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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

१० मीरां-बृहद्-पद-संग्रह
पावडी¹ पंगलियां चापसी² माला बुझै मन की बात ।
हरिदास दर्जी की बीनती जी, धोला³ वस्त्र सिमाओ जी ।
देर नगारो⁴ मीराँ चढ गयी, माता हियो मत हारो जी ।
बागा मे बोली कोयली, बन मे दादुर मोर ।
मीराँ ने गिरिधर मिलिया जी, र्नागर नन्द किशोर ॥७॥†
उपर्युक्त पद से यह अज्ञात ही रह जाता है कि ऐसी दृढ अभि-
व्यक्ति किसके प्रति हुई ? बहुत सम्भव है कि यह हरिदास दर्जी
नामक कोई "रैदासी" सत ही मीराँ के गुरु "रैदास" हों ।
८
कोई कछु कहो रे रग॰लाग्यो, रगलाग्यो भ्रम भाग्यो ।
लोग कहैं मीराँ भई बावरी, भ्रम दूनी ने खा गयो ।
कोई कहै रग लाग्यो ।-
मीराँ साधा मे यूँ रम बैठी, ज्यूँ गूदड़ी मे तागो ।
सोने मैं सुहागो ।
मीराँ सूती अपने भवन में, सतगुरु आय जगा गयो ।
ज्ञानी गुरु आय जगा गयो ॥८॥†
९
थांने बरज बरज मैं हारी, भाभी मानो बात हमारी ।
राणे रोस कियो था ऊपर, साधो मे मत जारी ।
कुल को दाग लगै छे भाभी, निन्दा हो रही भारी ।
साधो रे सग बन बन भटको, लाज गमाई सारी ।
बड़ा घरां मे जन्म लियो छे, नाचो दै दै तारी ।
बर पायो हिंदुवाणै सूरज, अब बिदल मे काई धारी ।
मीराँ गिरधर साध सग तज, चलो हमारे लारी ।
१ खडाऊ या चप्पल, २ दबावेगी, ३ डंके की चोट,

मतभेद ११
मीराँ : मीराँ बात नही जग छानी, ऊदाँ समझो सुघर संयानी ।
साधू मात पिता मेरे, सजन सनेही ग्यानी ।
सत चरण की सरण रैण दिन, सत्त कहत हू बानी ।
राणा ने समझाओ जाओ, मै तो बात न मानी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सता हाथ बिकानी ।
ऊदाँ . भाभी ' बोलो बात बिचारी* ।
साधो की संगति दुख भारी, मानो बात हमारी ।
छापा तिलक गलहार उतारो, पहिरो हार हजारी ।
रतन जडित पहिरो आभूषण, भोगो भोग अपारी ।
मीराँ जी थे चालो महल मे, थाँनें सोगन म्हांरी ।
मीराँ. 'भाव भगत भूषण सजे, सील सतो सिंगार ।
ओढी चूनर प्रेम की, म्हारो गिरधर जी भरतार ।
ऊदाँ बाई मन समझ, जाओ अपने धाम ।
राज पाट भोगो तुम ही, हमसे न तासू काम ॥९॥
१०
म्हांरी बात जगत सूँ छानी, साधा सूँ नही छानी री ।
साधू मात पिता कुल मेरे, साधू निरमल ग्यानी री ।
राणा ने समझाओ बाई, (ऊदाँ) मै तो एक न मानी री ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सतन हाथ बिकानी री ॥१०॥†
इस पद को स्वतन्त्र पद न मानकर पद स. ७ की ही कुछ पंक्तियो
“मीराँ गिरिधर ˙ ˙ हाथ बिकानी” का ही गेय रूपान्तर मानना
अधिक युक्ति-सगत प्रतीत होता है। प्रथम पंक्ति के सिवा अन्य
पंक्तियों पर ब्रजभाषा की छाप स्पष्ट है।

१२ मीराँ-बृहत्-पद-संग्रह
११
भाभी मीराँ ! कुल ने लगायी गाल, ईंडर गढ़ ते आया ओलमा¹ ।
बाई ऊदाँ ! थॉरे म्हॉरे नातो नाहि, बासो बस्या का आया जी ओलमा ।
भाभी मीराँ ! साधॉ को सग निवारि, सारो सहर थॉरी निन्दा करै ।
बाई ऊदाँ करे तो पड़या झख मारो, मन लाग्यो रमता राम सूँ ।
भाभी मीराँ पहरो नी मोत्या को हार, गहणो पहर्यो रतन जडाव को ।
बाई ऊदाँ छोड़यो मोत्यां को हार, गहणो तो पहर्यो सील सन्तोष को ।
भाँभी मीराँ ! औरॉ के आवे छै आच्छी² रूढी जान,
थॉरे आवे हरिजन पावनॉ ।
बाई ऊदाँ चौबसियां³ झाँक, साधॉ को मडल लागे सुहावणो ।
भाभी मीराँ ! लाजे गढ चितौड, राणो जी लाजै गढ़ रा राजबी ।
बाई ऊदाँ ! तार्यो तार्यो चित्तौड, राणा जी तार्या गढ रा राजवी ।
भाभी मीराँ ! लाजै लाजै थाँरू मायड बाप, पीहर लाजै जी मेडतो ।
बाई ऊदाँ ! तार्या म्हें तो मायड बाप, पीहर तार्यो जी मेडतो ।
भाभी मीराँ ! राणा जी कियो छै थां पर कोप, रतन कचोले विष घोलियो।
बाई ऊदाँ ! घोल्यो तो घोलवा द्यो कर, चरणामृत वो ही म्हू पीवस्यां ।
भाभी मीराँ ! देखतड़ा ही मर जाय, विष तो कहिए बासक नाग को ।
बाई ऊदाँ ! नही म्हारे माय र बाप, अमर डाली धरती झेलिया ।
भाभी मीराँ ! राणा उभा छै थारे द्वार, पोथी मागें छै थारे ज्ञान की ।
बाई ऊदाँ ! म्हारी खाँड़ा री धार, ज्ञान निभावन राणा छै नही ।
भाभी मीराँ ! राणा जी रो बचन न लोप, उन रूठ्यां भीड़ी कोऊ नहीं ।
बाई ऊदाँ ! रमापति आवे म्हारी भीड़, अरज करूं छूँ तांसू बीनती ॥११॥
१२
भाभी मीराँ हो साधा को संग निवारि,
थारी लोक निन्दा करै ।
१ शिकायत, २ भली सुन्दर, ३ बरॉमदा ।

१४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
साचाँ साहिब जी यो दुख सह्यो न जाई,
हीवडो तो सुमर भर्चो
सांचा साहिब जी बिदद री लाज,
कर जोडे मीराँ बिनती करै ॥१२॥ †
उपर्युक्त पद मे कुम्भा जी तथा दूदा जी का नाम आया है, यह
विचारणीय है। ऐसे पदो से यही स्पष्ट हो जाता है कि मीराँ का विवाह
“कुँवर” से नही अपितु “राणा” से ही हुआ था, परन्तु यही एक पद
ऐसा है जिसके आधार पर यह राणा कौन थे, इस पर प्रकाश पडता
है। पद की पक्ति “राणा जी रा बाघेला ...... मेडती” विशेष
महत्वपूर्ण है। इस अभिव्यक्ति के आधार पर कहा जा सकता है कि
मीराँ तक जहर का प्याला पहुँचाने वाले राणा के बाघेला सरदार ही
थे। पद विशेष विचारणीय है।
१३
ऊदाँ : माया थे क्यूँ रे तजी भाभी मीराँ, क्यूँ रे लियो बैराग,
काईं थारे मन बसी ।
मीराँ : याही म्हारे मन बसी ऊदाँ, यूँ लियो बैराग,
माया यूँ रे तजी ।
ऊदाँ . ऊचा नीचा बेसणा ये भाभी उत्तम तिहारी जात,
राणा सो वर पाइयो हे भाभी, नो कूँटाँ१ में थांरो राज ।
मीराँ : ऐसा तो मोती ओस का ये बाई, जैसी यो संसार,
लगै झकोलो पोन को ये बाई, छिन मे सब ढल जाय ।
ऊदाँ: खीर खांड को भोजन जीमो भाभी, ओढ़ो दिखनी चीर२ ।
राणा सो वर पाइयो थे भाभी, सब मह लाय थांरो सीर ।
१ कोना, दिशा, २ दिखनी चीर . दक्षिण से आया हुआ वस्त्र। राजस्थान
में इसको अति उत्तम और सुन्दर माना जाता है। अपनी बहुमूल्यता के कारण
यह राजघराने के ही उपयुक्त पड़ता है। अतः यह शब्द सुन्दर और कीमती
वस्त्र के लिए रूढ़ि रूप हो गया।

मतभेद १५
मीराँ खीर खाड को भोजन त्याग्यो ये बाई, त्याग्यो दिखणी चीर
राणा सो वर त्याग्यो ये बाई, सब संतन मे म्हारो सीर ।
ऊदाँ ॰ बास्या-कूस्या¹ टुकडा ये भाभी, और मिलेगी खाटी छार्य
रो रो भूखा मरो ये भाभी, नही मिलेगो हरि आय ।
मीराँ बास्या तो कूस्या टूकड़ा ये बाई, पीस्यां खाटी छाय² ।
म्हे रोवा भूखा मरा ये बाई, जब रे मिलेगो हरि आय ॥१३॥†
माया म्हे तो यूँ र तजी ।
१४
सुणजो जी थे भाभी मीराँ, थापे राणा जी कोप कियो छै जी ।
भाभी थारे मारणा कारणे, प्यालो हाथ लियो छै जी ।
उठ उठ भाजे रोस रो, या तो हाँथ खग लियो छै जी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, इमरत पान कियो छै जी ॥१४॥†
यह पद भी कोई स्वतन्त्र पद न होकर पद न० ११ की कुछ पंक्तियो
का ही गेय रूपान्तर प्रतीत होता है।
१५
अकोलो लाग्यो जी रग गिरधर को आन ।
गिरधर गिरधर काई करो, कोई गिरधर श्याम सुजाण ।
मीराँ तो चन्दा भई, कोई गिरधर उँग्यो भान ।
ऊदाँ थे तो बावली, कोई निहचै करल्यो ध्यान ।
आपा दोन्यू मिल भजा, कोई ज्यो गोप्योँ बिच कान³ ।
मीराँ ने गिरधर मिलिया जी, ममता रो राख्यो मान ॥१५॥†
पदाभिव्यक्ति असंगत है। कीर्तन मडली मे प्राय ऐसे गीत मिलते
हैं। प्राप्त इतिहास के आधार पर मीराँ की किसी ननद का नाम ऊदाँ
बाई नही मिलता। भोजराज की चार बहने थी। १. कुवरबाई
१ रूखा सूखा, २ छाँछ, मट्ठा, ३ कान्ह, कृष्ण।

१६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
२ पद्माबाई, ३ गंगाबाई और ४ राज बाई। प्रसिद्ध ऐतिहासिक गह
लोत जी के अनुसार मीराँ की एक ननद का डूगरगढ ब्याहा जाना सिद्ध
होता है। अद्यावधि प्राप्त इतिहास के आधार पर उपर्युक्त पदो को
प्रामाणिक मानना सम्भव नही।
१६
अब मीराँ मान लीजो म्हारी , हो जी थाने सखिया बरजे सारी।
राणा बरजे, राणी 'बरजे, बरजे सब परिवारी।
कुवर पाटवी सो भी-बरजे, और सहेल्या सारी।
सीस फूल सिर ऊपर सोहै, बिदली शोभा भारी।
साधन के ढिग बैठ बैठ के, लाज गमाई सारी।
नित प्रति उठि नीच घर जाओ, कुल को लगाओ गारी।
बडा घरा की छोरू कहावो, नाचो दे दे तारी।
वर पायो हिंदुवाणे सूरज, इब दिल मे काई धारी।
तार्यो पीहर, सासरो तार्यो, माय मोसाली तारी।
मीराँ ने सद्गुरु मिलिया जी, चरण कमल बलिहारी ॥१४॥।
पदाभिव्यक्ति के आधार पर यह स्पष्ट नही होता कि यह संवाद
किस के साथ हो रहा है। प्रथम दो पंक्तियो की अभिव्यक्ति अवश्य
ही कुछ नई सी प्रतीत होती है। परन्तु अन्य पंक्तियों को देखने से ऐसा
ही प्रतीत होता है कि ऊदाँ-मीराँ सवाद की भावनाओ की ही पुन-
रुक्ति हुई है। इतने अधिकारपूर्ण ढंग से विरोध किसी प्रभावशाली
निकट संबधी द्वारा ही संभव है। बहुत सम्भव है कि यह सवाद भी
ऊदाँ-मीराँ के बीच हुआ हो।
पद की प्रथम दो पंक्तियाँ विशेष महत्वपूर्ण है। "राणा" और
"राणी" तो विरोध करते ही हैं, इतना ही नही, "कुवर पाटवी सो
भी बरजे"। यह "कुंवर पांटवी" कौन है ? क्या यही भोजराज हे ?
प्राप्त इतिहास बताता है कि मीराँ का संघर्ष वैधव्य के बाद ही प्रारम्भ
॰ १ युवराज ।

मतभेद १७
हुआ, जब कि भोजराज के सौतेले छोटे भाई राज्याधिकारी बने।
उपर्युक्त पद के आधार पर मीराँ का संघर्ष भोजराज की जीवित-
अवस्था मे ही प्रारम्भ हो जाता है और वह भी कृष्ण की आराधना
हेतु नही अपितु इसलिये कि “नितप्रति उठि नीच घर जाओ” और
“नाचो दे दे तारी”।
अन्तिम पंक्ति मे वर्णित यह “सदगुरू” भी अब तक एक रहस्य
ही बने हुए है। सम्भव है कि “सदगुरू” कौन थे, यह जान लेने पर मीराँ
के जीवन वृतान्त पर गहरा प्रकाश पड सकेगा।
१७
नहि भावै थारो देसडलो रग रूडो¹।
थारे देसा मे राणा साध नही छै, लोग बसै सब कूड़ो।
गहना गाठी राणा हम सब त्याग्या, त्याग्या कर रो चूड़ो।
काजल टीकी हम सब त्याग्या, त्याग्या बाधन जूड़ो।
मेवा मिसरी मै सब त्याग्या, त्याग्या छै सक्कर बुरो।
तन की आस कबहु नहि कीनी, ज्यूँ रण माही सूरो।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, वर पायो मै पूरो ॥१७॥
पाठान्तर १,
नहि भावै थारो देसड़लो जी रूडो रूडो।
हरि की भगति करै नही कोई, लोग बसै सब कूडो।
पाटी माग उतारि धरूंगी, न पहिरू कर चूड़ो।
मीराँ हठीली कह सतन सो, वर पायो छै पूरो।
पाठान्तर २,
राणा जी थारो देसडलो रग रूडो।
थारे मुलक मे भक्ति नहि छै, लोग बसे सब कूड़े।
१ रंगो से भरा सजा हुआ सुन्दर।
२

१८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
पाट पटम्बर सब ही मै त्यागा, तज दियो कर रो चूडो ।
मेवा मिसरी मै सब ही त्यागा, त्यागा छै सक्कर बुरो ।
तन की मै आस कबहू नहि कीनी, ज्यूँ रण माहि सूरो ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, वर पायो छै पूरो ।
पाठान्तर ३,
राणा जी थारो देस्ड़लो छै रग रूड़ो ।
राम नाम की भक्ति न भावै, लोग बसै सब कूड़ो ।
मेवा मिठाई मीरा सब ही त्यागे, त्याग्यो छै सान और बुरो ।
गहणो तो गाठो मीरा सब ही त्याग्यो, त्याग्यो छै बैया रो चूड़ो ।
साल दुसाला मीरा सब सोई त्याग्या, सिर पर बांध्यो छै जूडो ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, बर पायो छै मीरा रूडो ।
पाठान्तर ४,
देसडलो रूड़ो रूडो, राणा जी थांरो देसडलो ।
भगत न भावै म्हारा राम की, लोग बसै सब छै कूड़ो ।
मेवा मिसरी सब ही त्याग्या, त्याग दियो छै बुरो ।
तन की आस कबहू नहि कीनी, ज्यूँ रण माहि सूरो ।
भाई मात कुटुम्बी त्याग्यो, त्याग दियो छै चूडो ।
घूँघट को पटि दूर कियो, सरि बाध्यौ छै जूड़ो ।
यो ससार भव दुख को सागर, मै हाकीयौ दूरो ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, वर पायो छै पूरो ।
यह पाठ भटनागर जी द्वारा किसी दादू पथी सत के सग्रह से
प्राप्त हुआ ।
१८
राणौ जी मेवाडो म्हांरे दाय न आवै ।
गिरधर मो मर्न भाया भोलि माय ।

मतभेद १९
राणा जी म्हारू रूस रह्यो है,
कडा वचन सुनाय भोली माय।
गुरू कृपा सूं सत पधार्या,
सता स्याम मिलाय भोली माय।
बाधि घूघरा नृत्य करू म्हे,
हरि गुण गाय रिझावा भोली माय।
मीराँ के प्रभु आस पराई,
गिरिधर सेजाँ आया भोली माय ॥१८॥†
पद की प्रथम पंक्ति की अभिव्यक्ति पद स० १७ की अभिव्यक्ति
से मिलती है। परन्तु शेष पदाभिव्यक्ति संर्वथा विभिन्न पडती है।
पदाभिव्यक्ति मे सगति का भी अभाव है। “भोली माय” जैसा
सम्बोधन पद की हर पंक्ति मे प्रयुक्त हुआ है जो विशेप विचारणीय है।
१९
अब नहि मानूँ राणा थारी, मै बर पायो गिरधारी।
मनि कपूर की एक गति है, कोऊ कहो हजारी।
ककर कचन एक गति है, गुंज मिरच इकसारि।
अनड घणी को सरणो लीनो, हाथ सुमिरंनी धारी।
जोग लियो जब क्या दलगीरी, गुरू पाया निज भारा।
साधू संगत मह दिल राजी, भइ कुटुम्ब सूं न्यारी।
क्रोड बार समझाओ मोकूँ, चालूँगी बुद्धि हमारी।
रतन जडित की टोपी सिर पै, हार कठ को भारा।
चरन घूघरू घमस पडत है, म्हे करा स्याम सूं यारी।
लाज सरम सब ही मै हारी, यौ तन चरण अधारी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, झक मारो संसारी ॥१९॥†

२० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
पाठान्तर १,
अब नहि मानाला म्हे थारी,म्हाने बर मिलि गिरधारी ।
मन कपूर की एक ही गति है, कहा कहू बार हजारी ।
ककर कचन एक गिणत है, गुज मिरच एक सारी ।
अनन्त धणी के सरणे आई, हाथ सुमिरणी धारी ।
जोग लियो जब बाद तजी री, गुर पाया निज भारी ।
साध सगत मेरो मंन राजी, भई कुटूब सू न्यारी ।
क्रोड बार समझावों मोकू, चालूगी बुद्धि हमारी ।
म्हे राणा के परत¹ न रहस्या, कई बार कह कह हारी ।
सौ बातन की एक बात है, अब तो समझ गवारी ।
रतन जडित की टोपी सिर पर, हार कठ को भारी ।
चरण घूंघरा घमस पडत है, “म्हे” कराँ स्याम सू न्यारी ।
लाज सरम तो सभी गुमाई, यो तन चरणा धारी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल बलिहारी ।†
उपर्युक्त पद निम्नांकित अन्तर के साथ भी पाया जाता है ।
१ अतिभारी । २. जब बाद तजी री । ३ में भई स्याम की प्यारी ।
पाठान्तर २,
अब तो नही म्हैं थांरी म्हांने, वर मिलिया गिरधारी ।
मन कपूर की एक ही गति है, कहा कहूं बार हजारी ।
ककर कंचन एक गिणत है, गुज मिरच इकंसारी ।
अनन्त धणी के सरणे आई, हाथ सुमिरणी धारी ।
जोग लियो जब सब ही त्याग्यो, गुरु पाया निज भारी ।
साध संगत मेरो दिल राजी, भई कुटुंब सू न्यारी ।
कोटि बेर समझावो मोकूं, चालूगी बुद्धि हमारी ।
म्हैं राणा के परत न जावा, केईं बेर कह हारी ।
१ लौट कर ।

मतभेद २१
सुवरण राग एक ही गति है, अब तो समझ गवारी१ ।
रतन जटित की टोपी सिर पर, हीरा कठी धारी ।
पाय घूघरा घमस पडत है, करी स्याम सू यारी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल बलिहारी ।†
उपर्युक्त पद मे अभिव्यक्त भावनाएँ विशेष महत्वपूर्ण है ।
पदाभिव्यक्ति से स्पष्ट होता है कि पद की रचना गृह त्याग के बाद
ही हुई है। “जोग लियो कह हारी” जैसी अभिव्यक्ति के
आधार पर ऐसा सम्भव प्रतीत होता है कि इस पद की रचना शायद
मीराँ को लौटा लाने के प्रयास के अवसर पर हुई है। पद की नवी
पक्ति मे प्रयुक्त “गवारी” सम्बोधन किसके प्रति हुआ, यह भी कही
से स्पष्ट नही होता । पद विशेष विचारणीय है ।
२०
अरे राणा पहली क्यो न बरजी, लागी गिरधारिया से प्रीत ।
मार चाहे छाँड राणा, नहीं रहू मै बरजी ।
सगुना साहिब सुमरता रे, मै थारे कोठे खटकी ।
राणा जी भेज्या विष रा प्याला, कर चरणामृत गटकी ।
दीनबन्धु सांवरिया है रे, जाणत है घट घट की ।
म्हांरे हिरदा माहि बसी है, लटकन मोर मुकुट की ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मै छू नागर नटकी ॥२०॥†
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सम्बन्ध का निर्वाह नही हुआ है ।
२१
राणा जी म्हाने या बदनामी लागे मीठी ।
कोई निन्दो कोई बिन्दो, मे चलूगी चाल अनूठी ।
साकली गली मे सतगुरु मिलिया, क्यूकर फिरू अपूठी ।
सदगुरु जी सू बाता करता, दुरजन लोगा ने दीठी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, दुरजन जलो जा अँगीठी ॥२१॥
१ कहाँ

२२ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
पाठान्तर १,
याहीं बदनामी मीठी हो, राणा जी, याही वदनामी मीठी।
रावली ड्योढया म्हाने सतगुरु मिलिया,किस बिध फिरूगी अपूठी।
सत सगति मे ग्यान सुणै छी, दुरजन लोगा मोहि दीठी।
यो मून मेरो हरि मे बसियो, जैसे रंग मजीठी।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, दुरजन जलो ज्यूँ अगीठी।
पाठान्तरपुर २,
राणा जी म्हाने याही बदनामी मीठी ।
साकडली सेरयां जन मिलिया, क्यू कर फिरू अपूठी।
राम जी सू मे तो बात करै छी, दुरजन लोगा ने दीठी।
बुरा जी कहो नै कोई,भला जी कहो नै,नै आनो किस की बसीठी।
जन मीराँ के है निन्दक प्राणी, जल बलि होई अगीठी । †
पाठान्तर ३,
राणा जी मुझे यह बदनामी लगे मीठी।
कोई निन्दो कोई बिन्दो, मै चलूगी चाल अपूठी।
साकली गली मे सतगुरु मिलिया, क्यू कर फिरूं अपूठी।
सतगुरु जी सू बातज करता, दुरजन लोगा ने दीठी।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, दुरजन जलो जा अंगीठी।†
इस पाठ की प्रथम दो पक्तियों पर भाषा की दृष्टि से आधुनिक प्रभाव हे।
प्रभाव हे।
पाठान्तर ४,
राणा जी म्हाने या बदनामी लागे मीठी।
थे तो राणा जी राजकवर छो, म्हे राठोडा री बेटी।
भलाई कहो म्हांने बुराई कहौ जी, नही माना रे किसी की।

मतभेद २३
साकडी गली मे म्हारा सतगुरु मिलिया, कैसे फिरूगी अपूठी।
खभ फाड मीराँ कने गरज्जा, दुरजन जलाये अगीठी । †
पाठान्तर ५,
राणा जी म्हाने या बदनामी लागे मीठी।
थारो रमैयो मीरा म्हाने बतावो, नाहि तो भक्ति थारी झूठी ।
म्हारो रमैयो थारे घट मे बिराजे, थांरे हिये की क्यू फूटी ।
प्रेम सहित मै करूगी रसोई, म्हारे गिरधर के भोग लगाई । १
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, रग दियो रग मजीठी' । †
पद की तीसरी पक्ति की अभिव्यक्ति व भाषा शेष पद से सर्वथा
भिन्न पडती है। अन्य पाठान्तरो मे भी ऐसी अभिव्यक्ति नही
मिलती। अत इस पक्ति को तो निश्चित रूपेण प्रक्षिप्त कहा जा
सकता ह।
२२
माई । म्हॉरे साधॉ रो इक्तयार२ है।
साधु ही पीहर, साधु ही सासरो, साँवरिया भरतार ह।
जात पाँत कुल कुटुम्ब कबीला, साधू ही परवार है।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, रमस्याँ साधा री लार३ है ॥२२॥
१ मजीठी। यह रग राजस्थान मे विशेष रूप से बनाया जाता है।
कई विभिन्न वनस्पतियो का रस मिला कर उबाल दिया जाता है। इस खौलते
हुए रस मे ही कपडा भिगो देते हैं । कपडे का रग कुछ कालिमा लिए हुए लाल
हो जाता हैं। साथ ही, बनस्पतियो के कारण, कपडे मे कुछ हल्की सी सुगन्ध
भी हो जाती है। यह रग और सुगन्ध कपडे के चिथडे चिथड़े हो जाने के बाद
भी नही छूटता । अत 'रग दियो रग मजीठी' एक मुहावरा भी बन गया है।
जिस का अर्थ है कि कभी न छूटने वाला रग। २ जोर, दबाव, ३ पीछे।

२४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
मिश्रित भाषा में प्राप्त पद
१
राणा जी ! अब न रहूगी तोरी हटकी ।
साध-संग मोहि प्यारा लागै, लाज गई घूँघट की ।
पीहर मेडता छोड़ा आपणा, सुरत निरत दोऊ चटकी ।
सतगुरु मुकुर दिखाया घट का, नाचूंगी दे दे चुटकी ।
हार सिगार सभी ल्यौ अपना, चूडी कर की पटकी ।
मेरा सुहाग अब मोकूँ दरसा, और न जाने घट की ।
महल किला राणा मोहि न चाहिये, सारी रेशम पट की ।
हुई दिवानी मीराँ डोलै, केस लटा सब छिटकी ॥२३॥
पाठान्तर १,
अंब न रहूगी अटकी, मन लाग्यो गिरधर से ।
माणक मोती परत न पहिरू, में तो कब की नटकी ।
गहणे म्हारे माला कंठी, और चनण की कुटकी ।
राजपणा की रीत गुमाई, साधा रे संग भटकी ।
जेठ भऊ की लाज न राखी, घूँघट परै जो पटकी ।
म्हाने गुरू मिलिया अविनासी, दई ज्ञान की गुटकी ।
नित प्रति उठि जाऊं गुरू दरसण, नाचूँ दै दे चुटकी ।
लागी चोट निज नाम धणी की, म्हांरे हिवड़े खटकी ।
परम गुरू के सरणै जाऊ, करू प्रणाम सिर लंटकी ।
साधा के सग करम लिखायो, हर सागर मे लटकी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जनम मरण से छुटकी । †
उपर्युक्त पाठ के प्राय. सभी क्रिया पद खड़ी बोली मे है ।

मतभेद २५
पाठान्तर २,
अब ना रहूगी स्याम अटकी, अजी म्हारो गिरधर से लाग्यौ
माणक मोती परत न पहिनूँ, मै तो नट गई कब की ।
गहणो म्हारे माला कठी, और चन्दन की कुटकी ।
राजापणा 'की रीति गुमाई, साधन के संग भटकी ।
जेठ भऊ की लाज न राखी , घूँघट परै जो पटकी ।
राज रीति मे करम लिखायो, हरि सागर मे लटकी ।
चोट लगी निज नाम हरि की, सो म्हारे हिवडे खटकी ।
प्रेम गुरा के चरण गहू, परणाम करू सिर लटकी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जनम मरण सूं छुटकी ।
उपर्युक्त दोनो पाठो मे “जेठ भऊ की लाज न राखी” अभिव्यक्ति
विशेष महत्व पूर्ण है । प्रथम पाठ मे “राणा” को सम्बोधित किया गया
है । यद्यपि अन्य पाठो से यह नही मालूम पडता कि पद किसी विशेष
व्यक्ति को सम्बोधित करके कहा गया है। क्या यह “राणा” मीराँ
के जेठ है ? जैसा कि उपर्युक्त दोनो पाठान्तरो से प्रतीत होता है। तब
मीराँ किस की स्त्री थी ? अद्यावधि मान्य इतिहासानुसार मीराँ के
पति भोजराज ही पाटवी के कुमार थे ।
पाठान्तर ३,
अब न रहूगी अटकी, म्हारो मन लाग्यो गिरधर से ।
म्हाने गुरु मिलिया अविनासी , दई ज्ञान की गुटकी ।
लगी चोट निज नाम धणी की, म्हारे हिवड़े खटकी ।
माणक मोती मे न पहिनूँ, मै तो कब न नटकी ।
गहना म्हारे दोवड़ो, और चनणां की कुटकी ।
राजकुल की लाज गमाई, साधा के सग भटकी ।
नित प्रति उठि जाऊ गुरू दरसन, नाचूँ दै दै चुटकी ।
परम गुरा के सरणे जाऊ, करू प्रणाम सिर लटकी ।
जेठ बहू की काण न माना, पडो घूँघट पर पटकी ।

२६ मीराँ-वृहद्-पद-सग्रह
करम लिखायो साध सगत मे, हर सागर मे लटकी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, भव सागर से छटकी ।†
उपर्युक्त पाठ प्रथम पाठ के विशेष निकट पडता हे ।
पाठान्तर ४,
मेरो मन लाग्यो हरि जूं सूं, अब न रहूंगी अटकी ।
गुरू मिलिया रैदास जी, दीन्ही ज्ञान की गुटकी ।
चोट लगी निज नाम́ हरि की, म्हारे हिवडे खटकी ।
माणक मोती परत न पहिरू, मै कब की नटकी ।
गेणो तो म्हारे माला दोवडी, और चन्दन की कुटकी ।
राजकुल की लांज गमाई, साधा के सग भटकी ।
नित उठि हरि के मंदिर जास्या, नाचा दे दे चुटकी ।
भाग खुल्यो म्हारो साध संगत सूं, सांवरिया की बटकी ।
जेठ बहू की काण न मानूं, घूंघट पड गई पटकी ।
परम गुरा के सरण मै रहस्या, परणाम करा लुटकी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जनम मरण सूं छुटकी ।†
पाठान्तर ५,
रूप देख अटकी, तेरो रूप देख अटकी ।
देह ते बिदेह भई, दुरि परि सिर मटकी ।
मात पिता भ्रात बधु, सब ही मिल हटकी ।
हिरदा ते टरत नाहि मूरति नागर नटकी ।
प्रगट भयो पूरन नेह लोक जानें भटकी ।
मीराँ प्रभु गिरिधर बिन, कौन लहे घटकी ।†
इस पाठ की चतुर्थ पक्ति के उत्तराद्ध "मूरति नागर नटकी'
'पाठ के बदले "सूरति वा नटकी" पाठ भी मिलता है ।

मतभेद २७
पाठान्तर ६,
माई ! मै तो गोविन्द सो अटकी ।
चकित भए मै दृग दोऊ मेरे, लखि शोभा नटकी ।
शोभा अग अग प्रति भूषण, बनमाला लटकी ।
मोर मुकुट कटि किकनि राजे, दुति दामिनी पटकी ।
रमित भई हो सावरे के सग, लोग कहै भटकी ।
छुटि लाज कानि लोग, डर रह्यो न घर हटकी ।
बिना गोपाल लाल बिन सजनी, को जाने घटकी ।
मीराँ प्रभु के सग फिरेगी, कुज कुज भटकी ।†
पाठान्तर ५ और ६ की भाषा स्पष्ट रूपेण ब्रज भाषा है। भाषा
के इस अतर के साथ ही साथ भावाभिव्यक्ति मे भी कितना गहरा
अन्तर आ गया है। यह पहलू अत्यन्त विचारणीय ह। खडी बोली
से प्रभावित राजस्थानी भाषा मे प्राप्त सम्पूर्ण पाठो से सतमत का प्रभाव
स्पष्ट हो उठता है, जब कि ब्रजभाषा के पदो से वैष्णव प्रभाव ही
स्पष्ट होता है।
ब्रजभाषा में प्राप्त पद
१
बरजी मै काहू की नाहि रहू ।
सुनो री सखी तुम सो, या मन की साची बात कहू ।
साधु सगति करि हरि सुख लेऊ, जगतै हौ दूरि रहू ।
तन मन धन मेरो सब ही जावो, भल मेरो सीस लहू ।
मन मम लाग्यो सुमरन सेती, सब का मै बोल सहू ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, सद्गुरू शरण गहू । ॥२४॥
उपर्युक्त पाठ की प्रथम पक्ति मे निम्नांकित पाठान्तर पाए
जाता है —
सुनो री सखी तुम चेतंन होइ के, मन की बात कहू ।

२८ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
२
बरजी नाही रहूगी, म्हारो स्याम सुंदर भरतार।
इक बार बरजी, दोय बार बरजी, बरजी सो सो बार।
सासू बरजी ननदी बरजी, राणो जी दावदार।
मीराँ के प्रभु अविनासी, पूरण ब्रह्म अपार। ॥२५॥
पद की तीसरी पंक्ति का उत्तरार्द्ध विचारणीय है। "राणो जी
'दावदारा'' संकेत किस ओर है ? राणा पद के दावेदार कुंवर पाटवी
या दबदबेदार "रोबीले व्यक्तित्व वाले" राणा स्वयं, दोनो ही तरफ
इसको घटाया जा सकता है। इतिहास और मान्यताएं भी दुविधा-
जनक ही हैं। अतः उस आधार पर भी निर्णय नहीं किया जा
सकता।
३
काहू की मै बरजी नाही रहू।
जौ कोई मोकूँ एक कहै, मै एक की लाख कहू।
सास की जाइ मेरी ननद हठीली, यह दुख किन से कहू।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, जग उपाहस सहू ॥२६॥†
पदाभिव्यक्ति में असंगति है। साथ ही मीराँ जैसी भक्तिमती
नारी द्वारा ऐसी छोटी वृत्तियों का वर्णन, वह भी गृह त्याग के बाद
असम्भव ही प्रतीत होता है। पद की शुद्ध ब्रजभाषा को देखते हुए
ऐसा ही प्रतीत होता है कि वृन्दावन पहुंचने पर ही ऐसे पदों की रचना
हुई होगी।
पाठान्तर १,
मेरो मन लाग्यो सखी सांवरिया सो,
काहू की बरजी नाहि रहोंगी।
जो कोऊ मोको एक कहेगो,
एक कीं लाख कहोंगी।

मतभेद २९
सासु बुरी है, ननद हठीली,
यह दुख कोह बहोगी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर के कारण,
जग उपाह़ास सहोगी।†
इस पाठ की भाषा भी अशुद्ध है। “सहोगी, बह्रोगी” आदि न
तो राजस्थानी मे ही होता है और न ब्रजभाषा मे ही। खडी बोली
मे भी “सहूंगी” आदि होगा। अस्तु, ऐसे पद और उसके गेय रूपान्तरो
को प्रक्षिप्त कहा जा सकता है।
लगभग एक ही भाव को व्यक्त करने वाले इन पदो पर विभिन्न
भाषाओ का प्रभाव विचारणीय है। भाषा के अन्तर के साथ ही साथ
भावाभिव्यक्ति मे भी अन्तर पड गया है। बहुत सम्भव है कि इसी
तरह से मीराँ के अन्य पदो मे भी भाषा परिवर्त्तन के साथ ही साथ
भाव परिवर्तन भी हुआ हो। यह एक अत्यन्त गम्भीर विचारणीय
प्रश्न है।
४
नैना लोभी रे बहुरि सके नहि आय।
रोम रोम नख शिख सब निरखत, ललकि रहे ललचाय।
मै ठाढ़ी गृह आपने री, मोहन निकले आय।
बदन चन्द परकासत हेली, मन्द मन्द मुसकाय।
लोग कुटुम्बी बरजि बरजही, मानत पर हाथ गए बिकाय।
भली कहो कोई बुरी कहो, मै सब लई सीस चढ़ाय।
मीराँ प्रभु गिरिधरन लाल बिनु, पल भर रह्यो न जाय॥ २७॥†
पद की अन्तिम पंक्ति मे निम्नांकित पाठान्तर पाया जाता है।
“मीराँ के प्रभु गिरिधर के बिनि, पल भर रह्यो न जाय।”
कही कही पद की तीसरी पंक्ति “मै ठाढी . ललचाय” के
बाद निम्नांकित एक पंक्ति और भी मिलती है।

३० मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
“सरँग ओट तजे कुल अंकुस, बदन दिये मुसकाय ।”
उपर्युक्त पद मे आए ‘गिरिधरन लाल’ का प्रयोग विशेष
विचारणीय हे ।
५
नयन लागे तब घूँघट कैसो, लोक लाज तिनका ज्यूँ तोर्यो ।
नेकी बदी हूं सिर पर धारी, मन हाथी आंकुस दे मार्यो ।
प्रगट निसान बजाय चली, राणा राव सकल जग छोऱ्यो ।
मीराँ सबल धणी के सरणे, का भयो भूपति मुख मोर्यो ।।२८।।
पद की तृतीय पंक्ति विशेष महत्वपूर्ण ह। मीरा सिर्फ राणा
परिवार “श्वसुर कुल” का ही परित्याग नही कर रही हे, अपितु “राव
परिवार” “पितृ कुल” का भी त्याग कर रही हे। ऐसी ही अभिव्यक्ति
सघर्ष द्योतक एक और पद मै भी हे, जिसका प्रारम्भ होता हे “अब
नाहि बिसरू म्हारे हिरदे लिख्यो हरि नाम। ” सदेश वाहक द्वारा
लौट जाने का आग्रह किए जाने पर मीराँ का उत्तर है, “कर सूरापण¹
नीसरी, म्हारे कुण राणे कुण राव ।” इन दोनो ही पदो मे प्रयुक्त यह
“राव” शब्द विशेष विचारणीय है ।
इसी पंक्ति के पूर्वार्द्ध से व्यक्त होने वाली भावना “प्रगट निसान
बजाय चली” भी विरोधाभिव्यक्ति के राजस्थानी पद स० ५ म मिलती
हैं। माता के प्रति मीराँ का कथन “देर नगारो² मीराँ चढ़ गयी, माता
हियो मत हारी जी” यद्यपि मीराँ की दृढ भक्ति भावना अन्य पदों से भी
व्यक्त होती है, तथापि इस तरह की भावना अन्य पदों म नही मिलती ।
१ भीष्म प्रतिज्ञा, २ ताल ठोककर ।