सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 365 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 88

मतभेद २९
सासु बुरी है, ननद हठीली,
यह दुख कोह बहोगी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर के कारण,
जग उपाह़ास सहोगी।†
इस पाठ की भाषा भी अशुद्ध है। “सहोगी, बह्रोगी” आदि न
तो राजस्थानी मे ही होता है और न ब्रजभाषा मे ही। खडी बोली
मे भी “सहूंगी” आदि होगा। अस्तु, ऐसे पद और उसके गेय रूपान्तरो
को प्रक्षिप्त कहा जा सकता है।
लगभग एक ही भाव को व्यक्त करने वाले इन पदो पर विभिन्न
भाषाओ का प्रभाव विचारणीय है। भाषा के अन्तर के साथ ही साथ
भावाभिव्यक्ति मे भी अन्तर पड गया है। बहुत सम्भव है कि इसी
तरह से मीराँ के अन्य पदो मे भी भाषा परिवर्त्तन के साथ ही साथ
भाव परिवर्तन भी हुआ हो। यह एक अत्यन्त गम्भीर विचारणीय
प्रश्न है।
४
नैना लोभी रे बहुरि सके नहि आय।
रोम रोम नख शिख सब निरखत, ललकि रहे ललचाय।
मै ठाढ़ी गृह आपने री, मोहन निकले आय।
बदन चन्द परकासत हेली, मन्द मन्द मुसकाय।
लोग कुटुम्बी बरजि बरजही, मानत पर हाथ गए बिकाय।
भली कहो कोई बुरी कहो, मै सब लई सीस चढ़ाय।
मीराँ प्रभु गिरिधरन लाल बिनु, पल भर रह्यो न जाय॥ २७॥†
पद की अन्तिम पंक्ति मे निम्नांकित पाठान्तर पाया जाता है।
“मीराँ के प्रभु गिरिधर के बिनि, पल भर रह्यो न जाय।”
कही कही पद की तीसरी पंक्ति “मै ठाढी . ललचाय” के
बाद निम्नांकित एक पंक्ति और भी मिलती है।