मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ मीराँ-वृहद्-पद-सग्रह
करम लिखायो साध सगत मे, हर सागर मे लटकी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, भव सागर से छटकी ।†
उपर्युक्त पाठ प्रथम पाठ के विशेष निकट पडता हे ।
पाठान्तर ४,
मेरो मन लाग्यो हरि जूं सूं, अब न रहूंगी अटकी ।
गुरू मिलिया रैदास जी, दीन्ही ज्ञान की गुटकी ।
चोट लगी निज नाम́ हरि की, म्हारे हिवडे खटकी ।
माणक मोती परत न पहिरू, मै कब की नटकी ।
गेणो तो म्हारे माला दोवडी, और चन्दन की कुटकी ।
राजकुल की लांज गमाई, साधा के सग भटकी ।
नित उठि हरि के मंदिर जास्या, नाचा दे दे चुटकी ।
भाग खुल्यो म्हारो साध संगत सूं, सांवरिया की बटकी ।
जेठ बहू की काण न मानूं, घूंघट पड गई पटकी ।
परम गुरा के सरण मै रहस्या, परणाम करा लुटकी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जनम मरण सूं छुटकी ।†
पाठान्तर ५,
रूप देख अटकी, तेरो रूप देख अटकी ।
देह ते बिदेह भई, दुरि परि सिर मटकी ।
मात पिता भ्रात बधु, सब ही मिल हटकी ।
हिरदा ते टरत नाहि मूरति नागर नटकी ।
प्रगट भयो पूरन नेह लोक जानें भटकी ।
मीराँ प्रभु गिरिधर बिन, कौन लहे घटकी ।†
इस पाठ की चतुर्थ पक्ति के उत्तराद्ध "मूरति नागर नटकी'
'पाठ के बदले "सूरति वा नटकी" पाठ भी मिलता है ।