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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

संज्ञा-प्रकरणम् २६
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम् (-११) अणुदित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः ।१।१।६८॥
प्रतीयते-विधीयत इति प्रत्ययः । अविधीयमानोऽण् उदिच्च सवर्णस्य
सञ्ज्ञा स्यात् । अत्रैवाण् परेण णकारेण । कुँ, चुँ, टुँ, तुँ, पुँ—एत उदितः ।
तदेवम्—अ इत्यष्टादशानां सञ्ज्ञा, तथेकारोकारौ । ऋकारस्त्रिंशतः, एवम्
लृकारोऽपि । एचो द्वादशानाम् । अनुनासिकाऽननुनासिकभेदेन यवला द्विधा,
तेनाऽननुनासिकास्ते द्वयोर्द्वयोः सञ्ज्ञा ॥
अर्थः- जिस का विधान किया जाये उसे 'प्रत्यय' कहते हैं। अप्रत्यय अर्थात्
न विधान किया हुआ अण् और उदित् सवर्णों की तथा अपनी सञ्ज्ञा वाला हो।
अत्रैवाण्—केवल इसी सूत्र में अण् प्रत्याहार पर णकार से गृहीत होता है। 'कुँ, चुँ,
टुँ, तुँ, पुँ' इन को उदित् कहते हैं। इस प्रकार 'अ' यह अठारह प्रकार की सञ्ज्ञा वाला
हो जाता है। इसी प्रकार 'इ' और 'उ' भी। ऋकार तीस प्रकार की सञ्ज्ञा वाला
होता है। इसी प्रकार लृकार भी। एच् प्रत्याहार का प्रत्येक बारह २ प्रकार की
सञ्ज्ञा है। अनुनासिक और अननुनासिक भेद से य्, व्, ल् दो प्रकार के होते हैं, अतः
अननुनासिक य्, व्, ल् ही दो २ की सञ्ज्ञा होंगे।
व्याख्या- अण् ।१।१। उदित् ।१।१। सवर्णस्य ।६।१। च इत्यव्ययपदम्।
अप्रत्ययः ।१।१। स्वस्य ।६।१। (चकार के बल से स्वं रूपं शब्दस्याऽशब्दसञ्ज्ञा सूत्र
में 'स्वम्' पद आ कर षष्ठ्यन्त में परिणत हो जाता है)। समासः- उद्=ह्रस्व
उवर्णः इत् यस्मात् स उदित्, बहुव्रीहि-समासः । प्रतीयते==विधीयते इति प्रत्ययः,
प्रतिपूर्वाद् इणः कर्मणि अच्प्रत्ययः। न प्रत्ययः = अप्रत्ययः, नञ्तत्पुरुषसमासः । अर्थः-
(अप्रत्ययः) न विधान किया हुआ (अण्) अण् और (उदित्) उदित् (सवर्णस्य)
सवर्णियों की (च) तथा (स्वस्य) अपने स्वरूप की सञ्ज्ञा होता है।
'प्रत्यय' शब्द यहाँ यौगिक है, इस का अर्थ है 'विधान किया हुआ'। यथा-
इको यण् अचि (१५) सूत्र में 'यण्' और सनाद्यंसभिक्ष उः (८४०) सूत्र में 'उ'
विधान किया गया है। अतः ये दोनों प्रत्यय हैं।
अण् तथा इण् प्रत्याहार दो प्रकार से बन सकते हैं। एक-अ इ उ ण् के
णकार से और दूसरा लँण् के णकार से। कहां पूर्व णकार से तथा कहां पर णकार
से इन का ग्रहण करना चाहिये ? इस विषय में ऊहापोह द्वारा निश्चित भाष्य-सम्मत
निर्णय यह है-
परेणैवेण्ग्रहाः सर्वे, पूर्वेणैवाण्ग्रहा मताः ।
ऋतेऽणुदित्सवर्णस्येत्येतदेकं परेण तु ॥
अर्थात् इण् प्रत्याहार सर्वत्र पर लँण् वाले णकार से तथा अण् प्रत्याहार अणु-
दित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः (११) को छोड़ सर्वत्र अइउण् वाले णकार से ग्रहण करना
चाहिये । अणुदित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः सूत्र में अण् प्रत्याहार लँण् वाले णकार से ग्रहण
किया जाता है। इस नियम के अनुसार यहां 'अण्' पर णकार से ग्रहण होता है । तो

३० भैमोव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
इस प्रकार यहां 'अण्' में 'अ इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ, ह्, य्, व्, र्, ल्' इन
चौदह वर्णों का ग्रहण होता है। यदि ये वर्ण अविधीयमान (न विधान किये हुए)
होंगे तो अपनी तथा अपने सवर्णियों की सञ्ज्ञा होंगे। यथा—इको यण् अचि (१५)
यहां इक् और अच् अविधीयमान हैं—विधान नहीं किये गये (विधान तो यण् ही
किया गया है), इस से इक्-प्रत्याहारान्तर्गत 'इ, उ, ऋ, ऌ' ये चार वर्ण अपनी तथा
अपने सवर्णियों की सञ्ज्ञा होंगे। इस से 'सुधी +उपास्य' यहां दीर्घ ईकार के स्थान
पर भी यण् हो जाता है। एवम् अच् प्रत्याहार के अन्तर्गत 'अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए,
ओ, ऐ, औ' ये नौ वर्ण भी अपनी तथा अपने सवर्णियों की सञ्ज्ञा होंगे। इस से 'दधि
+आनय = दध्यानय' यहां दीर्घ आकार के परे होने पर भी यण् सिद्ध हो जाता है।
'कुं, चुं, टुं, तुं, पुं' ये इस शास्त्र में उदित् माने जाते हैं। इन के उकार की
उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र से इत्सञ्ज्ञा होती है। यद्यपि 'कुं, चुं, टुं, तुं, पुं'
इन समुदायों का कोई सवर्ण नहीं होता तथापि इन समुदायों के आदि वर्ण 'क्, च्,
ट्, त्, प्' के सवर्णों का तथा उन के स्वरूप का यहां ग्रहण समझना चाहिये। 'क्' के
सवर्ण 'ख्, ग्, घ्, ङ्' ये चार वर्ण हैं अतः 'कुं' कहने से इन चार वर्णों तथा पांचवें
अपने रूप 'क्' अर्थात् कुल मिला कर पांच वर्णों का ग्रहण होगा। इसी प्रकार 'चुं'
से चवर्ग, 'टुं' से टवर्ग, 'तुं' से तवर्ग तथा 'पुं' से पवर्ग का ग्रहण होगा।
उदित् के साथ 'अप्रत्यय' का सम्बन्ध नहीं है, अतः उदित् चाहे विधीयमान
हो या अविधीयमान, प्रत्येक अवस्था में अपनी तथा अपने सवर्णों की सञ्ज्ञा होगा।
यथा—चोः कुः (३०६) यहां 'चुं' अविधीयमान और 'कुं' विधीयमान है, दोनों अपने
तथा अपने सवर्णों के ग्राहक होंगे। 'अण्' के साथ 'अप्रत्यय' का सम्बन्ध इस लिये
किया गया है कि सनाशंसभिक्ष उः (८४०) इत्यादि स्थानों में विधीयमान उकार
आदि सवर्णों के ग्राहक न हों, इस से दीर्घ ऊकार आदि प्रसक्त न होंगे।
अब अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ, ह्, य्, व्, र्, ल् ये सञ्ज्ञाएं हैं, इन
के सञ्ज्ञी निम्नप्रकार से होते हैं।
अ, इ, उ
इन सञ्ज्ञाओं के पीछे लिखे अनुसार अठारह २ सञ्ज्ञी होते हैं।
ऋ, ऌ
वार्त्तिक (१) से इन दोनों की सवर्णसञ्ज्ञा हो जाने के कारण प्रत्येक वर्ण
के तीस २ सञ्ज्ञी होते हैं। ('ऋ' के १८ + 'ऌ' के १२ = ३०)।
ए, ओ, ऐ, औ
ह्रस्व न होने के कारण इन सञ्ज्ञाओं में से प्रत्येक वर्ण के पीछे लिखे अनु-
सार बारह २ सञ्ज्ञी होते हैं।
य्, व्, ल्
ये दो प्रकार के होते हैं, एक अनुनासिक और दूसरे अननुनासिक। अण् प्रत्या-
हार में अननुनासिक य्, व्, ल् का पाठ है, अतः अननुनासिक ही अपनी तथा दूसरे

संज्ञा-प्रकरणम् ३१
अनुनासिकों की संज्ञा होते हैं। यहां यह भी समझ लेना चाहिये कि दीर्घ तथा प्लुत
वर्ण अण्प्रत्याहारान्तर्गत न होने से सवर्णों के ग्राहक नहीं हुआ करते। ह्रस्व वर्ण ही
(एच् दीर्घ ही) अणों में गृहीत होते हैं, अतः वे ही सवर्णों के ग्राहक हैं।
रेफ और हकार अणों के अन्तर्गत होते हुए भी किसी अन्य वर्ण के ग्राहक
नहीं होते, क्योंकि शिक्षाकारों का कथन है कि-रेफोष्मणां सवर्णा न सन्ति अर्थात्
रेफ और ऊष्म वर्णों के सवर्ण नहीं हुआ करते।
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम् - (१२) परः संनिकर्षः संहिता ।१।४।१०८॥
वर्णानामतिशयितः सन्निधिः संहिता-सञ्ज्ञः स्यात् ॥
अर्थः-वर्णों की अत्यन्त समीपता संहिता-सञ्ज्ञक होती है।
व्याख्या-परः ।१।१। सन्निकर्षः ।१।१। संहिता ।१।१। अर्थः- (परः) अत्यन्त
(सन्निकर्षः) सामीप्य (संहिता) 'संहिता' सञ्ज्ञक होता है। दो वर्णों के मध्य आधी
मात्रा से कम का व्यवधान सम्भव नहीं हो सकता; यही अत्यन्त समीपता 'संहिता'
कहाती है। संहितासंज्ञा का सोदाहरण विवेचन आगे (१५) सूत्र पर देखें।
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम् - (१३) हलोऽनन्तराः संयोगः ।१।१।७॥
अजिभिरव्यवहिता हलः संयोग-सञ्ज्ञाः स्युः ॥
अर्थः-अचों के व्यवधान से रहित हलों की 'संयोग' सञ्ज्ञा हो।
व्याख्या-हलः ।१।३। अनन्तराः ।१।३। संयोगः ।१।१। समासः--अविद्य-
मानम् अन्तरम् = व्यवधानं येषान्तेऽनन्तराः, बहुव्रीहि-समासः। अर्थः- (अनन्तराः)
जिन में अन्तर अर्थात् व्यवधान नहीं ऐसे (हलः) हल् (संयोगः) संयोग-सञ्ज्ञक होते
हैं। व्यवधान (परदा) सदा विजातियों का ही हुआ करता है; सजातियों का नहीं।
हल् के विजातीय अच् हैं। अतः यदि हल्, अचों के व्यवधान से रहित होंगे तो उन
की संयोग सञ्ज्ञा होगी। सूत्र में 'हलः' पद में बहुवचन विवक्षित नहीं, किन्तु जाति
में बहुवचन किया गया है। इस से दो या दो से अधिक हलों की संयोग-सञ्ज्ञा सिद्ध
हो जाती है। उदाहरण यथा--मृट् । यहां 'भृस्ज्' शब्द के आगे 'सुँ' प्रत्यय के अपृक्त
सकार का लोप होने पर स् और ज् की संयोग-सञ्ज्ञा हो कर स्कोः संयोगाद्योरन्ते च
(३०६) सूत्र से संयोग के आदि सकार का लोप हो जाता है। इसी प्रकार 'इन्द्रः' में
नकार दकार और रेफ की, 'उष्ट्रः' में षकार टकार और रेफ की संयोगसञ्ज्ञा समझनी
चाहिये।
नोट-ध्यान रहे कि प्रत्येक हल् की संयोगसञ्ज्ञा नहीं होती किन्तु सम्पूर्ण
हल्-समुदाय की ही हुआ करती है। फिर चाहे वह हल्-समुदाय दो हलों का हो अथवा
दो से अधिक हलों का।
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम् - (१४) सुँप्तिङन्तं पदम् ।१।४।१४॥
सुबन्तं तिङन्तञ्च पदसञ्ज्ञं स्यात् ॥
अर्थः-सुँबन्त और तिङन्त शब्द-स्वरूप पद-सञ्ज्ञक होते हैं।

३२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
व्याख्या — सुप्तिङन्तम् १।१। पदम् १।१। समास — सुप च तिङ् च सुप्तिङौ, इतरे-
तरद्वन्द्वः । सुप्तिङौ अन्तो यस्य तत्—सुप्तिङन्तम् (शब्दस्वरूपम्), बहुव्रीहि समास ।
अर्थ — (सुप्तिङन्तम्) सुबन्त और तिङन्त शब्द-स्वरूप (पदम्) पद-सञ्ज्ञक होते हैं ।
यहां शब्दानुशासन-शास्त्र के प्रस्तुत होने से सुप्तिङन्तम् पद का 'शब्द-स्वरूपम्' विशेष्य
अध्याहार कर लिया जाता है । स्वौजसमौट्० (११८) सूत्र से विधान किये गये इक्कीस
प्रत्यय 'सुप्' तथा तिप्तस्झिसिप्० (३७५) सूत्र से विधान किये गये अठारह प्रत्यय
'तिङ्' कहाते हैं । ये सुप् वा तिङ् प्रत्यय जिसके अन्त में हों उन की पद-सञ्ज्ञा होती
है । यहां यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि इन प्रत्ययों से युक्त सम्पूर्ण समुदाय
की ही पद सञ्ज्ञा होती है । केवल प्रकृति वा प्रत्यय की नहीं । उदाहरण यथा—
‘रामः पुष्प, देवस्य पुष्पस्य’ इत्यादि सुप् अन्त में होने के कारण ‘पदसञ्ज्ञक’ हैं ।
पचति, पठति अपचत् अपठत् —इत्यादि तिङ् अन्त में होने के कारण पदसञ्ज्ञक हैं ।
पदसञ्ज्ञा का प्रयोजन आगे (७७ ८० ६३ १०५ आदि) सूत्रों से स्पष्ट होगा । इस सूत्र
में 'अन्त' ग्रहण का प्रयोजन आगे (१५४) सूत्र पर स्पष्ट करेंगे ।
[लघु०] इति सञ्ज्ञा-प्रकरणं समाप्तम् ॥
अर्थ —यह सञ्ज्ञा प्रकरण समाप्त होता है ।
व्याख्या —इस प्रकरण में यद्यपि व्याकरण-गत सम्पूर्ण सञ्ज्ञाओं का समावेश
नहीं किया गया तथापि सन्धि-प्रकरण के लिये उपयोगी प्रायः सभी सञ्ज्ञाओं का
इस में वर्णन आ गया है । 'प्रायः' कथन का यह तात्पर्य है कि अदेङ् गुण (२५),
वृद्धिरादैच् (३२), अचोऽन्त्यादि टि (३६), तस्य परमाम्रेडितम् (६६) प्रभृति सूत्रों
से गुण, वृद्धि, टि और आम्रेडित आदि अन्य भी सन्ध्युपयोगी सञ्ज्ञाएं आगे कही
गई हैं ।
अभ्यास (१)
(१) 'क्, श्, ए, व्, ऌ, म्, ख्, ह्, अ, र्, औ, ऋ' इन वर्णों के स्थान तथा
दोनों प्रकार के यत्न लिख कर यथासम्भव सवर्णों का भी निर्देश करें ।
(२) 'अण्, टव्, रल्, जश्, यण्, छव्, मय्, झय्, रँ' इन प्रत्याहारों की प्रसून
सिद्धि कर तदन्तर्गत वर्णों का संक्षिप्तरीत्या उल्लेख करें ।
(३) अचों में परस्पर कितने प्रकार का अन्तर सम्भव है, उदाहरण द्वारा
स्पष्ट करें ।
(४) कौन सूत्र 'ऋ' सञ्ज्ञा करता है ? इस के कितने और कौन से सञ्ज्ञी
होते हैं ?
(५) अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय सूत्र में 'अप्रत्यय' पद का क्या अभिप्राय है
और इस का किस के साथ सम्बन्ध है ? सोदाहरण स्पष्ट करें ।
(६) सञ्ज्ञा और सञ्ज्ञी स्पष्ट करते हुए अदर्शनं लोप सूत्र के 'अदर्शनम्'
पद का विवेचन करें ।

संज्ञा-प्रकरणम् ३३
(७) 'इतः' पद के पीछे से प्राप्त होने पर भी तस्य लोपः सूत्र में 'तस्य' पद
के ग्रहण का क्या प्रयोजन है ?
(८) उदात्त, अनुदात्त और स्वरित में परस्पर भेद बताएं ।
(६) 'उपदेश' किसे कहते हैं ? यथाधीन स्पष्ट करें ।
(१०) अष्टाध्यायी किस ने बनाई है ? इस में कितने अध्याय और कितने
पाद हैं ? लघु-सिद्धान्त-कौमुदी के साथ अष्टाध्यायी का क्या संबन्ध है ?
(११) त्रिमुनि व्याकरणम् और उत्तरोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम् का भाव स्पष्ट
करें ।
(१२) लघु-सिद्धान्त-कौमुदी शब्द का अर्थ लिख कर इस के कर्त्ता के विषय
में संक्षिप्त नोट लिखें ।
(१३) 'उ' और 'ई' में, 'ऋ' और 'ऌ' में, 'ए' और 'ओ' में, 'ओ' और 'औ'
में पारस्परिक भेद बताएं ।
(१४) आभ्यन्तर और बाह्य यत्नों के भेद लिख कर उन का सार्थ विवेचन
करें ।
(१५) यदि सम्पूर्ण स्थान तुल्य होने पर ही सवर्ण-सञ्ज्ञा होती है तो क्या
'क्' और 'ङ्' की सवर्णसञ्ज्ञा नहीं होगी ?
(१६) 'ऌ' और 'ऐ' के बारह-बारह भेद सूत्रों द्वारा सिद्ध करें ।
(१७) 'संयोग' सञ्ज्ञा क्या प्रत्येक वर्ण की है या समुदाय की ? स्पष्ट करें ।
(१८) अर्ध-विसर्ग-सदृश उपध्मानीयः इस वचन का विवेचन करें ।
(१६) निम्न-लिखित सूत्रों का सूत्रस्थ पदों द्वारा अर्थ निकाल कर व्याख्यान
करें—तुल्यास्य-प्रयत्नं सवर्णम् । अणुदित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः । हलोऽ-
नन्तराः संयोगः । ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः । समाहारः स्वरितः ।
(२०) पद, संहिता, अनुनासिक और लोप सञ्ज्ञा करने वाले सूत्र सार्थ लिखें ।
(२१) इति सञ्ज्ञा-प्रकरणं समाप्तम् इस वचन की विस्तृत समालोचना करें ।
(२२) विसर्जनीय के स्थान का शास्त्रीत्या विवेचन करें ।
(२३) सूत्रों के आगे मुद्रित तीन संख्याओं का क्या तात्पर्य होता है ?
(२४) किस २ प्रत्याहार के अन्तर्गत निम्नस्थ वर्ण आते हैं ?
श्, ष्, स्; य्, व्, र्, ल्; च्, ट्, त्, क्, प्; वर्गतृतीय; वर्गपञ्चम ।
इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त-
कौमुद्यां सन्ध्युपयोगिसंज्ञानां
प्रायोवर्णनं समाप्तम् ॥
ल० प्र० (३)

अथाऽच्सन्धि-प्रकरणम्
अब अचों की सन्धि का प्रकरण प्रारम्भ किया जाता है । इस प्रकरण में अचों
अर्थात् स्वरों का प्रायः स्वरों के साथ मेल दिखाया जायेगा ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (१५) इको यणचि ।६।१।७४॥
इकः स्थाने यण् स्यादचि संहितायां विषये । 'सुधी + उपास्य' इति
स्थिते—
अर्थ — संहिता के विषय में अच् के विद्यमान होने पर इक् के स्थान पर यण्
हो जाता है । 'सुधी + उपास्य' ऐसा स्थित होने पर (अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है) ।
व्याख्या — इक् ।६।१। यण् ।१।१। अचि — भावसप्तम्यन्तम्¹ । संहितायाम्—
विषयसप्तम्यन्तम् (संहितायाम् यह पीछे से अधिकार चला आ रहा है) । महामुनि
पाणिनि ने अपने सूत्रों का अर्थज्ञान कराने के लिए कुछ विशेष नियम बनाये हैं, जो
कि अष्टाध्यायी के प्रथमाध्याय के प्रथमपाद के अन्तर्गत हैं, यह हम पीछे कह चुके
हैं। उन में षष्ठी स्थानेयोगा (१ १ ४८) यह भी एक नियम है। इस का तात्पर्य यह
है कि इस शास्त्र में षष्ठीविभक्ति का अर्थ 'स्थान पर' ऐसा करना चाहिये । यथा—
'इक' ।६।१। इस का अर्थ हुआ इक् के स्थान पर' । 'एच' ।६।१। इस का अर्थ हुआ
'एच् के स्थान पर' । परन्तु यह नियम वहां लागू नहीं होगा, जहां सम्बन्ध पहले से
नियत किया गया होगा । यथा — ऊद् उपधाया गोहः ( ६ ४ ८६) । ऊठ् ।१।१। उप-
धाया ।६।१। गोहः ।६।१। यहां गोह् का सम्बन्ध उपधा से नियत किया गया है, अतः
यहाँ स्थानषष्ठी का प्रसङ्ग न होगा । इस विषय का विस्तार काशिका (अष्टाध्यायी
की सुप्रसिद्ध व्याख्या) आदि में देखना चाहिये । यहां 'इक' इस में स्थानषष्ठी है इस
से 'इक् के स्थान पर' ऐसा इस का अर्थ होगा । 'अचि' यहां भावसप्तमी या सति-
सप्तमी है² । अर्थ — (इकः) इक् के स्थान पर (यण्) यण् होता है (अचि) अच्
होने पर (संहितायाम्) संहिता के विषय में । अच् विद्यमान हो तो संहिता के विषय
में अर्थात् संहिता करने की इच्छा होने पर इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) के स्थान पर यण्
(य्, व्, र्, ल्) करना चाहिये । यहां यण् विधान किया गया है, अतः यह अण्
प्रत्याहार के अन्तर्गत होता हुआ भी अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय (११) से अपने
सवर्णियों (अनुनासिक यँ, वँ, लँ वर्णों) का ग्राहक नहीं होगा । इक् और अच् दोनों
अविधीयमान अण् हैं, अतः ये अपने सवर्णियों के ग्राहक होंगे ।
१ नवीनास्त्वत्र औपश्लेषिकाधारे सप्तमीत्याहुः । तन्मतं शेखरादौ द्रष्टव्यम् ।
२ यह सप्तमी यस्य च भावेन भावलक्षणम् ( २ ३ ३७) सूत्र से विधान की जाती
है । इस सप्तमी का 'विद्यमान होने पर' या 'होने पर' ऐसा अर्थ होता है । इस
का विवेचन इस व्याख्या के तृतीयभागस्थ कारक प्रकरण (पृ० ३४६) पर देखें।

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ३५

'सुधोभिरुपास्यः' इस तृतीयातत्पुरुषममास में सुपो धातुप्रातिपदिकयोः (७२१)
से भिस् और सुं का लुक् होने पर 'सुधी+-उपास्य' यह रूप हुआ । अब यहां समास
के कारण संहिता का विषय स्पष्ट है जैसा कि कहा गया है—
संहितैकपदे नित्या, नित्या धातूपसर्गयोः ।
नित्या समासे, वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते ॥
एकपद अर्थात् अखण्डपद में; धातु और उपसर्ग में तथा समास में संहिता
नित्य करनी चाहिये; वाक्य में संहिता करना 'वक्ता' (यह उपलक्षणार्थ है, 'लेखक'
भी समझ लेना चाहिये) की इच्छा पर निर्भर है, चाहे करे या न करे । इन के उदा-
हरण यथा--चयः, जयः । यहां 'चे+अ' 'जे+अ' इस अवस्था में अयादेश एकपद
होने के कारण नित्य होता है । 'प्र+एति' यहां धातु और उपसर्ग में नित्य संहिता
होने से वृद्धि हो कर नित्य 'प्रैति' रूप ही बनेगा । 'गजेन्द्रः' यहां 'गजानामिन्द्रः' इस
प्रकार का समास होने से नित्य गुणादेश होगा । 'नाहं वेद्मि' यहां वाक्य होने से 'न
अहं वेद्मि' या 'नाहं वेद्मि' दोनों प्रयोग शुद्ध हैं; वक्ता चाहे जिस का प्रयोग करे ।
'सुधी+उपास्य' यहां समास है; अतः संहिता नित्य होगी । इस प्रकार
संहिता का विषय होने पर इको यणचि (१५) सूत्र प्रवृत्त हुआ । यहां सकार-में
उकार, धकार में ईकार तथा 'उपास्य' शब्द का आदि उकार इक् हैं । यदि सकारस्थ
उकार = इक् को यण् करें तो धकारस्थ ईकार = 'अच्' विद्यमान है । यदि धकारस्थ
ईकार = इक् को यण् करें तो सकारस्थ उकार या 'उपास्य' शब्द का आदि उकार =
'अच्' विद्यमान है तथा यदि 'उपास्य' शब्द के आदि उकार = इक् को यण् करें तो
पकारस्थ आकार या विपरीत दिशा में धकारस्थ ईकार = अच् विद्यमान रहता है ।
तो अब यह शङ्का उत्पन्न होती है कि किस अच् के विद्यमान रहते किस इक् के स्थान
पर यण् किया जाये ? इस शङ्का की निवृत्ति के लिये अग्रिमसूत्र लिखते हैं—
[लघु०] परिभाषा-सूत्रम् — (१६) तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य ।१।१।६५॥
सप्तमीनिर्देशेन विधीयमानं कार्यं वर्णान्तरेणाऽव्यवहितस्य पूर्वस्य
बोध्यम् ॥
अर्थः - सप्तम्यन्त के निर्देश से क्रियमाण कार्य अन्य वर्णों के व्यवधान से
रहित पूर्व के स्थान पर जानना चाहिये ।
व्याख्या - तस्मिन् = सप्तम्यन्तानुकरणं लुप्तसप्तम्येकवचनान्तम्¹ । [इको
यणचि (१५) आदियों में स्थित 'अचि' आदि सप्तम्यन्त पदों का अनुकरण यहां
'तस्मिन्' शब्द से किया गया है। इसके आगे सप्तमी विभक्ति का सुपां सुलुक्० (७.१.३६)
सूत्र से लुक् हुआ २ है। इस का अर्थ - इको यणचि (१५) आदियों में स्थित 'अचि'
१. 'तस्मिन्' इत्यत्र नागेशस्तु 'अची'त्यादि-सप्तम्यन्तार्थकत्तच्छब्दात् सप्तमीति मन्यते ।

३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
आदि सप्तम्यन्त पदों के होने पर—ऐसा होता है] । इति ऽप्यव्ययपदम् । निर्दिष्टे
।७।१। पूर्वस्य ।६।१।
इति शब्द पद के अर्थ को उल्टा कर दिया करता है, अर्थात् इस के जोड़ने
से शब्दपरक पद अर्थपरक और अर्थपरक पद शब्दपरक हो जाते हैं । यथा—‘वृक्ष’
इस पद का अर्थ लोक में विद्यमान पदार्थ विशेष है, अतः यह अर्थपरक है । अब यदि
इस के आगे ‘इति’ शब्द जोड़ दें ‘वृक्ष इति’, तो इस का अर्थ ‘वृक्ष’ यह लिखा हुआ
शब्द हो जायेगा । शब्दपरक पद से अर्थपरक पद हो जाना नवेति विभाषा (१ १ ४३)
सूत्र में सिद्धान्तकौमुदी में देखें । तो अब यहां ‘तस्मिन्’ इस लुप्तसप्तम्यन्त पद का
अर्थ—इको यणचि (१५) आदियों में स्थित ‘अचि’ आदि सप्तम्यन्त पदों के होने पर
—ऐसा था । ‘इति’ के जोड़ने से यह शब्द-परक से अर्थ परक हो गया, अर्थात् इस
का अर्थ “इको यणचि आदियों में स्थित ‘अचि’ आदि सप्तम्यन्त पदों के अर्थों के होने
पर” ऐसा हो गया ।
‘निर्दिष्टे’ पद ‘तस्मिन्’ पद का विशेषण है । निर्’ का अर्थ निरन्तर और
‘दिश्’ धातु का अर्थ ‘उच्चारण करना’ है । तो इस प्रकार ‘निर्दिष्टे’ पद का अर्थ
‘निरन्तर उच्चरित होने पर’ ऐसा हो जाता है ।
‘तस्मिन्’ और ‘निर्दिष्टे’ इन दोनों पदों में भाव-सप्तमी है । भाव-सप्तमी का
अर्थ ‘होने पर’ ऐसा हुआ करता है । इसे ‘सति सप्तमी’ भी कहते हैं । यह यस्य च
भावेन भावलक्षणम् (२ ३ ३७) सूत्र से विधान की जाती है, यथा—‘गच्छत्सु बाल-
केषु त्वं स्थित’ यहां भाव-सप्तमी है । इस प्रकार इस सूत्र का यह अर्थ हुआ—
(तस्मिन्निति) इको यणचि आदि सूत्रों में स्थित ‘अचि’ आदि सप्तम्यन्त पदों के अर्थों
के (निर्दिष्टे) निरन्तर उच्चरित होने पर (पूर्वस्य) पूर्व के स्थान पर [कार्य होता
है] ।
यदि सप्तम्यन्त पद के अर्थ से व्यवधान-रहित पूर्व को कार्य करेंगे तो तभी
वह सप्तम्यन्त पद का अर्थ निरन्तर उच्चरित हो सकेगा । अतः निरन्तर कथन से यह
प्राप्त हुआ कि ‘सप्तम्यन्त पदार्थ के उच्चरित होने पर उस में व्यवधान-रहित पूर्व के
स्थान पर कार्य हो’ ।
यथा—इको यणचि (१५) सूत्र में ‘अचि’ यह सप्तम्यन्त पद है । इस सप्त-
म्यन्त पद का अर्थ यहां ‘सुधी + उपास्य’ में सकारोत्तर उकार, धकारोत्तर ईकार,
‘उपास्य’ शब्द का आदि उकार तथा पकारोत्तर आकार है । अब हमें इन में से ऐसा
सप्तम्यन्त पदार्थ चुनना है, जिस से अव्यवहित पूर्व इक् हो; हम उसी इक् के स्थान
पर ही यण् करेंगे । तो ऐसा सप्तम्यन्त पदार्थ यहां ‘उपास्य’ शब्द के आदि वाले
उकार के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं हो सकता, क्योंकि अन्यों से पूर्व अव्यवहित
इक् नहीं है । तथाहि—पकारोत्तर आकार को यदि सप्तम्यन्त पदार्थ अच् मानें तो
उस से अव्यवहित पूर्व ‘उपास्य’ शब्द का उकार नहीं होता; पकार का व्यवधान

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ३७
पड़ता है। यदि धकारस्थ ईकार को सप्तम्यन्त पदार्थ अच् मानें तो उस से अव्यवहित
पूर्व सकारस्थ उकार नहीं होता; धकार का व्यवधान पड़ता है। यदि सकारोत्तर
उकार को सप्तम्यन्त पदार्थ अच् मानें तो इस से पूर्व कोई इक् नहीं रहता। अतः
'उपास्य' शब्द का आदि उकार ही सप्तम्यन्त पद का अर्थ=अच् होने योग्य है और
इस से अव्यवहित पूर्व धकारोत्तर ईकार के स्थान पर ही यण् होना चाहिये।१
यह परिभाषा-सूत्र है। परिभाषा-सूत्रों का उपयोग रूप-सिद्धि में नहीं हुआ करता,
किन्तु इन का उपयोग सूत्रों के अर्थ करने में ही होता है; अर्थात् इन की सहायता से
हम सूत्रों का अर्थ किया करते हैं। यहां भी इस सूत्र को रखने का तात्पर्य इको यणचि
(१५) सूत्र का अर्थ करना ही है। इस सूत्र की सहायता से इको यणचि (१५) का
यह अर्थ होगा—अच् होने पर, उस से अव्यवहित पूर्व इक् के स्थान पर यण् होता है
संहिता के विषय में।
शास्त्र में पर-सप्तमी नाम की किसी सप्तमी का विधान नहीं किया गया।
यही सूत्र जब सप्तम्यन्त पद के अर्थ से अव्यवहित पूर्व को कार्य करने के लिये कहता
है तो एक प्रकार से भावसप्तमी ही पर-सप्तमी हो जाया करती है। अतः कई लोग
इको यणचि (१५) सूत्र का अर्थ 'इक् के स्थान पर यण् हो अच् परे होने पर संहिता
के विषय में' ऐसा भी किया करते हैं। यह अर्थ भी शुद्ध है। आगे चलकर ग्रन्थकार
भी इस परिभाषा को सूत्रार्थ के साथ मिलाते हुए 'परे होने पर' ऐसा ही अर्थ करेंगे।
तो अब धकारस्थ ईकार के स्थान पर यण् अर्थात् य्, व्, र्, ल् प्राप्त होते हैं।
यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि इन चारों में से कौन सा यण् ईकार के स्थान पर
किया जाये ? इस शङ्का को दूर करने के लिये ग्रन्थकार एक पाणिनीय परिभाषा को
उद्धृत करते हैं—
[लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(१७) स्थानेऽन्तरतमः। १।१।४६॥
प्रसङ्गे सति सदृशतम आदेशः स्यात्। सुध्य्+उपास्य इति जाते॥
अर्थः—प्रसङ्ग अर्थात् प्रसक्ति (प्राप्ति) होने पर अत्यन्त सदृश आदेश होता
है। 'सुध्य्+उपास्य' इस प्रकार हो जाने पर (अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है)।
व्याख्या—स्थाने ।७।१। अन्तरतमः ।१।१। यहां अन्तर शब्द का अर्थ सदृश है।
अतिशयितोऽन्तरः=अन्तरतमः। अर्थः--(स्थाने) प्राप्ति होने पर (अन्तरतमः) अत्यन्त
सदृश आदेश२ होता है।
१. ध्यान रहे कि कार्य केवल अव्यवहित को ही नहीं होता किन्तु जो अव्यवहित
होते हुए पूर्व भी हो उसे कार्य होता है। इसीलिये यहां विपरीतता में भी कार्य
न होगा अर्थात् 'उपास्य' वाले उकार की विपरीत दिशा में धकारोत्तर ईकार
सप्तम्यन्त-पदार्थ अच् मानें तो उकार को यण् न होगा; यद्यपि इस में कोई
व्यवधान नहीं, तथापि उकार पूर्व में नहीं।
२. जो किसी के स्थान में उस को हटा कर स्वयं स्थित हो जाता है उसे आदेश

एक के स्थान पर बहुता की यदि प्राप्ति हो तो उन मे ग जो स्थानीय के अत्यन्त
सदृश होगा वही स्थानीय के स्थान पर आदेश होगा । वर्णों की सदृशता न तो आकृति
से और न ही तराजू मे तोल कर जानी जा सकती है । इन की सदृशता अर्थ, स्थान,
प्रयत्न अथवा मात्रा की दृष्टि से ही देखी जा सकती है । आगे इन के उदाहरण यत्र
तत्र बहुत आयेंगे, हम इन का स्पष्टीकरण भी वही करेंगे ।
यहां ईकार के साथ यणों की सदृशता अर्थ प्रयत्न और मात्रा की दृष्टि से तो
हो नहीं सकती, अब शेष रहे स्थान की दृष्टि से ही समता देखेंगे । ईकार का स्थान
इचुयशानां तालु के अनुसार तालु है । यणां में तालुस्थान यकार का है, अतः ईकार
के स्थान पर यकार होकर सुध्य् + उपास्य ऐसा हो जायगा।
इस सूत्र में अन्तर शब्द के साथ तमप् जोड़ा गया है इस कारण 'सदृशों
में भी जो अत्यन्त सदृश हो वही आदेश हो' ऐसा अर्थ हो जाता है । इस का फल
वाग्घरि प्रयोग पर हल्सन्धि में स्पष्ट करेंगे ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (१८) अनचि च ॥८।४।४६॥
अचः परस्य यरो द्वे वा स्तो न त्वचि। इति धकारस्य द्वित्वम् ॥
अर्थ —अच् से परे यर् को विकल्प करके द्वित्व हो जाता है परन्तु अच् पर
होने पर नहीं होता । इस सूत्र से धकार का द्वित्व हो जाता है ।
व्याख्या—अचः ।५।१। (अचो रहाभ्यां द्वे से) । यरः ।६।१। (यरोऽनुनासिके-
ऽनुनासिको वा से)। द्वे ।१।२। (अचो रहाभ्यां द्वे से) । वा इत्यव्ययपदम् (यरोऽनुना-
सिकेऽनुनासिको वा से) । अनचि ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । समास —न अच् = अनच्,
तस्मिन् = अनचि, नञ्समास । नञ्' प्रतिषेधार्थक अव्यय है । प्रतिषेध दो प्रकार का
होता है । एक पर्युदास-प्रतिषेध और दूसरा प्रसज्य-प्रतिषेध । तथाहि —
द्वौ नञौ तु समाख्यातौ, पर्युदास-प्रसज्यकौ ।
पर्युदासः सदृग्ग्राही, प्रसज्यस्तु निषेध-कृत् ॥१॥
प्राधान्यं तु विधेर्यत्र, प्रतिषेधेऽप्रधानता ।
पर्युदासः स विज्ञेयो, यत्रोत्तरपदेन नञ् ॥२॥
अप्राधान्यं विधेर्यत्र, प्रतिषेधे प्रधानता ।
प्रसज्यस्तु स विज्ञेयः, क्रियया सह यत्र नञ् ॥३॥
इन तीनों श्लोकों का तात्पर्य निम्नरीत्या जानना चाहिए—
कहते हैं । शत्रुवदादेश आदेश शत्रु के समान होता है—शत्रु जैसा व्यवहार
करता है । वह स्थानी को हटा कर वहां स्वयं बैठ जाता है । यथा 'सुधी +
उपास्य' में ईकार के स्थान पर होने वाला य्' आदेश है । जिस के स्थान पर
आदेश होता है उसे स्थानी कहते हैं । यथा 'सुधी+उपास्य' में ईकार स्थानी है।

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ३६
पर्युदास-प्रतिषेध
(१) इस मे विधि की प्रधानता तथा निषेध की अप्रधानता होती है। यथा—अब्राह्मणमानय। यहां लाने की प्रधानता है निषेध की नहीं; क्योंकि लाने का निषेध नहीं किया गया।
(२) इस में 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध किया करता है। यथा—अब्राह्मणमानय। यहां उत्तरपद 'ब्राह्मण' का निषेध किया गया है।
(३) इस में जिसका निषेध किया जाता है पुनः विधि में उसके सदृश का ही ग्रहण किया जाता है। यथा—अब्राह्मणमानय। यहां ब्राह्मण का निषेध किया गया है, अब जो लाया जायेगा वह भी ब्राह्मण के सदृश अर्थात् मनुष्य ही होगा; पत्थर आदि नहीं।
प्रसज्य-प्रतिषेध
(१) इस में विधि की अप्रधानता तथा निषेध की प्रधानता होती है। यथा—अनृतं न वक्तव्यम्। यहां 'बोलना चाहिये' इस विधि की अप्रधानता और 'न बोलना चाहिए' इस निषेध की प्रधानता है।
(२) इसमें 'नञ्' क्रिया का निषेध किया करता है। यथा—अनृतं न वक्तव्यम् यहां 'नञ्' ने 'बोलना चाहिए' इस क्रिया का निषेध कर दिया है।
(३) यहां केवल निषेध ही होता है। यथा—अनृतं न वक्तव्यम्। यहां केवल निषेध ही है।
हम विद्यार्थियों के अभ्यास के लिए इन दोनों प्रकार के निषेधों के कुछ उदा-
हरण दे रहे हैं; इनका अत्यन्त सावधानता से अभ्यास करना चाहिये—
प्रसज्य के उदाहरण—
(१) न व्यापार-शतेनापि शुकवत् पाठ्यते बकः।
यहां 'न पाठ्यते'¹ इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध
की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है।

१. यद्यपि यहां पर पद्य में क्रिया के साथ 'नञ्' साक्षात् नहीं; तथापि
यस्य येनार्थसम्बन्धो दूरस्थस्यापि तस्य सः।
अर्थतो ह्यसमर्थानाम् आनन्तर्यमकारणम्॥ (न्यायद० वा० भा० १.२.६)
इस न्यायदर्शनोद्धृत पद्यानुसार क्रिया सह यत्र नञ् वाली बात समन्वित
हो जाती है।

(२) न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ।
यहां 'न प्रविशन्ति' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी
निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है ।
(३) शत्रुना न हि सन्दध्यात् ।
यहां 'न सन्दध्यात्' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी
निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है ।
(४) न कुर्यान्निष्फलं कर्म ।
यहां 'न कुर्यात्' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध
की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है ।
(५) एव पुरुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति ।
यहां 'न सिद्ध्यति' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध
की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है ।
पर्युदास के उदाहरण —
(१) पुत्रः शत्रुरपण्डितः ।
'अपण्डितः' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता
है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास-
प्रतिषेध है ।
(२) जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः ।
'अनाथ' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता
है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास-
प्रतिषेध है ।
(३) दूरादस्पर्शनं वरम् ।
'अस्पर्शनम्' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता
है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास-
प्रतिषेध है ।
(४) नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति ।
'अप्राप्यम्' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता
है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास-
प्रतिषेध है ।
(५) समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः ।
'अपेया' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता
है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास-
प्रतिषेध है ।

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ४१
यहां यह ध्यान रखना चाहिये कि प्रायः समास में पर्युदास और असमास में
प्रसज्य-प्रतिषेध हुआ करता है। 'प्रायः' इसलिये कहा गया है कि कहीं २ इस नियम
का उल्लङ्घन भी हो जाया करता है। यथा - अनचि च (१८), सुँडनपुंसकस्य (१६३)
इत्यादि में समास होने पर भी प्रसज्य-प्रतिषेध है।
'अनचि' यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है; अतः 'अच् परे होने पर द्वित्व न हो' इस
निषेध की ही प्रधानता होगी, विधि की नहीं। अर्थात् अच् परे न हो, अच् से भिन्न
चाहे अन्य वर्ण परे हो या न हो द्वित्व हो जायेगा। इस का फल यह होगा कि
अवसान में भी द्वित्व हो जायेगा। यथा - वाक्क्, वाक् । यदि 'अनचि' में पर्युदास-
प्रतिषेध होता तो सदृश का ग्रहण होने से अच् के सदृश = हल् के परे होने पर ही
द्वित्व होता; 'वाक्' इत्यादि स्थानों पर अवसान मे द्वित्व न हो सकता। अतः पर्युदास
की अपेक्षा प्रसज्य-प्रतिषेध मानना ही उपयुक्त है। किञ्च - यदि यहां मुनिवर पाणिनि
को पर्युदास-प्रतिषेध अभीष्ट होता; तो वे 'अनचि' न कह कर सीधा उस के स्थान पर
'हलि' ही कह देते; इस से एक वर्ण का लाघव भी हो जाता, परन्तु उन के ऐसा न
कहने मे यह प्रतीत होता है कि यहां पर्युदास-प्रतिषेध नहीं किन्तु प्रसज्य-प्रतिषेध है।
अर्थः- (अचः) अच् से परे (यरः) यर् प्रत्याहार के स्थान पर (वा) विकल्प
करके (द्वे) दो शब्द स्वरूप हो जाते हैं। (अनचि) परन्तु अच् परे होने पर नहीं
होते।
कार्य का होना और पक्ष में न होना विकल्प कहाता है। एक को दो करने
का नाम द्वित्व है। द्वित्व हो भी और न भी हो, इसे द्वित्व का विकल्प कहते हैं¹।
'सुध्य्+उपास्य' यहां सकारोत्तर उकार = अच् से परे यर् = धकार को इस
सूत्र से विकल्प करके द्वित्व करने से दो रूप बन जाते हैं-
(१) सु ध् ध् य्+उपास्य [जहां द्वित्व होता है]।
(२) सु ध् य्+उपास्य [जहां द्वित्व नहीं होता है]।
अब द्वित्व वाले पक्ष में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है-
[लघु०] विधि-सूत्रम्- (१६) झलां जश्झशि ।८।४।५२॥
स्पष्टम्। इति पूर्व-धकारस्य दकारः ॥
अर्थः-झश् प्रत्याहार परे होने पर झलों के स्थान पर जश् हो जाता है।
इस सूत्र से पूर्व धकार के स्थान पर दकार हो जाता है।
व्याख्या-झलाम् ।६।३। जश् ।१।१। झशि ।७।१। अर्थः- (झशि) झश्
प्रत्याहार परे होने पर (झलाम्) झलों के स्थान पर (जश्) जश् हो जाता है।
'झलाम्' पद में षष्ठी स्थाने-योगा (१.१.४८) के अनुसार स्थानषष्ठी है। 'झशि'
पद सप्तम्यन्त है; अतः तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य (१६) सूत्र के अनुसार झश् से
१. ध्यान रहे कि विकल्प के दोनों रूप शुद्ध हुआ करते हैं। इन में से चाहे जिस का
प्रयोग करें हमारी इच्छा पर निर्भर है।

४२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

अव्यवहित पूर्व झल् को ही जश् होगा, अर्थात् झश् परे होने पर झलों को जश्
होगा¹।
झल् प्रत्याहार में वर्गों के चतुर्थ, तृतीय, द्वितीय, प्रथम और ऊष्म वर्ण आते
हैं। इनके स्थान पर जश् अर्थात् वर्गों के तृतीय वर्ण [ ज्, ब्, ग्, ड्, द् ] हो जाते
हैं, यदि झश् अर्थात् वर्गों के तृतीय या चतुर्थ वर्ण परे हों तो।
'सु ध् ध् य्+उपास्य' यहां द्वित्व वाले पक्ष में इस सूत्र से पूर्व धकार=झल्
को जश् होता है, क्योंकि इस से परे परला धकार = झश् विद्यमान है। जश् पांच
हैं—१ ज्, २ ब्, ३ ग् ४ ड्, ५ द्। यहां स्थानेऽन्तरतम (१७) के अनुसार धकार
के स्थान पर दकार=जश् होता है [देखें—लृ-तुल-सानां दन्ता.]। यथा—
(१) सुद्ध्य् + उपास्य [द्वित्वपक्ष में जश्त्व होकर]
(२) सुध्य् + उपास्य [द्वित्वाभावपक्ष में]
अब दोनों पक्षों में समान रूप से अग्रिम-सूत्र प्राप्त होता है—

[लघु०] विधि-सूत्रम् —(२०) संयोर्गान्तस्य लोपः ।८।२।२३॥
संयोगान्तं यत् पदं तस्य लोपः स्यात् ॥
अर्थः—जिस पद के अन्त में संयोग हो उस का लोप हो जाता है।
व्याख्या—संयोगान्तस्य ।८।२। पदस्य ।८।२। (यह अधिकार पीछे से आ रहा
है)। लोपः ।१।१। समास —संयोगोऽन्ते यस्य तत् = संयोगान्तम्, बहुव्रीहि-समास ।
अर्थ —(संयोगान्तस्य) जिस के अन्त में संयोग है ऐसे (पदस्य) पद का (लोपः) लोप
हो जाता है।
पाणिनीय-व्याकरण में येन विधिरुतदन्तस्य (१.१.७१) यह भी एक परिभाषा
है। इस का भाव यह है कि विशेषण के साथ तदन्त-विधि करनी चाहिये। यथा—
अचो यत् (७७३) यहां 'धातोः' पद की अनुवृत्ति आकर 'अचः ।३।१। धातोः ।३।१।
यत् ।१।१।' ऐसा हो जाता है। इस में 'अचः' पद 'धातोः' पद का विशेषण है, इस
से तदन्त-विधि होकर अजन्त धातु से यत् प्रत्यय हो' ऐसा अर्थ बन जाता है। इस
नियम के अनुसार यहां यदि 'संयोगस्य लोपः' सूत्र भी बनाते, तो भी 'संयोगस्य' पद
के 'पदस्य' पद के विशेषण होने के कारण तदन्त विधि होकर उपर्युक्त अर्थ सिद्ध हो
सकता था, पुनः यहां स्पष्ट-प्रतिपत्ति अर्थात् विद्यार्थियों के क्लेश का ध्यान रख
अनायास-ज्ञान के लिये ही मुनि ने 'अन्त' पद का ग्रहण किया है।
सुद्ध्य् + उपास्य, सुध्य् + उपास्य इन रूपों में क्रमशः 'सुद्ध्य्' और 'सुध्य्'
संयोगान्त पद हैं। हलोऽनन्तराः संयोगः (१३) के अनुसार 'द्, ध्, य्' अथवा 'ध्, य्'
वर्णों की संयोग संज्ञा है। सुप्तिङन्तं पदम् (१४) सूत्र द्वारा यहां पद-संज्ञा होती है।
यद्यपि इसके अन्त में भिस् = सुप् लुप्त हो चुका है, तथापि प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्


१. इस कारण परले 'ध्' को जश् नहीं होगा, क्योंकि समक्षस्थित 'य्' झश् नहीं है।

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ४३

(१६०) द्वारा सुबन्त के अक्षुण्ण रहने से पद-संज्ञा में कोई दोष नहीं होता। इस
प्रकार दोनों पक्षों में सम्पूर्ण संयोगान्त पद का लोप प्राप्त होता है। अब अग्रिम-
परिभाषा द्वारा केवल अन्त्य के लोप का विधान करते हैं—
[लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(२१) अलोऽन्त्यस्य ।१।१।५२।।
षष्ठी-निर्दिष्टस्यान्त्यस्याल आदेशः स्यात्¹। इति यलोपे प्राप्ते—
अर्थः—आदेश—षष्ठी-निर्दिष्ट के अन्त्य अल् के स्थान पर होता है। इस सूत्र
ने (दोनों पक्षों में) यकार के लोप के प्राप्त होने पर (अग्रिम वार्त्तिक द्वारा निषेध
हो जाता है)।
व्याख्या—स्थाने ।७।१। (षष्ठी स्थाने-योगा से)। विधीयमान आदेशः (ये
अध्याहार किये जाते हैं)। षष्ठ्या ।३।१। (षष्ठी स्थानेयोगा में प्रथमान्त ‘षष्ठी’
शब्द आ कर तृतीयान्त-रूपेण परिणत हो जाता है)। निर्दिष्टस्य ।६।१। (इस का
अध्याहार किया गया है)। अलः ।६।१। अन्त्यस्य ।६।१। अर्थः—(स्थाने) स्थान पर
विधान किया आदेश (षष्ठ्या) षष्ठी-विभक्ति से (निर्दिष्टस्य) निर्देश किये गये के
(अन्त्यस्य) अन्त्य (अलः) अल् के स्थान पर होता हैं।
इस का सार यह है कि जो आदेश षष्ठी-निर्दिष्ट के स्थान पर प्राप्त होता है
वह उस के अन्तिम अल् को होता है। यथा—त्यदादीनाम् अः (१६३) त्यदादियों को
‘अ’ हो। यहां षष्ठी स्थाने-योगा (१.१.४८) सूत्र से सम्पूर्ण त्यदादियों के स्थान पर
‘अ’ प्राप्त होता है, परन्तु इस परिभाषा (२१) से त्यदादियों के अन्त्य अल् को ‘अ’
हो जाता है। ‘त्यदादीनाम्’ यह यहां षष्ठी-निर्दिष्ट है। रायो हलि (२१५) हलादि
विभक्ति परे होने पर रै शब्द को आकार आदेश होता है। यहां सम्पूर्ण ‘रै’ के स्थान
पर प्राप्त आदेश इस परिभाषा द्वारा अन्त्य अल्=ऐकार को हो जाता है। ‘रायः’
यह यहां षष्ठी-निर्दिष्ट है। दिव औत् (२६४) सुँ परे होने पर दिव् शब्द को औकार
आदेश होता है। यहां सम्पूर्ण ‘दिव्’ के स्थान पर प्राप्त आदेश इस परिभाषा द्वारा
अन्त्य अल्=वकार को ही होता है। ‘दिवः’ यह यहां षष्ठी-निर्दिष्ट है।
संयोगान्तस्य लोपः (२०) संयोगान्त पद का लोप होता है। यहां सम्पूर्ण
संयोगान्त पद के स्थान पर प्राप्त लोप इस परिभाषा द्वारा अन्त्य अल् के स्थान पर
ही होता है। ‘संयोगान्तस्य’ यह यहां षष्ठी-निर्दिष्ट है।
यह परिभाषा-सूत्र है, अतः इस का उपयोग रूप-सिद्धि में न हो कर सूत्रार्थ
करने में ही होता है। इस की सहायता से संयोगान्तस्य लोपः (२०) सूत्र का यह अर्थ
होता है—संयोगान्त पद के अन्त्य अल् का लोप हो जाता है। इस प्रकार—१. सुद्ध्य्
+उपास्य। २. सुध्य्+उपास्य। इन दोनों पक्षों में अन्त्य अल् यकार का ही लोप
प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम वार्त्तिक से यकार के लोप का भी निषेध हो जाता है।
१. अत्र षष्ठीनिर्दिष्टोऽन्त्यस्याल आदेशः स्यात् इति क्वाचित्कः पाठोऽपपाठ एव।
यतो न ह्यादेशः क्वचित् षष्ठीनिर्दिष्टो भवति ।

४४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
[लघु०] वा०—(२) यणः प्रतिषेधो वाच्यः ॥
सुद्ध्युपास्यः, सुध्युपास्यः । मध्वरिः, मध्वरिः । धात्त्रंशः, धात्रंशः ।
लाकृतिः ॥
अर्थ —संयोग के अन्त में यण् के लोप का निषेध कहना चाहिये।
व्याख्या—यह वार्तिक संयोगातस्य लोपः (२०) सूत्र का है। जिस सूत्र पर
जो वार्तिक पढ़ा जाता है वह तद्विषयक ही समझा जाता है। संयोगात्तस्य लोपः
(२०) सूत्र—संयोगान्त पद के अन्त्य अल् का लोप करता है, अब यदि वे अन्त्य
अल् यण् (य्, व्, र्, ल्) हों तो उन का लोप न होगा।
इस प्रकार इस वार्तिक से पूर्वोक्त रूपों में प्राप्त यकार-लोप का निषेध हो
जाता है। तब (१) सु द् ध् य् + उपास्यः । (२) सु ध् य् + उपास्यः । ये दोनों उसी
तरह अवस्थित रहते हैं।
हमारी लिपि (देव-नागरी) का नियम है कि अज्हीनं परेण संयोज्यम् अर्थात्
अच् से रहित हल् अग्रिम वर्ण के साथ मिला देना चाहिये। इस नियमानुसार हलों
का अग्रिम वर्णों के साथ संयोग करके 'सुद्ध्युपास्य' और सुध्युपास्य' ये दो रूप बनते
हैं। जब समास होने से प्रातिपदिक-संज्ञा होकर विभक्ति आने पर 'सुद्ध्युपास्यः',
'सुध्युपास्यः' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं।१
नोट—'सुधी+उपास्यः' इस प्रकार विसर्ग वाला रूप प्रक्रिया-दशा में रखना
अत्यन्त अशुद्ध है, क्योंकि समास में विभक्तियों के लुक् के बाद सन्धि और उसके बाद
सुँ आदि प्रत्यय करने उचित होते हैं पूर्व नहीं। अतः यहाँ 'सुधी + उपास्य' ऐसी दशा
में प्रथम सन्धि करके 'सुध्युपास्य' बना लेना उचित है, तदनन्तर सुँ प्रत्यय लाकर उस
के स्थान पर विसर्ग आदेश करने से 'सुध्युपास्यः' प्रयोग सिद्ध करना चाहिये।
'मधु + अरि' यहां इको यणचि (१५) सूत्र से धकारोत्तर उकार के स्थान
पर यण् प्राप्त होता है, पुनः स्थानेऽन्तरतमः (१७) द्वारा ओष्ठ-स्थान के तुल्य होने
के कारण उकार के स्थान पर वकार ही हो जाता है—म ध् व् + अरि । अब अनचि
च (१८) से धकार को वैकल्पिक द्वित्व होकर द्वित्वपक्ष में झलां जश्झशि (१६) से
आदि धकार को दकार करने पर—१ 'मद्द्व् + अरि' और २ 'मध्व् + अरि' ये दो
रूप बनते हैं। अब इस दशा में दोनों पक्षों में अलोऽन्त्यस्य (२१) की सहायता से
संयोगातस्य लोपः (२०) सूत्र द्वारा वकार के लोप के प्राप्त होने पर यण् प्रतिषेधो
१ सुधी+उपास्य में इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च (५६) से प्रकृति-भाव नहीं
होता, न समासे (वा० ६) से निषेध हो जाता है। न सु-सुधियोः (२०२) से
यण्निषेध भी नहीं होता, क्योंकि वह अजादि सुँप् में निषेध करता है। किञ्च—
अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा इस न्याय से वह एरनेकाचो० (२००) के
यण् का निषेध कर सकता है, इको यणचि (१५) के नहीं।

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ४५
वाच्यः वार्त्तिक से उस का निषेध हो जाता है। अब 'सुं' प्रत्यय लाकर उसके स्थान
पर विसर्ग आदेश करने से 'मद्ध्वरिः, मध्वरिः' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं।
'धातृ + अंश' यहां इको यणचि (१५) सूत्र से तकारोत्तर ऋकार के स्थान
पर यण् प्राप्त होता है, पुनः स्थानेऽन्तरतमः (१७) द्वारा मूर्धा-स्थान के तुल्य होने से
ऋकार के स्थान पर रेफ ही आदेश हो जाता है - धात् र् + अंश। अब अनचि च (१८)
सूत्र ने तकार को वैकल्पिक द्वित्व होकर दोनों पक्षों में अलोऽन्त्यस्य (२१) की सहा-
यता से संयोगान्तस्य लोपः (२०) सूत्र द्वारा रेफ के लोप के प्राप्त होने पर यणः प्रति-
षेधो वाच्यः (वा० २) वार्त्तिक से उस का निषेध हो जाता है। अब 'सुं' प्रत्यय ला
कर विसर्ग आदेश करने में 'धात्त्रंशः, धात्रंशः' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं।
'लृ + आकृति' यहां स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र की सहायता से इको यणचि
(१५) सूत्र द्वारा दन्त-स्थान वाले लृकार के स्थान पर तादृश दन्त-स्थानीय लकार
आदेश होकर 'सुं' प्रत्यय लाकर विसर्ग आदेश करने में 'लाकृतिः' प्रयोग सिद्ध होता है।
'सुद्ध्युपास्यः' और 'मद्ध्वरिः' प्रयोगों की सिद्धि एक समान होती है। 'धात्त्रंशः'
में जश्त्व की तथा 'लाकृतिः' में द्वित्व और जश्त्व दोनों की प्रवृत्ति नहीं होती।
टिप्पणी-सुधीभिः = विद्वद्भिर् उपास्यः = आराधनीयः सुद्ध्युपास्यो भगवान्
विष्णुरित्यर्थः [विद्वानों द्वारा आराधना करने योग्य, भगवान् विष्णु] । मधोः = तदा-
ख्यस्य दैत्यस्य अरिः = शत्रुः मद्ध्वरिः, भगवान् विष्णुः ['मधु' नामक दैत्य को मारने
के कारण भगवान् विष्णु 'मद्ध्वरि' कहाते हैं ] । धातुः = ब्रह्मणः, अंशः = भागः
धात्त्रंशः [ब्रह्मा का भाग] । लृ आकृतिरिव आकृतिः = स्वरूपं यस्य सः = लाकृतिः,
वंशी-वादन-समये वक्राकृतिश्श्रीकृष्ण इत्यर्थः [बांसुरी बजाने के समय 'लृ' के समान
टेढ़ी आकृति वाले श्रीकृष्ण] ।
अभ्यास (२)
(१) अधोलिखित रूपों में सूत्रोपपत्तिपूर्वक सन्धिविच्छेद करें -
१. घस्लादेशः । २. मात्राज्ञा । ३. वद्ध्वागमनम् । ४. यद्यपि । ५.
लनुबन्धः । ६. कत्त्र्रायुः । ७. शृण्विदम् । ८. करोत्ययम् । ६. लाकारः ।
१०. पित्रधीनम् । ११. चार्वङ्गी । १२. वार्येति । १३. लादेशः ।
१४. धात्त्रैतत् । १५. गुर्वाज्ञा । १६. ह्ययम् । १७. गम्लादेशः । १८.
त्रसौ । १६. खल्वेहि । २०. दध्यत्र । २१. मद्ध्वानय । २२. अस्त्यनु-
भवः । २३. कुविद्म् । २४. भत्रादेशः । २५. पुनर्वस्वृक्षः ।
(२) निम्नलिखित रूपों में सूत्रोपपत्तिपूर्वक सन्धि करें -
१. शशी + उदियाय । २. सिध्यतु + एतत् । ३. भाति + अम्बरे । ४.
धातु + आदेश । ५. पातृ + एतत् । ६. लृ + अङ्ग । ७. शिशु + अङ्ग ।
८. नृ + आत्मज । ६. स्मृति + आदेशः । १०. अनु + आदेशः । ११. ०

४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
पितृ + अर्च्चा । १२ अपि + एतत् । १३ वृक्षेषु + अभिलाष । १४
त्वष्टृ + आकाङ्क्षा । १५ दर्वी + अमी । १६ अभि + उदय । १७
प्रति + एक । १८ वधू + अलङ्कार । १६ वस्तु + अस्ति । २० भ्रातृ

  • उत्त । २१ दधि + अशनम् । २२ तनु + अङ्गी । २३ स्त्री +
    उत्सव । २४ देवेषु + आसीत् । २५ मनु + आदि ।
    (३) 'लाकृतिः' का क्या विग्रह है ? 'लृ' शब्द का षष्ठ्येकवचन तथा प्रथमै-
    कवचन क्या बनेगा ? अथवा 'लृ' शब्द का उच्चारण लिखें ।
    (४) प्रसज्य और पर्युदास प्रतिषेधों का तात्पर्य अपनी भाषा में स्पष्ट करते
    हुए नायं शशो और अश्राद्धभोजी ब्राह्मणः में कौन-सा निषेध है सोप-
    पत्तिक लिखें ।
    (५) तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य अलोऽन्त्यस्य तथा स्थानेऽन्तरतम ये सूत्र
    यदि न होते तो कौन-कौन-सी हानियां होतीं ? सोदाहरण स्पष्ट करें ।
    (६) अनचि च सूत्र में कौन सा प्रतिषेध है और वैसा मानने की क्या आव-
    श्यकता है ?
    (७) संहिता की विवक्षा कहां कहां नित्य और कहां कहां ऐच्छिक हुआ
    करती है ? सप्रमाण सोदाहरण विवेचन करें ।
    (८) 'सुधी + उपास्य' में इकोऽसवर्णे० सूत्र से प्रकृतिभाव क्यों नहीं होता ?
    अथवा न मु-सुधियो में यण्निषेध ही क्यो नही होता ?
    [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२२) एचोऽयवायावः । ६।१।७५॥
    एचः क्रमाद् अय्, अव्, आय्, आव् एते स्युरचि ॥
    अर्थ—अच् परे हो तो एच् के स्थान पर क्रमशः अय्, अव्, आय्, आव् हों ।
    व्याख्या—एचः ।६।१। (षष्ठी स्थाने-योगा के अनुसार यहां स्थान-षष्ठी है) ।
    अयवायावः ।१।३। अचि ।७।१। (इको यणचि सूत्र से) । संहितायाम् ।७।१। (यह
    पीछे से अधिकृत है) । समास—अय् च अव् च आय् च आव् च = अयवायावः, इतरे-
    तरद्वन्द्वः । अर्थ—(अचि) अच् परे होने पर (संहितायाम्) संहिता के विषय में
    (एचः) एच् के स्थान पर (अयवायावः) अय्, अव्, आय्, आव् हो जाते हैं ।
    'एच्' प्रत्याहार के मध्य 'ए, ओ, ऐ, औ' ये चार वर्ण आते हैं । इन के स्थान
    पर 'अय्, अव्, आय्, आव्' ये चार आदेश होते हैं यदि इन से परे अच् अर्थात् स्वर
    हो तो । 'संहिता' के विषय में पीछे लिख चुके हैं वही नियम यहां और अन्यत्र सब
    जगह समझ लेना चाहिये । 'अचि' यहां भाव-सप्तमी है, यह पूर्ववत् तस्मिन्निति निर्दि-
    ष्टेपूर्वस्य (१६) परिभाषा द्वारा पर-सप्तमी में परिणत हो जाती है । यहां वृत्ति में
    'क्रमात्' पद यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) परिभाषा के कारण आया हुआ है ।
    अब इस परिभाषा को स्पष्ट करते हैं—

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ४७

[लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(२३) यथासंख्यमनुदेशः समानाम् ।१।३।१०॥
समसम्बन्धी विधिर्यथासंख्यं स्यात् । हरये । विष्णवे । नायकः । पावकः॥
अर्थः—(संख्या की दृष्टि से) समान सम्बन्ध वाली विधि संख्या के अनुसार हो।
व्याख्या—समानाम् ।६।३। अनुदेशः ।१।१। यथा-सङ्ख्यम् ।१।१। समासः—
सङ्ख्याम् अनतिक्रम्येति यथासङ्ख्यम्, अव्ययीभाव-समासः । यहां समानता सङ्ख्या
की दृष्टि से अभिप्रेत है । अर्थः—(समानाम्) समान सङ्ख्या वालों का (अनुदेशः)
कार्य (यथा-सङ्ख्यम्) सङ्ख्या के अनुसार अर्थात् बारी २ से होता है¹ ।
‘समानाम्’ में षष्ठी शेषे (६०१) सूत्र द्वारा सम्बन्ध में षष्ठी हुई है । यदि
यहां कर्तृ-कर्मणोः कृति (२.३.६५) सूत्र द्वारा कर्म में षष्ठी मानें तो जहां स्थानी के
साथ तुल्य सङ्ख्या वालों का विधान किया जायेगा, वहां ही इस सूत्र की प्रवृत्ति हो
सकेगी; यथा – एचोऽयवायावः सूत्र में । परन्तु जहां विधीयमान सम-सङ्ख्यक न होंगे
किन्तु प्रकारान्तर से समान सङ्ख्या होनी होगी वहां इस सूत्र की प्रवृत्ति न हो सकेगी;
यथा—समूलाकृतजीवेषु हन्कृञ्ग्रहः (३.४.३६) यहां विधीयमान ‘णमुल्’ एक है, इस
की किसी के साथ समान सङ्ख्या नहीं है; तीन उपपदों की तीन धातुओं के साथ
समान सङ्ख्या है । यहां यदि यथासङ्ख्य नहीं करते तो अनिष्ट हो जाता है ।
अतः ‘समानाम्’ पद में कर्मणि-षष्ठी न मान कर शेष-षष्ठी मानना ही युक्त है ।
एचोऽयवायावः (२२) सूत्र द्वारा विहित ‘अय्, अव्, आय्, आव्’ यह आदेश
रूप विधि सम-विधि है; क्योंकि एच् (ए, ओ, ऐ, औ) भी चार हैं और अय्, अव्,
आय्, आव् ये आदेश भी चार हैं । अतः इस परिभाषा द्वारा यह विधि बारी २ अर्थात्
पहले को पहला, दूसरे को दूसरा, तीसरे को तीसरा और चौथे को चौथा इस ढंग से
होगी । ‘ए’ पहले को पहला अय्, ‘ओ’ दूसरे को दूसरा अव्, ‘ऐ’ तीसरे को तीसरा
आय् तथा ‘औ’ चौथे को चौथा आव् होगा । इन सब के क्रमशः उदाहरण यथा—
हरे+ए=हर् अय्+ए=हरये । विष्णो+ए=विष्ण् अव्+ए=विष्णवे ।
इन दोनों उदाहरणों में ‘हरि’ और ‘विष्णु’ शब्दों से चतुर्थी का एकवचन ‘ङे’
आने पर ङकार अनुबन्ध का लोप हो घेर्ङिति (१७२) सूत्र से गुण हो जाता है ।
नै+अक=न् आय्+अक=नायकः । पौ+अक=प् आव्+अक=पावकः ।
इन दोनों उदाहरणों में ‘नी’ और ‘पू’ धातुओं से ‘ण्वुल्’ प्रत्यय लाने पर
अनुबन्धों का लोप तथा ‘वु’ के स्थान पर अकादेश होकर अचो ञ्णिति (१८२) सूत्र
१. यद्यपि इको यणचि (१५) में भी इस परिभाषा से काम चलाया जा सकता था
तथापि इक् (अविधीयमान होने से सवर्णों सहित) ६६ हैं और यण् (विधीयमान
होने से) केवल चार, कैसे यथासंख्य हो ? इस दृष्टि के आश्रयण से वहां स्थाने-
ऽन्तरतमः (१७) की प्रवृत्ति दर्शाई गई थी । वस्तुतः जाति के आश्रयण से चार
इक्कों को क्रमशः चार यण् हो सकते हैं कोई दोष नहीं आता । परन्तु तब भी
‘वाग्घरिः’ आदि प्रयोगों के लिये स्थानेऽन्तरतमः परिभाषा का होना तो आव-
श्यक है ही ।

४८ भैमीव्याख्योपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
में क्रमशः ईकार ऊकार को ऐकार औकार वृद्धि हो जाती है। इसी प्रकार भावुक ,
शयनम्, गायन पवन आदि प्रयोगों में भी अयादि-प्रक्रिया समझ लेनी चाहिये।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२४) वान्तो यि प्रत्यये।६।१।७६॥
यकारादौ प्रत्यये परे ओदोतोर् अव् आव् एतौ स्तः। गव्यम्।
नाव्यम् ॥
अर्थ —यकारादि प्रत्यय परे होने पर 'ओ' को अव् तथा 'औ' को आव् आदेश
हो जाता है।
व्याख्या—वान्तः ।१।१। यि ।७।१। प्रत्यये ।७।१। मुनिवर पाणिनि के 'येन
विधिस्तदन्तस्य' (१।१।७१) नियम का 'यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे' यह वार्तिक अपवाद
है। इस का अभिप्राय यह है कि सप्तम्यन्त एकाल् विशेषण से तदन्तविधि न हो किन्तु
तदादिविधि हो। यहां 'यि' यह सप्तम्यन्त एकाल् है और 'प्रत्यये' का विशेषण है,
अतः इस में तदादिविधि होकर 'यादौ प्रत्यय' ऐसा बन जायेगा। समास—व अन्ते
यस्य स =वान्तः, वकारादकार उच्चारणार्थः, बहुव्रीहि-समास । जिस के अन्त में 'व्'
हो उसे वान्त कहते हैं। यहां वान्त से अभिप्राय पूर्व-सूत्र-पठित अव्, आव् आदेशों से
है। यहां स्थानी ओदौतौश्चेति वक्तव्यम् वार्तिक से ओ और औ समझने चाहियें।
अर्थ —(यि = यादौ) जिस के आदि में 'य्' हो ऐसे (प्रत्यये) प्रत्यय के परे होने पर
(वान्त) 'ओ' और 'औ' के स्थान पर अव् और आव् आदेश हो जाते हैं। इन के
उदाहरण यथा—
'गो+य' [यहां 'गो' से गोपयसोर्यत् (४।३।१५८) द्वारा 'यत्' प्रत्यय होता है]
यहां 'य' यह यकारादि प्रत्यय परे है अतः गकारोत्तर ओकार के स्थान पर अव् आदेश
हो—ग् अव्+य =गव्य । अब विभक्ति लाने में 'गव्यम्' प्रयोग सिद्ध होता है।
गोर्विकारः =गव्यम्, दुग्ध-दध्यादिकमित्यर्थः। दूध, दही आदि गो के विकार 'गव्य'
कहाते हैं।
'नौ+य' [यहां 'नौ' से तार्य— 'तरने योग्य' अर्थ में नौ-व्यो-धर्म०(४।४।६१)
सूत्र से यत् प्रत्यय होता है] यहां 'य' यह यकारादि प्रत्यय परे है अतः नकारोत्तर
औकार के स्थान पर आव् आदेश होकर विभक्ति लाने में 'नाव्यम्' प्रयोग सिद्ध होता
है। नावा तार्यम् नाव्यं जलम्, नौका से तरने योग्य जल को 'नाव्य' कहते हैं। यथा—
गङ्गायां नाव्यं जलं वर्तते।
इन उदाहरणों में 'अच्' परे न होने के कारण एचोऽयवायावः (२२) सूत्र से
काम नहीं चल सकता था अतः यह सूत्र बनाना पड़ा है।
ध्यान रहे कि यकारादि प्रत्यय परे न होने पर इस सूत्र की प्रवृत्ति न होगी।
यथा—गोयानम्, नौयानम्। यहां वान्त आदेश नहीं होते।
[लघु०] वा०—(३) अध्वपरिमाणे च ॥
गव्यूतिः॥
अर्थ —'गो' शब्द से 'यूति' शब्द परे होने पर ओकार को वान्त (अव्) आदेश
हो जाता है, यदि समुदाय से मार्ग का परिमाण (माप) अर्थ ज्ञात हो तो।