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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 633 में से

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पृष्ठ 46

संज्ञा-प्रकरणम् ३१
अनुनासिकों की संज्ञा होते हैं। यहां यह भी समझ लेना चाहिये कि दीर्घ तथा प्लुत
वर्ण अण्प्रत्याहारान्तर्गत न होने से सवर्णों के ग्राहक नहीं हुआ करते। ह्रस्व वर्ण ही
(एच् दीर्घ ही) अणों में गृहीत होते हैं, अतः वे ही सवर्णों के ग्राहक हैं।
रेफ और हकार अणों के अन्तर्गत होते हुए भी किसी अन्य वर्ण के ग्राहक
नहीं होते, क्योंकि शिक्षाकारों का कथन है कि-रेफोष्मणां सवर्णा न सन्ति अर्थात्
रेफ और ऊष्म वर्णों के सवर्ण नहीं हुआ करते।
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम् - (१२) परः संनिकर्षः संहिता ।१।४।१०८॥
वर्णानामतिशयितः सन्निधिः संहिता-सञ्ज्ञः स्यात् ॥
अर्थः-वर्णों की अत्यन्त समीपता संहिता-सञ्ज्ञक होती है।
व्याख्या-परः ।१।१। सन्निकर्षः ।१।१। संहिता ।१।१। अर्थः- (परः) अत्यन्त
(सन्निकर्षः) सामीप्य (संहिता) 'संहिता' सञ्ज्ञक होता है। दो वर्णों के मध्य आधी
मात्रा से कम का व्यवधान सम्भव नहीं हो सकता; यही अत्यन्त समीपता 'संहिता'
कहाती है। संहितासंज्ञा का सोदाहरण विवेचन आगे (१५) सूत्र पर देखें।
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम् - (१३) हलोऽनन्तराः संयोगः ।१।१।७॥
अजिभिरव्यवहिता हलः संयोग-सञ्ज्ञाः स्युः ॥
अर्थः-अचों के व्यवधान से रहित हलों की 'संयोग' सञ्ज्ञा हो।
व्याख्या-हलः ।१।३। अनन्तराः ।१।३। संयोगः ।१।१। समासः--अविद्य-
मानम् अन्तरम् = व्यवधानं येषान्तेऽनन्तराः, बहुव्रीहि-समासः। अर्थः- (अनन्तराः)
जिन में अन्तर अर्थात् व्यवधान नहीं ऐसे (हलः) हल् (संयोगः) संयोग-सञ्ज्ञक होते
हैं। व्यवधान (परदा) सदा विजातियों का ही हुआ करता है; सजातियों का नहीं।
हल् के विजातीय अच् हैं। अतः यदि हल्, अचों के व्यवधान से रहित होंगे तो उन
की संयोग सञ्ज्ञा होगी। सूत्र में 'हलः' पद में बहुवचन विवक्षित नहीं, किन्तु जाति
में बहुवचन किया गया है। इस से दो या दो से अधिक हलों की संयोग-सञ्ज्ञा सिद्ध
हो जाती है। उदाहरण यथा--मृट् । यहां 'भृस्ज्' शब्द के आगे 'सुँ' प्रत्यय के अपृक्त
सकार का लोप होने पर स् और ज् की संयोग-सञ्ज्ञा हो कर स्कोः संयोगाद्योरन्ते च
(३०६) सूत्र से संयोग के आदि सकार का लोप हो जाता है। इसी प्रकार 'इन्द्रः' में
नकार दकार और रेफ की, 'उष्ट्रः' में षकार टकार और रेफ की संयोगसञ्ज्ञा समझनी
चाहिये।
नोट-ध्यान रहे कि प्रत्येक हल् की संयोगसञ्ज्ञा नहीं होती किन्तु सम्पूर्ण
हल्-समुदाय की ही हुआ करती है। फिर चाहे वह हल्-समुदाय दो हलों का हो अथवा
दो से अधिक हलों का।
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम् - (१४) सुँप्तिङन्तं पदम् ।१।४।१४॥
सुबन्तं तिङन्तञ्च पदसञ्ज्ञं स्यात् ॥
अर्थः-सुँबन्त और तिङन्त शब्द-स्वरूप पद-सञ्ज्ञक होते हैं।