लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंज्ञा-प्रकरणम् २६
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम् (-११) अणुदित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः ।१।१।६८॥
प्रतीयते-विधीयत इति प्रत्ययः । अविधीयमानोऽण् उदिच्च सवर्णस्य
सञ्ज्ञा स्यात् । अत्रैवाण् परेण णकारेण । कुँ, चुँ, टुँ, तुँ, पुँ—एत उदितः ।
तदेवम्—अ इत्यष्टादशानां सञ्ज्ञा, तथेकारोकारौ । ऋकारस्त्रिंशतः, एवम्
लृकारोऽपि । एचो द्वादशानाम् । अनुनासिकाऽननुनासिकभेदेन यवला द्विधा,
तेनाऽननुनासिकास्ते द्वयोर्द्वयोः सञ्ज्ञा ॥
अर्थः- जिस का विधान किया जाये उसे 'प्रत्यय' कहते हैं। अप्रत्यय अर्थात्
न विधान किया हुआ अण् और उदित् सवर्णों की तथा अपनी सञ्ज्ञा वाला हो।
अत्रैवाण्—केवल इसी सूत्र में अण् प्रत्याहार पर णकार से गृहीत होता है। 'कुँ, चुँ,
टुँ, तुँ, पुँ' इन को उदित् कहते हैं। इस प्रकार 'अ' यह अठारह प्रकार की सञ्ज्ञा वाला
हो जाता है। इसी प्रकार 'इ' और 'उ' भी। ऋकार तीस प्रकार की सञ्ज्ञा वाला
होता है। इसी प्रकार लृकार भी। एच् प्रत्याहार का प्रत्येक बारह २ प्रकार की
सञ्ज्ञा है। अनुनासिक और अननुनासिक भेद से य्, व्, ल् दो प्रकार के होते हैं, अतः
अननुनासिक य्, व्, ल् ही दो २ की सञ्ज्ञा होंगे।
व्याख्या- अण् ।१।१। उदित् ।१।१। सवर्णस्य ।६।१। च इत्यव्ययपदम्।
अप्रत्ययः ।१।१। स्वस्य ।६।१। (चकार के बल से स्वं रूपं शब्दस्याऽशब्दसञ्ज्ञा सूत्र
में 'स्वम्' पद आ कर षष्ठ्यन्त में परिणत हो जाता है)। समासः- उद्=ह्रस्व
उवर्णः इत् यस्मात् स उदित्, बहुव्रीहि-समासः । प्रतीयते==विधीयते इति प्रत्ययः,
प्रतिपूर्वाद् इणः कर्मणि अच्प्रत्ययः। न प्रत्ययः = अप्रत्ययः, नञ्तत्पुरुषसमासः । अर्थः-
(अप्रत्ययः) न विधान किया हुआ (अण्) अण् और (उदित्) उदित् (सवर्णस्य)
सवर्णियों की (च) तथा (स्वस्य) अपने स्वरूप की सञ्ज्ञा होता है।
'प्रत्यय' शब्द यहाँ यौगिक है, इस का अर्थ है 'विधान किया हुआ'। यथा-
इको यण् अचि (१५) सूत्र में 'यण्' और सनाद्यंसभिक्ष उः (८४०) सूत्र में 'उ'
विधान किया गया है। अतः ये दोनों प्रत्यय हैं।
अण् तथा इण् प्रत्याहार दो प्रकार से बन सकते हैं। एक-अ इ उ ण् के
णकार से और दूसरा लँण् के णकार से। कहां पूर्व णकार से तथा कहां पर णकार
से इन का ग्रहण करना चाहिये ? इस विषय में ऊहापोह द्वारा निश्चित भाष्य-सम्मत
निर्णय यह है-
परेणैवेण्ग्रहाः सर्वे, पूर्वेणैवाण्ग्रहा मताः ।
ऋतेऽणुदित्सवर्णस्येत्येतदेकं परेण तु ॥
अर्थात् इण् प्रत्याहार सर्वत्र पर लँण् वाले णकार से तथा अण् प्रत्याहार अणु-
दित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः (११) को छोड़ सर्वत्र अइउण् वाले णकार से ग्रहण करना
चाहिये । अणुदित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः सूत्र में अण् प्रत्याहार लँण् वाले णकार से ग्रहण
किया जाता है। इस नियम के अनुसार यहां 'अण्' पर णकार से ग्रहण होता है । तो