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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 633 में से

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पृष्ठ 63

४८ भैमीव्याख्योपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
में क्रमशः ईकार ऊकार को ऐकार औकार वृद्धि हो जाती है। इसी प्रकार भावुक ,
शयनम्, गायन पवन आदि प्रयोगों में भी अयादि-प्रक्रिया समझ लेनी चाहिये।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२४) वान्तो यि प्रत्यये।६।१।७६॥
यकारादौ प्रत्यये परे ओदोतोर् अव् आव् एतौ स्तः। गव्यम्।
नाव्यम् ॥
अर्थ —यकारादि प्रत्यय परे होने पर 'ओ' को अव् तथा 'औ' को आव् आदेश
हो जाता है।
व्याख्या—वान्तः ।१।१। यि ।७।१। प्रत्यये ।७।१। मुनिवर पाणिनि के 'येन
विधिस्तदन्तस्य' (१।१।७१) नियम का 'यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे' यह वार्तिक अपवाद
है। इस का अभिप्राय यह है कि सप्तम्यन्त एकाल् विशेषण से तदन्तविधि न हो किन्तु
तदादिविधि हो। यहां 'यि' यह सप्तम्यन्त एकाल् है और 'प्रत्यये' का विशेषण है,
अतः इस में तदादिविधि होकर 'यादौ प्रत्यय' ऐसा बन जायेगा। समास—व अन्ते
यस्य स =वान्तः, वकारादकार उच्चारणार्थः, बहुव्रीहि-समास । जिस के अन्त में 'व्'
हो उसे वान्त कहते हैं। यहां वान्त से अभिप्राय पूर्व-सूत्र-पठित अव्, आव् आदेशों से
है। यहां स्थानी ओदौतौश्चेति वक्तव्यम् वार्तिक से ओ और औ समझने चाहियें।
अर्थ —(यि = यादौ) जिस के आदि में 'य्' हो ऐसे (प्रत्यये) प्रत्यय के परे होने पर
(वान्त) 'ओ' और 'औ' के स्थान पर अव् और आव् आदेश हो जाते हैं। इन के
उदाहरण यथा—
'गो+य' [यहां 'गो' से गोपयसोर्यत् (४।३।१५८) द्वारा 'यत्' प्रत्यय होता है]
यहां 'य' यह यकारादि प्रत्यय परे है अतः गकारोत्तर ओकार के स्थान पर अव् आदेश
हो—ग् अव्+य =गव्य । अब विभक्ति लाने में 'गव्यम्' प्रयोग सिद्ध होता है।
गोर्विकारः =गव्यम्, दुग्ध-दध्यादिकमित्यर्थः। दूध, दही आदि गो के विकार 'गव्य'
कहाते हैं।
'नौ+य' [यहां 'नौ' से तार्य— 'तरने योग्य' अर्थ में नौ-व्यो-धर्म०(४।४।६१)
सूत्र से यत् प्रत्यय होता है] यहां 'य' यह यकारादि प्रत्यय परे है अतः नकारोत्तर
औकार के स्थान पर आव् आदेश होकर विभक्ति लाने में 'नाव्यम्' प्रयोग सिद्ध होता
है। नावा तार्यम् नाव्यं जलम्, नौका से तरने योग्य जल को 'नाव्य' कहते हैं। यथा—
गङ्गायां नाव्यं जलं वर्तते।
इन उदाहरणों में 'अच्' परे न होने के कारण एचोऽयवायावः (२२) सूत्र से
काम नहीं चल सकता था अतः यह सूत्र बनाना पड़ा है।
ध्यान रहे कि यकारादि प्रत्यय परे न होने पर इस सूत्र की प्रवृत्ति न होगी।
यथा—गोयानम्, नौयानम्। यहां वान्त आदेश नहीं होते।
[लघु०] वा०—(३) अध्वपरिमाणे च ॥
गव्यूतिः॥
अर्थ —'गो' शब्द से 'यूति' शब्द परे होने पर ओकार को वान्त (अव्) आदेश
हो जाता है, यदि समुदाय से मार्ग का परिमाण (माप) अर्थ ज्ञात हो तो।