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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 633 में से

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पृष्ठ 62

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ४७

[लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(२३) यथासंख्यमनुदेशः समानाम् ।१।३।१०॥
समसम्बन्धी विधिर्यथासंख्यं स्यात् । हरये । विष्णवे । नायकः । पावकः॥
अर्थः—(संख्या की दृष्टि से) समान सम्बन्ध वाली विधि संख्या के अनुसार हो।
व्याख्या—समानाम् ।६।३। अनुदेशः ।१।१। यथा-सङ्ख्यम् ।१।१। समासः—
सङ्ख्याम् अनतिक्रम्येति यथासङ्ख्यम्, अव्ययीभाव-समासः । यहां समानता सङ्ख्या
की दृष्टि से अभिप्रेत है । अर्थः—(समानाम्) समान सङ्ख्या वालों का (अनुदेशः)
कार्य (यथा-सङ्ख्यम्) सङ्ख्या के अनुसार अर्थात् बारी २ से होता है¹ ।
‘समानाम्’ में षष्ठी शेषे (६०१) सूत्र द्वारा सम्बन्ध में षष्ठी हुई है । यदि
यहां कर्तृ-कर्मणोः कृति (२.३.६५) सूत्र द्वारा कर्म में षष्ठी मानें तो जहां स्थानी के
साथ तुल्य सङ्ख्या वालों का विधान किया जायेगा, वहां ही इस सूत्र की प्रवृत्ति हो
सकेगी; यथा – एचोऽयवायावः सूत्र में । परन्तु जहां विधीयमान सम-सङ्ख्यक न होंगे
किन्तु प्रकारान्तर से समान सङ्ख्या होनी होगी वहां इस सूत्र की प्रवृत्ति न हो सकेगी;
यथा—समूलाकृतजीवेषु हन्कृञ्ग्रहः (३.४.३६) यहां विधीयमान ‘णमुल्’ एक है, इस
की किसी के साथ समान सङ्ख्या नहीं है; तीन उपपदों की तीन धातुओं के साथ
समान सङ्ख्या है । यहां यदि यथासङ्ख्य नहीं करते तो अनिष्ट हो जाता है ।
अतः ‘समानाम्’ पद में कर्मणि-षष्ठी न मान कर शेष-षष्ठी मानना ही युक्त है ।
एचोऽयवायावः (२२) सूत्र द्वारा विहित ‘अय्, अव्, आय्, आव्’ यह आदेश
रूप विधि सम-विधि है; क्योंकि एच् (ए, ओ, ऐ, औ) भी चार हैं और अय्, अव्,
आय्, आव् ये आदेश भी चार हैं । अतः इस परिभाषा द्वारा यह विधि बारी २ अर्थात्
पहले को पहला, दूसरे को दूसरा, तीसरे को तीसरा और चौथे को चौथा इस ढंग से
होगी । ‘ए’ पहले को पहला अय्, ‘ओ’ दूसरे को दूसरा अव्, ‘ऐ’ तीसरे को तीसरा
आय् तथा ‘औ’ चौथे को चौथा आव् होगा । इन सब के क्रमशः उदाहरण यथा—
हरे+ए=हर् अय्+ए=हरये । विष्णो+ए=विष्ण् अव्+ए=विष्णवे ।
इन दोनों उदाहरणों में ‘हरि’ और ‘विष्णु’ शब्दों से चतुर्थी का एकवचन ‘ङे’
आने पर ङकार अनुबन्ध का लोप हो घेर्ङिति (१७२) सूत्र से गुण हो जाता है ।
नै+अक=न् आय्+अक=नायकः । पौ+अक=प् आव्+अक=पावकः ।
इन दोनों उदाहरणों में ‘नी’ और ‘पू’ धातुओं से ‘ण्वुल्’ प्रत्यय लाने पर
अनुबन्धों का लोप तथा ‘वु’ के स्थान पर अकादेश होकर अचो ञ्णिति (१८२) सूत्र
१. यद्यपि इको यणचि (१५) में भी इस परिभाषा से काम चलाया जा सकता था
तथापि इक् (अविधीयमान होने से सवर्णों सहित) ६६ हैं और यण् (विधीयमान
होने से) केवल चार, कैसे यथासंख्य हो ? इस दृष्टि के आश्रयण से वहां स्थाने-
ऽन्तरतमः (१७) की प्रवृत्ति दर्शाई गई थी । वस्तुतः जाति के आश्रयण से चार
इक्कों को क्रमशः चार यण् हो सकते हैं कोई दोष नहीं आता । परन्तु तब भी
‘वाग्घरिः’ आदि प्रयोगों के लिये स्थानेऽन्तरतमः परिभाषा का होना तो आव-
श्यक है ही ।