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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 633 में से

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पृष्ठ 45

३० भैमोव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
इस प्रकार यहां 'अण्' में 'अ इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ, ह्, य्, व्, र्, ल्' इन
चौदह वर्णों का ग्रहण होता है। यदि ये वर्ण अविधीयमान (न विधान किये हुए)
होंगे तो अपनी तथा अपने सवर्णियों की सञ्ज्ञा होंगे। यथा—इको यण् अचि (१५)
यहां इक् और अच् अविधीयमान हैं—विधान नहीं किये गये (विधान तो यण् ही
किया गया है), इस से इक्-प्रत्याहारान्तर्गत 'इ, उ, ऋ, ऌ' ये चार वर्ण अपनी तथा
अपने सवर्णियों की सञ्ज्ञा होंगे। इस से 'सुधी +उपास्य' यहां दीर्घ ईकार के स्थान
पर भी यण् हो जाता है। एवम् अच् प्रत्याहार के अन्तर्गत 'अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए,
ओ, ऐ, औ' ये नौ वर्ण भी अपनी तथा अपने सवर्णियों की सञ्ज्ञा होंगे। इस से 'दधि
+आनय = दध्यानय' यहां दीर्घ आकार के परे होने पर भी यण् सिद्ध हो जाता है।
'कुं, चुं, टुं, तुं, पुं' ये इस शास्त्र में उदित् माने जाते हैं। इन के उकार की
उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र से इत्सञ्ज्ञा होती है। यद्यपि 'कुं, चुं, टुं, तुं, पुं'
इन समुदायों का कोई सवर्ण नहीं होता तथापि इन समुदायों के आदि वर्ण 'क्, च्,
ट्, त्, प्' के सवर्णों का तथा उन के स्वरूप का यहां ग्रहण समझना चाहिये। 'क्' के
सवर्ण 'ख्, ग्, घ्, ङ्' ये चार वर्ण हैं अतः 'कुं' कहने से इन चार वर्णों तथा पांचवें
अपने रूप 'क्' अर्थात् कुल मिला कर पांच वर्णों का ग्रहण होगा। इसी प्रकार 'चुं'
से चवर्ग, 'टुं' से टवर्ग, 'तुं' से तवर्ग तथा 'पुं' से पवर्ग का ग्रहण होगा।
उदित् के साथ 'अप्रत्यय' का सम्बन्ध नहीं है, अतः उदित् चाहे विधीयमान
हो या अविधीयमान, प्रत्येक अवस्था में अपनी तथा अपने सवर्णों की सञ्ज्ञा होगा।
यथा—चोः कुः (३०६) यहां 'चुं' अविधीयमान और 'कुं' विधीयमान है, दोनों अपने
तथा अपने सवर्णों के ग्राहक होंगे। 'अण्' के साथ 'अप्रत्यय' का सम्बन्ध इस लिये
किया गया है कि सनाशंसभिक्ष उः (८४०) इत्यादि स्थानों में विधीयमान उकार
आदि सवर्णों के ग्राहक न हों, इस से दीर्घ ऊकार आदि प्रसक्त न होंगे।
अब अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ, ह्, य्, व्, र्, ल् ये सञ्ज्ञाएं हैं, इन
के सञ्ज्ञी निम्नप्रकार से होते हैं।
अ, इ, उ
इन सञ्ज्ञाओं के पीछे लिखे अनुसार अठारह २ सञ्ज्ञी होते हैं।
ऋ, ऌ
वार्त्तिक (१) से इन दोनों की सवर्णसञ्ज्ञा हो जाने के कारण प्रत्येक वर्ण
के तीस २ सञ्ज्ञी होते हैं। ('ऋ' के १८ + 'ऌ' के १२ = ३०)।
ए, ओ, ऐ, औ
ह्रस्व न होने के कारण इन सञ्ज्ञाओं में से प्रत्येक वर्ण के पीछे लिखे अनु-
सार बारह २ सञ्ज्ञी होते हैं।
य्, व्, ल्
ये दो प्रकार के होते हैं, एक अनुनासिक और दूसरे अननुनासिक। अण् प्रत्या-
हार में अननुनासिक य्, व्, ल् का पाठ है, अतः अननुनासिक ही अपनी तथा दूसरे