लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअच्-सन्धि-प्रकरणम् ४१
यहां यह ध्यान रखना चाहिये कि प्रायः समास में पर्युदास और असमास में
प्रसज्य-प्रतिषेध हुआ करता है। 'प्रायः' इसलिये कहा गया है कि कहीं २ इस नियम
का उल्लङ्घन भी हो जाया करता है। यथा - अनचि च (१८), सुँडनपुंसकस्य (१६३)
इत्यादि में समास होने पर भी प्रसज्य-प्रतिषेध है।
'अनचि' यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है; अतः 'अच् परे होने पर द्वित्व न हो' इस
निषेध की ही प्रधानता होगी, विधि की नहीं। अर्थात् अच् परे न हो, अच् से भिन्न
चाहे अन्य वर्ण परे हो या न हो द्वित्व हो जायेगा। इस का फल यह होगा कि
अवसान में भी द्वित्व हो जायेगा। यथा - वाक्क्, वाक् । यदि 'अनचि' में पर्युदास-
प्रतिषेध होता तो सदृश का ग्रहण होने से अच् के सदृश = हल् के परे होने पर ही
द्वित्व होता; 'वाक्' इत्यादि स्थानों पर अवसान मे द्वित्व न हो सकता। अतः पर्युदास
की अपेक्षा प्रसज्य-प्रतिषेध मानना ही उपयुक्त है। किञ्च - यदि यहां मुनिवर पाणिनि
को पर्युदास-प्रतिषेध अभीष्ट होता; तो वे 'अनचि' न कह कर सीधा उस के स्थान पर
'हलि' ही कह देते; इस से एक वर्ण का लाघव भी हो जाता, परन्तु उन के ऐसा न
कहने मे यह प्रतीत होता है कि यहां पर्युदास-प्रतिषेध नहीं किन्तु प्रसज्य-प्रतिषेध है।
अर्थः- (अचः) अच् से परे (यरः) यर् प्रत्याहार के स्थान पर (वा) विकल्प
करके (द्वे) दो शब्द स्वरूप हो जाते हैं। (अनचि) परन्तु अच् परे होने पर नहीं
होते।
कार्य का होना और पक्ष में न होना विकल्प कहाता है। एक को दो करने
का नाम द्वित्व है। द्वित्व हो भी और न भी हो, इसे द्वित्व का विकल्प कहते हैं¹।
'सुध्य्+उपास्य' यहां सकारोत्तर उकार = अच् से परे यर् = धकार को इस
सूत्र से विकल्प करके द्वित्व करने से दो रूप बन जाते हैं-
(१) सु ध् ध् य्+उपास्य [जहां द्वित्व होता है]।
(२) सु ध् य्+उपास्य [जहां द्वित्व नहीं होता है]।
अब द्वित्व वाले पक्ष में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है-
[लघु०] विधि-सूत्रम्- (१६) झलां जश्झशि ।८।४।५२॥
स्पष्टम्। इति पूर्व-धकारस्य दकारः ॥
अर्थः-झश् प्रत्याहार परे होने पर झलों के स्थान पर जश् हो जाता है।
इस सूत्र से पूर्व धकार के स्थान पर दकार हो जाता है।
व्याख्या-झलाम् ।६।३। जश् ।१।१। झशि ।७।१। अर्थः- (झशि) झश्
प्रत्याहार परे होने पर (झलाम्) झलों के स्थान पर (जश्) जश् हो जाता है।
'झलाम्' पद में षष्ठी स्थाने-योगा (१.१.४८) के अनुसार स्थानषष्ठी है। 'झशि'
पद सप्तम्यन्त है; अतः तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य (१६) सूत्र के अनुसार झश् से
१. ध्यान रहे कि विकल्प के दोनों रूप शुद्ध हुआ करते हैं। इन में से चाहे जिस का
प्रयोग करें हमारी इच्छा पर निर्भर है।