लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअच्-सन्धि-प्रकरणम् ४५
वाच्यः वार्त्तिक से उस का निषेध हो जाता है। अब 'सुं' प्रत्यय लाकर उसके स्थान
पर विसर्ग आदेश करने से 'मद्ध्वरिः, मध्वरिः' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं।
'धातृ + अंश' यहां इको यणचि (१५) सूत्र से तकारोत्तर ऋकार के स्थान
पर यण् प्राप्त होता है, पुनः स्थानेऽन्तरतमः (१७) द्वारा मूर्धा-स्थान के तुल्य होने से
ऋकार के स्थान पर रेफ ही आदेश हो जाता है - धात् र् + अंश। अब अनचि च (१८)
सूत्र ने तकार को वैकल्पिक द्वित्व होकर दोनों पक्षों में अलोऽन्त्यस्य (२१) की सहा-
यता से संयोगान्तस्य लोपः (२०) सूत्र द्वारा रेफ के लोप के प्राप्त होने पर यणः प्रति-
षेधो वाच्यः (वा० २) वार्त्तिक से उस का निषेध हो जाता है। अब 'सुं' प्रत्यय ला
कर विसर्ग आदेश करने में 'धात्त्रंशः, धात्रंशः' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं।
'लृ + आकृति' यहां स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र की सहायता से इको यणचि
(१५) सूत्र द्वारा दन्त-स्थान वाले लृकार के स्थान पर तादृश दन्त-स्थानीय लकार
आदेश होकर 'सुं' प्रत्यय लाकर विसर्ग आदेश करने में 'लाकृतिः' प्रयोग सिद्ध होता है।
'सुद्ध्युपास्यः' और 'मद्ध्वरिः' प्रयोगों की सिद्धि एक समान होती है। 'धात्त्रंशः'
में जश्त्व की तथा 'लाकृतिः' में द्वित्व और जश्त्व दोनों की प्रवृत्ति नहीं होती।
टिप्पणी-सुधीभिः = विद्वद्भिर् उपास्यः = आराधनीयः सुद्ध्युपास्यो भगवान्
विष्णुरित्यर्थः [विद्वानों द्वारा आराधना करने योग्य, भगवान् विष्णु] । मधोः = तदा-
ख्यस्य दैत्यस्य अरिः = शत्रुः मद्ध्वरिः, भगवान् विष्णुः ['मधु' नामक दैत्य को मारने
के कारण भगवान् विष्णु 'मद्ध्वरि' कहाते हैं ] । धातुः = ब्रह्मणः, अंशः = भागः
धात्त्रंशः [ब्रह्मा का भाग] । लृ आकृतिरिव आकृतिः = स्वरूपं यस्य सः = लाकृतिः,
वंशी-वादन-समये वक्राकृतिश्श्रीकृष्ण इत्यर्थः [बांसुरी बजाने के समय 'लृ' के समान
टेढ़ी आकृति वाले श्रीकृष्ण] ।
अभ्यास (२)
(१) अधोलिखित रूपों में सूत्रोपपत्तिपूर्वक सन्धिविच्छेद करें -
१. घस्लादेशः । २. मात्राज्ञा । ३. वद्ध्वागमनम् । ४. यद्यपि । ५.
लनुबन्धः । ६. कत्त्र्रायुः । ७. शृण्विदम् । ८. करोत्ययम् । ६. लाकारः ।
१०. पित्रधीनम् । ११. चार्वङ्गी । १२. वार्येति । १३. लादेशः ।
१४. धात्त्रैतत् । १५. गुर्वाज्ञा । १६. ह्ययम् । १७. गम्लादेशः । १८.
त्रसौ । १६. खल्वेहि । २०. दध्यत्र । २१. मद्ध्वानय । २२. अस्त्यनु-
भवः । २३. कुविद्म् । २४. भत्रादेशः । २५. पुनर्वस्वृक्षः ।
(२) निम्नलिखित रूपों में सूत्रोपपत्तिपूर्वक सन्धि करें -
१. शशी + उदियाय । २. सिध्यतु + एतत् । ३. भाति + अम्बरे । ४.
धातु + आदेश । ५. पातृ + एतत् । ६. लृ + अङ्ग । ७. शिशु + अङ्ग ।
८. नृ + आत्मज । ६. स्मृति + आदेशः । १०. अनु + आदेशः । ११. ०