लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
[लघु०] वा०—(२) यणः प्रतिषेधो वाच्यः ॥
सुद्ध्युपास्यः, सुध्युपास्यः । मध्वरिः, मध्वरिः । धात्त्रंशः, धात्रंशः ।
लाकृतिः ॥
अर्थ —संयोग के अन्त में यण् के लोप का निषेध कहना चाहिये।
व्याख्या—यह वार्तिक संयोगातस्य लोपः (२०) सूत्र का है। जिस सूत्र पर
जो वार्तिक पढ़ा जाता है वह तद्विषयक ही समझा जाता है। संयोगात्तस्य लोपः
(२०) सूत्र—संयोगान्त पद के अन्त्य अल् का लोप करता है, अब यदि वे अन्त्य
अल् यण् (य्, व्, र्, ल्) हों तो उन का लोप न होगा।
इस प्रकार इस वार्तिक से पूर्वोक्त रूपों में प्राप्त यकार-लोप का निषेध हो
जाता है। तब (१) सु द् ध् य् + उपास्यः । (२) सु ध् य् + उपास्यः । ये दोनों उसी
तरह अवस्थित रहते हैं।
हमारी लिपि (देव-नागरी) का नियम है कि अज्हीनं परेण संयोज्यम् अर्थात्
अच् से रहित हल् अग्रिम वर्ण के साथ मिला देना चाहिये। इस नियमानुसार हलों
का अग्रिम वर्णों के साथ संयोग करके 'सुद्ध्युपास्य' और सुध्युपास्य' ये दो रूप बनते
हैं। जब समास होने से प्रातिपदिक-संज्ञा होकर विभक्ति आने पर 'सुद्ध्युपास्यः',
'सुध्युपास्यः' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं।१
नोट—'सुधी+उपास्यः' इस प्रकार विसर्ग वाला रूप प्रक्रिया-दशा में रखना
अत्यन्त अशुद्ध है, क्योंकि समास में विभक्तियों के लुक् के बाद सन्धि और उसके बाद
सुँ आदि प्रत्यय करने उचित होते हैं पूर्व नहीं। अतः यहाँ 'सुधी + उपास्य' ऐसी दशा
में प्रथम सन्धि करके 'सुध्युपास्य' बना लेना उचित है, तदनन्तर सुँ प्रत्यय लाकर उस
के स्थान पर विसर्ग आदेश करने से 'सुध्युपास्यः' प्रयोग सिद्ध करना चाहिये।
'मधु + अरि' यहां इको यणचि (१५) सूत्र से धकारोत्तर उकार के स्थान
पर यण् प्राप्त होता है, पुनः स्थानेऽन्तरतमः (१७) द्वारा ओष्ठ-स्थान के तुल्य होने
के कारण उकार के स्थान पर वकार ही हो जाता है—म ध् व् + अरि । अब अनचि
च (१८) से धकार को वैकल्पिक द्वित्व होकर द्वित्वपक्ष में झलां जश्झशि (१६) से
आदि धकार को दकार करने पर—१ 'मद्द्व् + अरि' और २ 'मध्व् + अरि' ये दो
रूप बनते हैं। अब इस दशा में दोनों पक्षों में अलोऽन्त्यस्य (२१) की सहायता से
संयोगातस्य लोपः (२०) सूत्र द्वारा वकार के लोप के प्राप्त होने पर यण् प्रतिषेधो
१ सुधी+उपास्य में इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च (५६) से प्रकृति-भाव नहीं
होता, न समासे (वा० ६) से निषेध हो जाता है। न सु-सुधियोः (२०२) से
यण्निषेध भी नहीं होता, क्योंकि वह अजादि सुँप् में निषेध करता है। किञ्च—
अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा इस न्याय से वह एरनेकाचो० (२००) के
यण् का निषेध कर सकता है, इको यणचि (१५) के नहीं।