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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 633 में से

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पृष्ठ 55

(२) न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ।
यहां 'न प्रविशन्ति' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी
निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है ।
(३) शत्रुना न हि सन्दध्यात् ।
यहां 'न सन्दध्यात्' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी
निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है ।
(४) न कुर्यान्निष्फलं कर्म ।
यहां 'न कुर्यात्' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध
की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है ।
(५) एव पुरुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति ।
यहां 'न सिद्ध्यति' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध
की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है ।
पर्युदास के उदाहरण —
(१) पुत्रः शत्रुरपण्डितः ।
'अपण्डितः' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता
है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास-
प्रतिषेध है ।
(२) जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः ।
'अनाथ' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता
है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास-
प्रतिषेध है ।
(३) दूरादस्पर्शनं वरम् ।
'अस्पर्शनम्' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता
है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास-
प्रतिषेध है ।
(४) नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति ।
'अप्राप्यम्' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता
है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास-
प्रतिषेध है ।
(५) समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः ।
'अपेया' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता
है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास-
प्रतिषेध है ।