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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 633 में से

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पृष्ठ 58

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ४३

(१६०) द्वारा सुबन्त के अक्षुण्ण रहने से पद-संज्ञा में कोई दोष नहीं होता। इस
प्रकार दोनों पक्षों में सम्पूर्ण संयोगान्त पद का लोप प्राप्त होता है। अब अग्रिम-
परिभाषा द्वारा केवल अन्त्य के लोप का विधान करते हैं—
[लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(२१) अलोऽन्त्यस्य ।१।१।५२।।
षष्ठी-निर्दिष्टस्यान्त्यस्याल आदेशः स्यात्¹। इति यलोपे प्राप्ते—
अर्थः—आदेश—षष्ठी-निर्दिष्ट के अन्त्य अल् के स्थान पर होता है। इस सूत्र
ने (दोनों पक्षों में) यकार के लोप के प्राप्त होने पर (अग्रिम वार्त्तिक द्वारा निषेध
हो जाता है)।
व्याख्या—स्थाने ।७।१। (षष्ठी स्थाने-योगा से)। विधीयमान आदेशः (ये
अध्याहार किये जाते हैं)। षष्ठ्या ।३।१। (षष्ठी स्थानेयोगा में प्रथमान्त ‘षष्ठी’
शब्द आ कर तृतीयान्त-रूपेण परिणत हो जाता है)। निर्दिष्टस्य ।६।१। (इस का
अध्याहार किया गया है)। अलः ।६।१। अन्त्यस्य ।६।१। अर्थः—(स्थाने) स्थान पर
विधान किया आदेश (षष्ठ्या) षष्ठी-विभक्ति से (निर्दिष्टस्य) निर्देश किये गये के
(अन्त्यस्य) अन्त्य (अलः) अल् के स्थान पर होता हैं।
इस का सार यह है कि जो आदेश षष्ठी-निर्दिष्ट के स्थान पर प्राप्त होता है
वह उस के अन्तिम अल् को होता है। यथा—त्यदादीनाम् अः (१६३) त्यदादियों को
‘अ’ हो। यहां षष्ठी स्थाने-योगा (१.१.४८) सूत्र से सम्पूर्ण त्यदादियों के स्थान पर
‘अ’ प्राप्त होता है, परन्तु इस परिभाषा (२१) से त्यदादियों के अन्त्य अल् को ‘अ’
हो जाता है। ‘त्यदादीनाम्’ यह यहां षष्ठी-निर्दिष्ट है। रायो हलि (२१५) हलादि
विभक्ति परे होने पर रै शब्द को आकार आदेश होता है। यहां सम्पूर्ण ‘रै’ के स्थान
पर प्राप्त आदेश इस परिभाषा द्वारा अन्त्य अल्=ऐकार को हो जाता है। ‘रायः’
यह यहां षष्ठी-निर्दिष्ट है। दिव औत् (२६४) सुँ परे होने पर दिव् शब्द को औकार
आदेश होता है। यहां सम्पूर्ण ‘दिव्’ के स्थान पर प्राप्त आदेश इस परिभाषा द्वारा
अन्त्य अल्=वकार को ही होता है। ‘दिवः’ यह यहां षष्ठी-निर्दिष्ट है।
संयोगान्तस्य लोपः (२०) संयोगान्त पद का लोप होता है। यहां सम्पूर्ण
संयोगान्त पद के स्थान पर प्राप्त लोप इस परिभाषा द्वारा अन्त्य अल् के स्थान पर
ही होता है। ‘संयोगान्तस्य’ यह यहां षष्ठी-निर्दिष्ट है।
यह परिभाषा-सूत्र है, अतः इस का उपयोग रूप-सिद्धि में न हो कर सूत्रार्थ
करने में ही होता है। इस की सहायता से संयोगान्तस्य लोपः (२०) सूत्र का यह अर्थ
होता है—संयोगान्त पद के अन्त्य अल् का लोप हो जाता है। इस प्रकार—१. सुद्ध्य्
+उपास्य। २. सुध्य्+उपास्य। इन दोनों पक्षों में अन्त्य अल् यकार का ही लोप
प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम वार्त्तिक से यकार के लोप का भी निषेध हो जाता है।
१. अत्र षष्ठीनिर्दिष्टोऽन्त्यस्याल आदेशः स्यात् इति क्वाचित्कः पाठोऽपपाठ एव।
यतो न ह्यादेशः क्वचित् षष्ठीनिर्दिष्टो भवति ।