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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३

पद-भाष्य
नैष दोषः। अयमत्र पदार्थः— समाधान—यह भी कोई दोष
श्रोत्रं तावत्स्वविषयव्यञ्जनसमर्थं नहीं है। यहाँ इस पदका अर्थ
दृष्टम् । तत्तु स्वविषयव्यञ्जन- इस प्रकार है—श्रोत्र अपने विषय-
सामर्थ्यं श्रोत्रस्य चैतन्ये ह्यात्म- को अभिव्यक्त करनेमें समर्थ है—
ज्योतिषि नित्येऽसंहते सर्वान्तरे यह देखा ही जाता है। किन्तु
सति भवति, न असति इति । श्रोत्रका वह अपने विषयको अभि-
अतः श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्याद्युप- व्यक्त करनेका सामर्थ्य नित्य,
पद्यते । तथा च श्रुत्यन्तराणि— असंहत, सर्वान्तर चेतन आत्म-
“आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते” ज्योतिके रहनेपर ही रह सकता है, न
(बृ० उ० ४।३।६) “तस्य भासा रहनेपर नहीं रह सकता। अतः
सर्वमिदं विभाति” (क० उ० उसे ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि कहना
२।२।१५, श्वे० ६।१४, उचित ही है। “यह अपने ही
मु० २।२।१०) “येन सूर्यस्त- प्रकाशसे प्रकाशित है” “उसके
पति तेजसेद्धः” (तै० ब्रा० ३। प्रकाशसे ही यह सब प्रकाशित
१२।९।७) इत्यादीनि । होता है” “जिस तेजसे प्रदीप्त हुआ
सूर्य तपता है” इत्यादि श्रुतियाँ भी
इसी अर्थकी द्योतक हैं। तथा
वाक्य-भाष्य
अनित्यं यत्संयोगादुपलब्धृत्वं आत्मामें ] जिनके संयोगसे अनित्य
उपलब्धृत्व है वे श्रोत्रादि करण कहलाते
तत्करणं श्रोत्रादि । उदकस्येव हैं। जलके दाहकत्वके समान आत्मामें
दग्धृत्वमनित्यं हि तत्र तत्। उपलब्धृत्व अनित्य ही है। जैसे
अग्निमें नित्य उष्णता रहनेके कारण
यत्र तु नित्यमुपलब्धृत्वमग्ना- वह दग्धा कहलाता है उसी प्रकार
विवौष्ण्यं स नित्योपलब्धिस्वरूप- जिसमें नित्य-उपलब्धृत्व रहता है वह
नित्य उपलब्धिस्वरूप होनेके कारण उप-
त्वादग्ध्नेवोपलब्धोच्यते । श्रोत्रा- लब्धा कहा जाता है। श्रोत्रादि निमित्तोंके
होनेपर जो आत्मामें श्रोतृत्ववादिकी उप-
दिषु श्रोतृत्वानुपलब्धिरनित्या लब्धि होती है वह अनित्य है और केवल
नित्या चात्मन्यतः श्रोत्रस्य आत्मामें वह नित्य है, अतः 'श्रोत्रस्य

२४ केनोपनिषद् [ खण्ड १

२४ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य

“यदादित्यगतं तेजो जगद्भा- | गीतामें भी कहा है—“जो तेज
सयतेऽखिलम्” (गीता १५।१२) | सूर्यमें स्थित होकर सम्पूर्ण जगत्को
“क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति | प्रकाशित करता है” “हे भारत !
भारत” (गीता १३।३३) इति | इसी प्रकार सम्पूर्ण क्षेत्रको क्षेत्री
च गीतासु। काठके च “नित्यो | प्रकाशित करता है।” कठोप-
नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्” | निषत्में भी कहा है—“वह
(२।२।१३) इति। श्रोत्राद्येव | नित्योंका नित्य और चेतनोंका
सर्वस्यात्मभूतं चेतनमिति | चेतन है” इत्यादि । श्रोत्रादि
प्रसिद्धम्; तदिह निवर्त्यते। अस्ति | इन्द्रियवर्ग ही सबका आत्मभूत
किमपि विद्वद्बुद्धिगम्यं सर्वान्तर- | चेतन है—यह बात [लोकमें]
तमं कूटस्थमजमजरममृतमभयं | प्रसिद्ध है। उस भ्रान्तिका इस
श्रोत्रादेरपि श्रोत्रादि तत्सामर्थ्य- | पदसे निराकरण किया जाता है।
निमित्तम् इति प्रतिवचनं शब्दार्थ- | अतः श्रोत्रादिका भी श्रोत्रादि
श्चोपपद्यत एव। | अर्थात् उनकी सामर्थ्यका निमित्त-
| भूत ऐसा कोई पदार्थ है जो
| आत्मवेत्ताओंकी बुद्धिका विषय,
| सबसे अन्तरतम, कूटस्थ, अजन्मा,
| अजर, अमर और अभयरूप है—
| इस प्रकार यह उत्तर और शब्दार्थ
| ठीक ही है।

वाक्य-भाष्य

श्रोत्रमित्याद्यक्षराणामर्थानुगमाद् | 'श्रोत्रम्' इत्यादि अक्षरोंके अर्थके
उपपद्यते निर्विशेषस्योपलब्धि- | अनुगमसे नित्योपलब्धिस्वरूप निर्विशेष
स्वरूपस्यात्मनो मनआदिप्रवृत्ति- | आत्माका मन आदिकी प्रवृत्तिमें कारण
निमित्तत्वमिति । मन आदिष्वेवं | होना ठीक ही है। इसी प्रकार [जैसा
यथोक्तम् । | कि 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' के विषयमें कहा
| गया है] मन, वाक् और प्राणादिके
| सम्बन्धमें भी समझ लेना चाहिये।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५
पद-भाष्य
तथा मनसः अन्तःकरणस्य | इसी प्रकार वह मनका—अन्तः-
मनः । न ह्यन्तःकरणम् अन्त- | करणका मन है, क्योंकि चिज्ज्योति-
रेण चैतन्यज्योतिषो दीधितिं | के प्रकाशके बिना अन्तःकरण
स्वविषयसङ्कल्पाध्यवसायादि- | अपने विषय सङ्कल्प और अध्यवसाय
समर्थं स्यात् । तस्मान्मनसोऽपि | ( निश्चय ) आदिमें समर्थ नहीं हो
मन इति । इह बुद्धिमणसी | सकता । अतः वह मनका भी मन
एकीकृत्य निर्देशो मनस इति । | है । यहाँ बुद्धि और मनको एक
| मानकर मनका निर्देश किया
| गया है ।
यद्वाचो ह वाचम्; यच्छब्दो | यद्वाचो ह वाचम्—यहाँके
यस्मादर्थे श्रोत्रादिभिः सर्वैः | 'यत्' शब्दका 'यस्मात्' अर्थ
सम्बध्यते—यस्माच्छ्रोत्रस्य श्रोत्रम्, | ( हेत्वर्थ ) में 'क्योंकि वह श्रोत्रका
यस्मान्मनसो मन इत्येवम् । | श्रोत्र है, क्योंकि वह मनका मन
वाचो ह वाचमिति द्वितीया | है' इस प्रकार श्रोत्रादि सभी पदोंसे
प्रथमात्वेन विपरिणम्यते, प्राणस्य | सम्बन्ध है । 'वाचो ह वाचम्'
प्राण इति दर्शनात् । वाचो ह | इस पदसमूहमें 'वाचम्' पदकी
| द्वितीया विभक्ति प्रथमा विभक्तिके
| रूपमें परिणत कर ली जाती है,
| जैसा कि 'प्राणस्य प्राणः' में देखा
| जाता है । यदि कहो कि 'वाचो
वाक्य-भाष्य
वाचो ह वाचं प्राणस्य प्राण | यहाँ 'वाचो ह वाचम्' तथा 'प्राणस्य
| प्राणः' इस प्रकार [ पिछले पदमें ]
इति विभक्तिद्वयं सर्वत्रैव द्रष्टव्यम् । | सर्वत्र ही [ प्रथमा और द्वितीया ] दो
| विभक्ति समझनी चाहिये, क्यों ? क्योंकि
कथम् ? पृष्टत्वात्स्वरूपनिर्देशः, | आत्मा-विषयक प्रश्न होनेके कारण
| उसके स्वरूपका निर्देश किया गया है
| और निर्देश प्रथमा विभक्तिसे ही
प्रथमेयव च निर्देशः । तस्य च | किया जाता है; तथा आत्मा ही

२६ केनोपनिषद् [ खण्ड १
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पद-भाष्य
वाचमित्येतदनुरोधेन प्राणस्य | ह वाचम्' इस प्रयोगके अनुरोधसे
प्राणमिति कस्माद्द्बितीयैव न | 'प्राणस्य प्राणम्' इस प्रकार द्वितीया
क्रियते ? न; बहूनामनुरोधस्य | ही क्यों नहीं कर ली जाती ? तो
युक्तत्वात्। वाचमित्यस्य वागि- | ऐसा कहना उचित नहीं क्योंकि
त्येतावद्वक्तव्यं स उ प्राणस्य | बहुतोंका अनुरोध मानना ही
प्राण इति शब्दद्वयानुरोधेन; एवं | युक्तिसङ्गत है। अतः 'स उ प्राणस्य
हि बहूनामनुरोधो युक्तः कृतः | प्राणः' इस पदसमूहके [स और
स्यात्। | प्राणः] दो शब्दोंके अनुरोधसे
पृष्टं च वस्तु प्रथमयैव निर्देश्टुं | 'वाचम्' इस शब्दको ही 'वाक्'
युक्तम्। स यस्त्वया पृष्टः प्राणस्य | इतना कहना चाहिये। ऐसा
प्राणाख्यवृत्तिविशेषस्य प्राणः | करनेसे ही बहुतोंका अनुरोध युक्त
तत्कृतं हि प्राणस्य प्राणन- | (स्वीकार) किया समझा जायगा।
सामर्थ्यम्। न ह्यात्मनानधिष्ठितस्य | इसके सिवा, पूछी हुई वस्तुका
प्राणनमुपपद्यते, "को ह्येवान्यात्कः | निर्देश प्रथमा विभक्तिसे ही करना
उचित है। [अभिप्राय यह कि]
जिसके विषयमें तूने पूछा है वह
प्राणका यानी प्राण नामक वृत्ति-
विशेषका प्राण है। उसके कारण
ही प्राणका प्राणनसामर्थ्य है, क्यों-
कि आत्मासे अनधिष्ठित प्राणका
प्राणन सम्भव नहीं है, जैसा कि
वाक्य-भाष्य
ज्ञेयत्वात्कर्मत्वमिति द्वितीया। | ज्ञेय है, इसलिये उसमें कर्मत्व रहनेके
अतो वाचो ह वाचं प्राणस्य | कारण द्वितीया भी ठीक है। अतः 'वाचो
प्राण इत्यस्मात्सर्वत्रैव विभक्ति- | ह वाचम्' तथा 'प्राणस्य प्राणः' इस
द्वयम्। | कथनके अनुसार सभी जगह दो
विभक्ति समझनी चाहिये। [अर्थात्
सभी पदोंमें ये दोनों विभक्तियाँ रह
सकती हैं।]

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७
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पद-भाष्य
प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो | “यदि यह आनन्दस्वरूप आकाश
न स्यात्” (तै० उ० २।७।१) | न होता तो कौन जीवित रहता
“ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्य- | और कौन श्वासोच्छ्वास करता”
गस्यति” (क० उ० २।२।३) | “वह प्राणको ऊपर ले जाता है
इत्यादिश्रुतिभ्यः । इहापि च | तथा अपानको नीचेकी ओर छोड़ता
वक्ष्यते येन प्राणः प्रणीयते | है” इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि इति । | है। यहाँ (इस उपनिषद्में) भी
श्रोत्रादीन्द्रियप्रस्तावे घ्राण- | यह कहेंगे ही कि जिसके द्वारा
स्यैव ग्रहणम् युक्तं न तु प्राणस्य । | प्राण प्राणन करता है उसीको तू
सत्यमेवम् ; प्राणग्रहणेनैव तु | ब्रह्म जान ।
घ्राणस्य ग्रहणं कृतमेव मन्यते | शङ्का—परन्तु यहाँ श्रोत्रादि
श्रुतिः । सर्वस्यैव करणकलापस्य | इन्द्रियोंके प्रसङ्गमें घ्राणको ही ग्रहण
यदर्थप्रयुक्ता प्रवृत्तिः, तद्ब्रह्मेति | करना युक्तियुक्त है, प्राणको नहीं ।
प्रकरणार्थो विवक्षितः । | समाधान—यह ठीक है ।
किन्तु श्रुति, प्राणको ग्रहण करनेसे
ही घ्राणका भी ग्रहण किया मानती
है । इस प्रकरणको यही अर्थ
बतलाना अभीष्ट है कि जिसके
लिये सम्पूर्ण इन्द्रिय-समूहकी प्रवृत्ति
है वही ब्रह्म है ।
वाक्य-भाष्य
यदेतच्छ्रोत्राद्युपलब्धिनिमितं | यह जो श्रोत्रादिकी उपलब्धिका
[हाशिया: आत्मज्ञानेन] श्रोत्रस्य श्रोत्रमि- | निमित्तभूत तथा ‘श्रोत्रका श्रोत्र’
[हाशिया: अमृतत्व-] त्यादिलक्षणं नित्योप- | इत्यादि लक्षणोंवाला नित्योपलब्धि-
[हाशिया: निरूपणम्] लब्धिस्वरूपं नि- | स्वरूप निर्विशेष आत्मतत्त्व है उसे
र्विशेषमात्मतत्त्वं | जानकर, अज्ञानके कारण आरोपित
तद्बुद्ध्वातिमुच्यानवबोधनिमि- | बुद्धि आदि लक्षणोंवाले संसारसे
त्ताध्यारोपिताद् बुद्ध्यादिलक्ष- | छूटकर—उससे मुक्त होकर, धीर—
णात्संसारान्मोक्षणं कृत्वा धीरा |
केनो० २—

२८ केनोपनिषद् [ खण्ड १

२८ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
तथा चक्षुषश्चक्षू रूपप्रकाश- तथा [वह ब्रह्म] चक्षुका चक्षु
है। रूपको प्रकाशित करनेवाले
कस्य चक्षुषो यद्रूपग्रहणसामर्थ्यं चक्षु-इन्द्रियमें जो रूपको ग्रहण
तदात्मचैतन्याधिष्ठितस्यैव । अतः करनेका सामर्थ्य है वह आत्म-
चैतन्यसे अधिष्ठित होनेके कारण ही
चक्षुषश्चक्षुः । है। इसलिये वह चक्षुका चक्षु है।
प्रष्टुः पृष्टस्यार्थस्य ज्ञातुमिष्ट- प्रश्न-कर्ताको अपने पूछे हुए
आत्मविदो- त्वात् श्रोत्रादेः श्रोत्रा- पदार्थको जाननेकी इच्छा हुआ ही
ऽमृतत्व- दिलक्षणं यथोक्तं करती है; अतः 'अमृता भवन्ति'
निरूपणम् (अमर हो जाते हैं) ऐसी फल-
ब्रह्म 'ज्ञात्वा' इत्यध्या- श्रुति होनेके कारण उपर्युक्त
ह्रियते; अमृता भवन्ति इति श्रोत्रादिके श्रोत्रादिरूप ब्रह्मको
जानकर—इस प्रकार यहाँ 'ज्ञात्वा'
फलश्रुतेश्च । ज्ञानाद्ध्यामृतत्वं क्रियाका अध्याहार किया जाता है,
प्राप्यते। ज्ञात्वा विमुच्यते इति क्योंकि ज्ञानसे ही अमरत्वकी प्राप्ति
होती है, जैसा कि '[ब्रह्मको] जानकर
सामर्थ्यात्। श्रोत्रादिकरणकलाप- मुक्त हो जाता है' इस उक्तिकी
सामर्थ्यसे सिद्ध होता है। जीव
मुज्झित्वा-श्रोत्रादौ ह्यात्मभावं श्रोत्रादि करणकलापको त्यागकर
—श्रोत्रादिमें ही आत्मभाव करके
कृत्वा, तदुपाधिः सन्, तदात्मना उनकी उपाधिसे युक्त होकर
जायते म्रियते संसरति च । जन्मता, मरता, और संसारको प्राप्त
वाक्य-भाष्य
धीमन्तः प्रेत्यास्माल्लोकाच्छरीरात् बुद्धिमान् लोग इस लोकसे जाकर
प्रेत्य वियुज्यान्यस्मिन्नप्रति- अर्थात् इस शरीरसे पृथक् होकर दूसरे
शरीरका अनुसन्धान न करनेके कारण
सन्धीयमाने निर्निमित्तत्वादमृता अन्य कोई प्रयोजन न रहनेसे अमृत
भवन्ति । हो जाते हैं।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३

पद-भाष्य
अतः श्रोत्रादेः श्रोत्रादिलक्षणं | होता है। अतः श्रोत्रादिका श्रोत्रादि
ब्रह्मात्मेति विदित्वा, अतिमुच्य | रूप ब्रह्म ही आत्मा है ऐसा जानकर
श्रोत्राद्यात्मभावं परित्यज्य—ये | और अतिमोचन करके अर्थात्
श्रोत्राद्यात्मभावं परित्यजन्ति, ते | श्रोत्रादिमें आत्मभावको त्यागकर धीर
धीराः धीमन्तः; न हि विशिष्ट- | पुरुष 'प्रेत्य' अर्थात् पुत्र, मित्र,
धीमत्त्वमन्तरेण श्रोत्राद्यात्म- | कलत्र और बन्धुओंमें अहंता-ममताके
भावः शक्यः परित्यक्तुम्—प्रेत्य | व्यवहाररूप इस लोकसे विलग हो
व्यावृत्य अस्मात् लोकात् पुत्र- | यानी सम्पूर्ण एषणाओंसे मुक्त
मित्रकलत्रबन्धुषु ममाहंभाव- | होकर अमृत—अमरणधर्मा हो
संव्यवहारलक्षणात्, त्यक्तसर्वै- | जाते हैं। जो लोग श्रोत्रादिमें आत्म-
षणा भूत्वेत्यर्थः अमृता | भावका त्याग करते हैं वे धीर यानी
अमरणधर्माणो भवन्ति । | बुद्धिमान् होते हैं। क्योंकि विशिष्ट
| बुद्धिमत्त्वके विना श्रोत्रादिमें आत्म-
| भावका त्याग नहीं किया जा सकता।
वाक्य-भाष्य
सति ह्यज्ञाने कर्माणि शरी- | अज्ञानके रहनेतक ही कर्म दूसरे
| शरीरकी खोज किया करते हैं ।
रान्तरं प्रतिसन्दधते । आत्मा- | आत्मज्ञान हो जानेपर तो सम्पूर्ण
वबोधे तु सर्वकर्मारम्भनिमित्ता- | कर्मोंके आरम्भक अज्ञानसे विपरीत
| ज्ञानरूप अग्निद्वारा कर्मोंके दग्ध
ज्ञानविपरीतविद्याग्निप्लुष्टत्वात् | हो जानेपर फिर प्रारब्ध निःशेष हो
| जानेके कारण वे अमृत ही हो जाते
कर्मणामनारम्भेऽमृता एव | हैं। [अनादि संसारपरम्परासे 'मैं
| शरीर हूँ' ऐसे अध्यासके कारण ]
भवन्ति। शरीरादिसन्तानाविच्छेद- | 'पुनः पुनः शरीरप्राप्तिरूप परम्पराका
| विच्छेद न हो' ऐसा अनुसन्धान करते
प्रतिसन्धानाद्यपेक्षयाध्यारोपित- | रहनेके कारण अपने ऊपर आरोपित

३० केनोपनिषद् [ खण्ड १
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पद-भाष्य
“न कर्मणा न प्रजया धनेन “कर्मसे, प्रजासे अथवा धनसे
त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः” नहीं, किन्हीं-किन्हींने केवल त्यागसे
(कैवल्य० १।२) “पराञ्चि ही अमरत्व लाभ किया है” “स्वयम्भू-
खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात् ने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित
पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्। कर दिया है इसलिये जीव बाह्य
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदा- वस्तुओंको ही देखता है, अपने
वृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्”(क०उ० अन्तरात्माको नहीं देखता । कोई
२।१।१) “यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते बुद्धिमान् पुरुष अमरत्वकी इच्छासे
कामा येऽस्य हृदि श्रिताः•••••• इन्द्रियोंको रोककर अपने प्रत्य-
अत्र ब्रह्म समश्नुते” (क० उ० गात्माको देखता है” “जिस समय
२।३।१४) इत्यादिश्रुतिभ्यः। इसके हृदयकी कामनाएँ छूट जाती
अथवा, अतिमुच्येत्यनेनैवैषणा- हैं••••इस अवस्थामें वह ब्रह्मको प्राप्त
त्यागस्य सिद्धत्वाद् अस्माल्लोकात् कर लेता है” इत्यादि श्रुतियोंसे
प्रेत्य अस्माच्छरीरादपेत्य मृत्वे- भी यही सिद्ध होता है । अथवा
त्यर्थः ॥२॥ एषणात्याग तो ‘अतिमुच्य’ इस
पदसे ही सिद्ध हो जाता है, अतः
‘अस्माल्लोकात्प्रेत्य’ का यह भाव
समझना चाहिये कि इस शरीरसे
अलग होकर यानी मरकर [अमर
हो जाते हैं] ॥ २ ॥
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यस्माच्छ्रोत्रादेरपि श्रोत्राद्यात्म- क्योंकि ब्रह्म श्रोत्रादिका भी
भूतं ब्रह्म, अतः । श्रोत्रादिरूप है, इसलिये—
वाक्य-भाष्य
मृत्युवियोगात्पूर्वमप्यमृताः सन्तो की हुई अज्ञानरूप मृत्युका वियोग
नित्यात्मस्वरूपवत्त्वादमृता भवन्ति होनेसे पूर्व भी नित्य आत्मस्वरूप
होनेके कारण यद्यपि अमृत ही रहते
इत्युपचर्यते ॥ २ ॥ हैं तथापि अमर होते हैं—ऐसा
उपचारसे कहा जाता है ॥ २ ॥
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१

आत्माका अज्ञेयत्व और अनिर्वचनीयत्व
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न
विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो
अविदितादधि। इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥३॥
वहाँ (उस ब्रह्मतक) नेत्रेन्द्रिय नहीं जाती, वाणी नहीं जाती,
मन नहीं जाता। अतः जिस प्रकार शिष्यको इस ब्रह्मका उपदेश
करना चाहिये, वह हम नहीं जानते—वह हमारी समझमें नहीं आता।
वह विदितसे अन्य ही है तथा अविदितसे भी परे है—ऐसा हमने पूर्व-
पुरुषोंसे सुना है, जिन्होंने हमारे प्रति उसका व्याख्यान किया था ॥ ३ ॥
पद-भाष्य
न तत्र तस्मिन्ब्रह्मणि चक्षुः | वहाँ—उस ब्रह्ममें नेत्रेन्द्रिय
गच्छति, स्वात्मनि गमना- | नहीं जाती, क्योंकि अपनेहीमें अपनी
सम्भवात्। तथा न वाग् गच्छति। | गति होनी असम्भव है। और न वाणी
वाचा हि शब्द उच्चार्यमाणोऽभि- | ही पहुँचती है। जिस समय वाणी-
धेयं प्रकाशयति यदा, तदाभि- | से उच्चारण किया हुआ शब्द अपने
धेयं प्रति वाग्गच्छतीत्युच्यते। | वाच्यको प्रकाशित करता है उस
| समय ही, अपने वाच्यतक वाणी
| पहुँचती है—ऐसा कहा जाता है।
वाक्य-भाष्य
न तत्र चक्षुर्गच्छति इत्युक्तेऽपि | यद्यपि आचार्यने तत्त्वका निरूपण
पर्यनुयोगे हेतुप्रतिपत्तेः। | कर दिया तो भी न समझनेके कारण
श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्येवमादिना | शिष्यके पुनः प्रश्न करनेमें 'वहाँ
उक्तेऽप्यात्मतत्त्वेऽप्रतिपन्नतवात् | नेत्रेन्द्रिय नहीं जाती' इत्यादि कारण
सूक्ष्मत्वहेतोर्वस्तुनः पुनः | है। अर्थात् 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' इत्यादि
पुनः पर्यनुयुयुक्षाकारणमाह—न | श्रुतिसे आत्मतत्त्वका निरूपण कर
| दिये जानेपर भी आत्मतत्त्व अत्यन्त
| सूक्ष्म होनेके कारण समझमें न आनेसे
| शिष्यको जो पुनः पूछनेकी इच्छा
| हुई उसका कारण 'न तत्र चक्षुर्गच्छति'

३२ केनोपनिषद् [ खण्ड १

३२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
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पद-भाष्य
तस्य च शब्दस्य तन्निर्वर्तकस्य च | किन्तु ब्रह्म तो शब्द और उसका
करणस्यात्मा ब्रह्म । अतो न | व्यवहार करनेवाले इन्द्रियका आत्मा
है । अतः वाणी वहाँ उसी प्रकार
वाग्गच्छति यथाग्निद्राइकः | नहीं पहुँच सकती, जैसे कि अग्नि
प्रकाशकश्चापि सन् न ह्यात्मानं | दाहक और प्रकाशक होनेपर भी
अपनेको न जलाता है और न
प्रकाशयति दहति वा, तद्वत् । | प्रकाशित ही करता है ।
नो मनः मनश्चान्यस्य | और न मन ही [ वहाँतक जाता
है ] । मन भी अन्य पदार्थोंका
सङ्कल्पयितृ अध्यवसायितृ च सत् | सङ्कल्प और निश्चय करनेवाला
नात्मानं सङ्कल्पयत्यध्यवस्यति | होता हुआ भी अपना सङ्कल्प या
निश्चय नहीं करता है, क्योंकि ब्रह्म
च, तस्यापि ब्रह्मात्मेति। इन्द्रिय- | उसका भी आत्मा है । इन्द्रिय और
मनोभ्यां हि वस्तुनो विज्ञानम् । | मनसे ही वस्तुका ज्ञान हुआ करता
है; उनका अविषय होनेके कारण
तद्गोचरत्वान्न विद्मः तद्ब्रह्म | हम यह नहीं जानते कि वह ब्रह्म
ईदृशमिति । | ऐसा है ।
वाक्य-भाष्य
तत्र चक्षुर्गच्छतीति। तत्र श्रोत्रा- | इत्यादि श्रुतिसे बतलाया गया है ।
श्रोत्रादिके आत्मस्वरूप उस आत्म-
द्यात्मभूते चक्षुरादीनि वाक्- | तत्त्वके विषयमें चक्षु आदि इन्द्रियाँ
चक्षुषोः सर्वेन्द्रियोपलक्षणार्थ- | ज्ञान उत्पन्न नहीं कर सकतीं,
क्योंकि यहाँ वाक् और चक्षु सभी
त्वात्न विज्ञानमुत्पादयन्ति । | इन्द्रियोंका उपलक्षण करनेके लिये हैं ।
सुखादिवत्तर्हि गृह्येतान्तःकर- | [ इसपर सन्देह होता है-] तो
फिर सुखादिके समान उसकाः
अन्तःकरणसे ग्रहण हो सकता होगा ?
णेनात आह-नो मनः । न | [ इसपर कहते हैं-] मन भी उसतक

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
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पद-भाष्य
अतो न विजानीमो यथा येन | अतः जिस प्रकारसे इस ब्रह्मका
प्रकारेण एतद् ब्रह्म अनुशिष्यात् | अनुशासन—शिष्यके प्रति उपदेश
उपदिशेच्छिष्यायेत्यभिप्रायः । | किया जाय—यह हम नहीं जानते
| ऐसा इसका अभिप्राय है। जो वस्तु
यद्धि करणगोचरं तदन्यस्मै | इन्द्रियोंका विषय होती है उसीका
उपदेष्टुं शक्यं जातिगुणक्रिया- | जाति, गुण और क्रियारूप
विशेषणैः। न तज्जात्यादिविशेषण- | विशेषणोंद्वारा दूसरेको उपदेश
वद्ब्रह्म तस्माद्विपमं शिष्यानुपदेशेन | किया जा सकता है। किन्तु ब्रह्म
| उन जाति आदि विशेषणोंवाला
प्रत्याययितुमिति उपदेशे तदर्थ- | नहीं है। अतः शिष्योंको उपदेश-
| द्वारा उसकी प्रतीति कराना बहुत
ग्रहणे च यत्नातिशयकर्त्तव्यतां | कठिन है—इस प्रकार श्रुति
दर्शयति । | उपदेश और उसके अर्थका ग्रहण
| करनेमें अधिक प्रयत्न करनेकी
| आवश्यकता दिखलाती है।
वाक्य-भाष्य
सुखादिवन्मनसो विषयस्तत् ; | नहीं पहुँचता। वह सुखादिके समान्
इन्द्रियाविषयत्वात्। | मनका भी विषय नहीं है, क्योंकि वह
| इन्द्रियोंका अविषय है।
न विद्मो न विजानीमोऽन्तः- | यह ब्रह्म मन आदि इन्द्रियसूहका
करणेन यथैतद्ब्रह्म मन आदिकरण- | जिस प्रकार अनुशासन करता है
जातमन्विशष्याद् अनुशासनं | अर्थात् जिस प्रकार उनकी प्रवृत्तिका
कुर्यात्प्रवृत्तिनिमित्तं भवेत्तथा- | कारण होता है—इन्द्रियोंका अविषय
विषयत्वान्न विद्मो न विजानीमः। | होनेके कारण—इस सम्बन्धमें अपने
| अन्तःकरणद्वारा हम कुछ नहीं जानते
| अर्थात् कुछ नहीं समझते ।

३४ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
‘न विद्मो न विजानीमो यथै- | [पूर्वोक्त श्रुतिके] ‘न विद्मो
| न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्’
तदनुशिष्यात्’ इति अत्यन्तम्
| इस वाक्यसे उपदेशके प्रकारका
एवोपदेशप्रकारप्रत्याख्याने प्राप्ते | अत्यन्त निषेध प्राप्त होनेपर उसका
तदपवादोऽयमुच्यते । सत्यमेवं | यह अपवाद कहा जाता है । यह
| ठीक है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे
प्रत्यक्षादिभिः प्रमाणैर्न परः | परमात्माकी प्रतीति नहीं करायी
प्रत्याययितुं शक्यः; आगमेन तु | जा सकती, किन्तु शास्त्रसे तो
| उसकी प्रतीति करायी ही जा
शक्यत एव प्रत्याययितुमिति | सकती है—अतः उसके उपदेशके
| लिये शास्त्रप्रमाण देते हैं—
तदुपदेशार्थमागममाह—
वाक्य-भाष्य
अथवा श्रोत्रादीनां श्रोत्रादि- | अथवा शिष्यके यह कहनेपर कि
लक्षणं ब्रह्म विशेषेण दर्शयेत्युक्त | ‘श्रोत्रादिके श्रोत्रादिरूप ब्रह्मको विशेष-
| रूपसे दिखलाओ’ आचार्य कहते हैं
आचार्य आह न शक्यते दर्श- | कि ‘उसे दिखाया नहीं जा सकता।’
| क्यों ? ‘क्योंकि उसतक नेत्र नहीं पहुँच
यितुम्। कस्मात् ? न तत्र चक्षु- | सकते’ इत्यादि प्रकारसे सबका आशय
र्गच्छति इत्यादि पूर्ववत्सर्वम्। अत्र | पूर्ववत् समझना चाहिये । यहाँ
| ‘यथैतदनुशिष्यात्’ इस वाक्यका
तु विशेषो यथैतदनुशिष्यादिति । | विशेष तात्पर्य है; अर्थात् जिस किसी
यथैतदनुशिष्यात् प्रतिपादयेत् | अन्य विधिसे कोई अन्य गुरु अपने
| शिष्योंको इसका अनुशासन—
अन्योऽपि शिष्यानितोऽन्येन | प्रतिपादन कर सकता है [ वह हम
विधिनेत्यभिप्रायः । | नहीं जानते ] ।
सर्वथापि ब्रह्म बोधयेत्युक्त | ‘परन्तु मुझे तो किसी भी तरह
| ब्रह्मका बोध करा ही दीजिये’—
आचार्य आह, अन्यदेव तद्वि- | शिष्यके ऐसा कहनेपर आचार्य कहते
| हैं—‘वह ब्रह्म जाने हुएसे अन्य है
दितादथो अविदितादधीत्या- | तथा बिना जानेसे भी परे है’—जाने
| और न जाने हुएसे भिन्न होना यही
गमम् विदिताविदिताभ्यामन्य- | उपदेशकी परम्परा है । इसके सिवा

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५
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पद-भाष्य
अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | ‘वह विदितसे अन्य ही है और
दितादधीति । अन्यदेव पृथगेव | अविदितसे भी परे है ।’ यहाँ जिस
तत् यत्प्रकृतं श्रोत्रादीनां श्रोत्रा- | प्रकरणप्राप्त श्रोत्रादिके श्रोत्रादि और
दीत्युक्तमविषयश्च तेषाम् । तद् | उनके अविषय ब्रह्मका उल्लेख किया
विदिताद् अन्यदेव हि । विदितं | गया है वह विदितसे अन्य—पृथक्
नाम यद्विदिक्रिययातिशयेनाप्तं | ही है । वेदन-क्रियासे अत्यन्त
| व्याप्त अर्थात् वेदन-क्रियाकी कर्म-
| भूत जो कुछ [नामरूपात्मक]
वाक्य-भाष्य
त्वम् । यो हि ज्ञाता स एव सः , | जो कोई भी उसको जाननेवाला है
सर्वात्मकत्वात् । अतः सर्वात्मनो | वह स्वयं वही है, क्योंकि ब्रह्म
ज्ञातुर्ज्ञातृन्तराभावाद्दिदितादन्य- | सर्वात्मक है । अतः सबके आत्मारूप
त्वम् । “स वेत्ति वेद्यं न च | उस ज्ञाताके सिवा अन्य ज्ञाताका
तस्यास्ति वेत्ता” (श्वे० उ० | अभाव होनेके कारण वह, जितना
३।१९) इति च मन्त्रवर्णात् । | कुछ जाना जाता है उससे भिन्न है;
“विज्ञातारमरे केन विजानीयात्” | जैसा कि मन्त्रवर्ण भी कहता है—
(बृ० उ० २।४।१४) इति च | “वह सम्पूर्ण ज्ञेयको जानता है तथा
वाजसनेयके । अपि च व्यक्तमेव | उसका ज्ञाता और कोई नहीं है”
विदितं तस्मादन्यदित्यभिप्रायः । | तथा वाजसनेय-श्रुतिमें भी कहा है—
यद्विदितं व्यक्तं तदन्यविषय- | “अरे ! उस विज्ञाताको किससे जाने ?”
त्वादल्पं सविरोधं ततोऽनित्यमत | इसके सिवा व्यक्तको ही विदित कहा
एवानेकत्वादशुद्धमत एव तद्वि- | गया है, उससे भिन्न [यानी अव्यक्त]
लक्षणं ब्रह्मेति सिद्धम् । | है यही इस [अन्यदेव विदितात्]
| का तात्पर्य है जो विदित अर्थात् व्यक्त
| होता है वह दूसरेका विषय होनेके
| कारण अल्प और सविरोध होता है
| ऐसा होनेसे अनित्य होता है, अतः
| अनेक होनेके कारण अशुद्ध भी होता
| है; इसलिये सिद्ध हुआ कि ब्रह्म उससे
| भिन्न प्रकारका ही है ।

३६ केनोपनिषद् [ खण्ड १

३६ केनोपनिषद् [ खण्ड १
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पद-भाष्य

विदिक्रियाकर्मभूतं क्वचित् किञ्चित्कस्यचिद्विदितं स्यादिति ।वस्तु कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी-को ज्ञात है उसीको 'विदित' कहते
सर्वमेव व्याकृतं विदितमेव; तस्मादन्यदेवेत्यर्थः ।हैं । अतः सम्पूर्ण व्याकृत वस्तु 'विदित' ही है । उस [विदित वस्तु] से ब्रह्म पृथक् ही है—यह इसका तात्पर्य है ।
अविदितमज्ञातं तर्हीति प्राप्ते आह—अथो अपि अविदिताद् विदितविपरीतादव्याकृताविद्या-तो फिर ब्रह्म अज्ञात है—ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं—'वह अविदित—विदितसे विपरीत व्याकृत पदार्थोंकी बीजभूत अविद्यारूप

वाक्य-भाष्य

तर्ह्यविदितम् ।पूर्व०—तो फिर ब्रह्म अज्ञात हुआ ?
न; विज्ञानानपेक्षत्वात् । यद्ध्य-सिद्धान्ती–नहीं, क्योंकि उसे विज्ञान (ज्ञात होने) की अपेक्षा नहीं है ।
[ब्रह्मणः स्वीय प्रकाशने अन्यानपेक्षत्वम्] विदितं तद्विज्ञानापेक्षम् । अविदितविज्ञानाय हि लोकप्रवृत्तिः । इदं तुजो वस्तु अज्ञात होती है उसके विज्ञानकी अपेक्षा हुआ करती है । अज्ञात वस्तुको जाननेके लिये ही सम्पूर्ण लोकोंकी प्रवृत्ति है, किन्तु ब्रह्मको
विज्ञानानपेक्षं । कस्मात् ? विज्ञानस्वरूपत्वात् । न हि यस्य यत्स्वरूपंअपने विज्ञानकी अपेक्षा नहीं है; क्यों ? क्योंकि वह विज्ञानस्वरूप ही है । जिसका जो स्वरूप होता है वह
तत्त्वेनान्यतोऽपेक्ष्यते । न च स्वत एवापेक्षा अनपेक्षमेव सिद्धत्वात् । प्रदीपः स्वरूपाभिव्यक्तौउसीकी दूसरेसे अपेक्षा नहीं रखता और अपनेसे तो अपेक्षा हुआ ही नहीं करती, क्योंकि अपना-आप तो सिद्ध (प्राप्त) होनेके कारण अपेक्षासे रहित ही है । दीपक अपने स्वरूपकी
न प्रकाशान्तरमन्यतोऽपेक्षते स्वतो वा । यद्ध्यनपेक्षं तत्स्वत एव सिद्धम् प्रकाशात्मकत्वात्अभिव्यक्तिके लिये अपनेसे अथवा किसी अन्यसे प्रकाशान्तरकी अपेक्षा नहीं रखता । इस प्रकार जो अपेक्षा नहीं रखता वह स्वतः सिद्ध ही है । दीपक प्रकाशस्वरूप ही है; अतः अपने स्वरूपकी अभिव्यक्तिके लिये
प्रदीपस्यापेक्षितोऽप्यनर्थकः स्यात्,यदि वह प्रकाशान्तरकी अपेक्षा करे

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
पद-भाष्य
लक्षणाद्व्याकृतबीजात्, अधि | अव्याकृतसे भी 'अधि' है।"'अधि' का
इति उपर्येर्थे, लक्षणया अन्यद् | अर्थ ऊपर होता है; परन्तु लक्षणासे
इत्यर्थः । यद्धि यस्मादधि उपरि | इसका अर्थ 'अन्य' करना चाहिये, क्योंकि जो वस्तु जिससे अधि—
भवति, तत्तस्मादन्यदिति | ऊपर होती है वह उससे अन्य हुआ
प्रसिद्धम् । | करती है—यह प्रसिद्ध ही है ।
वाक्य-भाष्य
प्रकाशे विशेषाभावात् । न हि | तो व्यर्थ ही होगा, क्योंकि प्रकाशमें
प्रदीपस्य स्वरूपाभिव्यक्तौ प्रदोप- | कोई विशेषता नहीं हुआ करती। एक दीपकके स्वरूपकी अभिव्यक्तिमें किसी
प्रकाशोऽर्थवान् । न चैवमात्म- | अन्य दीपकका प्रकाश सार्थक नहीं
नोऽन्यत्र विज्ञानमस्ति येन | होता। इसी प्रकार आत्मासे भिन्न ऐसा कोई विज्ञान नहीं है जो उसके
स्वरूपविज्ञानेऽप्यपेक्ष्येत । | स्वरूपका ज्ञान करानेके लिये अपेक्षित हो ।
विरोध इति चेन्नान्यत्वात् । | यदि कहो कि इससे विरोध प्रतीत
स्वरूपविज्ञाने विज्ञानस्वरूपत्वाद् | होता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि [ आत्मा ] इससे भिन्न है ।
विज्ञानान्तरं नापेक्षत इत्येतदसत् । | पूर्व०-तुमने जो कहा कि आत्मा विज्ञानस्वरूप है, इसलिये उसके
दृश्यते हि विपरीतज्ञानमात्मनि | स्वरूपको जाननेमें किसी अन्य विज्ञान-
सम्यग्ज्ञानं च । न जानाम्यात्मा- | की अपेक्षा नहीं है—सो ठीक नहीं, क्योंकि आत्मामें भी विपरीत ज्ञान
नमिति । श्रुतेश्च “तत्त्वमसि” | और सम्यक् ज्ञान होता देखा ही जाता
(छा० उ० ६।८-१६) "आत्मा- | है; जैसा कि "मैं आत्माको नहीं जानता" इत्यादि कथनसे तथा "तू वह
नमेवावेत्" (बृ० उ० १।४।१०) | (ब्रह्म) है" "आत्माको ही जाना"

३८ केनोपनिषद् [ खण्ड १
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पद-भाष्य

यद्विदितं तदल्पं मर्त्यं दुःखा- | जो वस्तु विदित होती है वह
[ब्रह्मण] त्मकं चेति हेयम् । | अल्प, मरणशील एवं दुःखमयी होती
[आत्मभिन्नत्व-] तस्माद्विदितादन्यद्ब्रह्म | है, इसलिये वह हेय (त्याज्य) है ।
[प्रतिपादनम्] इत्युक्ते त्वहेयत्वमुक्तं | ब्रह्म उस विदित वस्तुसे भिन्न है—
स्यात् । तथा अविदितादधि | ऐसा कहनेसे उसका अहेयत्व
इत्युक्तेऽनुपादेयत्वमुक्तं स्यात् । | बतलाया गया । तथा ‘वह अविदित-
| से भी ऊपर है' ऐसा कहनेपर उसका
| अनुपादेयत्व प्रतिपादन किया गया ।

वाक्य-भाष्य

“एतं वै तमात्मानं विदित्वा” | “उस इस आत्माको निश्चयपूर्वक जान-
(बृ० उ० ३ । ५ । १) इति च । | कर” आदि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है ।
सर्वत्र श्रुतिष्वात्मविज्ञाने विज्ञा- | श्रुतियोंमें आत्माके ज्ञानके लिये सर्वत्र
नान्तरापेक्षत्वं दृश्यते । तस्मात् | ही विज्ञानान्तरकी अपेक्षा देखी जाती
प्रत्यक्षश्रुतिविरोध इति चेत् । | है । इसलिये [ उपर्युक्त कथनका ]
न; कस्मात् ? अन्यो हि स | प्रत्यक्ष ही श्रुतिसे विरोध है ।
आत्मा बुद्ध्यादिकार्यकरणसङ्घा- | सिद्धान्ती-ऐसा कहना ठीक नहीं ।
ताभिमानसन्तानाविच्छेद लक्षणो- | क्यों ? क्योंकि बुद्धि आदि कार्य और
ऽविवेकात्मको बुद्धयवभासप्रधानः | करणके संघातमें जो अभिमान है उसकी
चक्षुरादिकरणो नित्यचित्स्वरू- | परम्पराका विच्छेद न होना ही जिसका
पात्मान्तःसारो यत्रानित्यं विज्ञानम् | लक्षण है, नित्य चित्स्वरूप आत्मा ही
अवभासते । बौद्धप्रत्ययानाम् आ- | जिसका आन्तरिक सार है और जिसमें
विर्भावतिरोभावधर्मकत्वात्तद्धर्म- | अनित्य विज्ञानका अवभास हुआ
तयैव विलक्षणमपि चावभासते । | करता है यह अविवेकात्मक, चिदाभास-
| प्रधान तथा चक्षु आदि करणोंवाला
| आत्मा ( जीवात्मा ) [ शुद्ध चेतनसे ]
| भिन्न ही है । बौद्ध प्रतीतियोंका
| आविर्भाव-तिरोभाव उसका धर्म है;
| अतः अपने उस धर्मके कारण वह उस-
| से पृथक् दिखलायी भी देता है ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
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पद-भाष्य
कार्यार्थं हि कारणमन्यदन्येन | किसी कार्यके लिये ही किसी अन्य
उपादीयते । अतश्च न वेदितुः | पुरुषद्वारा एक अन्य कारण यानी साधनको ग्रहण किया जाता है; अतः
अन्यस्मै प्रयोजनायान्यदुपादेयं | वेत्ता (आत्मा) को किसी अन्य प्रयोजनके लिये कोई अन्य साधन
भवतीति । एवं विदिताविदिता- | उपादेय नहीं है । इस प्रकार वह विदित और अविदित दोनोंसे भिन्न
भ्यामन्यदिति हेयोपादेय- | है—इस कथनद्वारा हेय और उपादेयका प्रतिषेध कर दिया जाने-
प्रतिषेधेन स्वात्मनोऽनन्यत्वाद् | से [ ज्ञेय वस्तु ] अपने आत्मासे अभिन्न सिद्ध होनेके कारण शिष्यकी
ब्रह्मविषया जिज्ञासा शिष्यस्य | ब्रह्मविषयक जिज्ञासा पूर्ण हो जाती
वाक्य-भाष्य
अन्तःकरणस्य मनसोऽपि | [ किन्तु वह शुद्ध चेतन तो ]
मनोऽन्तर्गतत्वात्सर्वान्तरश्रुतेः । | 'आत्मा सर्वान्तर है' ऐसा बतलाने-वाली श्रुतिके अनुसार अन्तःकरण
अन्तर्गतेन नित्यविज्ञानस्वरूपेण | यानी मनका भी मन है। उस अन्तर्गत,
आकाशवदप्रचलितात्मनान्तर्गर्भ- | नित्यविज्ञानस्वरूप, आकाशके समान
भूतेन बाह्यो बुद्ध्यात्मा तद्विलक्षणः | अविचल और अन्तर्गर्भभूत चिदात्मासे बाह्य और विलक्षण अनित्य विज्ञानवान्
अर्चिर्भिरिवाग्निः प्रत्ययैरावि- | विज्ञानात्मा ही, आविर्भाव-तिरोभाव
र्भावतिरोभावधर्मकैर्विज्ञानाभास- | धर्मवाले विज्ञानाभासरूप अनित्य
रूपैरनित्यविज्ञान आत्मा सुखी | प्रत्ययोंके कारण लौकिक पुरुषोंद्वारा आत्मा सुखी-दुःखी है—ऐसा माना
दुःखीत्यभ्युपगतो लौकिकैः । | जाता है, जैसे ज्वालाओंके कारण अग्नि ।
अतोऽन्यो नित्यविज्ञानस्वरूपादा- | अतः यह नित्यविज्ञानस्वरूप आत्मा-
त्मनः। तत्र हि विज्ञानापेक्षा विप- | से भिन्न है । उसीमें विज्ञानकी अपेक्षा
रीतज्ञानत्वं चोपपद्यते न पुन- | तथा विपरीत ज्ञानत्वकी सम्भावना है—
र्नित्यविज्ञाने । | नित्यविज्ञानस्वरूप चिदात्मामें नहीं ।

४० केनोपनिषद् [ खण्ड १

४० केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
निर्वर्तिता स्यात् । न ह्यन्यस्य | है, क्योंकि अपने आत्मासे भिन्न
स्वात्मनो विदिताविदिताभ्याम् | किसी और वस्तुका विदित और
अन्यत्वं वस्तुनः सम्भवतीत्यात्मा | अविदित दोनोंसे भिन्न होना सम्भव
ब्रह्मेत्येष वाक्यार्थः; “अयमात्मा | नहीं है । अतः आत्मा ही ब्रह्म
ब्रह्म” (माण्डू० २) “य आत्मा- | है—यह इस वाक्यका अर्थ है ।
पहतपाप्मा,” (छा० उ० ८।७।१) | यही बात “यह आत्मा ब्रह्म है”
| “जो आत्मा पापसे रहित है”
वाक्य-भाष्य
तत्त्वमसीति बोधोपदेशो न | पूर्व०—[ ऐसा माननेसे तो ]
उपपद्यत इति चेत् । “आत्मानमे- | “तत्त्वमसि” ( यह ब्रह्म तू है) यह
वावेत्” (बृ० उ० १।४।१०) | उपदेश भी नहीं बन सकता और न
इत्येवमादीनि च नित्यबोधात्म- | “अपने आत्माको ही जाना [ कि मैं
कत्वात् । न ह्यादित्योऽन्येन | ब्रह्म हूँ ]” इत्यादि वाक्य ही सार्थक
प्रकाश्यतेऽतस्तदर्थबोधोपदेशः | हो सकते हैं—क्योंकि ब्रह्म तो नित्य-
अनर्थक इति चेत् । | बोधस्वरूप है । सूर्य दूसरेसे प्रकाशित
| कभी नहीं हो सकता । इसलिये
| आत्माके विषयमें ज्ञानका उपदेश
| करना व्यर्थ ही होगा ।
न; लोकाध्यारोपापोहार्थत्वात् । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि
बोधोपदेशस्य सर्वात्मनि हि नित्य- | वह उपदेश लोगोंद्वारा किये हुए
अध्यास- विज्ञाने बुद्ध्याद्यनित्य- | अध्यारोपकी निवृत्तिके लिये है ।
निरासार्थत्वम् धर्मा लोकैरध्या- | लोगोंने आत्मतत्त्वके अज्ञानवश उस
रोपिता आत्माविवेकतस्तदपो- | नित्यविज्ञानस्वरूप सर्वात्मापर बुद्धि
हार्था बोधोपदेशो बोधात्मनः । | आदि अनित्य धर्मोंका आरोप किया
तत्र च बोधाबोधौ समञ्जसौ, | हुआ है । उसकी निवृत्तिके लिये ही
| उस ज्ञानस्वरूपके ज्ञानका उपदेश
| किया जाता है ।
| तथा उस बोधस्वरूपमें बोध और
| अबोध समीचीन भी हैं, क्योंकि जैसे
अन्यनिमित्तत्वादुदक इवौष्ण्यम् | अग्निके कारण जलमें उष्णता रहती है

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१

पद-भाष्य
“यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म” (बृ० | “जो साक्षात् अपरोक्षरूपसे ब्रह्म ही
उ० ३।४।१) “य आत्मा | है” “जो आत्मा सर्वान्तर है” इत्यादि
सर्वान्तरः” (बृ० उ० ३।४।१) | अन्य श्रुतियोंसे भी प्रमाणित
इत्यादिश्रुत्यन्तरेभ्यश्चेति । | होती है ।
वाक्य-भाष्य
अह्निमित्तम्, रात्रयहनी इवादित्य- | तथा सूर्यके कारण दिन और रात
निमित्ते। लोके नित्याचौष्ण्य- | हुआ करते हैं, वैसे ही उनका कारण
| भी अन्य (आरोपित धर्म) ही
प्रकाशावग्न्यादित्ययोरन्यत्रभावा- | है। उष्णता और प्रकाश-ये अग्नि
| और सूर्यके तो नित्य-धर्म हैं, किन्तु
भावयोर्निमित्तत्वाद नित्याविव | लोकमें अन्यत्र अपने भाव और
| अभावके कारण वे अनित्यवत् उपचरित
उपचर्येते । धक्ष्यत्यग्निः प्रकाश- | होते हैं; जैसे- 'अग्नि जला देगा',
यिष्यति सवितेति तद्वत् । एवं | 'सूर्य प्रकाशित करेगा' इत्यादि
| वाक्योंमें; वैसे ही [आत्माके विषयमें
च सुखदुःखबन्धमोक्षाद्यध्यारोपो | समझना चाहिये]। इस प्रकार लोकका
| जो सुख-दुःख एवं बन्ध-मोक्षरूप
लोकस्य तदपेक्ष्य तत्त्वमस्यात्मा- | अध्यारोप है उसकी अपेक्षासे ही
| 'तत्त्वमसि' 'आत्मानमेवावेत्' इत्यादि
नमेवावेदित्यात्मावबोधोपदेशेन | श्रुतियाँ आत्मज्ञानके उपदेशसे केवल
श्रुतयः केवलमध्यारोपापोहार्थाः। | अध्यारोपकी निवृत्तिके लिये ही हैं।
यथा सवितासौ प्रकाशयति | जिस प्रकार 'यह सूर्य अपने-आपको
| प्रकाशित करता है' [ इस वाक्यसे
आत्मानम् इति | प्रकाशस्वरूप सूर्यमें प्रकाशकर्तृत्वका
ब्रह्मणो विदिता- | तद्वत्, बोधाबोध- | उल्लेख किया जाता है] उसी प्रकार
विदिताभ्या- | कर्तृत्वं च नित्य- | नित्यबोधस्वरूप आत्मामें भी ज्ञान
मन्यत्वम् | बोधात्मनि।तस्मात्- | और अज्ञानका कर्तृत्व माना गया है।
| इसलिये वह अविदित (अज्ञात) से
अन्यदविदितात् । अधिशब्दश्च | भी अन्य है। यहाँ 'अधि' शब्द 'अन्य'
अन्यार्थे । यद्वा यदि यस्याधि | अर्थमें है। अथवा जो जिससे अधि

४२ केनोपनिषद् [ खण्ड १

४२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
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पद-भाष्य
एवं सर्वात्मनः सर्वविशेष- | इस प्रकार सर्वात्मा सर्वविशेष-
रहितस्य चिन्मात्रज्योतिषो | रहित चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप वस्तुका
ब्रह्मत्वप्रतिपादकस्य वाक्यार्थस्य | ब्रह्मत्व प्रतिपादन करनेवाले वाक्यार्थ--
वाक्य-भाष्य
तत्ततोऽन्यत्सामर्थ्यात् । यथाधि | (ऊपर) होता है वह उससे अन्य ही
हुआ करता है, क्योंकि उस शब्दकी
भृत्यादीनां राजा । अव्यक्तमेव | शक्तिसे यही बोध होता है; जिस प्रकार
सेवक आदिसे ऊपर राजा । १ अव्यक्त
अविदितं ततोऽन्यदित्यर्थः । | ही अविदित है, उससे यह आत्मा
पृथक् है—यही इसका तात्पर्य है ।
विदितमविदितं च व्यक्ताव्यक्ते | विदित और अविदित यानी
व्यक्त और अव्यक्त ही क्रमशः कार्य
कार्यकारणत्वेन विकल्पिते | तथा कारणभावसे माने गये हैं उनसे
भिन्न वह ब्रह्म है जो सम्पूर्ण विशेषणोंसे
ताभ्यामन्यद्ब्रह्म विज्ञानस्वरूपं | रहित विज्ञानस्वरूप है—यह इस समस्त
सर्वविशेषप्रत्यस्तमितम् इत्ययं | वाक्यसमुदायका तात्पर्य है । अतः
आत्मस्वरूप होनेके कारण यह त्याज्य
समुदायार्थः । अत एवात्मत्वान्न | या ग्राह्य भी नहीं है । अन्य वस्तु ही
किसी अन्यकी त्याज्य या ग्राह्य हुआ
हेय उपादेयो वा । अन्यद्ध्यन्येन | करती है; स्वयं आप ही अपनी कोई
हेयमुपादेयं वा । न तेनैव | भी वस्तु हेय या उपादेय नहीं होती ।
आत्मा ही ब्रह्म है और सबका
तद्यस्य कस्यचिद्धेयमुपादेयं वा | अन्तर्यामी होनेसे वह किसी इन्द्रियका
विषय भी नहीं है । इसलिये यह किसी
भवति । आत्मा च ब्रह्म सर्वान्त- | अन्यका भी हेय या उपादेय नहीं है ।
रात्मत्वादविषयमतोऽन्यस्यापिन | इसके सिवा आत्मासे भिन्न कोई और
वस्तु न होनेके कारण भी [वह
हेयमुपादेयं वा । अन्याभावाच्च । | हेयोपादेयरहित है]।
१. जिस प्रकार सेवकोंके ऊपर होनेके कारण राजा उनसे भिन्न है उसी प्रकार
अविदितसे ऊपर होनेके कारण आत्मा उससे भिन्न है ।