केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 42, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
‘न विद्मो न विजानीमो यथै- | [पूर्वोक्त श्रुतिके] ‘न विद्मो
| न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्’
तदनुशिष्यात्’ इति अत्यन्तम्
| इस वाक्यसे उपदेशके प्रकारका
एवोपदेशप्रकारप्रत्याख्याने प्राप्ते | अत्यन्त निषेध प्राप्त होनेपर उसका
तदपवादोऽयमुच्यते । सत्यमेवं | यह अपवाद कहा जाता है । यह
| ठीक है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे
प्रत्यक्षादिभिः प्रमाणैर्न परः | परमात्माकी प्रतीति नहीं करायी
प्रत्याययितुं शक्यः; आगमेन तु | जा सकती, किन्तु शास्त्रसे तो
| उसकी प्रतीति करायी ही जा
शक्यत एव प्रत्याययितुमिति | सकती है—अतः उसके उपदेशके
| लिये शास्त्रप्रमाण देते हैं—
तदुपदेशार्थमागममाह—
वाक्य-भाष्य
अथवा श्रोत्रादीनां श्रोत्रादि- | अथवा शिष्यके यह कहनेपर कि
लक्षणं ब्रह्म विशेषेण दर्शयेत्युक्त | ‘श्रोत्रादिके श्रोत्रादिरूप ब्रह्मको विशेष-
| रूपसे दिखलाओ’ आचार्य कहते हैं
आचार्य आह न शक्यते दर्श- | कि ‘उसे दिखाया नहीं जा सकता।’
| क्यों ? ‘क्योंकि उसतक नेत्र नहीं पहुँच
यितुम्। कस्मात् ? न तत्र चक्षु- | सकते’ इत्यादि प्रकारसे सबका आशय
र्गच्छति इत्यादि पूर्ववत्सर्वम्। अत्र | पूर्ववत् समझना चाहिये । यहाँ
| ‘यथैतदनुशिष्यात्’ इस वाक्यका
तु विशेषो यथैतदनुशिष्यादिति । | विशेष तात्पर्य है; अर्थात् जिस किसी
यथैतदनुशिष्यात् प्रतिपादयेत् | अन्य विधिसे कोई अन्य गुरु अपने
| शिष्योंको इसका अनुशासन—
अन्योऽपि शिष्यानितोऽन्येन | प्रतिपादन कर सकता है [ वह हम
विधिनेत्यभिप्रायः । | नहीं जानते ] ।
सर्वथापि ब्रह्म बोधयेत्युक्त | ‘परन्तु मुझे तो किसी भी तरह
| ब्रह्मका बोध करा ही दीजिये’—
आचार्य आह, अन्यदेव तद्वि- | शिष्यके ऐसा कहनेपर आचार्य कहते
| हैं—‘वह ब्रह्म जाने हुएसे अन्य है
दितादथो अविदितादधीत्या- | तथा बिना जानेसे भी परे है’—जाने
| और न जाने हुएसे भिन्न होना यही
गमम् विदिताविदिताभ्यामन्य- | उपदेशकी परम्परा है । इसके सिवा