केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
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पद-भाष्य
तस्य च शब्दस्य तन्निर्वर्तकस्य च | किन्तु ब्रह्म तो शब्द और उसका
करणस्यात्मा ब्रह्म । अतो न | व्यवहार करनेवाले इन्द्रियका आत्मा
है । अतः वाणी वहाँ उसी प्रकार
वाग्गच्छति यथाग्निद्राइकः | नहीं पहुँच सकती, जैसे कि अग्नि
प्रकाशकश्चापि सन् न ह्यात्मानं | दाहक और प्रकाशक होनेपर भी
अपनेको न जलाता है और न
प्रकाशयति दहति वा, तद्वत् । | प्रकाशित ही करता है ।
नो मनः मनश्चान्यस्य | और न मन ही [ वहाँतक जाता
है ] । मन भी अन्य पदार्थोंका
सङ्कल्पयितृ अध्यवसायितृ च सत् | सङ्कल्प और निश्चय करनेवाला
नात्मानं सङ्कल्पयत्यध्यवस्यति | होता हुआ भी अपना सङ्कल्प या
निश्चय नहीं करता है, क्योंकि ब्रह्म
च, तस्यापि ब्रह्मात्मेति। इन्द्रिय- | उसका भी आत्मा है । इन्द्रिय और
मनोभ्यां हि वस्तुनो विज्ञानम् । | मनसे ही वस्तुका ज्ञान हुआ करता
है; उनका अविषय होनेके कारण
तद्गोचरत्वान्न विद्मः तद्ब्रह्म | हम यह नहीं जानते कि वह ब्रह्म
ईदृशमिति । | ऐसा है ।
वाक्य-भाष्य
तत्र चक्षुर्गच्छतीति। तत्र श्रोत्रा- | इत्यादि श्रुतिसे बतलाया गया है ।
श्रोत्रादिके आत्मस्वरूप उस आत्म-
द्यात्मभूते चक्षुरादीनि वाक्- | तत्त्वके विषयमें चक्षु आदि इन्द्रियाँ
चक्षुषोः सर्वेन्द्रियोपलक्षणार्थ- | ज्ञान उत्पन्न नहीं कर सकतीं,
क्योंकि यहाँ वाक् और चक्षु सभी
त्वात्न विज्ञानमुत्पादयन्ति । | इन्द्रियोंका उपलक्षण करनेके लिये हैं ।
सुखादिवत्तर्हि गृह्येतान्तःकर- | [ इसपर सन्देह होता है-] तो
फिर सुखादिके समान उसकाः
अन्तःकरणसे ग्रहण हो सकता होगा ?
णेनात आह-नो मनः । न | [ इसपर कहते हैं-] मन भी उसतक