केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 43, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५
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पद-भाष्य
अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | ‘वह विदितसे अन्य ही है और
दितादधीति । अन्यदेव पृथगेव | अविदितसे भी परे है ।’ यहाँ जिस
तत् यत्प्रकृतं श्रोत्रादीनां श्रोत्रा- | प्रकरणप्राप्त श्रोत्रादिके श्रोत्रादि और
दीत्युक्तमविषयश्च तेषाम् । तद् | उनके अविषय ब्रह्मका उल्लेख किया
विदिताद् अन्यदेव हि । विदितं | गया है वह विदितसे अन्य—पृथक्
नाम यद्विदिक्रिययातिशयेनाप्तं | ही है । वेदन-क्रियासे अत्यन्त
| व्याप्त अर्थात् वेदन-क्रियाकी कर्म-
| भूत जो कुछ [नामरूपात्मक]
वाक्य-भाष्य
त्वम् । यो हि ज्ञाता स एव सः , | जो कोई भी उसको जाननेवाला है
सर्वात्मकत्वात् । अतः सर्वात्मनो | वह स्वयं वही है, क्योंकि ब्रह्म
ज्ञातुर्ज्ञातृन्तराभावाद्दिदितादन्य- | सर्वात्मक है । अतः सबके आत्मारूप
त्वम् । “स वेत्ति वेद्यं न च | उस ज्ञाताके सिवा अन्य ज्ञाताका
तस्यास्ति वेत्ता” (श्वे० उ० | अभाव होनेके कारण वह, जितना
३।१९) इति च मन्त्रवर्णात् । | कुछ जाना जाता है उससे भिन्न है;
“विज्ञातारमरे केन विजानीयात्” | जैसा कि मन्त्रवर्ण भी कहता है—
(बृ० उ० २।४।१४) इति च | “वह सम्पूर्ण ज्ञेयको जानता है तथा
वाजसनेयके । अपि च व्यक्तमेव | उसका ज्ञाता और कोई नहीं है”
विदितं तस्मादन्यदित्यभिप्रायः । | तथा वाजसनेय-श्रुतिमें भी कहा है—
यद्विदितं व्यक्तं तदन्यविषय- | “अरे ! उस विज्ञाताको किससे जाने ?”
त्वादल्पं सविरोधं ततोऽनित्यमत | इसके सिवा व्यक्तको ही विदित कहा
एवानेकत्वादशुद्धमत एव तद्वि- | गया है, उससे भिन्न [यानी अव्यक्त]
लक्षणं ब्रह्मेति सिद्धम् । | है यही इस [अन्यदेव विदितात्]
| का तात्पर्य है जो विदित अर्थात् व्यक्त
| होता है वह दूसरेका विषय होनेके
| कारण अल्प और सविरोध होता है
| ऐसा होनेसे अनित्य होता है, अतः
| अनेक होनेके कारण अशुद्ध भी होता
| है; इसलिये सिद्ध हुआ कि ब्रह्म उससे
| भिन्न प्रकारका ही है ।