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सर्वकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 152 में से

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पृष्ठ 36

२८ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
तथा चक्षुषश्चक्षू रूपप्रकाश- तथा [वह ब्रह्म] चक्षुका चक्षु
है। रूपको प्रकाशित करनेवाले
कस्य चक्षुषो यद्रूपग्रहणसामर्थ्यं चक्षु-इन्द्रियमें जो रूपको ग्रहण
तदात्मचैतन्याधिष्ठितस्यैव । अतः करनेका सामर्थ्य है वह आत्म-
चैतन्यसे अधिष्ठित होनेके कारण ही
चक्षुषश्चक्षुः । है। इसलिये वह चक्षुका चक्षु है।
प्रष्टुः पृष्टस्यार्थस्य ज्ञातुमिष्ट- प्रश्न-कर्ताको अपने पूछे हुए
आत्मविदो- त्वात् श्रोत्रादेः श्रोत्रा- पदार्थको जाननेकी इच्छा हुआ ही
ऽमृतत्व- दिलक्षणं यथोक्तं करती है; अतः 'अमृता भवन्ति'
निरूपणम् (अमर हो जाते हैं) ऐसी फल-
ब्रह्म 'ज्ञात्वा' इत्यध्या- श्रुति होनेके कारण उपर्युक्त
ह्रियते; अमृता भवन्ति इति श्रोत्रादिके श्रोत्रादिरूप ब्रह्मको
जानकर—इस प्रकार यहाँ 'ज्ञात्वा'
फलश्रुतेश्च । ज्ञानाद्ध्यामृतत्वं क्रियाका अध्याहार किया जाता है,
प्राप्यते। ज्ञात्वा विमुच्यते इति क्योंकि ज्ञानसे ही अमरत्वकी प्राप्ति
होती है, जैसा कि '[ब्रह्मको] जानकर
सामर्थ्यात्। श्रोत्रादिकरणकलाप- मुक्त हो जाता है' इस उक्तिकी
सामर्थ्यसे सिद्ध होता है। जीव
मुज्झित्वा-श्रोत्रादौ ह्यात्मभावं श्रोत्रादि करणकलापको त्यागकर
—श्रोत्रादिमें ही आत्मभाव करके
कृत्वा, तदुपाधिः सन्, तदात्मना उनकी उपाधिसे युक्त होकर
जायते म्रियते संसरति च । जन्मता, मरता, और संसारको प्राप्त
वाक्य-भाष्य
धीमन्तः प्रेत्यास्माल्लोकाच्छरीरात् बुद्धिमान् लोग इस लोकसे जाकर
प्रेत्य वियुज्यान्यस्मिन्नप्रति- अर्थात् इस शरीरसे पृथक् होकर दूसरे
शरीरका अनुसन्धान न करनेके कारण
सन्धीयमाने निर्निमित्तत्वादमृता अन्य कोई प्रयोजन न रहनेसे अमृत
भवन्ति । हो जाते हैं।