सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 152 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 37

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३

पद-भाष्य
अतः श्रोत्रादेः श्रोत्रादिलक्षणं | होता है। अतः श्रोत्रादिका श्रोत्रादि
ब्रह्मात्मेति विदित्वा, अतिमुच्य | रूप ब्रह्म ही आत्मा है ऐसा जानकर
श्रोत्राद्यात्मभावं परित्यज्य—ये | और अतिमोचन करके अर्थात्
श्रोत्राद्यात्मभावं परित्यजन्ति, ते | श्रोत्रादिमें आत्मभावको त्यागकर धीर
धीराः धीमन्तः; न हि विशिष्ट- | पुरुष 'प्रेत्य' अर्थात् पुत्र, मित्र,
धीमत्त्वमन्तरेण श्रोत्राद्यात्म- | कलत्र और बन्धुओंमें अहंता-ममताके
भावः शक्यः परित्यक्तुम्—प्रेत्य | व्यवहाररूप इस लोकसे विलग हो
व्यावृत्य अस्मात् लोकात् पुत्र- | यानी सम्पूर्ण एषणाओंसे मुक्त
मित्रकलत्रबन्धुषु ममाहंभाव- | होकर अमृत—अमरणधर्मा हो
संव्यवहारलक्षणात्, त्यक्तसर्वै- | जाते हैं। जो लोग श्रोत्रादिमें आत्म-
षणा भूत्वेत्यर्थः अमृता | भावका त्याग करते हैं वे धीर यानी
अमरणधर्माणो भवन्ति । | बुद्धिमान् होते हैं। क्योंकि विशिष्ट
| बुद्धिमत्त्वके विना श्रोत्रादिमें आत्म-
| भावका त्याग नहीं किया जा सकता।
वाक्य-भाष्य
सति ह्यज्ञाने कर्माणि शरी- | अज्ञानके रहनेतक ही कर्म दूसरे
| शरीरकी खोज किया करते हैं ।
रान्तरं प्रतिसन्दधते । आत्मा- | आत्मज्ञान हो जानेपर तो सम्पूर्ण
वबोधे तु सर्वकर्मारम्भनिमित्ता- | कर्मोंके आरम्भक अज्ञानसे विपरीत
| ज्ञानरूप अग्निद्वारा कर्मोंके दग्ध
ज्ञानविपरीतविद्याग्निप्लुष्टत्वात् | हो जानेपर फिर प्रारब्ध निःशेष हो
| जानेके कारण वे अमृत ही हो जाते
कर्मणामनारम्भेऽमृता एव | हैं। [अनादि संसारपरम्परासे 'मैं
| शरीर हूँ' ऐसे अध्यासके कारण ]
भवन्ति। शरीरादिसन्तानाविच्छेद- | 'पुनः पुनः शरीरप्राप्तिरूप परम्पराका
| विच्छेद न हो' ऐसा अनुसन्धान करते
प्रतिसन्धानाद्यपेक्षयाध्यारोपित- | रहनेके कारण अपने ऊपर आरोपित