सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 152 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 34

२६ केनोपनिषद् [ खण्ड १
❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦
पद-भाष्य
वाचमित्येतदनुरोधेन प्राणस्य | ह वाचम्' इस प्रयोगके अनुरोधसे
प्राणमिति कस्माद्द्बितीयैव न | 'प्राणस्य प्राणम्' इस प्रकार द्वितीया
क्रियते ? न; बहूनामनुरोधस्य | ही क्यों नहीं कर ली जाती ? तो
युक्तत्वात्। वाचमित्यस्य वागि- | ऐसा कहना उचित नहीं क्योंकि
त्येतावद्वक्तव्यं स उ प्राणस्य | बहुतोंका अनुरोध मानना ही
प्राण इति शब्दद्वयानुरोधेन; एवं | युक्तिसङ्गत है। अतः 'स उ प्राणस्य
हि बहूनामनुरोधो युक्तः कृतः | प्राणः' इस पदसमूहके [स और
स्यात्। | प्राणः] दो शब्दोंके अनुरोधसे
पृष्टं च वस्तु प्रथमयैव निर्देश्टुं | 'वाचम्' इस शब्दको ही 'वाक्'
युक्तम्। स यस्त्वया पृष्टः प्राणस्य | इतना कहना चाहिये। ऐसा
प्राणाख्यवृत्तिविशेषस्य प्राणः | करनेसे ही बहुतोंका अनुरोध युक्त
तत्कृतं हि प्राणस्य प्राणन- | (स्वीकार) किया समझा जायगा।
सामर्थ्यम्। न ह्यात्मनानधिष्ठितस्य | इसके सिवा, पूछी हुई वस्तुका
प्राणनमुपपद्यते, "को ह्येवान्यात्कः | निर्देश प्रथमा विभक्तिसे ही करना
उचित है। [अभिप्राय यह कि]
जिसके विषयमें तूने पूछा है वह
प्राणका यानी प्राण नामक वृत्ति-
विशेषका प्राण है। उसके कारण
ही प्राणका प्राणनसामर्थ्य है, क्यों-
कि आत्मासे अनधिष्ठित प्राणका
प्राणन सम्भव नहीं है, जैसा कि
वाक्य-भाष्य
ज्ञेयत्वात्कर्मत्वमिति द्वितीया। | ज्ञेय है, इसलिये उसमें कर्मत्व रहनेके
अतो वाचो ह वाचं प्राणस्य | कारण द्वितीया भी ठीक है। अतः 'वाचो
प्राण इत्यस्मात्सर्वत्रैव विभक्ति- | ह वाचम्' तथा 'प्राणस्य प्राणः' इस
द्वयम्। | कथनके अनुसार सभी जगह दो
विभक्ति समझनी चाहिये। [अर्थात्
सभी पदोंमें ये दोनों विभक्तियाँ रह
सकती हैं।]