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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

४५२ : छान्दोग्योपनिषद् : [ अध्याय ७

४५२ : छान्दोग्योपनिषद् : [ अध्याय ७
और जो अल्प है, वह मर्त्य है।' [नारद--] 'भगवन् !
यह (भूमा) किसमे प्रतिष्ठित है?' [सनत्कुमार--] 'अपनी
महिमामे, अथवा अपनी महिमामे भी नहीं है। इस लोकमे
गौ, अश्व आदिको महिमा कहते हैं तथा हाथी, सुवर्ण, दास,
भार्या, क्षेत्र और घर इनका नाम भी महिमा है, किन्तु मेरा
ऐसा कथन नहीं है; क्योकि अन्य पदार्थ अन्यमे प्रतिष्ठित
होता है। म तो यह कहता हूँ'-ऐसा सनत्कुमारजीने
कहा ॥ १२ ॥
पञ्चविंश खण्ड
भूमा ही सर्वत्र सब कुछ और आत्मा है
वही नीचे है, वही ऊपर है, वही पीछे है, वही आगे है,
वही दायीं ओर है, वही बायीं ओर हे और वही यह सब
है। अब उसीमे अहङ्कारादेश किया जाता है-मै ही नीचे हूँ,
मैं ही ऊपर हूँ, मं ही पीछे हूँ, मे ही आगे हूँ, मे ही दायीं
ओर हूँ, मै ही बायीं ओर हूँ और मै ही यह सब हूँ ॥ १ ॥
अब आत्मरूपसे ही भूमाका आदेश किया जाता है। आत्मा
ही नीचे है, आत्मा ही ऊपर है, आत्मा ही पीछे है, आत्मा
ही आगे है, आत्मा ही दायीं ओर है, आत्मा ही बायीं ओर
हे और आत्मा ही यह सब है। वह यह इस प्रकार देखनेवाला,
इस प्रकार मनन करनेवाला तथा विशेषरूपसे इस प्रकार
जाननेवाला आत्मरति, आत्मक्रीड, आत्ममिथुन और आत्मानन्द
होता हे, वह स्वराट् हे, सम्पूर्ण लोकोंमें उसकी यथेच्छ गति
होती हे। किंतु जो इससे विपरीत जानते हे वे अन्यराट्
(जिनका राजा अपनेसे भिन्न कोई और हे, ऐसे) और
क्षय्यलोक (क्षयशील लोकोंको प्राप्त होनेवाले) होते हैं। उनकी
सम्पूर्ण लोकोंमे स्वेच्छागति नहीं होती ॥ २ ॥
षड्विंश खण्ड
आत्मदर्शनसे सबकी प्राप्ति, आहारशुद्धिसे क्रमशः अविद्याकी निवृत्ति
उस इस प्रकार देखनेवाले, इस प्रकार मनन करनेवाले और
इस प्रकार जाननेवाले इस विद्वानके लिये आत्मासे प्राण,
आत्मासे आशा, आत्मासे स्मृति, आत्मासे आकाश, आत्मासे
तेज, आत्मासे जल, आत्मासे आविर्भाव और तिरोभाव, आत्मासे
अन्न, आत्मासे बल, आत्मासे विज्ञान, आत्मासे ध्यान, आत्मासे
चित्त, आत्मासे संकल्प, आत्मासे मन, आत्मासे वाक, आत्मासे
नाम, आत्मासे मन्त्र, आत्मासे कर्म और आत्मासे ही यह सब
हो जाता है ॥ १ ॥
इस विषयमें यह मन्त्र है-विद्वान् न तो मृत्युको देखता
है, न रोगको और न दुःखत्वको ही। वह विद्वान् सबको
[आत्मरूप ही] देखता है, अतः सबको प्राप्त हो जाता है।
वह एक होता है फिर वही तीन, पाँच, सात और नौ रूप हो
जाता है। फिर वही ग्यारह कहा गया हे तथा वही सौ, दश,
एक, सहस्र और बीस भी होता है। आहारशुद्धि (विषयो-
पलब्धिरूप विज्ञानकी शुद्धि) होनेपर अन्तःकरणकी शुद्धि होती
हे; अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर निश्चल स्मृति होती हे तथा
स्मृतिकी प्राप्ति होनेपर सम्पूर्ण ग्रन्थियोकी निवृत्ति हो जाती
है। [इस प्रकार] जिनकी वासनाएँ क्षीण हो गयी थीं, उन
(नारदजी) को भगवान् सनत्कुमारने अज्ञानान्धकारका पार
दिखलाया। उन (सनत्कुमारजी) को 'स्कन्द' ऐसा कहते
हैं, 'स्कन्द' ऐसा कहते हैं ॥ २ ॥
॥ सप्तम अध्याय समाप्त ॥ ७ ॥