कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४२४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३
४२४ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ३
त्रयोदश खण्ड
पञ्चप्राणोंकी उपासना
उस इस प्रसिद्ध हृदयके पाँच देवसुषि ह । इसका जो
पूर्वदिग्नावर्ती सुषि (छिद्र) है वह प्राण है, वह चक्षु है, वह
आदित्य है, वही यह तेज और अन्नाद्य है—इस प्रकार उपासना
करे । जो इस प्रकार जानता है [अर्थात् इस प्रकार इनकी
उपासना करता है] वह तेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता
है । तथा इसका जो दक्षिण छिद्र है वह व्यान है, वह श्रोत्र
है, वह चन्द्रमा है और वही यह श्री एव यश है—इस प्रकार
उसकी उपासना करे । जो ऐसा जानता है वह श्रीमान् और
यशस्वी होता है। तथा इसका जो पश्चिम छिद्र है वह अपान
है, वह वाक् है, वह अग्नि है और वही यह ब्रह्मतेज एव
अन्नाद्य है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो ऐसा जानता
है वह ब्रह्मतेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है। तथा इसका
जो उत्तरी छिद्र है वह समान है, वह मन है, वह मेघ है,
और वही यह कीर्ति और व्युष्टि (देहका लावण्य) है—
इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो इस प्रकार जानता है वह
कीर्तिमान् और कान्तिमान् होता है। तथा इसका जो ऊर्ध्व
छिद्र है वह उदान है, वह वायु है, वह आकाश है और वही
यह ओज और तेज है—इस प्रकार उसकी उपासना करे ।
जो इस प्रकार जानता है वह ओजस्वी और तेजस्वी होता है ।
वे ये पाँच ब्रह्मपुरुष स्वर्गलोकके द्वारपाल ह । यह जो कोई
भी स्वर्गलोकके द्वारपाल इन पाँच ब्रह्मपुरुषोंको जानता है
उसके कुलमे वीर उत्पन्न होता है। जो इस प्रकार स्वर्गलोकके
द्वारपाल इन पाँच पुरुषोंको जानता है वह स्वर्गलोकको प्राप्त
होता है। तथा इस द्युलोकसे परे जो परम ज्योति विश्वके पृष्ठपर
यानी सबके ऊपर, जिनमे उत्तम कोई दूसग लोक नहीं है
ऐसे उत्तम लोकोमे प्रकाशित हो रही है वह निश्चय यही है
जो कि इस पुरुषके भीतर ज्योति है। उस इस (हृदयस्थित
पुरुष) का यही दर्शनोपाय हे जब कि [मनुष्य] इस शरीरमे
स्पर्शद्वारा उष्णताको जानता है तथा यही उसका श्रवणोपाय
है जब कि यह कानोंको मूँदकर निनद (रथके घोष), नदथु
(बैलके डकराने) और जलते हुए अग्निके शब्दके समान श्रवण
करता है, वह यह ज्योति दृष्ट और श्रुत है—इस प्रकार इसकी
उपासना करे । जो उपासक ऐसा जानता है [इस प्रकार
उपासना करता ह] वह दर्शनीय और विश्रुत (विख्यात)
होता है ॥ १-८॥
चतुर्दश खण्ड
जगत्की एवं आत्माकी ब्रह्मरूपमें उपासना
यह सारा जगत् निश्चय ब्रह्म ही है, यह उसीमे उत्पन्न
होनेवाला, उसीमे लीन होनेवाला और उसीमें चेष्टा करनेवाला
है—इस प्रकार शान्त [राग द्वेषरहित] होकर उपासना करे,
क्योंकि पुरुष निश्चय ही क्रतुमय—निश्चयात्मक है; इस लोकमें
पुरुष जैसे निश्चयवाला होता है वैसा ही यहाँसे मरकर जानेपर
होता है। अतः उसे [पुरुषको] निश्चय करना चाहिये [वह
ब्रह्म] मनोमय, प्राणशरीर, प्रकाशस्वरूप, सत्यसङ्कल्प, आकाश-
शरीर, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरम, इस सम्पूर्ण
जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाक्रहित और सम्भ्रम-
शून्य है, हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा धानसे, यवसे,
सरसोंसे, श्यामाकसे अथवा श्यामाकतण्डुलसे भी सूक्ष्म है तथा
हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक
अथवा इन सब लोकोंकी अपेक्षा भी बड़ा है जो सर्वकर्मा,
सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सबको सब ओरसे व्याप्त करने-
वाला, वाक्रहित और सम्भ्रमशून्य है वह मेरा आत्मा हृदय-
कमलके मध्यमें स्थित है। यही ब्रह्म है, इस शरीरसे मरकर
जानेपर में इसीको प्राप्त होऊँगा । जिसका ऐसा निश्चय है, और
जिसे इस विषयमे कोई सन्देह भी नहीं है [उसे इसी ब्रह्म-
भावकी ही प्राप्ति होती है] ऐसा शाण्डिल्यने कहा है ॥ १-४॥
पञ्चदश खण्ड
विराड्रूप कोशकी उपासना
अन्तरिक्ष जिसका उदर है, वह कोश पृथिवीरूप मूलवाला
है। वह जीर्ण नहीं होता । दिशाएँ इसके कोण हैं, आकाश
ऊपरका छिद्र है। वह यह कोश वसुधान है। उसीमे यह
सारा विश्व स्थित है। उस कोशकी पूर्व दिशा 'जुहू' नामवाली
है, दक्षिण दिशा 'सहमाना' नामकी है, पश्चिम दिशा 'राज्ञी'
नामवाली है तथा उत्तर दिशा 'सुभूता' नामकी है। उन
दिशाओंका वायु वत्स है। वह, जो इस प्रकार इस वायुको
दिशाओके वत्सरूपसे जानता है, पुत्रके निमित्तसे रोदन नहीं
खण्ड १७ ] $\qquad$ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * $\qquad$ ४२५
करता । वह मैं इस प्रकार इस वायुको दिशाओंके वत्सरूपसे $\quad$ कहा कि 'मैं भूःकी शरण हूँ' इससे मैंने यही कहा है कि 'मैं
जानता हूँ, अतः मैं पुत्रके कारण न रोऊँ । मैं अमुक अमुक $\quad$ पृथिवीकी शरण हूँ, अन्तरिक्षकी शरण हूँ और द्युलोककी शरण
अमुकके सहित अविनाशी कोशकी शरण हूँ, अमुक अमुक $\quad$ हूँ' फिर मैने जो कहा कि 'मैं भुवःकी शरण हूँ' इससे यह
अमुकके सहित प्राणकी शरण हूँ, अमुक अमुक अमुकके सहित $\quad$ कहा गया है कि 'मैं अग्निकी शरण हूँ, वायुकी शरण हूँ और
भूःकी शरण हूँ, अमुक अमुक अमुकके सहित भुवःकी शरण $\quad$ आदित्यकी शरण हूँ' तथा मैंने जो कहा कि 'मैं स्वःकी शरण
हूँ, अमुक अमुक अमुकके सहित स्वःकी शरण हूँ।* वह मैंने $\quad$ हूँ' इससे 'मैं ऋग्वेदकी शरण हूँ, यजुर्वेदकी शरण हूँ और
जो कहा कि 'मैं प्राणकी शरण हूँ' सो यह जो कुछ सम्पूर्ण $\quad$ सामवेदकी शरण हूँ' यही मैंने कहा है ॥ १-७ ॥
भूतसमुदाय है प्राण ही है, उसीकी मैं शरण हूँ तथा मैंने जो
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ षोडश खण्ड
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ पुरुषकी यज्ञरूपमें उपासना
निश्चय पुरुष ही यज्ञ है । उसके (उसकी आयुके) जो $\quad$ मध्यमें कभी विच्छिन्न (नष्ट) न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह
चौबीस वर्ष हैं, वे प्रातःसवन हैं । गायत्री चौबीस अक्षरोंवाली $\quad$ उस कष्टसे छूट जाता है और नीरोग हो जाता है ॥ ३-४ ॥
है; और प्रातःसवन गायत्री-छन्दसे संबद्ध है। उस इस प्रातः- $\quad$ इसके पश्चात् जो अड़तालीस वर्ष हैं, वे तृतीय सवन हैं ।
सवनके वसुगण अनुगत हैं । प्राण ही वसु हैं, क्योंकि ये ही इस $\quad$ जगती-छन्द अड़तालीस अक्षरोंवाला है तथा तृतीय सवन
सबको बसाये हुए हैं। यदि इस प्रातःसवनसम्पन्न आयुमें उसे $\quad$ जगती-छन्दसे सम्बन्ध रखता है। इस सवनके आदित्यगण
कोई कष्ट पहुँचावे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राण- $\quad$ अनुगत हैं। प्राण ही आदित्य हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण
रूप वसुगण ! मेरे इस प्रातःसवनको माध्यन्दिनसवनके साथ एक- $\quad$ विषयजातको ग्रहण करते हैं। उस उपासकको यदि इस आयु-
रूप कर दो; यज्ञस्वरूप मैं आप प्राणरूप वसुओके मध्यमें $\quad$ में कोई [रोगादि] सन्तप्त करे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये,
विछिन्न (नष्ट) न होऊँ।' तब उस कष्टसे मुक्त होकर वह नीरोग $\quad$ 'हे प्राणरूप आदित्यगण ! मेरे इस तृतीय सवनको आयुके
हो जाता है ॥ १-२ ॥ $\quad$ साथ एकीभूत कर दो । यज्ञस्वरूप मैं प्राणरूप आदित्योंके मध्यमें
इसके पश्चात् जो चौवालीस वर्ष हैं, वे माध्यन्दिनसवन हैं। $\quad$ विनष्ट न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह उस कष्टसे मुक्त होकर
त्रिष्टुप् छन्द चौवालीस अक्षरोंवाला है और माध्यन्दिनसवन $\quad$ नीरोग हो जाता है ॥ ५-६ ॥
त्रिष्टुप्-छन्दसे सम्बद्ध है । उस माध्यन्दिनसवनके रुद्रगण $\quad$ इस प्रसिद्ध विद्याको जाननेवाले ऐतरेय महिदासने कहा
अनुगत हैं। प्राण ही रुद्र हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण प्राणि- $\quad$ था—'[अरे रोग !] तू मुझे क्यों कष्ट देता है, जो मैं कि इस रोग-
समुदायको रुलाते हैं। यदि उस यज्ञकर्ताको इस आयुमे कोई $\quad$ द्वारा मृत्युको प्राप्त नहीं हो सकता।' वह एक सौ सोलह वर्ष
[रोगादि] सन्तप्त करे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, $\quad$ जीवित रहा था, जो इस प्रकार इस सवन-विद्याको जानता है वह
'हे प्राणरूप रुद्रगण ! मेरे इस मध्याह्नकालिक सवनको तृतीय $\quad$ (नीरोग होकर) एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहता है ॥ ७ ॥
सवनके साथ एकीभूत कर दो। यज्ञस्वरूप मैं प्राणरूप रुद्रोंके
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ सप्तदश खण्ड
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ आत्मयज्ञके अन्य अङ्ग
वह [पुरुष] जो भोजन करनेकी इच्छा करता है, जो $\quad$ समानताको प्राप्त होते हैं। तथा जो तप, दान, आर्जव
पीनेकी इच्छा करता है और जो रममाण (प्रसन्न) नहीं $\quad$ (सरलता), अहिंसा और सत्यवचन हैं, वे ही इसकी दक्षिणा
होता—वही इसकी दीक्षा है। फिर वह जो खाता है, जो $\quad$ हैं। इसीसे कहते हैं कि 'प्रसूता होगी' अथवा 'प्रसूता हुई'
पीता है और जो रतिका अनुभव करता है—वह उपसदोंकी $\quad$ वह इसका पुनर्जन्म ही है, तथा मरण ही अवभृथस्नान है।
सदृशताको प्राप्त होता है। तथा वह जो हँसता है, जो भक्षण $\quad$ घोर आङ्गिरस ऋषिने देवकीपुत्र कृष्णको यह यज्ञदर्शन
करता है और जो मैथुन करता है—वे सब स्तुतशस्त्रकी ही $\quad$ सुनाकर, जिससे कि वह अन्य विद्याओंके विषयमें तृष्णाहीन
- इसमें जहाँ-जहाँ 'अमुक' शब्द आया है, वहाँ अपने पुत्रके नामको उच्चारण करना चाहिये ।
उ० सं० ५४-५५-