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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

सप्तम अध्याय

ॐ
सप्तम अध्याय
प्रथम खण्ड
नामकी ब्रह्मरूपमे उपासना
'भगवन् ! मुझे उपदेश कीजिये' ऐसा कहते हुए
नारदजी सनत्कुमारजीके पास गये । उनसे सनत्कुमारजीने
कहा—'तुम जो कुछ जानते हो उसे बतलाते हुए मेरे प्रति
उपसन्न होओ; तब मैं तुम्हें उससे आगे बतलाऊँगा ।' तब
नारदने कहा—॥ १ ॥
'भगवन् ! मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और चौथा
अथर्ववेद जानता हूँ, [ इनके सिवा ] इतिहास-पुराणरूप
पाँचवाँ वेद, वेदोंका वेद ( व्याकरण ), श्राद्धकल्प, गणित,
उत्पातज्ञान, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीति, देवविद्या, ब्रह्मविद्या,
भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्पविद्या ( गारुड मन्त्र )
और देवजनविद्या—नृत्य-संगीत आदि—हे भगवन् ! यह
सब मैं जानता हूँ। हे भगवन् ! वह मैं केवल मन्त्रवेत्ता ही
हूँ, आत्मवेत्ता नहीं हूँ। मैंने आप-जैसोंसे सुना है कि आत्मवेत्ता
शोकको पार कर लेता है, परंतु भगवन् ! मैं शोक करता हूँ; ऐसे
मुझको हे भगवन् ! शोकसे पार कर दीजिये ।' तब सनत्कुमारने
उनसे कहा—'तुम यह जो कुछ जानते हो वह नाम ही है।
ऋग्वेद नाम है तथा यजुर्वेद, सामवेद, चौथा आथर्वण वेद,
पाँचवाँ वेद इतिहास-पुराण, वेदोंका वेद ( व्याकरण ),
श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीति-
शास्त्र, निरुक्त, वेदविद्या, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गरुड,
संगीतादि कला और शिल्पविद्या—ये सब भी नाम ही हैं।
तुम नामकी उपासना करो। वह जो कि नामकी 'यह ब्रह्म है'
ऐसी उपासना करता है, उसकी जहाँतक नामकी गति होती है
वहाँतक यथेच्छ गति हो जाती है, जो कि नामकी 'यह ब्रह्म
है' ऐसी उपासना करता है।' [ नारद---] 'भगवन् ! क्या
नामसे भी अधिक कुछ है ?' [ सनत्कुमार—] 'नामसे भी
अधिक है।' [नारद---] 'तो भगवन् ! मुझे वही बतलावें ।'२-५
द्वितीय खण्ड
वाक्‌की ब्रह्मरूपमें उपासना
वाक् ही नामसे बढ़कर है; वाक् ही ऋग्वेदको विज्ञापित
करती है तथा यजुर्वेद, सामवेद, चतुर्थ आथर्वण वेद, पञ्चम
वेद इतिहास-पुराण, वेदोंके वेद व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित,
उत्पातशास्त्र, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीति, निरुक्त, वेदविद्या,
भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गरुड, संगीतशास्त्र, द्युलोक,
पृथिवी, वायु, आकाश, जल, तेज, देव, मनुष्य, पशु, पक्षी,
तृण-वनस्पति, श्वापद (हिंस्र जन्तु ), कीट-पतंग, पिपीलिका-
पर्यन्त प्राणी, धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य, साधु और
असाधु, मनोज्ञ और अमनोज्ञ जो कुछ भी है [उसे वाक् ही
विज्ञापित करती है ]। यदि वाणी न होती तो न धर्मका और
न अधर्मका ही ज्ञान होता; तथा न सत्य, न असत्य, न साधु,
न असाधु, न मनोज्ञ और न अमनोज्ञका ही ज्ञान हो सकता।
वाणी ही इन सबका ज्ञान कराती है; अतः तुम वाक्‌की
उपासना करो। वह जो वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार
उपासना करता है उसकी जहाँतक वाणीकी गति है वहाँतक
स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस
प्रकार उपासना करता है । .[नारद-] 'भगवन् ! क्या
वाणीसे भी बढ़कर कुछ है ?' [ सनत्कुमार-] 'वाणीसे
भी बढ़कर है ही।' [ नारद-] 'भगवन् ! वह मुझे
बतलाइये' ॥ १-२ ॥
तृतीय खण्ड
मनकी ब्रह्मरूपमें उपासना
मन ही वाणीसे उत्कृष्ट है। जिस प्रकार दो आँवले, दो
बेर अथवा दो बहेड़े मुट्ठीमें आ जाते हैं, उसी प्रकार वाक्
और नामका मनमे अन्तर्भाव हो जाता है। यह पुरुष जिस
समय मनसे विचार करता है कि 'मन्त्रोंका पाठ करूँ' तभी
पाठ करता है, जिस समय सोचता है 'काम करूँ' तभी काम
करता है, जब विचारता है 'पुत्र और पशुओंकी इच्छा करूँ'
तभी उनकी इच्छा करता है और जब ऐसा सङ्कल्प करता है
कि 'इस लोक और परलोककी कामना करूँ' तभी उनकी

खण्ड ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५७
कामना करता है । मन ही आत्मा है, मन ही लोक है और मनकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है । [ नारद— ]
मन ही ब्रह्म है; तुम मनकी उपासना करो । वह जो कि मनकी 'भगवन् ! क्या मनसे भी बढ़कर कोई है ?' [ सनत्कुमार— ]
'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है, उसकी जहाँतक 'मनसे बढ़कर भी है ही ।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मेरे प्रति
मनकी गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि उसीका उपदेश करें' ॥ १-२ ॥

चतुर्थ खण्ड
संकल्पकी ब्रह्मरूपमें उपासना
सङ्कल्प ही मनसे बढ़कर है । जिस समय पुरुष संकल्प लिये कर्म समर्थ होते हैं, कर्मोंके संकल्पके लिये लोक (फल)
करता है, तभी वह मनस्यन करता है और फिर वाणीको समर्थ होता है और लोकोंके संकल्पके लिये सब समर्थ होते हैं।
प्रेरित करता है । वह उसे नामके प्रति प्रवृत्त करता है, नाममें वह (ऐसा) यह संकल्प है, तुम संकल्पकी उपासना करो ।
सब मन्त्र एकरूप हो जाते हैं और मन्त्रोंमें कर्मोंका अन्तर्भाव वह जो कि संकल्पकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता
हो जाता है । वे ये (मन आदि) एकमात्र सङ्कल्परूप है [ विधाताके ] रचे हुए ध्रुवलोकोंको स्वयं ध्रुव होकर,
लयस्थानवाले, संकल्पमय और संकल्पमें ही प्रतिष्ठित हैं। प्रतिष्ठित लोकोंको स्वयं प्रतिष्ठित होकर तथा व्यथा न पानेवाले
द्युलोक और पृथ्वीने मानो सकल्प किया है । वायु और लोकोंको स्वयं व्यथा न पाता हुआ सब प्रकार प्राप्त करता है ।
आकाशने सकल्प किया है, जल और तेजने सकल्प किया। जहाँतक सङ्कल्पकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो
उनके संकल्पके लिये वृष्टि समर्थ होती है, [ अर्थात् उन जाती है, जो कि सङ्कल्पकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना
द्युलोकादिके सङ्कल्पसे वृष्टि होती है ] वृष्टिके संकल्यके लिये करता है । [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या सकल्पसे भी बढ़कर
अन्न समर्थ होता है, अन्नके सङ्कल्पके लिये प्राण समर्थ होते हैं, कुछ है ?' [सनत्कुमार—] 'संकल्पसे बढ़कर भी है ही।'
प्राणोंके संकल्पके लिये मन्त्र समर्थ होते हैं, मन्त्रोंके सङ्कल्पके [नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-३ ॥

पञ्चम खण्ड
चित्तकी ब्रह्मरूपमें
चित्त ही सङ्कल्पसे उत्कृष्ट है। जिस समय पुरुष चेतनावान् ही आत्मा है और चित्त ही प्रतिष्ठा है, तुम चित्तकी उपासना
होता है तभी वह संकल्प करता है, फिर मनन करता है, करो । वह जो कि चित्तकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना
तत्पश्चात् वाणीको प्रेरित करता है, उसे नाममें प्रवृत्त करता करता है [ अपने लिये ] उपचित हुए ध्रुवलोकोंको स्वय ध्रुव
है । नाममें मन्त्र एकरूप होते हैं और मन्त्रोंमें कर्म । वे ये होकर, प्रतिष्ठित लोकोंको स्वय प्रतिष्ठित होकर तथा व्यथा
[ संकल्पादि ] एकमात्र चित्तरूप लयस्थानवाले, चित्तमय न पानेवाले लोकोंको स्वय व्यथा न पाता हुआ सब प्रकार प्राप्त
तथा चित्तमें ही प्रतिष्ठित हैं। इसीसे यद्यपि कोई मनुष्य बहुज्ञ करता है। जहाँतक चित्तकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति
भी हो तो भी यदि वह अचित्त होता है तो लोग कहने लगते हो जाती है, जो कि चित्तकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना
हैं कि 'यह तो कुछ भी नहीं है, यदि यह कुछ जानता अथवा करता है । [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या चित्तसे बढ़कर भी
विद्वान् होता तो ऐसा अचित्त न होता।' और यदि कोई कुछ है ?' [ सनत्कुमार—] 'चित्तसे बढ़कर भी है ही।'
अल्पज्ञ होनेपर भी चित्तवान् हो तो उसीसे वे सब श्रवण करना [ नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-३ ॥
चाहते हैं । अत चित्त ही इनका एकमात्र आश्रय है, चित्त
षष्ठ खण्ड
ध्यानकी ब्रह्मरूपमें उपासना
ध्यान ही चित्तसे बढ़कर है । पृथ्वी मानो ध्यान करती देवता और मनुष्य भी मानो ध्यान करते हैं । अतः जो लोग
है, अन्तरिक्ष मानो ध्यान करता है, द्युलोक मानो ध्यान करता यहाँ मनुष्योंमें महत्त्व प्राप्त करते हैं वे मानो ध्यानके लाभका
है, जल मानो ध्यान करते हैं, पर्वत मानो ध्यान करते हैं तथा ही अश पाते हैं; किंतु जो क्षुद्र होते हैं वे कलहप्रिय, चुगलखोर