कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
तृतीय ब्राह्मण
३] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०५
तृतीय ब्राह्मण
मन्थविद्या और उसकी परम्परा
जो ऐसा चाहता हो कि मैं महत्त्व प्राप्त करूँ, वह
उत्तरायणमें शुक्लपक्षकी पुण्य तिथिपर बारह दिन उपसद्व्रती
(पयोव्रती) होकर गूलरकी लकड़ीके कस (कटोरे) या चमस-
में सर्वौषध, फल तथा अन्य सामग्रियोंको एकत्रितकर, [जहाँ
हवन करना हो, उस स्थानका] परिसमूहन* एव परिलेपन†
करके अग्निस्थापन करता है और फिर अग्निके चारों ओर कुशा
बिछाकर शास्त्रोक्त विधिसे घृतका शोधन करके, जिसका नाम
पुँल्लिङ्ग हो उस [हस्त आदि] नक्षत्रमें मन्थको (औषध-फल
आदिके पिण्डको) [अपने और अग्निके] बीचमें रखकर हवन
करता है। [ 'यावन्तो' इत्यादि प्रथम मन्त्रका अर्थ—] हे
जातवेदः ! तेरे वशवर्ती जितने देवता वक्रमति होकर पुरुषकी
कामनाओंका प्रतिबन्ध करते हैं, उनके उद्देश्यसे यह आज्यभाग
मैं तुझमें हवन करता हूँ। वे तृप्त होकर मुझे समस्त कामनाओंसे
तृप्त करें—स्वाहा‡ । [ 'या तिरश्ची' इत्यादि द्वितीय मन्त्रका
अर्थ—] 'मैं संवकी मृत्युको धारण करनेवाला हूँ' ऐसा समझकर
जो कुटिलमति देवता तेरा आश्रय करके रहता है, सब साधनों-
की पूर्ति करनेवाले उस देवताके लिये मे घृतकी धारासे यजन
करता हूँ—स्वाहा ॥ १ ॥
'ज्येष्ठाय स्वाहा, श्रेष्ठाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निर्म हवन
करके सस्रवको (स्रुवामे बचे हुए घृतको) मन्थम डाल देता
है। 'प्राणाय स्वाहा, वसिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन
करके सस्रवको मन्थम डाल देता है। 'वाचे स्वाहा,
प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको
मन्थमें टाल देता है। 'चक्षुषे स्वाहा, सम्मदे स्वाहा' इस मन्त्रसे
अग्निमे हवन करके सस्रवको मन्थमं डाल देता है। 'श्रोत्राय
स्वाहा, आयतनाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके
सस्रवको मन्थम डाल देता है। 'मनसे स्वाहा, प्रजात्यै स्वाहा'
इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता
है। 'रेतसे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्रवको
मन्थर्म डाल देता है ॥ २ ॥
'अग्नये स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको
मन्थमे डाल देता है। 'सोमाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें
हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भूः स्वाहा' इस
मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें टाल देता है।
'भुवः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें
टाल देता है। 'स्वः स्वाहा' इम मन्त्रसे अग्निमें हवन करके
सस्रवको मन्थमे डाल देता है। 'भूर्भुवः स्वः म्वाहा' इस
मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्रवको मन्थमे टाल देता है।
'ब्रह्मणे स्वाहा' इम मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमे
डाल देता है। 'क्षत्राय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन
करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भूताय स्वाहा' इस
मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है।
'भविष्यते स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको
मन्थमें टाल देता है। 'विश्वाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें
हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'सर्वाय स्वाहा'
इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता
है। 'प्रजापतये स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको
मन्थमें डाल देता है ॥ ३ ॥
इसके पश्चात् उस मन्थको 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रद्वारा
स्पर्श करता है। [मन्थद्रव्यका अधिष्ठातृदेव प्राण है,
इसलिये प्राणसे एकरूप होनेके कारण वह सर्वात्मक है।
'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रका अर्थ इस प्रकार है—] तू [ प्राण-
रूपसे सम्पूर्ण देहोंमें ] घूमनेवाला है, [ अग्निरूपसे सर्वत्र ]
प्रज्वलित होनेवाला है, [ ब्रह्मरूपसे ] पूर्ण है, [ आकाश-
रूपसे ] अत्यन्त स्तब्ध ( निष्कम्प ) है, [ सबसे अविरोधी
होनेके कारण ] तू यह जगद्रूप एक सभाके समान है, तू ही
[ यज्ञके आरम्भमे प्रस्तोताके द्वारा ] हिङ्कृत है, तथा [ उच्चै
प्रस्तोताद्वारा यज्ञमे ] तू ही हिङ्क्रियमाण है, [ यज्ञारम्भमें
उद्गाताद्वारा ] तू ही उच्च स्वरसे गाया जानेवाला उद्गीथ है
और [ यज्ञके मध्यमें उसके द्वारा ] तू ही उद्गीयमान है। तू
ही [ अध्वर्युद्वारा ] श्रावित और [ आग्नीध्रद्वारा ] प्रत्याश्रावित
हे; आर्द्र (अर्थात् मेघ) में सम्यक् प्रकारसे दीप्त है, तू
विभु (विविधरूप होनेवाला) है और प्रभु (समर्थ) है;
तू [भोक्ता अग्निरूपसे] ज्योति है, [कारणरूपसे ] सबका
प्रलयस्थान है तथा [ सबका सहार करनेवाला होनेसे ]
सर्वगं है ॥ ४ ॥
फिर 'आम५सि आमन्धि' इत्यादि मन्त्रसे इसे ऊपर
उठाता हे । [ इस मन्त्रका अर्थ—] 'आमंसि'—तू मब जानता है,
- कुशोसे बुहारना ।
† गोबर और जलसे वेदीको लीपना ।
‡ जहाँ-जहाँ 'स्वाहा' आये, वहाँ आहुति देनी चाहिये ।
उ० अ० ६४—
५०६ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ ६
'आर्माहि ते महि'—मैं तेरी महिमाको अच्छी तरह जानता उस इस मन्थका उद्दालक आरुणिने अपने शिष्य
हूँ । वह प्राण राजा, ईशान ( ईश्वर ) और अधिपति है । वाजसनेय याज्ञवल्क्यको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई
वह मुझे राजा, ईशान और अधिपति करे ॥ ५ ॥ इस मन्थको सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न
इसके पश्चात् 'तत्सवितुर्वरेण्यम्' इत्यादि मन्त्रसे इस हो जायँगी और पत्ते निकल आवेंगे।' उस इस मन्थका
मन्थको भक्षण करता है । [ 'तत्सवितुः' इत्यादि मन्त्रका वाजसनेय याज्ञवल्क्यने अपने शिष्य मधुक पैङ्ग्यको उपदेश
अर्थ—] 'तत्सवितुर्वरेण्यम्'—सूर्यके उस वरेण्य-श्रेष्ठ पदका करके कहा था, यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें
मैं ध्यान करता हूँ । 'वाता मधु ऋतायते'—पवन मधुर, शाखाएँ उत्पन्न हो जायेंगी और पत्ते निकल आवेंगे।' उस
मन्द गतिसे बह रहा है। 'सिन्धवः मधु क्षरन्ति'—नदियों इस मन्थका मधुक पैङ्ग्यने अपने शिष्य चूल भागवित्ति को
मधु-रसका स्राव कर रही हैं। 'नः ओषधीः माध्वीः सन्तु'— उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा
हमारे लिये ओषधियाँ मधुर हों । 'भूः स्वाहा' [ यहाँतक- तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायेंगी और पत्ते निकल आवेंगे।'
के मन्त्रसे मन्थका पहला ग्रास भक्षण करे । ] 'देवस्य भर्गः
धीमहि'—हम सवितादेवके तेजका ध्यान करते हैं। 'नक्तमुत उस इस मन्थका चूल भागवित्तिने अपने शिष्य जानकि
उषसः मधु'—रात और दिन सुखकर हों। 'पार्थिव रजः आयस्थूणको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे
मधुमत्'—पृथिवीके धूलिकण उद्वेग न करनेवाले हों । 'द्यौः ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायेंगी और
पिता नः मधु अस्तु'—पिता द्युलोक हमारे लिये सुखकर हो । पत्ते निकल आवेंगे।' उस इस मन्थका जानकि आयस्थूणने
'भुवः स्वाहा' [ यहाँतकके मन्त्रसे दूसरा ग्रास भक्षण अपने शिष्य सत्यकाम जाबालको उपदेश करके कहा था, 'यदि
करे ] । 'धियः नः प्रचोदयात्'—जो सवितादेव कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो
हमारी बुद्धियोंको प्रेरित करता है। 'नः वनस्पतिः मधुमान्'— जायँगी और पत्ते निकल आवेंगे।' उस इस मन्थका सत्यकाम
हमारे लिये वनस्पति ( सोम ) मधुर रसमय हो । 'सूर्यः जाबालने अपने शिष्योंको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई
मधुमान् अस्तु'—सूर्य हमारे लिये मधुमान् हो । 'गावः नः इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी
माध्वीः भवन्तु'—किरणें अथवा दिशाएँ हमारे लिये सुखकर और पत्ते निकल आवेंगे।' उस इस मन्थका, जो पुत्र या
हों । 'स्वः स्वाहा' [ यहाँतकके मन्त्रसे तृतीय ग्रास शिष्य न हो, उसे उपदेश न करे ॥ ७-१२ ॥
भक्षण करे ] । इसके पश्चात् सम्पूर्ण सावित्री ( गायत्रीमन्त्र ), यह मन्थकर्म चतुरौदुम्बर ( चार औदुम्बरकाष्ठके बने
'मधु वाता ऋतायते' इत्यादि समस्त मधुमती ऋचा और पदार्थोंवाला ) है । इसमे औदुम्बरकाष्ठ ( गूलरकी लकड़ी )
'अहमेवेद सर्वं भूयासम्' (यह सब मैं ही हो जाऊँ) 'भूर्भुवः का स्रुव, औदुम्बरकाष्ठका चमस, औदुम्बरकाष्ठका इध्म और
स्वाहा'—इस प्रकार कहकर अन्तमें समस्त मन्थको भक्षण- औदुम्बरकाष्ठकी दो उपमन्थनी होती हैं। इसमें व्रीहि ( धान ),
कर, दोनों हाथ धो, अग्निके पश्चिम भागमे पूर्वकी ओर सिर यव (जौ ), तिल, माष (उड़द ), अणु (सावाँ ), प्रियङ्गु
करके बैठता है। प्रातःकालमें 'दिशामेकपुण्डरीकमस्यहं ..... ( काँगनी ), गोधूम (गेहूँ ), मसूर, खल्व (वाल ) और
भूयासम्' इस मन्त्रद्वारा आदित्यका उपस्थान ( नमस्कार ) खलकुल (कुलथी)—ये दस ग्रामीण अन्न उपयुक्त होते
करता है । फिर जिस मार्गसे गया होता है, उसीसे लौटकर हैं। उन्हें पीसकर दही, मधु और घृतमे मिलाकर घृतसे हवन
अग्निके पश्चिम भागमें बैठकर [ आगे कहे जानेवाले ] वंशको करता है ॥ १३ ॥
जपता है ॥ ६ ॥
चतुर्थ
सन्तानोत्पत्ति-विज्ञान
( इच्छानुसार सद्गुणयुक्त सन्तान उत्पन्न करने, सर्वथा चराचर समस्त भूतोंका रस-सार अथवा आधार पृथिवी है,
न उत्पन्न करने तथा संयमयुक्त जीवन-निर्माण करनेकी युक्ति पृथिवीका रस जल है, जलका रस—उसपर निर्भर करनेवाली
बतलानेके लिये इस ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है, मन्थाख्य ओषधियाँ हैं, ओषधियोंका रस—सार पुष्प है, पुष्पका रस
कर्मकर्ता प्राणदर्शी पुरुषका ही इसमें अधिकार है।) फल है, फलका रस—आधार पुरुष है, पुरुषका रस—सार
१. दिशाओंका एक पुण्डरीक ( अर्थात् अखण्ड श्रेष्ठ ) है, मैं मनुष्योंमें एक पुण्डरीक होऊँ ।
४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०७
शुक्र है। प्रसिद्ध प्रजापतिने विचार किया कि इस शुक्रकी मन्त्रोपासक अपनी पत्नीको कामनापरायण करना चाहे तो उस
उपयुक्त प्रतिष्ठाके लिये कोई आधार चाहिये, इसलिये उसने समय वह 'अङ्गादङ्गात् सम्भवसि हृदयादधिजायसे । स
स्त्रीकी सृष्टि की और उसके अधोभाग-सेवनका विधान किया। त्वमङ्गकषायोसि दिग्धविद्धमिव मादयेमाममूं मयि ।' मन्त्र-
( यहाँ यदि यह कहा जाय कि इस पाशविक क्रियामें तो प्राणि- का जप करे ।
मात्रकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है, इसके लिये विधान क्यों किया यदि किसी कारणवश गर्भनिरोधकी आवश्यकता हो तो
गया, तो इसका उत्तर यह है कि यह विधान इसीलिये बनाया उस समय 'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आददे' मन्त्रका जाप करे ।
गया कि जिसमें पुरुषोंकी स्वेच्छाचारिताका निरोध हो और ऐसा करनेपर पत्नी गर्भवती नहीं होगी *। और यदि यह इच्छा
इस विज्ञानसे परिचित पुरुषोंके द्वारा केवल श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्तिके हो कि पत्नी गर्भधारण करे तो उस समय 'इन्द्रियेण ते रेतसा
लिये ही इसका सेवन किया जाय।) इसके लिये प्रजापतिने रेत आदधामि' इस मन्त्रका पाठ करे; इससे वह निश्चय ही
प्रजनननेन्द्रियको उत्पन्न किया । अतएव इस विषयसे घृणा नहीं गर्भवती हो जायगी ।
करनी चाहिये। अरुणके पुत्र विद्वान् उद्दालक और नाक- यदि कभी अपनी भार्याके साथ किसी जारका सम्बन्ध हो
मौद्गल्य तथा कुमारहारीत ऋषिने भी कहा है कि बहुत-से ऐसे जाय और उसे दण्ड देना हो तो पहले कच्ची मिट्टीके बरतनमें अग्नि
मरणधर्मा, नामके ब्राह्मण हैं जो निरिन्द्रिय, सुकृतहीन, मैथुन- स्थापन करके समस्त कर्मोंको विपरीत रीतिसे करे और कुछ सरके
विज्ञानसे अपरिचित होकर भी मैथुन-कर्ममें आसक्त होते हैं, तिनकोंके अग्रभागको घीमें भिगोकर विपरीत क्रमसे ही उनका
उनकी परलोकमें दुर्गति होती है। (इससे अशास्त्रीय तथा होम करे। आहुतिके पहले 'मम समिद्धेऽहौषी. प्राणापानौ त
अंधाध मैथुन-कर्मका पापहेतुत्व सूचित किया गया है।) आददेऽसौ' आदि मन्त्रोंका पाठ करके अन्तमें प्रत्येक बार
इस प्रकार मन्थ-कर्म करके ब्रह्मचर्यधारणपूर्वक पुरुषको 'असौ' बोलकर उसका नाम ले। इस प्रकार करनेसे वह पुण्य-
पत्नीके ऋतुकालकी प्रतीक्षा करनी चाहिये। यदि इस बीचमें से स्खलित होकर मृत्युको प्राप्त हो जाता है।
स्वप्नदोषादिके द्वारा शुक्र क्षरण हो जाय तो उसकी पुनः प्राप्ति ऋतुमती पत्नीका त्रिरात्र ब्रह्म (तीन रात्रियोंका पृथक्
तथा वृद्धिके लिये 'यन्मेऽद्य रेत पृथिवीमस्कान्त्सीद्यदोषधी- निवासादि) समाप्त होनेपर स्नान करनेके बाद उसे धान
रप्यसरद्यदपः, इदमह तद्रेत आददे ।' तथा 'पुनर्मा- कूटना आदि गृहस्थीका काम करना चाहिये। तीन दिनोंतक
मैत्विन्द्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः । पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं उसे अलग रहना चाहिये, किसीका स्पर्श नहीं करना चाहिये।
कल्पन्ताम् ।' इन मन्त्रोंका पाठ करे। (इससे स्वप्नदोषादि जो पुरुष चाहता हो कि मेरा पुत्र गौरवर्ण हो, एक वेदका
व्याधियोंका नाश होता है।) अध्ययन करनेवाला हो और पूरे सौ वर्षोंतक जीवित रहे,
यदि कदाचित् जलमें अपनी छाया दीख जाय तो 'मयि उसको दूध-चावलकी खीर बनाकर उसमें घी मिलाकर पत्नी-
तेज इन्द्रियं यशो द्रविणम् सुकृतम् ।' (मुझे तेज, इन्द्रिय- सहित खाना चाहिये । जो कपिलवर्ण, दो वेदोंका अध्ययन
शक्ति, यश, धन और पुण्यकी प्राप्ति हो) इस मन्त्रको पढे। ऋतु- करनेवाला और पूर्णायु पुत्र चाहता हो, उसको दहींमें चावल
कालकी तीन रात बीतनेपर जब पत्नी स्नान करके शुद्ध हो जाय, पकाकर पत्नीसहित खाना चाहिये। जो श्यामवर्ण, रक्तनेत्र,
तब 'स्त्रियोंमें मेरी यह पत्नी लक्ष्मीके समान है, इसलिये निर्मल वस्त्र वेदत्रयीका अध्ययन करनेवाले, पूर्णायु पुत्रकी इच्छा करता हो,
पहने हुए है' यह विचारकर उस यशस्विनी पत्नीके समीप जाकर उसे जलमें चावल (भात) पकाकर घी मिलाकर पत्नीसहित
'हम दोनों सन्तानोत्पादनके लिये क्रिया करेंगे' कहकर आमन्त्रण खाना चाहिये। जो चाहता हो कि मेरे पूर्ण आयुवाली
करे । लज्जा अथवा हठवश स्त्री यदि मिथुन-धर्मके लिये विदुषी कन्या हो, उसे तिल-चावलकी खिचड़ी बनाकर पत्नी-
अस्वीकार करे तो उसे आभरणादिद्वारा तथा अभिशापादि- सहित खाना चाहिये। और जो चाहता हो कि मेरा पुत्र
द्वारा प्रेरित करे। पुरुषके 'इन्द्रियेण ते यशसा यश आददे' इस
मन्त्रयुक्त अभिशापसे स्त्री अयशस्विनी—वन्ध्या हो जाती है। * आजकल गर्भनिरोधके लिये कैसी-कैसी तामसी क्रियाएं की
परन्तु यदि स्त्री अपने स्वामीकी अभिलाषा पूर्ण करती है तो स्वामीके जाती हैं, पर ये होती हैं प्राय असमयकी वृद्धिके लिये । और यह
'इन्द्रियेण ते यशसा यश आदधामि' इस मन्त्रपाठपूर्वक वैदिक प्रक्रिया भी अपनी धर्मपत्नीको कभी गर्भधारण न कराना हो
उपगत होनेसे पत्नी निश्चय ही यशस्विनी—पुत्रवती होती है।, तो उनके लिये । सयमी पुरुष ही ऐसा कर सकते थे ।