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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

अष्टम अध्याय

ॐ
अष्टम अध्याय
प्रथम खण्ड
आत्मा ही सत्य है
अब इस ब्रह्मपुरके भीतर और जो यह सूक्ष्म कमलाकार स्थान
है, इसमें जो सूक्ष्म आकाश है और उसके भीतर जो वस्तु है,
उसका अन्वेषण करना चाहिये और उसीकी जिज्ञासा करनी
चाहिये। उस (गुरु) से यदि [शिष्यगण] कहें कि इस ब्रह्मपुरमें
जो सूक्ष्म कमलाकार गृह है, उसमें जो अन्तराकाश है, उसके
भीतर क्या वस्तु है, जिसका अन्वेषण करना चाहिये अथवा
जिसकी जिज्ञासा करनी चाहिये ?- तो [ इस प्रकार कहनेवाले
शिष्योके प्रति ] वह आचार्य यों कहे ॥ १-२ ॥
जितना यह [भौतिक] आकाश है, उतना ही हृदयान्तर्गत
आकाश है। द्युलोक और पृथिवी ये दोनों लोक सम्यक् प्रकारसे
इसके भीतर ही स्थित हैं। इसी प्रकार अग्नि और वायु-
ये दोनों, सूर्य और चन्द्रमा-ये दोनों तथा विद्युत् और
नक्षत्र एव इस आत्माका जो कुछ इस लोकमें है और जो नहीं
है, वह सर्व सम्यक् प्रकारसे इसीमें स्थित है ॥ ३ ॥
उस आचार्यसे यदि शिष्यगण कहें कि यदि इस ब्रह्मपुरमें
यह सब समाहित है तथा सम्पूर्ण भूत और समस्त कामनाएँ भी
सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं तो जिस समय यह वृद्धावस्थाको प्राप्त
होता अथवा नष्ट हो जाता है, उस समय क्या शेष रह जाता
है ? । तो उसे कहना चाहिये 'इस (देह) की जरावस्थासे यह
(आकाशाख्य ब्रह्म) जीर्ण नहीं होता। इसके वधसे उसका
नाश नहीं होता। यह ब्रह्मपुर सत्य है, इसमें [ सम्पूर्ण ]
कामनाएँ सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं, यह आत्मा है, धर्माधर्मसे
शून्य है तथा जराहीन, मृत्युहीन, शोकरहित, भोजनेच्छारहित,
पिपासाशून्य, सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प है, जिस प्रकार इस
लोकमें प्रजा राजाकी आज्ञाका अनुवर्तन करती है तो वह
जिस जिस सन्निहित वस्तुकी कामना करती है तथा जिस-जिस
देश या भूभागकी इच्छा करती है, उसी-उसीके आश्रित जीवन
धारण करती है। जिस प्रकार यहाँ कर्मसे प्राप्त किया हुआ
लोक क्षीण हो जाता है, उसी प्रकार परलोकमे पुण्योपार्जित
लोक क्षीण हो जाता है। जो लोग इस लोकमें आत्माको और
इन सत्य कामनाओको बिना जाने ही परलोकगामी होते हैं,
उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छागति नहीं होती। परन्तु जो इस
लोकमें आत्माको तथा सत्य कामनाओको जानकर [परलोकमे]
जाते हैं, उनकी समस्त लोकोंमें यथेच्छागति होती है' ॥ ४-६ ॥
द्वितीय खण्ड
आत्मज्ञानीकी सङ्कल्पसिद्धि
वह यदि पितृलोककी कामनावाला होता है तो उसके
संकल्पसे ही पितृगण वहाँ उपस्थित होते हे [ अर्थात् उसके
आत्मसम्बन्धी हो जाते हे, ] उस पितृलोकसे सम्पन्न होकर
वह महिमान्वित होता है। और यदि वह मातृलोककी
कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही माताएँ वहाँ
उपस्थित हो जाती हैं। उस मातृलोकसे सम्पन्न हो वह महिमा-
को प्राप्त होता है। और यदि वह भ्रातृलोककी कामनावाला
होता है तो उसके सकल्पसे ही भ्रातृगण वहाँ उपस्थित हो जाते
हैं। उस भ्रातृलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है।
और यदि वह भगिनीलोककी कामनावाला होता है तो
उसके सकल्पसे ही वहनें वहाँ उपस्थित हो जाती हैं। उस
भगिनीलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है। और
यदि वह सखाओंके लोककी कामनावाला होता है तो उसके
संकल्पसे ही सखा लोग वहाँ उपस्थित हो जाते हैं। उन
सखाओंके लोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है।
और यदि वह गन्धमाल्यलोककी कामनावाला होता है तो
उसके सकल्पसे ही गन्धमाल्यादि वहाँ उपस्थित हो जाने
हैं। उस गन्धमाल्यलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त
होता है। और यदि वह अन्नपानसम्बन्धी लोककी कामनावाला
होता है तो उसके सकल्पसे ही अन्नपान उसके पास उपस्थित
हो जाते हैं। उस अन्न-पान-लोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको
प्राप्त होता है। और यदि वह गीतवाद्यसम्बन्धी लोककी
कामनावाला होता है तो उसके सकल्पसे ही गीत-वाद्य वहाँ
प्राप्त हो जाते हैं। उस गीतवाद्यलोकसे सम्पन्न हो वह
महिमाको प्राप्त होता है। और यदि वह स्त्री लोककी कामना-
वाला होता है तो उसके सकल्पमात्रसे ही स्त्रियां उसके पास
उपस्थित हो जाती हैं। उस स्त्री-लोकसे सम्पन्न हो वह
महिमान्वित होता है। वह जिस-जिस प्रदेशकी कामना करने-
वाला होता है और जिस-जिस भोगकी इच्छा करता है वह
सब उसके सकल्पसे ही उसको प्राप्त हो जाता है। उससे
सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ १-१० ॥