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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

अर्जुन और कबीर संवाद

कवीरकृष्णगीता

( ७१ )

अब ऐसी दाय। प्रभु करहू । सब दिन तुम मम हृदय संचरहू ॥
जो तुम मम हिय करहु प्रकाशा। तब छूटे मम यमके त्रासा ॥
तुम विन को जिव राखन हारा । निरंजन जीवाहिं करे अहारा ॥
कहा करौ यमके डर दरपो। काल निरंजनके डर कपो ॥
अब मोहिं देहु सुकके पाना । यम त्रण ताडे करहु निरवाना ॥
हम सब तुम्हरे जाप पोषे । तुम जागे औ सब जग सोषे ॥

कवीरवचन ।

कहे कबीर सुन कृष्ण सुरारी । निर्गुण भक्त करे तेहि तारी ॥
निर्गुण आद अजर सतनामा । सद्गुरु सत्यनाम सुखधामा ॥

अर्जुनवचन ।

कहे अर्जुन सुन श्रीभगवाना । सत्यकबीर कर्ता निरवाना ॥
जीव कबीर साहेबके ठाहर । तेहि यम खाय जो कबीरसे ठाहर
कृष्ण वचन ।

कहे कृष्ण अर्जुन सुन वाणी । सतपद गहो कबहुं नहिं हानी ॥
सबसों कहौ कबीर है पहली । कबीरसो लगु सो रंग गहिली ॥

अर्जुनवचन ।

कहे अर्जुन हम हैं अज्ञानी । जेहि अब कर्म सोई अज्ञानी ॥
सोइ अज्ञानी शुभ पंथ न आनी। भ्रमत फिरे सदा अज्ञानी ॥
श्रीयदुपति मोहि दीन्ह चिन्हाई । तब हम कबीर पुरुष लख पाई ॥
दोहा--अर्जुन भीमाहि औ गले, भये युधिष्ठिर ठाठ।
सबदेवन कुल औ कृष्ण मिल, विनती कराहिं आति गाठ ॥

७२

कबीरकृष्णगीता ।

युधिष्ठिरकृष्णवचन ।

कहैं युधिष्ठिर कृष्ण समेता । सत्यकबीर तुम कृपा निकेता ॥
अब मोहिं सब कहैं तारहु स्वामी । सत्यपुरुष तुम अंतर्धामी ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुन सांचा सोई । मोहिं विन जीव तरे नहिं कोई ॥
जाकर अंस ताहि दुख व्यापे । आनके अंस आन पहुँचौपे ॥
कहैं कबीर जीव अंसहि मोरा । छलके जार निरंजन चारा ॥
जो सुनरे सत्यनाम गोसाईं । ताके निकट काल नहिं जाई ॥

युधिष्ठिरवचन ।

कहैं युधिष्ठिर दोह कर जोरी । सुक्त पान दये जिव बंदीछोरी ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर निज अंस प्रगट कर । सोईं अंस विष्णु अंसमे लपथर ॥
आद अंत औ निर्गुण सरगुण । पांच पचीस औ चौदह त्रिगुण ॥
अजर अमर सो सबके मूला । जासु अंस सोहंग अंकूला ॥
केदल ब्रह्म सोहंगम जीऊ । रमिता सोहंग पै तन धीऊ ॥
क्षीर मथे सो करे सुवास । सो सुवास पर आत्म पास ॥
परआत्म आत्मके करता । सो सब मूल सकलके भरता ॥
सो सत्यनाम अमरपुर माहीं । सब जिव सत्यनामके आहीं ॥

युधिष्ठिरवचन

कहैं युधिष्ठिर तुम सत्यनामा । सत्यकबीर संतन सुखधामा ॥
देहु परवाना अधम उधारो । पांचों पंडव कहैं तुम तारो ॥

युधिष्ठिरका आरती चौका करना

कवीरकृष्णगीता ।

७३

कवीरवचन ।

दोहा-कहैं कबीर सुन धर्मसुत, आनहु आरती साज ।

देव प्रवाना सुत्तको, वेग करो जिवकाज ॥

जाहु कुबेर पहैं तुम राजा । आनहु साज करो तुम काजा ॥

जाय कहा नृपपांह कुबेर । आरती साज कबीरहि हेर ॥

छाय कुबेर सकल विध नामा । नृप साजले आय तुलाना ॥

आये समर्थ चरण मनावा । साहेव कीन्ह सर्वाहि सत भावा ॥

कृष्ण कुबेर सो चौका सँवारा । जोत प्रकाश सिंहासन सारा ॥

शब्द उचार अवाहद गाजा । ताल मृदंग झालरी बाजा ॥

सत्यकबीर तब नरिअर मोरा । पांचो पंडवके बंद छोरा ॥

मगन भये प्रवाना पाये । आद सुरत सतलोक पठाये ॥

क्रीतम सुरत संसारे राखा । पुष्ट पुन घर गवन सो भाषा ॥

कहैं कबीर प्रसाद वतावहु । समहछि पतिव्रतक मनावहु ॥

रजगुण तमगुण भोजन तजहूँ । सद्गुरु भोग नाम सत भजहूँ ॥

सतकबीर सिखवन दे सवहूँ । सुमत विना कोई तरे न कबहूँ ॥

प्रेतभक्ष तज देव भक्ष लीजे । सद्गुरुके चरण चित दीजे ॥

सद्गुरु भक्त साधुकी सेवा । सकल आस तज देवी देवा ॥

जाहि भजा चाहे जो कोई । तेहि पंथ गुरु हर लखे सोई ॥

भगवानोवचन ।

कहैं युधिष्ठिर सो भगवाना । तुम्हरी घरी शुभ आय तुलाना ॥

सोई संत जो सद्गुरु सेवा । सद्गुरु सब देवनके देवा ॥

एकादश कोट देव विष्णु अंगी । हरसमेत भये सद्गुरु संगी ॥

कबीर साहबका युधिष्ठिरको परवाना देकर लोकको जाना

७४

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा-आगे पिछे सब मिल, लियो मुक्तको पान ।

ठीका पुरे सुखघर गये, सत्यकबीर व्रत ठान ॥

सत्यकबीरके सेवक पतिव्रता । सतकबीर सब अघके हर्ता ॥
कोटि २ जिन किये अपराधा । गौ द्विज हत्या अगम अगाधा ॥
केहु प्रकारकी हत्या होई । कोट तीर्थ किये छूटे न सोई ॥
जो जिव सद्गुरु शरण सभावे । सतकबीर सुमरे सच पावे ॥
जन्म २ अघजार नसावे । यम त्रिण तोड प्रवाना पावे ॥
धन्य सराहिये ताकर भागा । जो सतनामके शरणहि लागा ॥
कहे कृष्ण सतनाम कबीरा । भेटे जीवको भौ दुख पीरा ॥

कबीरवचन ।

कहे कबीर हम लोकहिं जाहीं । जो सुमरे मोहिं हम तेहि पाहीं ॥
यह कह सद्गुरु गुप्तमें तहां । विष्णु व्याप्त सब स्तुति माहा ॥
सत्यनाम कहि सीस नवाई । सत्यनाम सुमरे सच पाई ॥
सत्य गहे बांचे सब कोई । सत्यनाम जप सब सुख होई ॥
सत्यनाम स्मरण सुखमूला । सत्यनाम प्रति उझे न तूला ॥
प्रतिस्वासा सुमरे सतनामा । विष्णु व्याप्त सतनाम विश्रामा ॥
महाविष्णु सतनाम अधारा । सत्यनाम ते आय निराकारा ॥
सत्यनाम सो सतपुरवासी । सतपुर अमरलोक सुखरासी ॥
विद्यावेद पढ़हिं नर लोई । सत्य अमर कहैं लखे न सोई ॥
सत्य मुक्त जाके घट पूरा । सत्यनाम तेहि रहत हजुरा ॥
सबके घट महैं अमर स्वासा । सो सतनामको अंस सुवासा ॥

निरंजन और त्रिदेवका सम्वाद - शिवादिदेवका कोप करना

कबीरकृष्णगीता ।

७५

जीव सोहंग रमता थिर करता। भंरा खाली कर खाली भरता ॥
सत्यनाम सब मँहैं सोइ न्यारा । सोइ परम गुरु भो कंडहारा ॥
सत्यनाम सड़ुरु कहाये । पुन गुरु तात मात बंधु भाये ॥

दोहा--सकल समाये रहै सो, प्रगट होइहिं जहैं सांच ॥

विष्णु व्यास सुखदेव कहैं, सांच बिना जिव कांच ॥
सांच सोई जो विनशे नाही । जठर योनि नहिं आवे जाई ॥
जब यम जीव कहैं सांसत कीन्हा । जीव पुकारे सड़ुर लीन्हा ॥
कस जिव अघ पतसे बहु जाभी । अमरलोक अम्बरपति स्वामी ॥
कहि जो कियऊं ताहुपर जाऐ । सत्यनाम सो जरत उबारे ॥
तत्क्षण प्रगट भये सतनामा । कालहिं मार बिंधसेउ धामा ॥
स्वास निकसतन सुन्य कहाया। काल भेट सुन्यकार बसाया ॥
दाना भीर राखेउ यहि लागी । बिना पयोद दाम न पागी ॥
सत्यनाम सोइ सत्यकबीर । जोगजीत है काल बधीर ॥

दोहा--बंदीछोर कबीर प्रभु, राम अछाह कबीर ।

प्रथम विष्णु मिल धायके, कबीर राज दिये थीर ॥
ब्रह्मा पत्री कर ढुम साली । सत्यकबीर कुल विष्णु अमाली ॥
शब्दवेदके मते जो चलि है । ताके त्रास काल महि खिलि है ॥
वेद पुराण कुराणकी बात । विरला सैल निरख मग जाता ॥
गुरु साधु सो होय अधीना । सेवा सबके स्वामी चित दीन्हा ॥
सबन मथनके देख परेखा । स्वामी सत्यकबीर अलेखा ॥
विष्णु व्यास अज कृष्णउचारा । सत्यकबीर जिव तारन हारा ॥

७६

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा—सबके मटुक कबीर गुरु, बिन कबीरकुछ नाहिं ।

सुरत स्वास सुख संतत, सो कबीरके छाहिं ॥

अविचल स्वाधी परख कबीरा । महाकालको मस्तक चीरा ॥
कहैं कृष्ण कबीरसे वैना । निस दिन दरश देहु भर नैना ॥
गुप्त प्रगट हरदम देहु दर्शन । सवहि पदरस प्राप्त गुरु प्रशन ॥
दरश परस मम हिय रहु भिनी । कृष्ण कबीर कहैं बिनती कीन्ही ॥
आये कबीर कृष्णके सीसा । ताप गई शीतल हर दीसा ॥
जबलग रहे कबीर डर माथा । तबलग कृष्ण सो रहे सनाथा ॥
जबहिं कबीर गुप्त होय जाहीं । तब गोपाल पथ पितु जे माहीं ॥
पितु जननी धर्मराय भवानी । ताके छाया अनित चलानी ॥
चलहिं अपंथ जो विष्णु सयाना । तब पितु काल बांध सिरहाना ॥
वार अनेक विष्णुहिं यासे काला । तबहिं विष्णु औ सब बेहाला ॥
तब कबीरके शरण समाये । कबीर शरण जग त्रास नसाये ॥
नगद पंथ निरगुण कबीरा । सरगुण जानहु भर्म खोगीरा ॥
सरगुण तीरथ व्रत भ्रम पूजा । पुन सरगुण काया यह दूजा ॥
निर्गुण एक कबीर अधिनाशी । ब्रह्म बोलता सब घट वासी ॥
बहु निर्गुण वरणो अब नीरा । दुस्वित निरवान सकल शरीरा ॥
नीर कबीरको अंस बखाना । शीतल नीरसो साधस ज्ञाना ॥
नीर बिना नहिं जीवे प्राणी । नीर सकल शरीर निसानी ॥
अन्ननेत औ तरवर चीना । कंद मूल फल दल बिनहीना ॥
दल पानी करुनाम बखाना । दल देव भाषा जल नर जाना ॥

कवीरकृष्णगीता ।

७७

पानी नीर उदक अंभु वारी । जल कह जले नीर संसारी ॥

दोहा-नीर कवीरहिं मिल गया, अंतर रहा न रेख ।

तीनों मिल एके भया, नीर कवीर अलेख ॥

जाके होय सत्तके जोरा । सो गुरु करे कवीर वंदीछोरा ॥

जो पुन दया सत्तके हीना । तिन भज त्रिगुण देवी पंथ लीन्हा

त्रिगुण मता देवी सरगुण संसारी ॥ निर्गुण सत्यकवीर जिवतारी ॥

नीर बिना नहिं पण पछली । महि बिना कोइ बैठे न चली ॥

सो महि मीन रूप स्थापा । मीन भषहिं बड लागहि पापा ॥

मीन एक गौ द्विज शत कोटी । तिल भर मीन नरकके कोटी ॥

महादेववचन ।

कोध महादेव वचन उचारा । विनामीन नहिं मातु अहारा ॥

अष्टंगविवचन ।

उठ अष्टंगी सबहिं बुझावा । कक्षप सूकर महादेव खावा ॥

मैं तो आद निरंजन बामी । हमरी प्रत को श्रवण प्राणी ॥

एक दिन जो कोइ तिलभर खाई । पुरुषा सहित सो नरक सिधाई ॥

हम तो विष्णु ब्रह्मा शिव माता । एक दिन मम कामन राता ॥

ब्रह्माहु मम वचन नसाये । तुमहु शिव नीके बरताये ॥

विष्णु भागि गो साधुन संग । खाहिं मीन हम तेहि नहिं संग ॥

हमहू मीन खाय अघ बूढे । मांस खाय अघ सुडे बूढे ॥

जल शिव सभा माहिं हम हारा । तुरत भरम होहु आप हमारा ॥

भयउ भरम शिव बहुरि जियाय ॥ सर्व जीवके तेहि मीन खवाया ॥

७८

कबीरकृष्णगीता ।

मीन खवाय ज्ञान हर लीन्हा । प्रेतक ईस महादेव कीन्हा ॥
ब्रह्मा कहा जननी परखावा । औरहिं ब्रह्म ज्ञान बतलावा ॥
ब्रह्माहि बधुपुन तुरत जिआवा । मीन मांस भर सुरा खवावा ॥
ब्रह्मा कहैं तब कीन्हेट प्रेता । द्विज तन जगत भेष धर केता ॥
प्रेत अंस औ नौ गृह अंसा । भाषि हैं सखा तुव मांस परसंसा ॥
विष्णु जननी कहैं सीस नवावा । मैं बालक माते बरतावा ॥
भई विष्णु पर मात दयाला । कबीरके हांथ देवाइव माला ॥
कहे अघा कबीरसे रोई । विष्णुहिं चांप सके नहिं कोई ॥

दोहा—ब्रह्मा शिव एक मत भये, विष्णुहिं करिहैं उदास ।

तोहि शरण कबीर हरि, राखि लेहु यहि पास ॥

तुमका अघा सौपहु आज्ञ । हरिकर कीन्ह प्रथम हम काज् ॥

विष्णु साधुकी संगत कीन्हा । ताते हम विष्णुहिं चित दीन्हा ॥

साधु सनेह औ गुरुके सनेही । कबहुँ दोष नहिं आवे तेही ॥

तुमहू अघा सेवहु साधू । गुरुकर मिटे काल उपाधू ॥

सहस्रसुखी सिखवन मान हमारी । हमरी सुरत ध्यान चित धारी ॥

एक काल निरंजन राई । बांचहि हमरे हुकुम चलाई ॥

अष्टंगीवचन ।

कहे अष्टंगी हम तुव चरी । तुम्हरे शरण जीव सब करी ॥

दोहा—सुरतके चौका सर्वारके, दीन्ह अष्टंगी पान ।

आद कला सो लोक गई, कीतम अंस सब जान ॥

सत्यकबीर प्रमारथ बोले । कबीर प्रताप सबे पक्ष खोले ॥

कृष्णको निरंजन शिवके कोपसे बचानेके लिये कबीरका प्रकट होना

कबीरकृष्णगीता ।

७९

जापर दया करहिं सतनामा । सत्यनाम सो कबीर सुखधामा ॥
सत्यकबीरकी जापर दया । सत संतोष दया तहैं छाया ॥
कबीर सुवास फूल तिल संसीरा ॥ सत्यकबीर घृत जग तम हीरा ॥
कबीर अभी विष राय निरंजन । तारहिं कबीर काल शिरभंजन ॥

दोहा—कैसो अधीन अगाध होय, जो गुरु करी कबीर ।

विष्णु व्यास सत कहतहैं, तेहि छूटे भोजलपीर ॥
कबीरके सुमरे पाप नसाई । कबीरके भजे यम निकट न जाई ॥

अजहरवचन ।

अजहर विनवे दोइ कर जोरी । श्रीकृष्ण सुन विनती मोरी ॥
कहु सोहंग कर मूल बखानी । कासो भये सोहंग उत्पानी ॥
निराकार अद्या पितु माता । तिनतो कीन्हा सोहंग घाता ।
मात पिता घाती नहिं होई । गुरु साध घाती नहिं कोई ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण सुन रुद्र वियोगी । तुव समान नहिं जगमा जोगी ॥
सो तुम आद सोहंग न चीन्हा । हम तो आद सतनाम गहि लीन्हा ॥
सत्यनाम जग प्रगट कबीर । स्वासा सोहंग अंस सत धीर ॥
अमर कबीर अमर सतलोक । अंस सोहंगम कबीर निहसोका ॥

शिववचन ।

कहैं शिव जो कबीर करतारा । मम बल जीतहिं तो हम हारा ॥
दोहा—वाठे शिव आकाश लहि, कीन्ह कृष्ण पर धाव ।
विष्णु कबीर पुकारहौं, कबीर प्रगटे तेहि ठांव ॥

८०

कबीरकृष्णगीता ।

भयउ सुगंध महा घन घोरा । भयउ अंजोर भाग चल चोरा ॥
लिंग समेट गदहा होइ भागा । तबहिं विष्णु शिव गोहने लागा ॥
फिर शिव देख कहा बल भयऊ । कबीरके त्रास गदहा होयगयऊ ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर हरि आव सिंहसन । विष्णो झोह हीन भक्ष डासन ॥
प्रेत पिशाच भूत रखवारे । तासो बंजनी कहा हमारे ॥
हमरे साथ भजन सतनामा । भूत पिशाच घोर अघकामा ॥
साधनका जो दुखावे आई । आपन बल करे नाम सुहाई ॥
हमरे नाम सुरत चित गहहू । सकल समयस्तो निर्भय रहहू ॥
प्रथमहिं सिंध मथन तिहुं लरऊ । कबीर प्रताप तहाँ निश्तरऊ ॥
ब्रह्मा शिव देवी कर दूता । कहैं विष्णु भोहि दुखावे बहुता ॥
सत्यकबीर एक तुव प्रतापा । कालहिं जीत भक्त स्थापा ॥

दोहा—कहैं कबीर कृष्ण सुन, हम तोहि सदा सहाय ।

सुमरे नाम जो मेरो, और सतपंथ चलाय ॥

त्रिगुणके पिता निरंजन ऐठा । पुनहिं पाप करावे वैठा ॥
पुण्य पाप नहिं नाम समाना । साधुसेवा गुरु भक्त प्रणामा ॥

दोहा—कहैं कबीर कृष्ण सुन, साधु सरूप है राम ।

विष्णु साधु सरूप गुरु, गुरु सरूप सतनाम ॥

बहुरि शंभु सनकादिक आये । ब्रह्मा अवागन ससुझाये ॥

यहां कबीर कृष्ण सतरूपा । अंतर दीन्ह दर्श नहिं भूपा ॥

एक वार शिव बरस अंगारा । सब अंगारपर रुद्र कपारा ॥

सनकादिका शिवका जिलानेके लिये प्रार्थना करना

कवीरकृष्णगीता ।

८१

जरा जरे बांच लट तीनी । बहुर कवीर भस्म तेहि कोन्ही ॥
तब अज सनकादिक चल भागी । तबहींके तन लूक सो लागी ॥
तब सनकादिक विष्णु पुकारा । विष्णु कहा सुमरहु करतारा ॥
कवीर बस्ते तो बांचहु झारा । सबके मूल कवीर करतारा ॥
सनकादिकमचन ।

कहैं सनकादिक राख कवीरा । ज्वाला छुटा भौ निर्धल शरीरा ॥
तब सनकादिक स्तुति कीन्हा । सत्यकवीर कहा सब चीन्हा ॥
सनकादिक तन तपके पूजा । हीरा विष्णु रुद्र अज गुंजा ॥

दोहा—सत्यकबीरके पगु परे, सनकादिक बिलखाय ।
अब तो बरुसहु चक्र प्रभु, रुद्रहि देहु जिआय ॥
सरजिव कीन्ह कवीर दयाला । चक्षुहीन जपु सुंडके माला ॥
रुद्र आंखके भा रुद्राक्षा । आपन चक्षु आप शिववाक्षा ॥
बहुर चक्षु कवीर कर दीन्हा । आद सिरसापन दैवे लीन्हा ॥
तुम तीनों भई हर सरदारा । रहियो विष्णुके आज्ञाकारा ॥
तबते रुद्र कवीरहिं चीन्हा । रहियो सेवा विष्णु अधीना ॥
छांठ धुरत मत जोग अराधा । भांग धतूरा माहुर साधा ॥
गगन ध्यान मन जोत प्रकाशा । परम जोत दिन मुक निरासा ॥
परमजोत सत्यनाम कवीरा । जोत निरंजन काल अहीरा ॥
सत्यकबीर गुप्त होय गयऊ । सनकादिक हर पूछे लियऊ ॥
कहिये विष्णु कबीरके माहिभा । हम बहु माना कबीरके सीमा ॥
कहैं हरि तुव मानिक होई । सत्यकबीरके यम डर रोई ॥
सुनहु आदके बात गोसाई । जबते हम कवीर लाखि पाई ॥

सनकादि और विष्णुका सम्वाद - वेदादिकी उत्पत्ति

८२

कबीरकृष्णगीता ।

प्रथमहि सतयुग यम मोहि जारो । निराकार यम पिता हमारो ॥
तीनों देव औ कोट तैतीसा । सबकहैं जार भ्रम कर पीसा ॥
जीवहिं कब दीन्ह बहु काला । तहाँ भगट सतपुरुष दयाला ॥
जिन सब जीव सोंप धर्मराई । सो सत्यनाम कबीर सुखदाई ॥
महाभयंकर काल निरंजन । धर्म अजाजिल वंस अंजन ॥
अजाजील धर्मराय लखाये । आप काल करता कहलाये ॥
कहइ रक्षाके भक्षक ताहीं । ध्रुव प्रह्लाद अजहु पछताहीं ॥
भक्ष करे जिव चांपे काला । जार बार करे निपट बेहाला ॥
राम कहे सत कहे नरेशा । सत्यनाम विन कागके भेषा ॥
दोहा-धुनकट कौसे अंस भरी, सप्रथ सत्यकबीर ।
पतिव्रता गंगा गती, वण्ड्य व्यास रघुवीर ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण प्रगटे सतनामा । सत्यकबीर जोगजीत सुखके धामा ॥
हने सीस मम पितुके अनंता । जार भ्रम किय यमहिं तुरंता ॥
सत्यकबीर आजा मैं नाती । कबीर दुलहा हम सबहि बराती ॥
कालहिं जार भ्रम यम साखा । दान कदसा अंस भर राखा ॥
दोहा-धुनकट केंस अंस भरि, बहरे काल बरिआन ॥
जाय स्वर्ग गे लागा, देवतन देख रिसान ॥
सकल देव तेहि यासन धावा । भाग सबे कबीर पहुँ आवा ॥
तत्क्षण सत्यकबीर जोगजीता । कालीहिं भ्रम कीन्ह भये रीता ॥
लक्ष बार तेहि जार निकंदा । पुनि सजीव कीन्ह कहैं मैं बंदा ॥

कवीरकृष्णगीता

८३

कवीरवचन ।

कहे कवीर वंदा तैं काकर । जाकर दास नाम ले ताकर ॥

निरजनवचन ।

कहे काल कवीरको दास । जिन मोहि छिनया सिरज विनासा ॥

कहे कवीर तैं कासो डरसी । काकर भक्त विहुन भक्ष करसी ॥

कहे काल मैं पुरुषके अंसा । पुरुष कवीर एक परसंसा ॥

सत्यकवीर सो हमरे श्रेष्ठा । और न करे छिनक महे नष्टा ॥

बहुर सहस्र बेर तेहि जारा । सिरजेउं बहुरि काल तव हारा ॥

पृच्छिहि जोगजीत सुन काला । कासो डरस कहु यम ब्याला ॥

बोले काल रोप सिर धुनिया । तुम्हरो दास तुव मेरे सिर मणिया ॥

तुव सत्यपुरुष हम तुम्हरे चेरा । तुम्हरे दास मकुट सिर मेरा ॥

जो लेहि सत्यनाम परवाना । तोहे सम ताहि गिनो निरवाणा ॥

दोहा—सत्यकवीरके दास, जो मैं पुन ताके दास ।

जो जिव विलग कवीरसे, यम तेहि घाले फांस ।

धन्य सत्यनाम कवीर अटोटा । जिन महाकाल बांध यम कोटा ॥

यमके कोट कर्म भ्रम धोखा । सत्यकवीर विन पावे नहि मोषा ॥

कवीरवचन ।

कहे कवीर सुन काल निरंजन । अजाजील तुम साकटभंजन ॥

हमहिं गौय कस पाया चोरा । आपहि पुरुष थाप कस भोरा ॥

कालवचन ।

कहे काल मोहि व्यापेउ ऐसा । पुरुषहिं मेट राज करें वैसा ॥

जब मन महे अस चितवन कीन्हा । दस बीस सीस दूट परभीना ॥

८४

कबीरकृष्णगीता ।

बहुर कीन्ह मैं सुमरण साईं । सीस मोर धड लागे आई ॥
तब मैं जाना पुरुष दयाला । सेवक चूक न मन महीं चाला ॥
निशि दिन धरों मैं पितु पगु ध्याना । पै कछु मन महीं भौ अभिमाना
तब तुम योहिं भ्रम कर डारा । कबीरते आद अंत यम हारा ॥
जो सतनाम राखे तो रहऊं । डाहे तो बिन अगिन डहाऊं ॥

दोहा—सत्यकबीर जो सुमरहीं, तोहि मैं निकट न जाऊं ।
कबीरके भक्त विद्वान जो, कहे काल तेहि खाऊं ॥

कृष्णवचन ।

कहे कृष्ण सनकादिक सुनहूँ । आद पुरुष कबीर चित गुनहूँ ॥

सनकादिकवचन

कहे सनकादिक अब हम चीन्हा । सब मूल कबीर गम कीन्हा ॥
अब हम सत्यकबीरके शिष्या । कबीरके सुरत हृदयमो लिखा ॥
बला सुत हम सहस्र अठासीं । कबीर बिना सब परे यमफांसी ॥
अब जिव सत्य कबीरहिं दीन्हा । कबीरके अगुवा विष्णुहिं चीन्हा ॥

कृष्णवचन ।

कहे कृष्ण जब लेहो परवाना । यम त्रिण तोर संहाय सतनामा ॥
यह सुन सनकादिक धर ध्याना । कृष्णके स्तुति आप बखाना ॥
सत्यलोकके हंस संग आये । झलकत झलझल सुवास बसाये ॥
कोटिन रावे शशि एक न तुलहीं । एक हंस ससि अर्बन तुलहीं ॥
शोभासिंधु राससुख मूछं । ताहि सुख जेहि कबीरसम तुछं ॥
सत्यकबीर जग दास कहाये । साधरूप धर भक्त हठाये ॥
इह हम कहैं यमसुखते बचावा । जगमहैं हमरे नाम खिडावा ॥

कबीरकृष्णगीता ।

८५

कहै कृष्ण पग समर्थ नाई । कहैं लग कहों मैं समर्थ बढाई ॥
सतकबीर मेटो यम दुःखा । सनकादिक सुन प्राण पिशुषा ॥
यम त्रिण तोड कालसुख थूका । आरती यंगल यम धर लूका ॥

दोहा—दियो पान सनकादिको, मग्न भये सब साथ ।

कहे सनकादिक सुख भये, मिटा काल आध ॥
कहैं सनकादिक धन्य सतनामा । क्षण यहैं हम सबको भो कामा ॥
जै जै सत्यकबीर दयाला । सनकादिक जप कबीरको माला ॥
मग्न भये सब तन मन शोधा । पांच पचीस मन सहज सभोधा ॥
चैदह यम त्रिगुण जेहिथाकी । अरिहित सम लघु दृग एक ताकी
धन्य सो सतकबीर सत्यनामा । मैं लघु सेवक कबीर सुखधामा ॥
सयकादिक बहु स्तुति कबीरा । सुरति निरति गहि तन मन थीरा
व्याघ्र भ्यानहर अज बिग कागा । चारों झोहर करने लागा ॥
सब हरे सनकादिक क्रांति । मिल सनकादिक साधुके पांती ॥
एक बारके हुकार सब गजी । आप आप कह अज हरी तजी ॥
तब कबीर सनकादिक आगे । सतकबीर आवत यम भागे ॥
कछु पग जाय भये चक्षुहीना । बहुर कुष्ट होय चुये अभीना ॥
पगुके हीन भये सिर कूटा । जरि भो चिता केर जस खूंट ॥

दोहा—चारों मूठ नर पूछे, कहे आप महशोय ।

जो कबीर ना आवते, तो सब खात बिगोय ॥
ऐसे भौ पुन चारों वेदा । स्तुति करहि कबीरको भेदा ॥
कहा कबीर वेद समुझाई। धर तन शक्त करहु मनलाई ॥

८६

कबीरकृष्णगीता ।

चारों वेदके तारन हारा । पंचयें सुसम वेद सोहंगम तारा ॥
सतकबीरको अंस सोहंगा । स्तुति वेद कबीर प्रसंगा ॥
आज्ञा मान भक्त चित दीन्हा । चार वर्ण भये भक्त अधीना ॥
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य औ शूद्रा । कोई करे भक्त कोई तपमुद्रा ॥
भक्त विना धन वित सब छारा । सतकबीर विनती यम धारा ॥
सत्यकबीर सत्य सो राजी । काम क्रोध मिथ्या यम बाजी ॥
सोहंसा सारपद चाही । अजर अमर जिव अमर व्याही ॥
भजहिं कबीर सो जाहिं अमरपुर । सब सुख विलसहिं कर्म कालदुर
भजे सो सत्यकबीर पतिव्रत छवा । तिभिर थिठै जब उदे ज्ञानवा ॥
तिभिर त्रिगुण मन मत सब चारा । सोतहवां अंजोर कबीर मत सार ॥
विष्णु अवरण तुलसी भूषण । मृतुका तिलक काहु नहिंदूषण ॥
अंकुर कंद मूल गुर घीऊ । पान फूलपट सेत सोइ लेऊं ॥

दोहा—मीन मांस जो भखे, तासु अन्न जल नाहिं ।
साकटको घर भात ताजि, छूट साधको खाइ ॥
एक दिन महाकाल रिसियाना । तीन. लोकमो परा भगाना ॥
सहस्रमुखी तक्षक होइ उठा । जाय इंद्रासन इस इंद्र सुडा ॥
भागे देवता अखिल पताला । वहां सहस्रमुखी जहैं जवाला ॥
दौरे काल कैलासहि आवा । शिव कहैं डंक कीन्ह बहु भावा ॥
बहुर काल धाये वैकुंठा । जै औ विजय सांस धर उठा ॥
खैच उरधके डसेउ बनाई । विष्णुके ढिग दीन्ह गिराई ॥
मृतुक साथ तक्षक गिर तहां । विष्णु व्यास सुखदेव सब जहां ॥

कबीरकृष्णगीता ।

८७

कै प्रहापे अहि धाय विष्णु पर । सतकबीर तब कहा सुरलीधर ॥
सहस्रमुख सन्मुख कबीरा । पुन कबीर घर अमित शरीरा ॥
रूप कबीर देखत यम हारा । आपन विष भौ आपहिं छारा ॥
लीन्ह उवार विष्णुहिं सतनामा । जै कबीर कह विष्णु प्रणामा ॥
जै २ सत्यकबीर अरिघातक । काल मर्दन रक्षक सतपातक ॥
सत्यकबीर सबे गुण आगर । पतित तार देहीं सुक्त उजागर ॥
इंद्र रुद्र सब देव जिआये । सब देवन मिलस्तुति लाये ॥
सहस्रमुखी तब विष्णुहिं कीन्हा । महाविष्णुकी पदवी दीन्हा ॥
वेद विदित जाने संसारा । सहस्रसिरषा पुर्ष विचारा ॥
सहस्रसिरषापातिआनंदसिपासो । सो सतपुरुष कबीर दिखासो ॥
एक अनंतकी कौन बतावे । कोट अनंत पार नहिं पावे ॥
जाके खोजत सब पचहारे । सो सतनाम कबीर पुकारे ॥
जासु अंस एक रोम निरंजन । सो सतनाम कबीर दुखभंजन ॥
जिन प्रभु इच्छाते सब कीन्हा । सो सदुरु कबीर हर चीन्हा ॥
महाविष्णु औ विष्णु व्यासा । सत्यकबीर सुभरो हरि स्वासा ॥

दोहा—सत्यकबीरसत्यनामप्रभु, दुखनासिकासुखधाम ।
सर्व मई सो रम रहे, संतनमें विश्राम ॥

जहां सांच तहैं प्रगट आही । दयाहीनके निकट न जाही ॥
गुरु भक्त सबते अधिकारी । साध भक्त गुरु भक्त सुखारी ॥
कोटिन देवी देव अराधे । विन गुरु भक्त काल घर बाधे ॥
कोट अनंत कर्म संसारा । गुरुके भक्त विनसवे असारा ॥

८८

कबीरकृष्णगीता ।

इहां वहां गुरु भक्त सुहेखा । गुरु आज्ञा कर सोई चेला ॥
गुरु कहैं आद ब्रह्म कर लेखे । गुरु सरूप संतन कहैं पेखे ॥
गुरु सोई जो तिहुँलोकते न्यारा । सद्गुरु अमरलोक विस्तारा ॥
विष्णु अंस सद्गुरुके आहीं । सद्गुरु सर्वे मई बरताहीं ॥
सद्गुरु सत्यकबीर अविनाशी । रहे निरंतर सब घटवासी ॥
जिभि चंदा नभ कुंभक दीसा । पुनि जिभिरविप्रकाशपद ईसा ॥
एके साहेब सद्गुरु आदी । कीतनउपजी विनासिषटस्वादी ॥
तीन लोककेहैं विष्णु श्रेष्ठा । विष्णुते सत्यकबीर गरिष्ठा ॥
सत्यकबीर सबके सुखदाई । सुरति सुमतिते वै भल पाई ॥

दोहा—सत्यकबीर सुखदाया, जो सुमरे एक चित्त ।
विष्णु व्यास कहैं सब, ते सुख कबीर प्रतीत ॥

जै जै जै सतनाम कबीरा । सत्यसुक्त सो अजर शरीरा ॥
पुष्पविमान सतलोकते आवा । सकलआयचरणनशिर नावा ॥
निज सिंहासन ठाकुर दीन्हा । चरणपस्वारचरणाभूतलीन्हा ॥
विष्णुव्यास सुखदेव सतव्यासा । सतकबीर पग परस हुलासा ॥
कर जोरे जै हरखित कहहीं । सतकबीर कहत सुख लहहीं ॥
जो सुमरे सतनाम सुखधामा । सच २ सो सद्गुरु नामा ॥
सत्यलोक अम्बर सुचकाया । तहां सो सत्य पुरुष रहाया ॥
बेहंग सोहंग वोहंगके मूला । ओंकार मकारके मूला ॥
कालके कारण करण गोसाई । रक्षपालक सब जिव सुखदाई ॥
तीन लोकते न्यारा रहहीं । सर्वे मई पुन सबसों कहहीं ॥

अवतारोंकी कथा

कवीरकृष्णगीता ।

८९

धरणी अकाश पवन औ पानी । चंद सूर्य जेते नष सानी ॥
सबके आद सोहे सतनामा । सच दया मिल जीवको कामा ॥
सर्वमूल अविनाशी रामा । सोई सतकवीर सुखवाया ॥
जो सुभरे सतनाम कवीरा । ताके काल न आवे निषरा ॥
कीन्हो स्तुति विष्णु बहुता । कहा कवीर वैठहु पूता ॥
तुम स्तुति जब बहुते कीन्हा । तब हम आय दरशतोहि दीन्हा ॥
कौन काज तुम सुभरेहु मोही । टोरो सब संकट जत तोही ॥
परहि कालमुख झरकहि जबहीं । सतकवीर कह चितवे तवहीं ॥

कृष्णवचन ।

कहे कृष्ण पलकन पग झारे । मैं नाती तुम आज्ञा प्यारे ॥
धन्य भाग्य मम शुभ दिन मोश । दीन्हो दरश कवीर बंदीछोरा ॥
कवीरते अधिक और नहि कोई । आद अंत सब जिनते होई ॥
हम सब हैं कवीरके अंसा । सतकवीरके सब निज वंसा ॥
सिद्ध साध मत वेद पुराना । सतकवीर गुण सबहि बखाना ॥
कवीर निरवान मुक्तके दाता । जाको अंत न लखे विधाता ॥

दोहा—सब करताके करता, सब दाताके तार ।

सकल मूल सतसाहेब, सो कवीर औतार ॥

सच २ सच हर गई । सतकवीर जिव रक्षक भाई ॥
ये कवीरको महिमा जानो । और सब मनभत बौरानो ॥
गरुड चरण हरि शीस नवाई । महिमा कृष्ण कवीर परवाई ॥
अस शोभा नहि देखो काहू । करता कृष्ण राम तुव आहू ॥

५

९०

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा-सोई पुरुष कबीर है, जेहि हम कीन्हो खोज ।
सबे कहै मोहि वाउर, कहै भसुंड बनरोज ॥
त्रेता रामचंद्र मोहि जांचा । नागफांस परिचित भौ कांचा ॥
तहां पहुँच अहिनास उबारा । तब मैं करतातेहिनावविचारा ॥
करता निरबंद योनि नहि आवे । नागफांस तेहि बांधको पावे ॥
तब हम चीन्ह कौसिल जाये । भक्तवत्सल क्षत्रीरूप धर आये ॥

दोहा-क्षत्रीरूप राजसी, सातकी सद्गुरु रूप ।
तमगुण तामस सकल सब, त्रिगुण बित्त तेहि भूप ॥
अब हम सत्यपुरुषको चीन्हा । कबीरकेस्तुतिगरुडबहुकीन्हा ॥

कृष्णवचन ।

कहै कृष्ण गरुड तुम जानहु । कबीरकेअंस सुपच पाहिचानहु ॥
जिनके भोजन घंट जो बाजा । अधर अकाशजो धजा विराजा ॥
सो कबीरके सेवक रहई । जेहि सपनाकोउतिहँपुरअहई ॥
उधसेन भक्त बंद मै छोरा । ताते मोहि संत कहैं बंदिछोरा ॥
कबीर छोरहिँ चौरासी यम फंदा । निर्गुण नाम कबीर निर्दिदा ॥
जापर दायरा करहिँ सतनामा । सो देखे सतलोक सुखधामा ॥
कहैं कृष्ण सुन आसन मोरा । महा सुज्ञान गरुड बल जोरा ॥
हमही रहे त्रेता रघुवंसा । तवहीं कबीर मेटे यम संसा ॥
सतकबीरके अंस एक राऊ । सो पूंजी यम पितहिँ दियाऊ ॥
राय रभिता राम सोहँगी । ताके नार देह अर्धगी ॥
रामचंद्र अर्धगी सांता । रावण चोर संधि सिर दीता ॥