सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

६४

कबीरकृष्णगीता।

मोहि त्रियहि गाडेहि चाहे डारी । केहि कारण पिय दिसंतर सारी ॥
व्याह करन चाहे सब कोई । नारि निवाह करे कोई कोई ॥
कहैं कुंअर सुभचार वैविचारी । सुनहु सुरत धर सीख हमारी ॥
कच्चा कली बन मधुकर योगू । तबलग मधुकर चिंताहि वियोगू ॥
हमरी तुम्हरी सुरत एक जानो । पिय गुरु वचन हृदयपर आनो ॥
नर होथ नारीके रँग राता । तिनको कोई न पूछे वाता ॥
नार सोइ जो कान न छोडे । मर्द सोइ जो एकोन न छोडे ॥
और काज हमरे कछु नाहीं । गुरु खोजन दिसंतर जाहीं ॥
गुरु विन काज कबहुँ नहिं होई । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर सम कोई ॥
करता आप जो तन धर आवे । तो गुरु विन नहिं जग यस पावे ॥
ना जग यश ना यमते छूटे । गुरु विन निराकार यम लूटे ॥
गुरु सोई जो निरंजन मारा । सो गुरु भौजल तारनहारा ॥
अमरलोक ले जिव पहुँचावे । त्रिगुण त्यागले चौथे मिलावे ॥
सोई गुरु जो अंतहू मीठा । गुरुते जन्म मरण सब छूटा ॥
ताते अब चित धीरज धरहू । मानहु वचन तुमहु गुरु करहू ॥
यह जीव है कहे सुष घरकैरा । कहे वेद सतलोक जिवढैरा ॥
सत्यलोकते सब जिव आया । निरंजनके डहन समावा ॥
निरंजनसो अधिक जो होई । ताके सुमरण बांचे लोई ॥
जाके ढर ढरे काल निरंजन । परम जोत सो काल शिर भंजन ॥
करुणा मैं कहाय जग प्रगटे । तिनके त्रास निरंजन हटे ॥
सोई अचिंत सत सुकृत सदुरु । सोई मुनींद्र त्रेता शुभ पग धरू ॥

कबीरकृष्णगीता ।

६५

दोहा—सोइ समरथ सत्यनामहै, तेहि प्रथम नाम कबीर ।

कलिके जिव तारन कारण, प्रगटहिं दास कबीर ॥

दास कबीर कलिमहैं कहाई । सत्यपुरुष जग प्रगटहिं आई ॥

तब यम सो छूटा हम भाई । जो कबीरके शरण समाई ॥

सुन पतवरता स्वामी कहई । गुरु विन मिथ्या सब जग अहई ॥

यात पिता सुत संपत्त दारा । स्वामी तन धन जोवन छारा ॥

जीवके स्वामी सांचा सोई । सो कबीर सदुरु दुख खोई ॥

हमहू लेव कबीर पंथ सीखी । तुमहू लेव कबीर हिय लीखी ॥

पतिव्रतावचन ।

कह पतिव्रता सुनो प्रभु स्वामी । कतहुँ स्त्री कहे पियसे दुरवानी ॥

स्त्रीके गुरु पुरुष जग कहई । पिया प्रताप निरभैं निरवहई ॥

पतिव्रता गुरु स्वामी सिखावा । और सबन गुरु भक्त हदावा ॥

कुंभर वचन ।

कहैं कुंभर हम तनके स्वामी । तुम अरधंगी व्याही वार्थी ॥

जीवके स्वामी सत्यकबीरा । तास शरण जिव व्यापे न पीरा ॥

करुणा मैं कबीरकी कला । कबीरके भक्त आद जे माला ॥

जो कबीर कलियुग ना प्रगटे । चले ना भक्त काल न हटे ॥

काल दोहाई कबीरके माने । और काहु यम नाहिं गुदाने ॥

बाले हरिश्चंद्र मोरध्वज राजा । जिनके सदा धर्म वरत साजा ॥

पांचो पंडव नरक गक्षो चाको । दानी करण महा अति बांको ॥

कहैलग कहौ तिहुपुर धर्मधारी । छलके सबहिं निरंजन भारी ॥

६६

कबीररुप्णगीता ।

जो कोइ शरण कबीरके लाग। ताकर दुख संकट सब भागा ॥
जिमि जग पतिव्रता शुभचारी । आदि पतिव्रता सद्गुरु व्रतधारी ॥
दोहा-सत्यकबीर विना जीव सब, कतहुँ संच न पाय ।
कहैं स्वामी सुन गुरुमुखी, पिय सत्यकबीर लौलाय ॥
स्वाधीके सिखापन ठियमहैं गुना। सुधावंत पिये लिखा दुख दूना ॥
पिया पगु टेक उठी श्रह ताका । रंगमहल मिल उरदक फांका ॥
जेहरकेर चुलह तिन कीन्हा । प्राणदानरूप घृत दीन्हा ॥
दीपक अग्नि वस्तर चूलह वारी । विनवर थार राख दल हारी ॥
ले स्वाधीके सन्मुख ठाडी । सलिता हगते वार अति बाडी ॥
“आज्ञा पाय धरेउ पिय आगे। बराबर दुइ भाग किहु कुंअर सुभागे ॥
एक आप लिय एक त्रिय दीन्हा। अपेण कर पुन भोजन कीन्हा ॥
दे खरचा पुन बीरा दीन्हा । सुख जूठन कुल्ला तब कीन्हा ॥
भये संतुष्ट जूठन देव दासी । हरिंत लेहु जो मिलि अविनाशी ॥
चरणोदक पुन प्रथमहिं लीन्हा । महाप्रसाद तब भोजन कीन्हा ॥
सुखसागर पिय दरश सुजानी । पिय विराहिन पिय दरश लुभानी ॥
लौंग जायफल पान मिलाई । बीरा रच देइ पियाहिं खवाई ॥
कहा कुंअर अब आज्ञा देहू । हम गवने तुव प्रतिव्रत लेहू ॥
यह सुन कुहकी मार धन रोई । कुहक सुनत धाय सब कोई ॥
मात पिता कह कुंअर नेवेली । गरे हार कर कुंअर चवेली ॥
रोई आन दुख बूझ सपाना । कहैं कुंअर चूप बोलिय आना ॥
हम कह परि ओर कछ धंधा । तुम सबके मन पापके संधा ॥
कुंअर सो बुध जान सब बूझा । कहा बुझाय तबे सब सूझा ॥

कवीरकृष्णगीता ।

६७

दोहा-ठांव २ सब सैना कहु, कुँअर सोइ अलसाय ।

पहिला भिन्न सार अगम पंथ, कुँअर धरे उठपांय ॥

निकसा कुँअर सत्तगुरु भापी । गुरु कर फिर आयो अस भापी ॥
निसरा कुँअर दिसंतर भारी । कुँअर जाग एक सर सेज पारी ॥
उठि अकुलाय अंगना भइ ठाई ॥ पियकी प्रीति अंतर्गत बाडी ॥
माय बाप कैंहें डांक जगावा । मम अभाग पिय तरिथ सिधावा ॥
रोर करे दुलहिन पिय लागी । पियके बोल हिये उठ वृह आगी
सये विकल होय रोवन लागे । कहैं नृपत कस रोवहु अभागे ॥
पठवहु मानुष पर आती । कुँअर होय पितु बंधु जमाती ॥
धाय बहुत खोज नहि पाये । नृपत समोव कुँअर समुझाये ॥
पतिवरताके स्वामी पूरा । सर्वस माग चेताय तेहि सुरा ॥
बेविचारी कर स्वामी कांचा । चीन्ह कछू नहि बोलिस वांचा ॥
वहां दिसंतर गयो कौने काजा । बेविचारी लिहे गौ दुतिय राजा ॥
बारह वर्ष बीत जब पूरा । आन कुँअर आवत वाजे तूरा ॥
कियो नृपत सन्मान बहूता । कस तन ठहरे ताके पूता ॥
पहिले पहर तेहि कुँअर बुलावा । पतिव्रता पट अंतर दियावा ॥

दोहा-पतिवरतासुं दुहि कहा, पूछ कुँअरकी बात ।

कौन वस्तु तुम खावो, पतिव्रता संग रात ॥

भगली कुँअर कहे भष भाता । बराबरी झकभास सुहाता ॥
कहे पतिव्रता यह नहि मम स्वामी । विदाई नहि कहैं लसकर जाही ॥
यही भांति भूप बहु भगली । पतिवरतहि ठग सके न नकली ॥

६८

कबीररुग्णगीता ।

भूप अनेक कांक्ष बहु आये । हांथ न लगी जाहि पछताये ॥
नृपत पद पतिव्रता राती । पिय आज्ञा किया चहे पिय माती
गुरु करेको अंकुर कीन्हा । पुन पिये प्रति अबोझा दीन्हा ॥
जब पिय आवैं देखों आंखी । तब गुरु करौं कबीर सत भाषी ॥
गुरु प्रतीत तुरंत मिल स्वामी । धन्य सहृदु गुरु अंतर्थाभी ॥
बाजत गाजत आव बराता । सुनके कोथ भयउं तब ताता ॥
तब पुत्री कहैं गारी दीन्हा । धन सर्वस नाहक खर्च कीन्हा ॥
सुना कुंभरि पिय करे अवाई । अधिक गीत कब पिय पद पाई ॥
पिता पहाँ दुलहिन चलि गयऊ । पूछ पिता पुत्री कस आयऊ ॥
कहे पतिव्रता संभाषण करहू । नहिं तो द्रव्य मम गहना धरहू ॥
सुन पितइ पठय नौवारी । किहुं सनमाने जेता धारी ॥
बहुरि दीप बार कुंभरि बुलाये । माला तिलक झलक झलकाये ॥
सतकबीर करुणा वै बोले । तब पतिव्रतते श्रवण खोले ॥
पूछे सुंदरी कहु नृपवारा । कोहवर जैवे कौन प्रकारा ॥
परदा सात चदर देहु अंतर । निज पिया नाम जपहिं उरमंदर ॥
कहैं कुंभर जानहिं अरधंगा । दुइ बरा पायऊं एके संग ॥
यह सुन पतिव्रता पगु लागी । परदा सात भरसपट त्यागी ॥
परे चरण पिय छुये न ताहीं । पूछे विष्णव भये कि नाहीं ॥
कहे पतिव्रता यह मन आज । जिहि पियसों पग हो तेहि पाऊ ॥
कहे कुंभर साकट जेहि नारी । तेहि संग बूडे पुरुष अनारी ॥
यह कहि कुंभर चला अपना दल । साकट हांथ न उचित लेन जल ॥

कबीरकृष्णगीता ।

६९

पीछे लाग चली पतिव्रता । बहुर उचर दीन्हा तेहि भरता ॥
हम अब जात आह बरिआता । गुरु करव तो होन तुव साथा ॥
कहे कन्या गुरुदेव बोलाई । हमहू शरण सत्यनाभके जाई ॥
कहे कुंभर गुरुबंधु संग मोरे । तुरत पान लेहु तिनका तोरे ॥
भये जो मंगल अधिक उछाहा । तन गउवा मन जीवके व्याहा ॥
पतिव्रता कहे पियपद लागी । चल मंदिर मोहि करहु सुभागी ॥
तबलग मोर छुवा जिन खाहू । जो लगि मोहि गुरु शरण दिवाहू ॥
सुनत वचन पतिव्रता केरी । पाऊं परे कुँअर पगु वारी ॥
पतिव्रता गृह चल भौ स्वाभी । हर्ष चले पाछे पिय बानी ॥
मंदिर जाय पलंग सुभ डासा । फूल विछौना अधिक सुवासा ॥
पलंग बैठ पिय वचन उचारा । परआत्म कह दीन्ह अहारा ॥

दोहा—राजा कीन्ह सन्मान सब पुन, कीन्ह आरती साज ।
आरती होत सो मंगल, अनवन बाजन बाज ॥

सिंहासन बैठे कडिहारा । नरिअर मोर हंस निस्तारा ॥
तिनका जमते वेग तोडावा । दे प्रवाना जीव सुकावा ॥
पुन दे तिलक चरणोदक दीन्हा । कागते हंस रूप कर लीन्हा ॥
चरण टेके कीन दंडवत साता । सट्टुर दियो सीस तब हांथा ॥
दीन्ह प्रसाद नारियर गरी । बहुर प्रसाद नवहु देहु फेरी ॥
पुन सट्टुर तेहि सिखापन दीन्हा । सदा रहहु पिय चरण अधीना ॥
पतिव्रता सुन शब्द सिखापन । गुत प्रगट एक ब्रह्म पुरातन ॥
सत्यनामप्रति पिय गुण जानी । पतिव्रता पिय पद लपटानी ॥

कथाका सार दृष्टान्तका आध्यात्मिक अर्थ व निर्गुण भक्ति

७०

कबीरकृष्णगीता ।

चरण टेक पियसो कह बाला । हमहु देहु पिय तुलसीमाला ॥
दीनदयाल दिय भेष गुरुसेती । कहा करहु प्रसाद सुनेती ॥
पतिव्रता प्रसाद बनावा । सतसुछत कहैं भोग लगावा ॥
सद्गुरु कहैं पकवान पवाई । राजा निज कर बाव ढोलाई ॥
पतिव्रता पुनि स्वामि जिमावा । नाना व्यंजन थार भरावा ॥
हर्ष चूप प्रसाद पुन कीन्हा । सत्यनाम सुखसागर चीन्हा ॥
अचवन कर कुंअर असनादा । गुरुमुख किनका लेहु प्रसादा ॥
सद्गुरु कहैं सुनो पतिवरता । गुरु नारायण सम पिय भरता ॥
पतिव्रता पिय जूठ अहारा । औ चरणोदक सम वसु धारा ॥

दोहा—सब सुख पुर रहा तेहि, जेह घर पिय तन कंथ ।
वेनिचारी नष्ट गई, तेहिना मिले अध अंत ॥
बालापन पिय व्याहको, पिय जो गये विदेश ।
पतिव्रता पिय पाइया, विश्वा नरक प्रवेश ॥

कबीरखचन ।

कहैं कबीर यह जीवके लेखा । ज्ञानी होय सो करे विवेका ॥
तैसे जीव कंहैं जार झुलावा । काल निरंजन जार लखावा ॥
सत्यनाम सब जीवके पीऊ । निज पिय ताहि न चीन्हे जीऊ ॥

कृष्णव्यासवचन ।

विष्णु व्यास विनैवे कर जोरी । सत्यकबीर अगम मत तोरी ॥
सबके मूल तुमहि सतनामा । सब जीवनके तुम सुखधामा ॥
कहैं कृष्ण मैं कबीर बल गाजौ । सद्गुरु चरण प्रताप विराजौ ॥

अर्जुन और कबीर संवाद

कवीरकृष्णगीता

( ७१ )

अब ऐसी दाय। प्रभु करहू । सब दिन तुम मम हृदय संचरहू ॥
जो तुम मम हिय करहु प्रकाशा। तब छूटे मम यमके त्रासा ॥
तुम विन को जिव राखन हारा । निरंजन जीवाहिं करे अहारा ॥
कहा करौ यमके डर दरपो। काल निरंजनके डर कपो ॥
अब मोहिं देहु सुकके पाना । यम त्रण ताडे करहु निरवाना ॥
हम सब तुम्हरे जाप पोषे । तुम जागे औ सब जग सोषे ॥

कवीरवचन ।

कहे कबीर सुन कृष्ण सुरारी । निर्गुण भक्त करे तेहि तारी ॥
निर्गुण आद अजर सतनामा । सद्गुरु सत्यनाम सुखधामा ॥

अर्जुनवचन ।

कहे अर्जुन सुन श्रीभगवाना । सत्यकबीर कर्ता निरवाना ॥
जीव कबीर साहेबके ठाहर । तेहि यम खाय जो कबीरसे ठाहर
कृष्ण वचन ।

कहे कृष्ण अर्जुन सुन वाणी । सतपद गहो कबहुं नहिं हानी ॥
सबसों कहौ कबीर है पहली । कबीरसो लगु सो रंग गहिली ॥

अर्जुनवचन ।

कहे अर्जुन हम हैं अज्ञानी । जेहि अब कर्म सोई अज्ञानी ॥
सोइ अज्ञानी शुभ पंथ न आनी। भ्रमत फिरे सदा अज्ञानी ॥
श्रीयदुपति मोहि दीन्ह चिन्हाई । तब हम कबीर पुरुष लख पाई ॥
दोहा--अर्जुन भीमाहि औ गले, भये युधिष्ठिर ठाठ।
सबदेवन कुल औ कृष्ण मिल, विनती कराहिं आति गाठ ॥

७२

कबीरकृष्णगीता ।

युधिष्ठिरकृष्णवचन ।

कहैं युधिष्ठिर कृष्ण समेता । सत्यकबीर तुम कृपा निकेता ॥
अब मोहिं सब कहैं तारहु स्वामी । सत्यपुरुष तुम अंतर्धामी ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुन सांचा सोई । मोहिं विन जीव तरे नहिं कोई ॥
जाकर अंस ताहि दुख व्यापे । आनके अंस आन पहुँचौपे ॥
कहैं कबीर जीव अंसहि मोरा । छलके जार निरंजन चारा ॥
जो सुनरे सत्यनाम गोसाईं । ताके निकट काल नहिं जाई ॥

युधिष्ठिरवचन ।

कहैं युधिष्ठिर दोह कर जोरी । सुक्त पान दये जिव बंदीछोरी ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर निज अंस प्रगट कर । सोईं अंस विष्णु अंसमे लपथर ॥
आद अंत औ निर्गुण सरगुण । पांच पचीस औ चौदह त्रिगुण ॥
अजर अमर सो सबके मूला । जासु अंस सोहंग अंकूला ॥
केदल ब्रह्म सोहंगम जीऊ । रमिता सोहंग पै तन धीऊ ॥
क्षीर मथे सो करे सुवास । सो सुवास पर आत्म पास ॥
परआत्म आत्मके करता । सो सब मूल सकलके भरता ॥
सो सत्यनाम अमरपुर माहीं । सब जिव सत्यनामके आहीं ॥

युधिष्ठिरवचन

कहैं युधिष्ठिर तुम सत्यनामा । सत्यकबीर संतन सुखधामा ॥
देहु परवाना अधम उधारो । पांचों पंडव कहैं तुम तारो ॥

युधिष्ठिरका आरती चौका करना

कवीरकृष्णगीता ।

७३

कवीरवचन ।

दोहा-कहैं कबीर सुन धर्मसुत, आनहु आरती साज ।

देव प्रवाना सुत्तको, वेग करो जिवकाज ॥

जाहु कुबेर पहैं तुम राजा । आनहु साज करो तुम काजा ॥

जाय कहा नृपपांह कुबेर । आरती साज कबीरहि हेर ॥

छाय कुबेर सकल विध नामा । नृप साजले आय तुलाना ॥

आये समर्थ चरण मनावा । साहेव कीन्ह सर्वाहि सत भावा ॥

कृष्ण कुबेर सो चौका सँवारा । जोत प्रकाश सिंहासन सारा ॥

शब्द उचार अवाहद गाजा । ताल मृदंग झालरी बाजा ॥

सत्यकबीर तब नरिअर मोरा । पांचो पंडवके बंद छोरा ॥

मगन भये प्रवाना पाये । आद सुरत सतलोक पठाये ॥

क्रीतम सुरत संसारे राखा । पुष्ट पुन घर गवन सो भाषा ॥

कहैं कबीर प्रसाद वतावहु । समहछि पतिव्रतक मनावहु ॥

रजगुण तमगुण भोजन तजहूँ । सद्गुरु भोग नाम सत भजहूँ ॥

सतकबीर सिखवन दे सवहूँ । सुमत विना कोई तरे न कबहूँ ॥

प्रेतभक्ष तज देव भक्ष लीजे । सद्गुरुके चरण चित दीजे ॥

सद्गुरु भक्त साधुकी सेवा । सकल आस तज देवी देवा ॥

जाहि भजा चाहे जो कोई । तेहि पंथ गुरु हर लखे सोई ॥

भगवानोवचन ।

कहैं युधिष्ठिर सो भगवाना । तुम्हरी घरी शुभ आय तुलाना ॥

सोई संत जो सद्गुरु सेवा । सद्गुरु सब देवनके देवा ॥

एकादश कोट देव विष्णु अंगी । हरसमेत भये सद्गुरु संगी ॥

कबीर साहबका युधिष्ठिरको परवाना देकर लोकको जाना

७४

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा-आगे पिछे सब मिल, लियो मुक्तको पान ।

ठीका पुरे सुखघर गये, सत्यकबीर व्रत ठान ॥

सत्यकबीरके सेवक पतिव्रता । सतकबीर सब अघके हर्ता ॥
कोटि २ जिन किये अपराधा । गौ द्विज हत्या अगम अगाधा ॥
केहु प्रकारकी हत्या होई । कोट तीर्थ किये छूटे न सोई ॥
जो जिव सद्गुरु शरण सभावे । सतकबीर सुमरे सच पावे ॥
जन्म २ अघजार नसावे । यम त्रिण तोड प्रवाना पावे ॥
धन्य सराहिये ताकर भागा । जो सतनामके शरणहि लागा ॥
कहे कृष्ण सतनाम कबीरा । भेटे जीवको भौ दुख पीरा ॥

कबीरवचन ।

कहे कबीर हम लोकहिं जाहीं । जो सुमरे मोहिं हम तेहि पाहीं ॥
यह कह सद्गुरु गुप्तमें तहां । विष्णु व्याप्त सब स्तुति माहा ॥
सत्यनाम कहि सीस नवाई । सत्यनाम सुमरे सच पाई ॥
सत्य गहे बांचे सब कोई । सत्यनाम जप सब सुख होई ॥
सत्यनाम स्मरण सुखमूला । सत्यनाम प्रति उझे न तूला ॥
प्रतिस्वासा सुमरे सतनामा । विष्णु व्याप्त सतनाम विश्रामा ॥
महाविष्णु सतनाम अधारा । सत्यनाम ते आय निराकारा ॥
सत्यनाम सो सतपुरवासी । सतपुर अमरलोक सुखरासी ॥
विद्यावेद पढ़हिं नर लोई । सत्य अमर कहैं लखे न सोई ॥
सत्य मुक्त जाके घट पूरा । सत्यनाम तेहि रहत हजुरा ॥
सबके घट महैं अमर स्वासा । सो सतनामको अंस सुवासा ॥

निरंजन और त्रिदेवका सम्वाद - शिवादिदेवका कोप करना

कबीरकृष्णगीता ।

७५

जीव सोहंग रमता थिर करता। भंरा खाली कर खाली भरता ॥
सत्यनाम सब मँहैं सोइ न्यारा । सोइ परम गुरु भो कंडहारा ॥
सत्यनाम सड़ुरु कहाये । पुन गुरु तात मात बंधु भाये ॥

दोहा--सकल समाये रहै सो, प्रगट होइहिं जहैं सांच ॥

विष्णु व्यास सुखदेव कहैं, सांच बिना जिव कांच ॥
सांच सोई जो विनशे नाही । जठर योनि नहिं आवे जाई ॥
जब यम जीव कहैं सांसत कीन्हा । जीव पुकारे सड़ुर लीन्हा ॥
कस जिव अघ पतसे बहु जाभी । अमरलोक अम्बरपति स्वामी ॥
कहि जो कियऊं ताहुपर जाऐ । सत्यनाम सो जरत उबारे ॥
तत्क्षण प्रगट भये सतनामा । कालहिं मार बिंधसेउ धामा ॥
स्वास निकसतन सुन्य कहाया। काल भेट सुन्यकार बसाया ॥
दाना भीर राखेउ यहि लागी । बिना पयोद दाम न पागी ॥
सत्यनाम सोइ सत्यकबीर । जोगजीत है काल बधीर ॥

दोहा--बंदीछोर कबीर प्रभु, राम अछाह कबीर ।

प्रथम विष्णु मिल धायके, कबीर राज दिये थीर ॥
ब्रह्मा पत्री कर ढुम साली । सत्यकबीर कुल विष्णु अमाली ॥
शब्दवेदके मते जो चलि है । ताके त्रास काल महि खिलि है ॥
वेद पुराण कुराणकी बात । विरला सैल निरख मग जाता ॥
गुरु साधु सो होय अधीना । सेवा सबके स्वामी चित दीन्हा ॥
सबन मथनके देख परेखा । स्वामी सत्यकबीर अलेखा ॥
विष्णु व्यास अज कृष्णउचारा । सत्यकबीर जिव तारन हारा ॥

७६

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा—सबके मटुक कबीर गुरु, बिन कबीरकुछ नाहिं ।

सुरत स्वास सुख संतत, सो कबीरके छाहिं ॥

अविचल स्वाधी परख कबीरा । महाकालको मस्तक चीरा ॥
कहैं कृष्ण कबीरसे वैना । निस दिन दरश देहु भर नैना ॥
गुप्त प्रगट हरदम देहु दर्शन । सवहि पदरस प्राप्त गुरु प्रशन ॥
दरश परस मम हिय रहु भिनी । कृष्ण कबीर कहैं बिनती कीन्ही ॥
आये कबीर कृष्णके सीसा । ताप गई शीतल हर दीसा ॥
जबलग रहे कबीर डर माथा । तबलग कृष्ण सो रहे सनाथा ॥
जबहिं कबीर गुप्त होय जाहीं । तब गोपाल पथ पितु जे माहीं ॥
पितु जननी धर्मराय भवानी । ताके छाया अनित चलानी ॥
चलहिं अपंथ जो विष्णु सयाना । तब पितु काल बांध सिरहाना ॥
वार अनेक विष्णुहिं यासे काला । तबहिं विष्णु औ सब बेहाला ॥
तब कबीरके शरण समाये । कबीर शरण जग त्रास नसाये ॥
नगद पंथ निरगुण कबीरा । सरगुण जानहु भर्म खोगीरा ॥
सरगुण तीरथ व्रत भ्रम पूजा । पुन सरगुण काया यह दूजा ॥
निर्गुण एक कबीर अधिनाशी । ब्रह्म बोलता सब घट वासी ॥
बहु निर्गुण वरणो अब नीरा । दुस्वित निरवान सकल शरीरा ॥
नीर कबीरको अंस बखाना । शीतल नीरसो साधस ज्ञाना ॥
नीर बिना नहिं जीवे प्राणी । नीर सकल शरीर निसानी ॥
अन्ननेत औ तरवर चीना । कंद मूल फल दल बिनहीना ॥
दल पानी करुनाम बखाना । दल देव भाषा जल नर जाना ॥

कवीरकृष्णगीता ।

७७

पानी नीर उदक अंभु वारी । जल कह जले नीर संसारी ॥

दोहा-नीर कवीरहिं मिल गया, अंतर रहा न रेख ।

तीनों मिल एके भया, नीर कवीर अलेख ॥

जाके होय सत्तके जोरा । सो गुरु करे कवीर वंदीछोरा ॥

जो पुन दया सत्तके हीना । तिन भज त्रिगुण देवी पंथ लीन्हा

त्रिगुण मता देवी सरगुण संसारी ॥ निर्गुण सत्यकवीर जिवतारी ॥

नीर बिना नहिं पण पछली । महि बिना कोइ बैठे न चली ॥

सो महि मीन रूप स्थापा । मीन भषहिं बड लागहि पापा ॥

मीन एक गौ द्विज शत कोटी । तिल भर मीन नरकके कोटी ॥

महादेववचन ।

कोध महादेव वचन उचारा । विनामीन नहिं मातु अहारा ॥

अष्टंगविवचन ।

उठ अष्टंगी सबहिं बुझावा । कक्षप सूकर महादेव खावा ॥

मैं तो आद निरंजन बामी । हमरी प्रत को श्रवण प्राणी ॥

एक दिन जो कोइ तिलभर खाई । पुरुषा सहित सो नरक सिधाई ॥

हम तो विष्णु ब्रह्मा शिव माता । एक दिन मम कामन राता ॥

ब्रह्माहु मम वचन नसाये । तुमहु शिव नीके बरताये ॥

विष्णु भागि गो साधुन संग । खाहिं मीन हम तेहि नहिं संग ॥

हमहू मीन खाय अघ बूढे । मांस खाय अघ सुडे बूढे ॥

जल शिव सभा माहिं हम हारा । तुरत भरम होहु आप हमारा ॥

भयउ भरम शिव बहुरि जियाय ॥ सर्व जीवके तेहि मीन खवाया ॥

७८

कबीरकृष्णगीता ।

मीन खवाय ज्ञान हर लीन्हा । प्रेतक ईस महादेव कीन्हा ॥
ब्रह्मा कहा जननी परखावा । औरहिं ब्रह्म ज्ञान बतलावा ॥
ब्रह्माहि बधुपुन तुरत जिआवा । मीन मांस भर सुरा खवावा ॥
ब्रह्मा कहैं तब कीन्हेट प्रेता । द्विज तन जगत भेष धर केता ॥
प्रेत अंस औ नौ गृह अंसा । भाषि हैं सखा तुव मांस परसंसा ॥
विष्णु जननी कहैं सीस नवावा । मैं बालक माते बरतावा ॥
भई विष्णु पर मात दयाला । कबीरके हांथ देवाइव माला ॥
कहे अघा कबीरसे रोई । विष्णुहिं चांप सके नहिं कोई ॥

दोहा—ब्रह्मा शिव एक मत भये, विष्णुहिं करिहैं उदास ।

तोहि शरण कबीर हरि, राखि लेहु यहि पास ॥

तुमका अघा सौपहु आज्ञ । हरिकर कीन्ह प्रथम हम काज् ॥

विष्णु साधुकी संगत कीन्हा । ताते हम विष्णुहिं चित दीन्हा ॥

साधु सनेह औ गुरुके सनेही । कबहुँ दोष नहिं आवे तेही ॥

तुमहू अघा सेवहु साधू । गुरुकर मिटे काल उपाधू ॥

सहस्रसुखी सिखवन मान हमारी । हमरी सुरत ध्यान चित धारी ॥

एक काल निरंजन राई । बांचहि हमरे हुकुम चलाई ॥

अष्टंगीवचन ।

कहे अष्टंगी हम तुव चरी । तुम्हरे शरण जीव सब करी ॥

दोहा—सुरतके चौका सर्वारके, दीन्ह अष्टंगी पान ।

आद कला सो लोक गई, कीतम अंस सब जान ॥

सत्यकबीर प्रमारथ बोले । कबीर प्रताप सबे पक्ष खोले ॥

कृष्णको निरंजन शिवके कोपसे बचानेके लिये कबीरका प्रकट होना

कबीरकृष्णगीता ।

७९

जापर दया करहिं सतनामा । सत्यनाम सो कबीर सुखधामा ॥
सत्यकबीरकी जापर दया । सत संतोष दया तहैं छाया ॥
कबीर सुवास फूल तिल संसीरा ॥ सत्यकबीर घृत जग तम हीरा ॥
कबीर अभी विष राय निरंजन । तारहिं कबीर काल शिरभंजन ॥

दोहा—कैसो अधीन अगाध होय, जो गुरु करी कबीर ।

विष्णु व्यास सत कहतहैं, तेहि छूटे भोजलपीर ॥
कबीरके सुमरे पाप नसाई । कबीरके भजे यम निकट न जाई ॥

अजहरवचन ।

अजहर विनवे दोइ कर जोरी । श्रीकृष्ण सुन विनती मोरी ॥
कहु सोहंग कर मूल बखानी । कासो भये सोहंग उत्पानी ॥
निराकार अद्या पितु माता । तिनतो कीन्हा सोहंग घाता ।
मात पिता घाती नहिं होई । गुरु साध घाती नहिं कोई ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण सुन रुद्र वियोगी । तुव समान नहिं जगमा जोगी ॥
सो तुम आद सोहंग न चीन्हा । हम तो आद सतनाम गहि लीन्हा ॥
सत्यनाम जग प्रगट कबीर । स्वासा सोहंग अंस सत धीर ॥
अमर कबीर अमर सतलोक । अंस सोहंगम कबीर निहसोका ॥

शिववचन ।

कहैं शिव जो कबीर करतारा । मम बल जीतहिं तो हम हारा ॥
दोहा—वाठे शिव आकाश लहि, कीन्ह कृष्ण पर धाव ।
विष्णु कबीर पुकारहौं, कबीर प्रगटे तेहि ठांव ॥

८०

कबीरकृष्णगीता ।

भयउ सुगंध महा घन घोरा । भयउ अंजोर भाग चल चोरा ॥
लिंग समेट गदहा होइ भागा । तबहिं विष्णु शिव गोहने लागा ॥
फिर शिव देख कहा बल भयऊ । कबीरके त्रास गदहा होयगयऊ ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर हरि आव सिंहसन । विष्णो झोह हीन भक्ष डासन ॥
प्रेत पिशाच भूत रखवारे । तासो बंजनी कहा हमारे ॥
हमरे साथ भजन सतनामा । भूत पिशाच घोर अघकामा ॥
साधनका जो दुखावे आई । आपन बल करे नाम सुहाई ॥
हमरे नाम सुरत चित गहहू । सकल समयस्तो निर्भय रहहू ॥
प्रथमहिं सिंध मथन तिहुं लरऊ । कबीर प्रताप तहाँ निश्तरऊ ॥
ब्रह्मा शिव देवी कर दूता । कहैं विष्णु भोहि दुखावे बहुता ॥
सत्यकबीर एक तुव प्रतापा । कालहिं जीत भक्त स्थापा ॥

दोहा—कहैं कबीर कृष्ण सुन, हम तोहि सदा सहाय ।

सुमरे नाम जो मेरो, और सतपंथ चलाय ॥

त्रिगुणके पिता निरंजन ऐठा । पुनहिं पाप करावे वैठा ॥
पुण्य पाप नहिं नाम समाना । साधुसेवा गुरु भक्त प्रणामा ॥

दोहा—कहैं कबीर कृष्ण सुन, साधु सरूप है राम ।

विष्णु साधु सरूप गुरु, गुरु सरूप सतनाम ॥

बहुरि शंभु सनकादिक आये । ब्रह्मा अवागन ससुझाये ॥

यहां कबीर कृष्ण सतरूपा । अंतर दीन्ह दर्श नहिं भूपा ॥

एक वार शिव बरस अंगारा । सब अंगारपर रुद्र कपारा ॥

सनकादिका शिवका जिलानेके लिये प्रार्थना करना

कवीरकृष्णगीता ।

८१

जरा जरे बांच लट तीनी । बहुर कवीर भस्म तेहि कोन्ही ॥
तब अज सनकादिक चल भागी । तबहींके तन लूक सो लागी ॥
तब सनकादिक विष्णु पुकारा । विष्णु कहा सुमरहु करतारा ॥
कवीर बस्ते तो बांचहु झारा । सबके मूल कवीर करतारा ॥
सनकादिकमचन ।

कहैं सनकादिक राख कवीरा । ज्वाला छुटा भौ निर्धल शरीरा ॥
तब सनकादिक स्तुति कीन्हा । सत्यकवीर कहा सब चीन्हा ॥
सनकादिक तन तपके पूजा । हीरा विष्णु रुद्र अज गुंजा ॥

दोहा—सत्यकबीरके पगु परे, सनकादिक बिलखाय ।
अब तो बरुसहु चक्र प्रभु, रुद्रहि देहु जिआय ॥
सरजिव कीन्ह कवीर दयाला । चक्षुहीन जपु सुंडके माला ॥
रुद्र आंखके भा रुद्राक्षा । आपन चक्षु आप शिववाक्षा ॥
बहुर चक्षु कवीर कर दीन्हा । आद सिरसापन दैवे लीन्हा ॥
तुम तीनों भई हर सरदारा । रहियो विष्णुके आज्ञाकारा ॥
तबते रुद्र कवीरहिं चीन्हा । रहियो सेवा विष्णु अधीना ॥
छांठ धुरत मत जोग अराधा । भांग धतूरा माहुर साधा ॥
गगन ध्यान मन जोत प्रकाशा । परम जोत दिन मुक निरासा ॥
परमजोत सत्यनाम कवीरा । जोत निरंजन काल अहीरा ॥
सत्यकबीर गुप्त होय गयऊ । सनकादिक हर पूछे लियऊ ॥
कहिये विष्णु कबीरके माहिभा । हम बहु माना कबीरके सीमा ॥
कहैं हरि तुव मानिक होई । सत्यकबीरके यम डर रोई ॥
सुनहु आदके बात गोसाई । जबते हम कवीर लाखि पाई ॥

सनकादि और विष्णुका सम्वाद - वेदादिकी उत्पत्ति

८२

कबीरकृष्णगीता ।

प्रथमहि सतयुग यम मोहि जारो । निराकार यम पिता हमारो ॥
तीनों देव औ कोट तैतीसा । सबकहैं जार भ्रम कर पीसा ॥
जीवहिं कब दीन्ह बहु काला । तहाँ भगट सतपुरुष दयाला ॥
जिन सब जीव सोंप धर्मराई । सो सत्यनाम कबीर सुखदाई ॥
महाभयंकर काल निरंजन । धर्म अजाजिल वंस अंजन ॥
अजाजील धर्मराय लखाये । आप काल करता कहलाये ॥
कहइ रक्षाके भक्षक ताहीं । ध्रुव प्रह्लाद अजहु पछताहीं ॥
भक्ष करे जिव चांपे काला । जार बार करे निपट बेहाला ॥
राम कहे सत कहे नरेशा । सत्यनाम विन कागके भेषा ॥
दोहा-धुनकट कौसे अंस भरी, सप्रथ सत्यकबीर ।
पतिव्रता गंगा गती, वण्ड्य व्यास रघुवीर ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण प्रगटे सतनामा । सत्यकबीर जोगजीत सुखके धामा ॥
हने सीस मम पितुके अनंता । जार भ्रम किय यमहिं तुरंता ॥
सत्यकबीर आजा मैं नाती । कबीर दुलहा हम सबहि बराती ॥
कालहिं जार भ्रम यम साखा । दान कदसा अंस भर राखा ॥
दोहा-धुनकट केंस अंस भरि, बहरे काल बरिआन ॥
जाय स्वर्ग गे लागा, देवतन देख रिसान ॥
सकल देव तेहि यासन धावा । भाग सबे कबीर पहुँ आवा ॥
तत्क्षण सत्यकबीर जोगजीता । कालीहिं भ्रम कीन्ह भये रीता ॥
लक्ष बार तेहि जार निकंदा । पुनि सजीव कीन्ह कहैं मैं बंदा ॥

कवीरकृष्णगीता

८३

कवीरवचन ।

कहे कवीर वंदा तैं काकर । जाकर दास नाम ले ताकर ॥

निरजनवचन ।

कहे काल कवीरको दास । जिन मोहि छिनया सिरज विनासा ॥

कहे कवीर तैं कासो डरसी । काकर भक्त विहुन भक्ष करसी ॥

कहे काल मैं पुरुषके अंसा । पुरुष कवीर एक परसंसा ॥

सत्यकवीर सो हमरे श्रेष्ठा । और न करे छिनक महे नष्टा ॥

बहुर सहस्र बेर तेहि जारा । सिरजेउं बहुरि काल तव हारा ॥

पृच्छिहि जोगजीत सुन काला । कासो डरस कहु यम ब्याला ॥

बोले काल रोप सिर धुनिया । तुम्हरो दास तुव मेरे सिर मणिया ॥

तुव सत्यपुरुष हम तुम्हरे चेरा । तुम्हरे दास मकुट सिर मेरा ॥

जो लेहि सत्यनाम परवाना । तोहे सम ताहि गिनो निरवाणा ॥

दोहा—सत्यकवीरके दास, जो मैं पुन ताके दास ।

जो जिव विलग कवीरसे, यम तेहि घाले फांस ।

धन्य सत्यनाम कवीर अटोटा । जिन महाकाल बांध यम कोटा ॥

यमके कोट कर्म भ्रम धोखा । सत्यकवीर विन पावे नहि मोषा ॥

कवीरवचन ।

कहे कवीर सुन काल निरंजन । अजाजील तुम साकटभंजन ॥

हमहिं गौय कस पाया चोरा । आपहि पुरुष थाप कस भोरा ॥

कालवचन ।

कहे काल मोहि व्यापेउ ऐसा । पुरुषहिं मेट राज करें वैसा ॥

जब मन महे अस चितवन कीन्हा । दस बीस सीस दूट परभीना ॥