कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
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कपिलमुनिका पान परवाना लेना
कबीरकृष्णगीता ।
५९
प्रगट सत्यकबीर देहु दरशन । कहैं कृष्ण मोहि पर होहु प्रशन ॥
कबीर दरश विन कृष्ण अधीरा । प्रगट भये तब सत्यकबीरा ॥
भौ वैकुंठ महा अज्ञानी । पुष्प विमान चढ़ि पहुँचे आनी ॥
भये सुवास वैकुंठ अंजोरा । सत्यकबीर देख चहुँ ओरा ॥
अधर विमान उत्तर नहिँ नीचा । आवत अभी सबनपर सींचा ॥
रतुत २ बोले सब देवा । अष्टांग दंडवत आशिष लेवा ॥
कहैं गरुड हरि होहु सवारी । उठ कबीरके चरणन पारी ॥
कहैं कृष्ण सुन गरुड सुजाना । अपना योग्य बात नहिँ आना ॥
हम सेवक कबीरके आही । स्वामीसे सरवर नहिँ चाही ॥
समर्थ अधरते करिहैं दया । इतना कहत आप प्रभुराया ॥
आय विमान वैकुंठ तेहि ठयऊ । स्तुति सकल देव मुनि कियऊ ॥
कृष्ण व्यास पंडो पगु लगे । चरण पखार सकल मिल पागे ॥
पूछहिँ ज्ञान कपिलमुनि देवा । सत्यकबीर कहु सत्यको भेवा ॥
दोहा—श्रोता वक्ता कौन घर, जब नर आवे नींद ।
शब्द विराजे कौन घर, पूछहिँ कपिल मुनींद ॥
कबीरवचन ।
सिद्ध जाहि दरबार महँ, ब्रह्मरंध्रके तीर ।
श्रोता वक्ता एक शब्द सुतसंग, मुनिसो कहैं कबीर ॥
कपिलमुनिवचन ।
कहैं कपिलमुनि मोकहैं तारो । निरंजन वाघसो मोहि उबारो ॥
हृदय जपिहों तुन्हरो नामा । जेहि दिन यमसों छोरैहु प्राणा ॥
रावणका वृत्तान्त
६०
कबीरकृष्णगीता ।
अब मोहिं करहु निकटक स्वामी । देहु पान प्रभु अंतर्धामी ॥
आरती पान शरण लौलाई । आदि अंत डर देहु छोड़ाई ॥
मोहि उबार सवनको तारो । काल मेट निज हंस उबारो ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर कपिलमुनि सेती । दैकै छोड़ लेय बढनेती ॥
कोइ दिनके आगे होय ऐसा । तुम कपिल मुनि भाखेहु जैसा ॥
अब तुम पान लेहु त्रिण तोरी । लेव कालके सुखसो छोरी ॥
तारो सब जिव सहज सहज ते । सो पशु पंछी भूंग नर जेतै ॥
सहज आरती कर दीन्हो पाना । भयउ मुक्त कपिलमुनि जाना ॥
चरणामृत सीत प्रशादी । लियो कपिलमुनि भक्त अराधी ॥
मगन भये सब संशय नाशी । सत्यकबीर मिले अविनाशी ॥
कहैं कबीर सुनो कपिलमुनि । हमरे नाम सुरत लायो धुनि ॥
हमरे नाम जप काल न पाई । हमरे नाम बिन काल चवाई ॥
जैसे रावण तप नित कीन्हा । दशाशिर काट शिवहिं नित दीन्हा ॥
मगन भये सेवा वश रुद्रा । दियो लंकागढ़ खाही समुद्रा ॥
कीन्हो कैद रावण सब देवा । सबै देव करें रावणकी सेवा ॥
रावणके मन गर्व सुहाती । एक लख पुत्र सवा लख नाती ॥
दश शीश बीस भुजा लख गाजा । कहे रावण मोहि समको राजा ॥
करता गर्व करें सो छाजा । सो करता संतन पगु माजा ॥
कहैं कबीर जिन कियो गर्व छल । सत्य भक्त बिन परे नरकमल ॥
रामचंद्रसो ताहि हताये । सब परवार रिष नगर रिताये ॥
कलि युगके धर्मका वर्णन
कवीरकृष्णगीता ।
६१
बांचे भक्त ठांन विभीषण । हंकारी प्रले भो सब जन ॥
तस छल गर्व निरंजन कीन्ह । जोग जीत तवहीं शिर छीना ॥
ताते भक्त करो मन लाई । सत्यनाम भज सब सुखपाई ॥
रामचंद्रके हृदय कवीरा । कृष्णके शीश गंभीर कवीरा ॥
ताते राम कृष्ण जग जीता । नाना रंग जुगन जुग कीता ॥
सतयुग त्रेता द्वापर माही । थोडे पाप बहु पुण्य कमाही ॥
कलयुग पाप करिहैं बहु लोग । सुख किंचित् ताते बहु रोग ॥
दोहा-ब्राह्मण औ संन्यासी, काजी प्रजा झार ।
सब होइहैं आमिषभष, कोटि माहिये न्यार ॥
कलिके भूप कहैं गउ बंदा । प्रजा दुख दे आप अनंदा ॥
राजा तबलग भोगिहैं राजु । जबलग दान पुण्य व्रत साजु ॥
पुण्यहीन नृपत जड जुडा । पुण्य घटे राजा बिन सुढा ॥
पुण्य कीन्ह बहुते एक साकट । गुरु बिन सकल पुण्यभौकरकट ॥
कलिमहँ पतिव्रता बहु नाहीं । सर्ता यती गुरुभकविरलाअहीं ॥
पतिव्रता विश्वा कलि गारी । विश्वा सो जो बहुत भतारी ॥
दुनियाके पतिव्रता पत भजी । साधु सो जो पतिव्रत सजी ॥
गुरु सोई सो अंतहु मीठा । जन्ममरण गुरु लागहि सीठा ॥
दोहा-पतिव्रता सोइ जानिये, जो अपने पतिरात ।
अपना पति सोइ जानिये, जो कहै अमरपुरवात ॥
अमरदुलहिनअमरवरचाही । जीव अमर सत्पुरुषके व्याही ॥
सत्पुरुष अमर अमरापुर । तहँवा काल जंजाल दुख दुर ॥
६२
कबीरकृष्णगीता ।
सोई पुरुष संत्यनाम कबीरहम । हमरे डर डरें निराकार यम ॥
कहे कबीर हमरे सब कीन्हा । ताकर तोहि बताऊँ चीन्हा ॥
जाकर अंस दरद तेहि होई । गुरु विन राखनहार न कोई ॥
गुरु सोई जो भौते न्यारा । नहिं कुछ जातपात व्योहारा ॥
पूजे विन पूजे सुख माने । पूजा परम भक्त रत जाने ॥
कृष्ण सुनो गुरुमतकी वाता । गुरु संत करता पिलु भाता ॥
सबके गुरु अमरापुरवासी । कलिं प्रगटहिं डासातनकासी ॥
दास कबीर सोई सतनाया । कहें कबीर हमरे सोह कामा ॥
कहें कबीर बडा जो होई । होय गलतान प्रेम बस सोई ॥
पेटे गर्व करे छूंचेपर । गर्वके सीसा वा देखे धर ॥
छूंचे गर्भ बला शिव कीन्हा । संत्यनाम लखि सुरतन दीन्हा ॥
विष्णु सतो गुण कछुलखि पावा । ताते हमसों प्रेम बढावा ॥
विन कबीर जिव कोई न तारे । श्रीकृष्ण यह वचन उचारे ॥
कहें कबीर सब जीव है मोरा । करिहों जीवन बंदीछोरा ॥
सब जिव आहिं हमारीव्याही । विन परचे यमके सुख जाही ॥
पिया तज भये जार जम जारी । जार भजे बूढ़हिं भ्रम भारी ॥
जगकरजीवन नामसो सांचा । सोई नाम विदेह सुख रांचा ॥
सरगुण पांच तीन बस देहा । तासु परे है नाम विदेहा ॥
देह विदेह सकलको मूला । सोई सत्य कबीर हर बोला ॥
व्यास सुखदेव कपिल वचन ।
क हँव्यास सुखदेव कपिलमुनि । पतिव्रता सद्गुरु सेवक धनी ॥
राजा दण्डपालके पुत्रोंकी कथा
कवीरकृष्णगीता ।
६३
कवीरवचन ।
कहैं कवीर सुन विष्णु व्यासा । सुनहुकपिलसुनिपतिव्रतभासा ॥
पुरब कुण्ड होय पतिव्रता । प्ररब कुर होय बहु भरता ॥
बहु भरता बेविचारी नाऊं । पतिव्रता शुभ चार कपाऊं ॥
राजा एक रहो दुगपाला । ताके गृह जन्मे दोह वाला ॥
कीन्ह व्याह दोनोंके ताता । बेविचारीकेमनस्वामीगहिंरता ॥
बेविचारीके स्वामी अनारी । कोहवर कछु न दीन्ह चिन्हारी ॥
सुभिचारी पतिव्रताके स्वामी । मनमो तर्क कीन्ह गुरु त्राणी ॥
पतिव्रताके स्वामी मन कहा । मैं जैहों देसंतर जहां ॥
तिबइ कीन्ह देहु कछु आजू । तब पुन होइहै दंपत काजु ॥
दंपति की पुरुषहिं कहिये । गुरुविनसुचिकबहुँनहिंलहिये ।
गुरु सोई जो अंतहु भीठा । जन्ममरणगुरु विननहिं छूटा ॥
कहैं कुंभर सुन त्रिय पतिव्रता । चलि हैं दिसंतर तुम्हरे भरता ॥
अपने हांथ खवावहु मोही । भोजन चीन्ह देऊं मैं तोही ॥
मोर नाम ले वहू नृप अइहैं । हमार नाम ले तोहि खुले हैं ॥
दोहा--ताते कछु प्रशादके, मोकहैं आन कराव ।
जो आवे सो पुनि तेही, पूछिहौ भोजन प्रभाव ॥
सुनतहिं दुलहिन विकल भई मन । स्वामीके पग गिर करुणाकर ॥
बहुरि जोर युग कर युग रोई । तुम विन मोहिरक्षक नहिं कोई ॥
मोहि तजि पिया कितहु जनि जाहू । तुम विन मोर करे को निबाहू
मात पित बंधु परिजन जेते । पिय विन करकटदुर्जन भये तेते ॥
६४
कबीरकृष्णगीता।
मोहि त्रियहि गाडेहि चाहे डारी । केहि कारण पिय दिसंतर सारी ॥
व्याह करन चाहे सब कोई । नारि निवाह करे कोई कोई ॥
कहैं कुंअर सुभचार वैविचारी । सुनहु सुरत धर सीख हमारी ॥
कच्चा कली बन मधुकर योगू । तबलग मधुकर चिंताहि वियोगू ॥
हमरी तुम्हरी सुरत एक जानो । पिय गुरु वचन हृदयपर आनो ॥
नर होथ नारीके रँग राता । तिनको कोई न पूछे वाता ॥
नार सोइ जो कान न छोडे । मर्द सोइ जो एकोन न छोडे ॥
और काज हमरे कछु नाहीं । गुरु खोजन दिसंतर जाहीं ॥
गुरु विन काज कबहुँ नहिं होई । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर सम कोई ॥
करता आप जो तन धर आवे । तो गुरु विन नहिं जग यस पावे ॥
ना जग यश ना यमते छूटे । गुरु विन निराकार यम लूटे ॥
गुरु सोई जो निरंजन मारा । सो गुरु भौजल तारनहारा ॥
अमरलोक ले जिव पहुँचावे । त्रिगुण त्यागले चौथे मिलावे ॥
सोई गुरु जो अंतहू मीठा । गुरुते जन्म मरण सब छूटा ॥
ताते अब चित धीरज धरहू । मानहु वचन तुमहु गुरु करहू ॥
यह जीव है कहे सुष घरकैरा । कहे वेद सतलोक जिवढैरा ॥
सत्यलोकते सब जिव आया । निरंजनके डहन समावा ॥
निरंजनसो अधिक जो होई । ताके सुमरण बांचे लोई ॥
जाके ढर ढरे काल निरंजन । परम जोत सो काल शिर भंजन ॥
करुणा मैं कहाय जग प्रगटे । तिनके त्रास निरंजन हटे ॥
सोई अचिंत सत सुकृत सदुरु । सोई मुनींद्र त्रेता शुभ पग धरू ॥
कबीरकृष्णगीता ।
६५
दोहा—सोइ समरथ सत्यनामहै, तेहि प्रथम नाम कबीर ।
कलिके जिव तारन कारण, प्रगटहिं दास कबीर ॥
दास कबीर कलिमहैं कहाई । सत्यपुरुष जग प्रगटहिं आई ॥
तब यम सो छूटा हम भाई । जो कबीरके शरण समाई ॥
सुन पतवरता स्वामी कहई । गुरु विन मिथ्या सब जग अहई ॥
यात पिता सुत संपत्त दारा । स्वामी तन धन जोवन छारा ॥
जीवके स्वामी सांचा सोई । सो कबीर सदुरु दुख खोई ॥
हमहू लेव कबीर पंथ सीखी । तुमहू लेव कबीर हिय लीखी ॥
पतिव्रतावचन ।
कह पतिव्रता सुनो प्रभु स्वामी । कतहुँ स्त्री कहे पियसे दुरवानी ॥
स्त्रीके गुरु पुरुष जग कहई । पिया प्रताप निरभैं निरवहई ॥
पतिव्रता गुरु स्वामी सिखावा । और सबन गुरु भक्त हदावा ॥
कुंभर वचन ।
कहैं कुंभर हम तनके स्वामी । तुम अरधंगी व्याही वार्थी ॥
जीवके स्वामी सत्यकबीरा । तास शरण जिव व्यापे न पीरा ॥
करुणा मैं कबीरकी कला । कबीरके भक्त आद जे माला ॥
जो कबीर कलियुग ना प्रगटे । चले ना भक्त काल न हटे ॥
काल दोहाई कबीरके माने । और काहु यम नाहिं गुदाने ॥
बाले हरिश्चंद्र मोरध्वज राजा । जिनके सदा धर्म वरत साजा ॥
पांचो पंडव नरक गक्षो चाको । दानी करण महा अति बांको ॥
कहैलग कहौ तिहुपुर धर्मधारी । छलके सबहिं निरंजन भारी ॥
६६
कबीररुप्णगीता ।
जो कोइ शरण कबीरके लाग। ताकर दुख संकट सब भागा ॥
जिमि जग पतिव्रता शुभचारी । आदि पतिव्रता सद्गुरु व्रतधारी ॥
दोहा-सत्यकबीर विना जीव सब, कतहुँ संच न पाय ।
कहैं स्वामी सुन गुरुमुखी, पिय सत्यकबीर लौलाय ॥
स्वाधीके सिखापन ठियमहैं गुना। सुधावंत पिये लिखा दुख दूना ॥
पिया पगु टेक उठी श्रह ताका । रंगमहल मिल उरदक फांका ॥
जेहरकेर चुलह तिन कीन्हा । प्राणदानरूप घृत दीन्हा ॥
दीपक अग्नि वस्तर चूलह वारी । विनवर थार राख दल हारी ॥
ले स्वाधीके सन्मुख ठाडी । सलिता हगते वार अति बाडी ॥
“आज्ञा पाय धरेउ पिय आगे। बराबर दुइ भाग किहु कुंअर सुभागे ॥
एक आप लिय एक त्रिय दीन्हा। अपेण कर पुन भोजन कीन्हा ॥
दे खरचा पुन बीरा दीन्हा । सुख जूठन कुल्ला तब कीन्हा ॥
भये संतुष्ट जूठन देव दासी । हरिंत लेहु जो मिलि अविनाशी ॥
चरणोदक पुन प्रथमहिं लीन्हा । महाप्रसाद तब भोजन कीन्हा ॥
सुखसागर पिय दरश सुजानी । पिय विराहिन पिय दरश लुभानी ॥
लौंग जायफल पान मिलाई । बीरा रच देइ पियाहिं खवाई ॥
कहा कुंअर अब आज्ञा देहू । हम गवने तुव प्रतिव्रत लेहू ॥
यह सुन कुहकी मार धन रोई । कुहक सुनत धाय सब कोई ॥
मात पिता कह कुंअर नेवेली । गरे हार कर कुंअर चवेली ॥
रोई आन दुख बूझ सपाना । कहैं कुंअर चूप बोलिय आना ॥
हम कह परि ओर कछ धंधा । तुम सबके मन पापके संधा ॥
कुंअर सो बुध जान सब बूझा । कहा बुझाय तबे सब सूझा ॥
कवीरकृष्णगीता ।
६७
दोहा-ठांव २ सब सैना कहु, कुँअर सोइ अलसाय ।
पहिला भिन्न सार अगम पंथ, कुँअर धरे उठपांय ॥
निकसा कुँअर सत्तगुरु भापी । गुरु कर फिर आयो अस भापी ॥
निसरा कुँअर दिसंतर भारी । कुँअर जाग एक सर सेज पारी ॥
उठि अकुलाय अंगना भइ ठाई ॥ पियकी प्रीति अंतर्गत बाडी ॥
माय बाप कैंहें डांक जगावा । मम अभाग पिय तरिथ सिधावा ॥
रोर करे दुलहिन पिय लागी । पियके बोल हिये उठ वृह आगी
सये विकल होय रोवन लागे । कहैं नृपत कस रोवहु अभागे ॥
पठवहु मानुष पर आती । कुँअर होय पितु बंधु जमाती ॥
धाय बहुत खोज नहि पाये । नृपत समोव कुँअर समुझाये ॥
पतिवरताके स्वामी पूरा । सर्वस माग चेताय तेहि सुरा ॥
बेविचारी कर स्वामी कांचा । चीन्ह कछू नहि बोलिस वांचा ॥
वहां दिसंतर गयो कौने काजा । बेविचारी लिहे गौ दुतिय राजा ॥
बारह वर्ष बीत जब पूरा । आन कुँअर आवत वाजे तूरा ॥
कियो नृपत सन्मान बहूता । कस तन ठहरे ताके पूता ॥
पहिले पहर तेहि कुँअर बुलावा । पतिव्रता पट अंतर दियावा ॥
दोहा-पतिवरतासुं दुहि कहा, पूछ कुँअरकी बात ।
कौन वस्तु तुम खावो, पतिव्रता संग रात ॥
भगली कुँअर कहे भष भाता । बराबरी झकभास सुहाता ॥
कहे पतिव्रता यह नहि मम स्वामी । विदाई नहि कहैं लसकर जाही ॥
यही भांति भूप बहु भगली । पतिवरतहि ठग सके न नकली ॥
६८
कबीररुग्णगीता ।
भूप अनेक कांक्ष बहु आये । हांथ न लगी जाहि पछताये ॥
नृपत पद पतिव्रता राती । पिय आज्ञा किया चहे पिय माती
गुरु करेको अंकुर कीन्हा । पुन पिये प्रति अबोझा दीन्हा ॥
जब पिय आवैं देखों आंखी । तब गुरु करौं कबीर सत भाषी ॥
गुरु प्रतीत तुरंत मिल स्वामी । धन्य सहृदु गुरु अंतर्थाभी ॥
बाजत गाजत आव बराता । सुनके कोथ भयउं तब ताता ॥
तब पुत्री कहैं गारी दीन्हा । धन सर्वस नाहक खर्च कीन्हा ॥
सुना कुंभरि पिय करे अवाई । अधिक गीत कब पिय पद पाई ॥
पिता पहाँ दुलहिन चलि गयऊ । पूछ पिता पुत्री कस आयऊ ॥
कहे पतिव्रता संभाषण करहू । नहिं तो द्रव्य मम गहना धरहू ॥
सुन पितइ पठय नौवारी । किहुं सनमाने जेता धारी ॥
बहुरि दीप बार कुंभरि बुलाये । माला तिलक झलक झलकाये ॥
सतकबीर करुणा वै बोले । तब पतिव्रतते श्रवण खोले ॥
पूछे सुंदरी कहु नृपवारा । कोहवर जैवे कौन प्रकारा ॥
परदा सात चदर देहु अंतर । निज पिया नाम जपहिं उरमंदर ॥
कहैं कुंभर जानहिं अरधंगा । दुइ बरा पायऊं एके संग ॥
यह सुन पतिव्रता पगु लागी । परदा सात भरसपट त्यागी ॥
परे चरण पिय छुये न ताहीं । पूछे विष्णव भये कि नाहीं ॥
कहे पतिव्रता यह मन आज । जिहि पियसों पग हो तेहि पाऊ ॥
कहे कुंभर साकट जेहि नारी । तेहि संग बूडे पुरुष अनारी ॥
यह कहि कुंभर चला अपना दल । साकट हांथ न उचित लेन जल ॥
कबीरकृष्णगीता ।
६९
पीछे लाग चली पतिव्रता । बहुर उचर दीन्हा तेहि भरता ॥
हम अब जात आह बरिआता । गुरु करव तो होन तुव साथा ॥
कहे कन्या गुरुदेव बोलाई । हमहू शरण सत्यनाभके जाई ॥
कहे कुंभर गुरुबंधु संग मोरे । तुरत पान लेहु तिनका तोरे ॥
भये जो मंगल अधिक उछाहा । तन गउवा मन जीवके व्याहा ॥
पतिव्रता कहे पियपद लागी । चल मंदिर मोहि करहु सुभागी ॥
तबलग मोर छुवा जिन खाहू । जो लगि मोहि गुरु शरण दिवाहू ॥
सुनत वचन पतिव्रता केरी । पाऊं परे कुँअर पगु वारी ॥
पतिव्रता गृह चल भौ स्वाभी । हर्ष चले पाछे पिय बानी ॥
मंदिर जाय पलंग सुभ डासा । फूल विछौना अधिक सुवासा ॥
पलंग बैठ पिय वचन उचारा । परआत्म कह दीन्ह अहारा ॥
दोहा—राजा कीन्ह सन्मान सब पुन, कीन्ह आरती साज ।
आरती होत सो मंगल, अनवन बाजन बाज ॥
सिंहासन बैठे कडिहारा । नरिअर मोर हंस निस्तारा ॥
तिनका जमते वेग तोडावा । दे प्रवाना जीव सुकावा ॥
पुन दे तिलक चरणोदक दीन्हा । कागते हंस रूप कर लीन्हा ॥
चरण टेके कीन दंडवत साता । सट्टुर दियो सीस तब हांथा ॥
दीन्ह प्रसाद नारियर गरी । बहुर प्रसाद नवहु देहु फेरी ॥
पुन सट्टुर तेहि सिखापन दीन्हा । सदा रहहु पिय चरण अधीना ॥
पतिव्रता सुन शब्द सिखापन । गुत प्रगट एक ब्रह्म पुरातन ॥
सत्यनामप्रति पिय गुण जानी । पतिव्रता पिय पद लपटानी ॥
कथाका सार दृष्टान्तका आध्यात्मिक अर्थ व निर्गुण भक्ति
७०
कबीरकृष्णगीता ।
चरण टेक पियसो कह बाला । हमहु देहु पिय तुलसीमाला ॥
दीनदयाल दिय भेष गुरुसेती । कहा करहु प्रसाद सुनेती ॥
पतिव्रता प्रसाद बनावा । सतसुछत कहैं भोग लगावा ॥
सद्गुरु कहैं पकवान पवाई । राजा निज कर बाव ढोलाई ॥
पतिव्रता पुनि स्वामि जिमावा । नाना व्यंजन थार भरावा ॥
हर्ष चूप प्रसाद पुन कीन्हा । सत्यनाम सुखसागर चीन्हा ॥
अचवन कर कुंअर असनादा । गुरुमुख किनका लेहु प्रसादा ॥
सद्गुरु कहैं सुनो पतिवरता । गुरु नारायण सम पिय भरता ॥
पतिव्रता पिय जूठ अहारा । औ चरणोदक सम वसु धारा ॥
दोहा—सब सुख पुर रहा तेहि, जेह घर पिय तन कंथ ।
वेनिचारी नष्ट गई, तेहिना मिले अध अंत ॥
बालापन पिय व्याहको, पिय जो गये विदेश ।
पतिव्रता पिय पाइया, विश्वा नरक प्रवेश ॥
कबीरखचन ।
कहैं कबीर यह जीवके लेखा । ज्ञानी होय सो करे विवेका ॥
तैसे जीव कंहैं जार झुलावा । काल निरंजन जार लखावा ॥
सत्यनाम सब जीवके पीऊ । निज पिय ताहि न चीन्हे जीऊ ॥
कृष्णव्यासवचन ।
विष्णु व्यास विनैवे कर जोरी । सत्यकबीर अगम मत तोरी ॥
सबके मूल तुमहि सतनामा । सब जीवनके तुम सुखधामा ॥
कहैं कृष्ण मैं कबीर बल गाजौ । सद्गुरु चरण प्रताप विराजौ ॥
अर्जुन और कबीर संवाद
कवीरकृष्णगीता
( ७१ )
अब ऐसी दाय। प्रभु करहू । सब दिन तुम मम हृदय संचरहू ॥
जो तुम मम हिय करहु प्रकाशा। तब छूटे मम यमके त्रासा ॥
तुम विन को जिव राखन हारा । निरंजन जीवाहिं करे अहारा ॥
कहा करौ यमके डर दरपो। काल निरंजनके डर कपो ॥
अब मोहिं देहु सुकके पाना । यम त्रण ताडे करहु निरवाना ॥
हम सब तुम्हरे जाप पोषे । तुम जागे औ सब जग सोषे ॥
कवीरवचन ।
कहे कबीर सुन कृष्ण सुरारी । निर्गुण भक्त करे तेहि तारी ॥
निर्गुण आद अजर सतनामा । सद्गुरु सत्यनाम सुखधामा ॥
अर्जुनवचन ।
कहे अर्जुन सुन श्रीभगवाना । सत्यकबीर कर्ता निरवाना ॥
जीव कबीर साहेबके ठाहर । तेहि यम खाय जो कबीरसे ठाहर
कृष्ण वचन ।
कहे कृष्ण अर्जुन सुन वाणी । सतपद गहो कबहुं नहिं हानी ॥
सबसों कहौ कबीर है पहली । कबीरसो लगु सो रंग गहिली ॥
अर्जुनवचन ।
कहे अर्जुन हम हैं अज्ञानी । जेहि अब कर्म सोई अज्ञानी ॥
सोइ अज्ञानी शुभ पंथ न आनी। भ्रमत फिरे सदा अज्ञानी ॥
श्रीयदुपति मोहि दीन्ह चिन्हाई । तब हम कबीर पुरुष लख पाई ॥
दोहा--अर्जुन भीमाहि औ गले, भये युधिष्ठिर ठाठ।
सबदेवन कुल औ कृष्ण मिल, विनती कराहिं आति गाठ ॥
७२
कबीरकृष्णगीता ।
युधिष्ठिरकृष्णवचन ।
कहैं युधिष्ठिर कृष्ण समेता । सत्यकबीर तुम कृपा निकेता ॥
अब मोहिं सब कहैं तारहु स्वामी । सत्यपुरुष तुम अंतर्धामी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन सांचा सोई । मोहिं विन जीव तरे नहिं कोई ॥
जाकर अंस ताहि दुख व्यापे । आनके अंस आन पहुँचौपे ॥
कहैं कबीर जीव अंसहि मोरा । छलके जार निरंजन चारा ॥
जो सुनरे सत्यनाम गोसाईं । ताके निकट काल नहिं जाई ॥
युधिष्ठिरवचन ।
कहैं युधिष्ठिर दोह कर जोरी । सुक्त पान दये जिव बंदीछोरी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर निज अंस प्रगट कर । सोईं अंस विष्णु अंसमे लपथर ॥
आद अंत औ निर्गुण सरगुण । पांच पचीस औ चौदह त्रिगुण ॥
अजर अमर सो सबके मूला । जासु अंस सोहंग अंकूला ॥
केदल ब्रह्म सोहंगम जीऊ । रमिता सोहंग पै तन धीऊ ॥
क्षीर मथे सो करे सुवास । सो सुवास पर आत्म पास ॥
परआत्म आत्मके करता । सो सब मूल सकलके भरता ॥
सो सत्यनाम अमरपुर माहीं । सब जिव सत्यनामके आहीं ॥
युधिष्ठिरवचन
कहैं युधिष्ठिर तुम सत्यनामा । सत्यकबीर संतन सुखधामा ॥
देहु परवाना अधम उधारो । पांचों पंडव कहैं तुम तारो ॥
युधिष्ठिरका आरती चौका करना
कवीरकृष्णगीता ।
७३
कवीरवचन ।
दोहा-कहैं कबीर सुन धर्मसुत, आनहु आरती साज ।
देव प्रवाना सुत्तको, वेग करो जिवकाज ॥
जाहु कुबेर पहैं तुम राजा । आनहु साज करो तुम काजा ॥
जाय कहा नृपपांह कुबेर । आरती साज कबीरहि हेर ॥
छाय कुबेर सकल विध नामा । नृप साजले आय तुलाना ॥
आये समर्थ चरण मनावा । साहेव कीन्ह सर्वाहि सत भावा ॥
कृष्ण कुबेर सो चौका सँवारा । जोत प्रकाश सिंहासन सारा ॥
शब्द उचार अवाहद गाजा । ताल मृदंग झालरी बाजा ॥
सत्यकबीर तब नरिअर मोरा । पांचो पंडवके बंद छोरा ॥
मगन भये प्रवाना पाये । आद सुरत सतलोक पठाये ॥
क्रीतम सुरत संसारे राखा । पुष्ट पुन घर गवन सो भाषा ॥
कहैं कबीर प्रसाद वतावहु । समहछि पतिव्रतक मनावहु ॥
रजगुण तमगुण भोजन तजहूँ । सद्गुरु भोग नाम सत भजहूँ ॥
सतकबीर सिखवन दे सवहूँ । सुमत विना कोई तरे न कबहूँ ॥
प्रेतभक्ष तज देव भक्ष लीजे । सद्गुरुके चरण चित दीजे ॥
सद्गुरु भक्त साधुकी सेवा । सकल आस तज देवी देवा ॥
जाहि भजा चाहे जो कोई । तेहि पंथ गुरु हर लखे सोई ॥
भगवानोवचन ।
कहैं युधिष्ठिर सो भगवाना । तुम्हरी घरी शुभ आय तुलाना ॥
सोई संत जो सद्गुरु सेवा । सद्गुरु सब देवनके देवा ॥
एकादश कोट देव विष्णु अंगी । हरसमेत भये सद्गुरु संगी ॥
कबीर साहबका युधिष्ठिरको परवाना देकर लोकको जाना
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कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-आगे पिछे सब मिल, लियो मुक्तको पान ।
ठीका पुरे सुखघर गये, सत्यकबीर व्रत ठान ॥
सत्यकबीरके सेवक पतिव्रता । सतकबीर सब अघके हर्ता ॥
कोटि २ जिन किये अपराधा । गौ द्विज हत्या अगम अगाधा ॥
केहु प्रकारकी हत्या होई । कोट तीर्थ किये छूटे न सोई ॥
जो जिव सद्गुरु शरण सभावे । सतकबीर सुमरे सच पावे ॥
जन्म २ अघजार नसावे । यम त्रिण तोड प्रवाना पावे ॥
धन्य सराहिये ताकर भागा । जो सतनामके शरणहि लागा ॥
कहे कृष्ण सतनाम कबीरा । भेटे जीवको भौ दुख पीरा ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर हम लोकहिं जाहीं । जो सुमरे मोहिं हम तेहि पाहीं ॥
यह कह सद्गुरु गुप्तमें तहां । विष्णु व्याप्त सब स्तुति माहा ॥
सत्यनाम कहि सीस नवाई । सत्यनाम सुमरे सच पाई ॥
सत्य गहे बांचे सब कोई । सत्यनाम जप सब सुख होई ॥
सत्यनाम स्मरण सुखमूला । सत्यनाम प्रति उझे न तूला ॥
प्रतिस्वासा सुमरे सतनामा । विष्णु व्याप्त सतनाम विश्रामा ॥
महाविष्णु सतनाम अधारा । सत्यनाम ते आय निराकारा ॥
सत्यनाम सो सतपुरवासी । सतपुर अमरलोक सुखरासी ॥
विद्यावेद पढ़हिं नर लोई । सत्य अमर कहैं लखे न सोई ॥
सत्य मुक्त जाके घट पूरा । सत्यनाम तेहि रहत हजुरा ॥
सबके घट महैं अमर स्वासा । सो सतनामको अंस सुवासा ॥
निरंजन और त्रिदेवका सम्वाद - शिवादिदेवका कोप करना
कबीरकृष्णगीता ।
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जीव सोहंग रमता थिर करता। भंरा खाली कर खाली भरता ॥
सत्यनाम सब मँहैं सोइ न्यारा । सोइ परम गुरु भो कंडहारा ॥
सत्यनाम सड़ुरु कहाये । पुन गुरु तात मात बंधु भाये ॥
दोहा--सकल समाये रहै सो, प्रगट होइहिं जहैं सांच ॥
विष्णु व्यास सुखदेव कहैं, सांच बिना जिव कांच ॥
सांच सोई जो विनशे नाही । जठर योनि नहिं आवे जाई ॥
जब यम जीव कहैं सांसत कीन्हा । जीव पुकारे सड़ुर लीन्हा ॥
कस जिव अघ पतसे बहु जाभी । अमरलोक अम्बरपति स्वामी ॥
कहि जो कियऊं ताहुपर जाऐ । सत्यनाम सो जरत उबारे ॥
तत्क्षण प्रगट भये सतनामा । कालहिं मार बिंधसेउ धामा ॥
स्वास निकसतन सुन्य कहाया। काल भेट सुन्यकार बसाया ॥
दाना भीर राखेउ यहि लागी । बिना पयोद दाम न पागी ॥
सत्यनाम सोइ सत्यकबीर । जोगजीत है काल बधीर ॥
दोहा--बंदीछोर कबीर प्रभु, राम अछाह कबीर ।
प्रथम विष्णु मिल धायके, कबीर राज दिये थीर ॥
ब्रह्मा पत्री कर ढुम साली । सत्यकबीर कुल विष्णु अमाली ॥
शब्दवेदके मते जो चलि है । ताके त्रास काल महि खिलि है ॥
वेद पुराण कुराणकी बात । विरला सैल निरख मग जाता ॥
गुरु साधु सो होय अधीना । सेवा सबके स्वामी चित दीन्हा ॥
सबन मथनके देख परेखा । स्वामी सत्यकबीर अलेखा ॥
विष्णु व्यास अज कृष्णउचारा । सत्यकबीर जिव तारन हारा ॥
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कबीरकृष्णगीता ।
दोहा—सबके मटुक कबीर गुरु, बिन कबीरकुछ नाहिं ।
सुरत स्वास सुख संतत, सो कबीरके छाहिं ॥
अविचल स्वाधी परख कबीरा । महाकालको मस्तक चीरा ॥
कहैं कृष्ण कबीरसे वैना । निस दिन दरश देहु भर नैना ॥
गुप्त प्रगट हरदम देहु दर्शन । सवहि पदरस प्राप्त गुरु प्रशन ॥
दरश परस मम हिय रहु भिनी । कृष्ण कबीर कहैं बिनती कीन्ही ॥
आये कबीर कृष्णके सीसा । ताप गई शीतल हर दीसा ॥
जबलग रहे कबीर डर माथा । तबलग कृष्ण सो रहे सनाथा ॥
जबहिं कबीर गुप्त होय जाहीं । तब गोपाल पथ पितु जे माहीं ॥
पितु जननी धर्मराय भवानी । ताके छाया अनित चलानी ॥
चलहिं अपंथ जो विष्णु सयाना । तब पितु काल बांध सिरहाना ॥
वार अनेक विष्णुहिं यासे काला । तबहिं विष्णु औ सब बेहाला ॥
तब कबीरके शरण समाये । कबीर शरण जग त्रास नसाये ॥
नगद पंथ निरगुण कबीरा । सरगुण जानहु भर्म खोगीरा ॥
सरगुण तीरथ व्रत भ्रम पूजा । पुन सरगुण काया यह दूजा ॥
निर्गुण एक कबीर अधिनाशी । ब्रह्म बोलता सब घट वासी ॥
बहु निर्गुण वरणो अब नीरा । दुस्वित निरवान सकल शरीरा ॥
नीर कबीरको अंस बखाना । शीतल नीरसो साधस ज्ञाना ॥
नीर बिना नहिं जीवे प्राणी । नीर सकल शरीर निसानी ॥
अन्ननेत औ तरवर चीना । कंद मूल फल दल बिनहीना ॥
दल पानी करुनाम बखाना । दल देव भाषा जल नर जाना ॥
कवीरकृष्णगीता ।
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पानी नीर उदक अंभु वारी । जल कह जले नीर संसारी ॥
दोहा-नीर कवीरहिं मिल गया, अंतर रहा न रेख ।
तीनों मिल एके भया, नीर कवीर अलेख ॥
जाके होय सत्तके जोरा । सो गुरु करे कवीर वंदीछोरा ॥
जो पुन दया सत्तके हीना । तिन भज त्रिगुण देवी पंथ लीन्हा
त्रिगुण मता देवी सरगुण संसारी ॥ निर्गुण सत्यकवीर जिवतारी ॥
नीर बिना नहिं पण पछली । महि बिना कोइ बैठे न चली ॥
सो महि मीन रूप स्थापा । मीन भषहिं बड लागहि पापा ॥
मीन एक गौ द्विज शत कोटी । तिल भर मीन नरकके कोटी ॥
महादेववचन ।
कोध महादेव वचन उचारा । विनामीन नहिं मातु अहारा ॥
अष्टंगविवचन ।
उठ अष्टंगी सबहिं बुझावा । कक्षप सूकर महादेव खावा ॥
मैं तो आद निरंजन बामी । हमरी प्रत को श्रवण प्राणी ॥
एक दिन जो कोइ तिलभर खाई । पुरुषा सहित सो नरक सिधाई ॥
हम तो विष्णु ब्रह्मा शिव माता । एक दिन मम कामन राता ॥
ब्रह्माहु मम वचन नसाये । तुमहु शिव नीके बरताये ॥
विष्णु भागि गो साधुन संग । खाहिं मीन हम तेहि नहिं संग ॥
हमहू मीन खाय अघ बूढे । मांस खाय अघ सुडे बूढे ॥
जल शिव सभा माहिं हम हारा । तुरत भरम होहु आप हमारा ॥
भयउ भरम शिव बहुरि जियाय ॥ सर्व जीवके तेहि मीन खवाया ॥
७८
कबीरकृष्णगीता ।
मीन खवाय ज्ञान हर लीन्हा । प्रेतक ईस महादेव कीन्हा ॥
ब्रह्मा कहा जननी परखावा । औरहिं ब्रह्म ज्ञान बतलावा ॥
ब्रह्माहि बधुपुन तुरत जिआवा । मीन मांस भर सुरा खवावा ॥
ब्रह्मा कहैं तब कीन्हेट प्रेता । द्विज तन जगत भेष धर केता ॥
प्रेत अंस औ नौ गृह अंसा । भाषि हैं सखा तुव मांस परसंसा ॥
विष्णु जननी कहैं सीस नवावा । मैं बालक माते बरतावा ॥
भई विष्णु पर मात दयाला । कबीरके हांथ देवाइव माला ॥
कहे अघा कबीरसे रोई । विष्णुहिं चांप सके नहिं कोई ॥
दोहा—ब्रह्मा शिव एक मत भये, विष्णुहिं करिहैं उदास ।
तोहि शरण कबीर हरि, राखि लेहु यहि पास ॥
तुमका अघा सौपहु आज्ञ । हरिकर कीन्ह प्रथम हम काज् ॥
विष्णु साधुकी संगत कीन्हा । ताते हम विष्णुहिं चित दीन्हा ॥
साधु सनेह औ गुरुके सनेही । कबहुँ दोष नहिं आवे तेही ॥
तुमहू अघा सेवहु साधू । गुरुकर मिटे काल उपाधू ॥
सहस्रसुखी सिखवन मान हमारी । हमरी सुरत ध्यान चित धारी ॥
एक काल निरंजन राई । बांचहि हमरे हुकुम चलाई ॥
अष्टंगीवचन ।
कहे अष्टंगी हम तुव चरी । तुम्हरे शरण जीव सब करी ॥
दोहा—सुरतके चौका सर्वारके, दीन्ह अष्टंगी पान ।
आद कला सो लोक गई, कीतम अंस सब जान ॥
सत्यकबीर प्रमारथ बोले । कबीर प्रताप सबे पक्ष खोले ॥