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सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

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पृष्ठ 19

कबीरकृष्णगीत ।

५

और सबे हैं जमके चेरा । भजें कबीर तेहि सतपुर डेरा ॥
कहैं कृष्ण जानहु सो करहु । कबीर बालकके पाछन परहु ॥
कृष्णबचन लख सबहिं उदासा । कहैं अजहूँ चल देखहु दासा ॥
ब्रह्मा रुद्र नारद सब देवा । रज तम संग जीव सबे चलेवा ॥
इंद्र आद नारद सो भाषी । चलो जाय देखहुँ मैं आंखी ॥
सबे अधर धर प्रगटे गोपा । नारद धार नृप गये कोपा ॥
सात दिवस निशिके हम भूखे । इच्छाभोजन विन हम खूखे ॥
जाय सेवटिया नृप सो कहई । क्षुधावंत द्वारे नृप अहई ॥
राजा कहा पूछहु तुम जाई । इच्छा भोजन कौन गोसाई ॥
जाय सेवटिया ऋषिसों पूछा । भोजन कौन आय तुव इच्छा ॥
तव नारद कहै तोहि कह कहहीं । कहौ ताहि राजा जो अहई ॥
जाय सेवटिया नृपसो भाषी । द्विज नृपसो कहवे चित राखी ॥
राजा आय कीन्ह परणामा । कछु ऋषि कहु इच्छा भच्छकामा
नारद कहैं इच्छा चित मोरा । सर्व मांस खाऊं भर थोरा ॥
सर्व मांस सुन राजा डरेऊ । सर्व जीव हतको डर भरेऊ ॥
नृप ऋषिकहैं बैठक दीन्हा । आप गमन भवन निज कीन्हा ॥
मंदिर जाय ध्यान गुरु कीन्हा । तुरत कबीर दरश नृप दीन्हा ॥
राजा चरण पखार सो पान कराये । नारद सुनिके कथा सुनाये ॥
सर्व मांस चाहे अन्याई । सट्टरु आप दया डर लाई ॥

कबीर वचन ।

कहैं कबीर सोच कछु नाहीं । देहु मीन ले तिनके पाहीं ॥
सर्व मांस है मीनशरीरा । गउ सूकर नर सकल सधीरा ॥