कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
निरंजन और विष्णुका संवाद व चौरासीका वर्णन
कवीरकृष्णगीता ।
१५
व्यासदेववचन ।
कहैं व्यास अस साहेब नीका । जमके आस मिटे जो जिवका ॥
ठाकुरसो विनवें सुनि व्यासा । कौन कवीर आवे तुव पास ॥
जब मैं सुमरों दीन दशाला । सट्टरु कवीर मगटे क्पाळा ॥
कहैं व्यास तुम ठाकुर मोरा । बेग मिठाव कवीर बंदीछोरा ॥
सुखदेवके मन उपजी इच्छा । कवीरकेर मैं लेऊं दीक्षा ॥
दान पुण्य बहु तीरथ जोगा । सचनाम विन भये सब रोगा ॥
माया मोह कछु काम न आवे । सट्टरु विना नर नरकसिंघावे ॥
धन सट्टरु सतनाम कबीरा । जम जालियको भेटे पीरा ॥
विष्णु वचन ।
कहा विष्णु महाविष्णु सो जाई । महाविष्णु निरंजन राई ॥
सुखदेव व्यास औ देव अनेका । कबीरहिं सट्टरु किये चहे ठेका ॥
निरंजन वचन ।
कहैं निरंजन गुताहिं राखो । कहु काहूके आगे न भाषो ॥
कबीर जोगजीत औतारा । तिन तो सीस हमारा मारा ॥
दोहा--मैं अछुंगी आसेऊं, जोग हने मम शीश ।
रूप रेख विन भयउं तब, नाम मोर जगदीश ॥
जेहिते कूर्म बिने शिर नाई । कोट विनति कै सीस दिबाई ॥
मोर सीस देहौ सत्त कबीरा । तबते डर भरहरे शरीरा ॥
जो कोइ सत्त कबीर पथ चहई । तेहिमें आपन माथ निरबहई ॥
सट्टरु कबीरकेर यह शीती । शरण गहे तेहि नहिं बेधीती ॥
१६
कबीरकृष्णगीता ।
कोट जनमके पापी होई । भमे तीर्थ अवमल चहे धोई ॥
पाप न छूटे कोट उपाई । कछुहरि शरण पाप दुर जाई ॥
अवनाथक सतनाम कबीरा । जाके निहचल अजर शरीरा ॥
कबीर शरण जिव पहुँचा चाहे । पौत चला कछु रहे सो राहे ॥
और जहांलग जीव जहाना । सब कबीरके मैं गुरु बखाना ॥
जैसे गऊ गोरणिया राखे । पौसै गऊ कबहुँ रस चाखे ॥
गोरस रास गऊ रवाणीके । सांझ सकारे छाँछ महीके ॥
जैसे मैं कबीरके चेरा । कबीर पुरुष मम पिता सुखेरा ॥
मैं कपूत सब बंधु सयाना । वे सब निकट मैं दूर समाना ॥
मैं अपराधी दरश बिहूना । पुरुष दरश विन मंदिर सूना ॥
जहँ मैं रहों सुन्य तेहि नाऊ । तुम विनपुरष सुन्य सब ठाऊँ ॥
धन्य जीव जो सद्गुरु सेवे । सद्गुरु सेय परम पद लेवे ॥
परमपद सोई भवते न्यारा । भौसागर तुम कष्ट अपारा ॥
तीन लोक तव करिहों राजू । जब कबीरसों करिहों साजू ॥
हमरे पिता त्रिगुणके आजा । सतकबीर सुमरै जिव काजा ॥
दोहा—जो समर्थके जीव हैं, सो नाम कबीरके लेंय ।
तिनकी सेवा तुम करो, सुफल कबीर कहैं सेय ॥
सुनके विष्णु कृष्ण औ रामा । पुलकित भये तब विष्णु सुजाना
पूछा निरंजन कस खुशियाला । कबीर नाम सुन गात रिसाला ॥
कहैं विष्णु हम अति पुलकाने । हमपर दया कबीर बहु ठाने ॥
कहैं निरंजन तेहि बड भागी । दीन्हो जाय कबीर सोहागी ॥
कवीरकृष्णगीता ।
१७
कहैं निरंजन विष्णु सपूता । सवा लक्ष भक्ष देहो पूता ॥
विष्णु वचन ।
कहैं विष्णु सब तुम्हरीं दाया । नित्य काट देउँ आपन काया ॥
इक आज्ञा प्रभु मोकहूँ करहूँ । मैं सद्गुरु कवीर पग धरहूँ ॥
गुरुकी भक्त भात पितु सेवा । साधुसेवा फल बैठे लेवा ॥
निरंजनवचन ।
कहैं निरंजन मन हर्षाई । सद्गुरु करो कवीरको जाई ॥
सद्गुरु प्रगट दुनिया दिखलाई । जाते लोग न जाने भाई ॥
यह सब समुझ बूझ हर्षाये । जाय सबन सानंद सुनाये ॥
अब तुमसब मिल राधहु ध्याना । हमहूँ सत्त कवीरहि जाना ॥
कवीरके ऊपर और नहीं कोई । आप कवीर पुरुष हैं सोई ॥
तीन लोक सबते अधिकारा । जोत स्वरूप निरंजन निराकारा ॥
सेवक सम लघु आपहिं जाना । एक कहिन कोउ बहुतक जाना ॥
कवीर भजे सो मोहि गुनदाना । सत्त पुरुष निर्भय निर्वाना ॥
प्रगट राम कृष्ण निराकारा । सब मिल गुप्त कवीर अधारा ॥
अमी बुंद सो सत्तकवीरा । विषय निरंजन नीर शरीरा ॥
प्रेम भक्त नहीं छिपत छिपाये । गुरुसो अधिक कौन अस जाये
सरगुणके प्रेमाधिक गुरूवा । जन्मत भरत भये अति हन्ना ॥
सत्त कवीर अखंड सुखदाता । तिनके भक्त दुख जाय निपाता ॥
जो कवीर कहिहै सो करई । गुरुकी दयाभात पितु तरई ॥