कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
नारद-कृष्ण संवाद व कबीरके भक्तकी महिमा
कवीरकृष्णगीता ।
७
तब राजा कबीर मुख जोवा । कहैं कबीर वकसहु द्विज रोवा ॥
राजा कहे वकसाहम तोहौं । तुमहु दया कर वकसहु मोहीं ॥
तब नारद बहु स्तुति कीन्हा । सबै रुधिर सरवरमह दीन्हा ॥
जेहि २ तनके ओनित गहेऊ । भयउ सोझकतनमीनहोय रहेऊ ॥
स्तुति करत नारद चलि गयऊ । अति लज्जित होय हरिपद गहेऊ ॥
हीरसन्मुख नारद सिर नाये । पूछा हरि कृषि कहैंते आये ॥
नारद उवाच ।
कहे कृषि नारद सुन जदुराई । विन तुव आज्ञा गयउ गोसाईं ॥
इंद्रकाज ब्रह्मा शिव भेजा । भयऊँ पतित अब यह तन तेजा ॥
छत्रजीतके गुरु कबीरा । रोसेउ तिन पुनि नृपत गैभीरा ॥
भसभ होत चाहूं वहां आजू । होत भला तब इंद्रके काजू ॥
सत कबीर मोहि कोप सुनावा । भम सेवक किमि आन दुखावा ॥
अभित कला कजु वराणि न जाई । कहीं न सके अज हरि देव नसाई ॥
कृष्ण उवाच ।
कहे कृष्ण तुम हमरी नहिं भाना । मानसके तुम सहुर जाना ॥
सतकबीर करता आविनाशी । निराकारके मूलकबीर मुखराशी ॥
राजा रहे कबीरके दासा । तिनसे हम आज्ञा प्रगासा ॥
कबीरके संतसे काल डेराना । जरे गात तब पेल पराना ॥
कबीरके संत रहे सतलोक । इंद्रहि कौन भार भौ सोका ॥
जब इंद्र तब इंद्र कह पूजहु । इंद्र परहि अब दूसर भूजहु ॥
इंद्रासन वैकुंठ विलासा । यह सब क्रीतम ठोर विनासा ॥
सत्तलोक अम्बरपुर देश । तहां रहे सतकबीर मुखभेषा ॥
८
कबीरकृष्णगीता ।
सबहिं जीव सतकबीरके आहीं । विन परचे कोइ चीन्हत नाही ॥
मैं चीन्हा मोहि पिता चिन्हावा । निराकार मोहि भेद बतावा ॥
तुम सब कहैं हम भाष सुनाई । पेल वचन तुम गये गोसाई ॥
कबीरके त्रास निरंजन कंपे । हम तेहि दास गने निज आपे ॥
धर्मराय चौदह तेहि हारे । जो सतनाम कबीर पुकारे ॥
सुन नारद सीस तर कीन्हा । कबीरके स्तुति करवे लीन्हा ॥
पुनि एक जम दौरा तहैं आवा । विष्णुहिं सीस नाग गोहरावा ॥
जीव एक बरबस चलि जाई । सत् कबीर कहैं इतराई ॥
तेहि देखत मम बल भोथोरा । जैसे साहु देखत हो चोरा ॥
तुम हरि सब ईश गोसाई । ताते आप कहों गोहराई ॥
कहा विष्णु तुम घर चलि जाहू । जो कबीर बै मुख तेहि खाहू ॥
हम सब हैं कबीरके दासा । निराकारको जाकी आसा ॥
सत्पुरुष सतनाम कबीरा । दास कबीरके सो मतधीरा ॥
कहैं कृष्ण सुन जम जिवजाळा । तजहु जाहि तेहि तुलसीमाला ॥
तुलसीमाला तिलक लिलारा । कहैं कबीर जिन राम पुकारा ॥
तासु निकट जिन जायहु भाई । साकट बांध नरक देवनाई ॥
भये शिष्य गुरु शब्द न माने । गुरुसाधनकी भाकि न ठाने ॥
साकटके तेहि लागे चांपी । साकट तो भये कालसभीपी ॥
विन गुरु शरणको साकटकहिंये । विन गुरु शरण वस अव लहिंये ॥
दोहा-सत् कबीरके सेवक, तेहि मत बोलहु बात ॥
राम गहे तेहि छांडहु, राम कबीर एक साथ ॥