कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीता ।
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तब राजा कबीर मुख जोवा । कहैं कबीर वकसहु द्विज रोवा ॥
राजा कहे वकसाहम तोहौं । तुमहु दया कर वकसहु मोहीं ॥
तब नारद बहु स्तुति कीन्हा । सबै रुधिर सरवरमह दीन्हा ॥
जेहि २ तनके ओनित गहेऊ । भयउ सोझकतनमीनहोय रहेऊ ॥
स्तुति करत नारद चलि गयऊ । अति लज्जित होय हरिपद गहेऊ ॥
हीरसन्मुख नारद सिर नाये । पूछा हरि कृषि कहैंते आये ॥
नारद उवाच ।
कहे कृषि नारद सुन जदुराई । विन तुव आज्ञा गयउ गोसाईं ॥
इंद्रकाज ब्रह्मा शिव भेजा । भयऊँ पतित अब यह तन तेजा ॥
छत्रजीतके गुरु कबीरा । रोसेउ तिन पुनि नृपत गैभीरा ॥
भसभ होत चाहूं वहां आजू । होत भला तब इंद्रके काजू ॥
सत कबीर मोहि कोप सुनावा । भम सेवक किमि आन दुखावा ॥
अभित कला कजु वराणि न जाई । कहीं न सके अज हरि देव नसाई ॥
कृष्ण उवाच ।
कहे कृष्ण तुम हमरी नहिं भाना । मानसके तुम सहुर जाना ॥
सतकबीर करता आविनाशी । निराकारके मूलकबीर मुखराशी ॥
राजा रहे कबीरके दासा । तिनसे हम आज्ञा प्रगासा ॥
कबीरके संतसे काल डेराना । जरे गात तब पेल पराना ॥
कबीरके संत रहे सतलोक । इंद्रहि कौन भार भौ सोका ॥
जब इंद्र तब इंद्र कह पूजहु । इंद्र परहि अब दूसर भूजहु ॥
इंद्रासन वैकुंठ विलासा । यह सब क्रीतम ठोर विनासा ॥
सत्तलोक अम्बरपुर देश । तहां रहे सतकबीर मुखभेषा ॥