कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
कबीरकी महिमा कृष्णमुख (सत्यलोक, जीव, निरंजन आदिका वर्णन)
१०
कबीरकृष्णगीता ।
रामके भक्तन हरगण लावहिं । कबीरके दास नाम बल धावहिं ॥
रामके दास पूछे कहु केह बाता । जन कबीर सहुर रंगराता ॥
चहे विमान चले सब जाहीं । जागृत सतकबीर कहाहीं ॥
त्रिगुण जीव औ भूत पिशाची । पाप पुण्य आश्रित जमफांसी ॥
सतकबीरके जो हैं दासा । जेहि नहिं पाप पुण्यके आसा ॥
एकहि नाम कबीरहिं गावहिं । गुरुसाधुके सेवा लावहिं ॥
एकहि दूत गये जम धामा । साधु संत हरित लख रामा ॥
सबे देव औ सुखदेव व्यासा । को कबीर जेहि डर जमत्रासा ॥
केहे कृष्ण कबीरके लीला । सतनाम कबीर गहीला ॥
कबीर हैं अमरलोकके वासी । सो नहिं देह धरे चौरासी ॥
अमरलोक तिहु लोकते न्यारा । जहैंत यहां आये निरंकारा ॥
सो घर आदु सबनके मूला । सत्तलोक अमर अस्थूला ॥
जीव अमर सत्तलोकते आये । पूंजी सो अलस निरंजन पाये ॥
दोहा-आदु पिता सो सब, सो हैं सत्तकबीर ।
क्रीतम पिता सो बहुत, भये निरंजन नीर शरीर ॥
सत्तकबीरके अंस सोहंगा । आय रहै सो सबके संग ॥
सोहंग नाम ब्रह्मके दल । पांच पचीस त्रिगुण अहंकल ॥
तत ओंकार सोहंगम जीऊ । सत्तकबीर सब जिवके पीऊ ॥
जीव न चीन्है सत्तकबीरा । पांच तीनके धरे शरीरा ॥
अमर लोक हिरंभर काया । तहं सब हंसा केल कराया ॥
हम सब कहा सेवक बडभागी । जो कबीरके शरण न लागी ॥
कबीरकृष्णगीता ।
११
अब निज इच्छा भये है मोरा । सतगुरु करो कबीर बंदीछोरा ॥
केहि कारण हमहूं दुख पावा । निरंजन मोहि भग जठर रमावा ॥
जन्म मरण औ गर्भ वसेरा । कोटिन वार धरो तन फेरा ॥
जब कबीरको लेउं प्रवाना । तब मैं करिहों लोक पयाना ॥
जन्म मरण तब छूटे भाई । सतकबीर जब हृदय समाई ॥
व्यास सुखदेव गुरु उवाच ।
कहैं व्यास सुखदेव गुरु आदी । हम सब तुम्हरे सेवक आदी ॥
आप तार हमहूं कहैं तारो । जन्म मरण हर मोर निश्चारो ॥
तुम थोरे घर दस चौबीसा । इतन दुख हर धूनहु सीसा ॥
कहैं सुखदेव मैं परकं चौरासी । नामभक्त विन परे जमफांसी ॥
सही निर्गुण विन मुक्ति न होई । को हम सम तप करि है लोई ॥
सो तो हर चौरासी डारेहु । भक्तनकेर वाट तुम पारेहु ॥
विष्णु उवाच ।
कहैं विष्णु मैं करो का भाई । निराकार जैसे फरभाई ॥
पाप पुण्य कछु नहि जानो । पितु आज्ञा मैं सिरपर मानो ॥
नहि मानो तो मोहिं धर खाई । काह कहौं कछु कहत न जाई ॥
पिता निरंजन बड हर भोगा । दुखित सबे हिंहु पुरके लोगा ॥
जन्म मरण सब कोइ अरुझा । बांचे सतकबीर जेहि सूझा ॥
सतकबीर जेहि होय सहाई । ताके वारन बंके भाई ॥
पाछे रामचंद्र मैं रहकं । पितु आज्ञाते जन्म लियकं ॥
धन मम तिरिती निरंजन काळा । सबहिं खाय सुतकरे विहाळा ॥
कर व्याह बन पठहन मोही । पुन बन विपत दीन्ह बहु झोही ॥