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सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 25

कबीरकृष्णगीता ।

११

अब निज इच्छा भये है मोरा । सतगुरु करो कबीर बंदीछोरा ॥
केहि कारण हमहूं दुख पावा । निरंजन मोहि भग जठर रमावा ॥
जन्म मरण औ गर्भ वसेरा । कोटिन वार धरो तन फेरा ॥
जब कबीरको लेउं प्रवाना । तब मैं करिहों लोक पयाना ॥
जन्म मरण तब छूटे भाई । सतकबीर जब हृदय समाई ॥

व्यास सुखदेव गुरु उवाच ।

कहैं व्यास सुखदेव गुरु आदी । हम सब तुम्हरे सेवक आदी ॥
आप तार हमहूं कहैं तारो । जन्म मरण हर मोर निश्चारो ॥
तुम थोरे घर दस चौबीसा । इतन दुख हर धूनहु सीसा ॥
कहैं सुखदेव मैं परकं चौरासी । नामभक्त विन परे जमफांसी ॥
सही निर्गुण विन मुक्ति न होई । को हम सम तप करि है लोई ॥
सो तो हर चौरासी डारेहु । भक्तनकेर वाट तुम पारेहु ॥

विष्णु उवाच ।

कहैं विष्णु मैं करो का भाई । निराकार जैसे फरभाई ॥
पाप पुण्य कछु नहि जानो । पितु आज्ञा मैं सिरपर मानो ॥
नहि मानो तो मोहिं धर खाई । काह कहौं कछु कहत न जाई ॥
पिता निरंजन बड हर भोगा । दुखित सबे हिंहु पुरके लोगा ॥
जन्म मरण सब कोइ अरुझा । बांचे सतकबीर जेहि सूझा ॥
सतकबीर जेहि होय सहाई । ताके वारन बंके भाई ॥
पाछे रामचंद्र मैं रहकं । पितु आज्ञाते जन्म लियकं ॥
धन मम तिरिती निरंजन काळा । सबहिं खाय सुतकरे विहाळा ॥
कर व्याह बन पठहन मोही । पुन बन विपत दीन्ह बहु झोही ॥