घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
१४६ / घट रामायण
अर्थ-तब तकी ने कहा कि तुलसी साहब आप हमारे गुरु और पीर हैं। मेरी गलतियों को क्षमा
करके मुझे अपना बना लें और यह बंदा तकी अब आपका है॥ १॥
तुलसी साहब ने जब तकी को उस दुखी अवस्था में देखा समझा कि यह पूरी तरह से मेरे मतों में
'पक गया है। तब बोले कि तुम अपने को गुहगार पाते हो, अब इससे ऐसा लगता कि तुमने अपनी तरफ
से (मन के अन्दर) झाँका और देखा है, आत्मालोचन किया है॥ २॥
तुलसी साहब कहते हैं कि हे तकी! तुमने तबक (सृष्टि की परतें) नहीं समझा और नवी
(धर्मगुरु) तथा नूर को भी नहीं प्राप्त किया है-स्वर्ग समझ कर इसनरक में तुम रहते रहे, तुम्हें खुदा
कैसे मिल सकते हैं॥ ३॥
॥रेखता नसीहत॥
तुलसी तबक जाना नहीं, बेहोस गाफिल हो रहा।
जिस ने तुझे पैदा किया, उस यार को चीन्हा नहीं॥ १॥
नाहक अदम दम खोवता, मुरसिद पकड़ नहिं डूबही।
तुलसी खलक कुल ख्याल है, आसिक मुहब्बत कर सही॥ २॥
खोजो मुहम्मद दिल-रहम, जिस इस्म से आलम हुआ।
तुलसी नबी निरखै नहीं, जहाँ लग मुसल्लम है नहीं ॥ ३॥
रब रूह मरहम ना हुआ, रब देख अंदर है सही।
तुलसी तकी बूझा नहीं, जग में जिया तो क्या हुआ ॥ ४॥
गन्दा नजिस क्यों हो रहा, इस जक्त में रहना नहीं।
अरे ऐ तकी तल्लास कर, तुलसी फना होना सही ॥ ५॥
चारो चसम को खोल कर, देखो जुलम जालिम वही।
जबरील को तैंना लखा, तुलसी खबर खोजा नहीं॥ ६॥
रोजा निमाज हर दम किया, उस यार को दिल ना दिया।
खोजा नहीं अपना पिया, तुलसी तकी दोजख लिया॥ ७॥
नासूत मलकूत जबरूत हैं, लाहूत लौं तैं ना लिया।
हाहूत हिये खोजा नहीं, ला में रबी जीता पिया॥ ८॥
तुलसी तकी तालिम दिया, हर दम गुनह बंदा हुआ।
मुरसिद मुरीदी दस्त है, पावै तकी अपना किया॥ ९॥
तुलसी रहम राजी हुआ, तोला तकी अपना किया।
दिया दस्त दरदी जान कै, तुलसी तकी मुरसिद हुआ॥ १०॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि हे शेख तकी तुमने तबक (सृष्टि) नहीं समझा और अपने गर्व में
बराबर बेहोश तथा गाफिल (भयग्रस्त) होता रहा। जिसने तुम्हें जन्म दिया है, इस दोस्त ईश्वर को तुमने
पहचाना नहीं॥
॥ दोहा॥
तकी दीन तुलसी लखा, दीन्हा पंथ लखाइ।
सुरति सैल असमान कर, चढ़े गगन को धाइ॥
घट रामायण / १४७
अर्थ-तुलसी साहब ने तकी को दुखी देखकर उस निर्गुण ब्रह्म का मार्ग दिखा दिया। वे सुरति से
जुड़कर पर्वत शिखर पर जाकर शून्य पर दौड़कर चढ़ गये॥
॥ चौपाई ॥
तकी दीन गति गाइ सुनाई। दीन्हा सूरति पंथ लखाई॥
अर्थ-दीन सेख तकी के मार्ग को गाकर सुनाया और उसे सुरति का मार्ग दिखला दिया।
॥ सरन में आना तकी मियाँ का ॥
॥ दोहा ॥
तकी दस्त दोउ जोड़ि कै, करि सलाम सिर टेक।
नेक नजर अपनी करौ, बन्दा तकी निहाल॥
अर्थ-तकी मियाँ दोनों हाथों को जोड़कर तथा नमस्कार करते हुए शिर टेक कर बोले कि यह
बन्दा तकी निहाल हो चुका है, अब आप मेरे ऊपर कृपा करें॥
॥ चौपाई ॥
नेक निहाला नजर निहारौ। तुलसी बंदा तकी सम्हारौ॥
हमरा गुनह माफ सब कीजै। फजल करौ फिर अज्ञा दीजै॥
चले तकी मारग को जाई। कासी नगरी पहुंचे आई॥
अर्थ-थोड़ी देर के लिए तकी को निहाल करते हुए तुलसी साहब ने शेख तकी को सम्हाला। तकी
कहने लगे हे स्वामी जी! हमारी गलतियों को आप क्षमा करें-अब मुझे आज्ञा देकर मुझ पर फजल
(कृपा) करे। शेख तकी अपने मार्ग की ओर चल पड़े और धीरे-धीरे काशी नगरी में पहुँच गए॥
॥ दोहा ॥
चले तकी मारग गये, बीच बजार मँझार।
कर्मा पल्लीवाल की, गये दुकान के पास॥
अर्थ-शेख तकी उस मार्ग से चलते हुए काशी के बीच बाजार में पहुँचे और कर्मा पालीवाल की
दुकान पर गए॥
सम्बाद जैनियों के साथ
॥ चौपाई ॥
कर्मचंद इक पल्लीवाला। स्रावग जैन धर्म मत पाला॥
सो करै बनिज बजाजी कौरा। ताहि दुकान बाग तैहि मोरा॥
कर्मचंद ने कीन्ह सलामा। आदर बहुत कीन्ह सनमाना॥
सेख तकी कहै सुन रे भाई। कहौं फकीर अक खुदा गुसाईं॥
ता को सब बरतंत सुनावा। कर्मकंद तुलसी ढिंग आवा॥
कर्मचंद और धर्मा जैनी। सब पूछी पुनि हमरी कहेनी॥
कौन धर्म यह साध कहावा। जैन को धर्म मर्म जिन पावा॥
धर्मचंद और कर्मा जैनी। थापी उन निज अपनी कहेनी॥
१४८ / घट रामायण
अर्थ—कर्मचन्द नामके एक पालीवाल जाति वाले थे और उन्होंने श्रावग जैन मत स्वीकार कर रखा
था। वह बनियागीरी था और केवल बजाजी (कपड़े की दुकानदारी) करता था। उसकी दूकान मेरी
उस बाग में थी।
कर्मचंद ने मुझे देखकर सलाम किया और उन्होंने अति आदरपूर्वक मेरा सम्मान भी किया। शेख
तकी ने उनसे कहा कि हे भाई सुनो! उसे मैं फकीर कहूँ याकि ( अक ) मालिक ही कहूँ।
उन कर्मचन्द को तकी मिया ने सारा वृत्तान्त सुनाया, उसे सुनकर कर्मचंद तुलसी साहब के पास
आए। कर्मचंद और धर्मा दोनों जैनियों ने मिलकर सारे कथनों के विषय में पूछा॥ किस धर्म से सम्बद्ध
यह साधु कहा जाता है, जैन धर्म का रहस्य किसने जाना है। उन धर्मचन्द तथा कर्मा जैनी ने मिलकर
तुलसी साहब से अपनी (जैन धर्म के सिद्धान्त की) बातें रखीं॥
॥ प्रश्न तुलसी साहिब ॥
कहि तुलसी तुम मर्म बताओ। जैन धर्म का भेद सुनाओ॥
अर्थ—तुलसी साहब ने पूछा, कि आप अपना रहस्य बतलाएँ और जैनधर्म के मर्म के विषय में भी
बतलाएँ।
॥ उत्तर कर्मचंद और धर्मा ॥
कर्मचंद और बोले धर्मा। होइ मुक्ति जब काटै कर्मा॥
तप कर संजम बन को जावै। हरी त्याग कर जीव बचावै॥
टाटक ध्यान जपै नौकारा। जब या जीव को होइ उबारा॥
कोसिस ऐसी कठिन अपारा। काटै कर्म जीव निरबारा॥
तीर्थंकर चौबीसो जाना। कर्म काटि पहुँचे निरबाना॥
अर्थ-धर्मा एवं कर्मचन्द साथ-साथ बोले, मुक्ति तब मिलती है, जब व्यक्ति कर्म संसक्ति को नष्ट
कर डाले॥ तप के संयम बरत कर व्यक्ति बन में जाए और विष्णु (ब्रह्म) को त्यागकर मनुष्य में
निहित जीवत्व की रक्षा करे॥
तुरन्त नौ प्रकार के ध्यानों में अपनी साधना लगा दे, तभी इस जीव का उद्धार सम्भव है। इसी के
द्वारा कठिन तपस्या करके एवं कर्म बन्धन को काटकर अपने को मुक्त करना चाहिए।
तीर्थंकर चौबीस हो गए हैं-जिन्होंने कर्मबंधन काट कर निर्वाण पद को प्राप्त कर लिया है।
॥ सोरठा ॥
धर्मा कही जनाइ, जैन धर्म संजम बिधी।
तुलसी सुनौ समाइ, तब पुनि फिरि आगे कहौं॥
अर्थ-धर्मा ने सारे जैन धर्म के मर्म को बताते हुए समस्त धर्म एवं संयम विधि बतलाई। वे बोले, हे
तुलसी साहब, भली भाँति सुन लो, तब इसके बाद आगे पूछना॥
॥ प्रश्न तुलसी साहिब ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी पूछै ताइ, भेद कहो निरबान को।
तुम कस पायौ जाइ, सो देखी अपनी कहौ॥
घट रामायण / १४९
अर्थ-तुलसी साहब धर्मा से पूछा, कि तुम निर्वाण के भेदों के विषय में बताओ। उसे जानकर तुमने
किस तरह देखा है और जिसे देखा है, उससे जुड़े अनुभवों के बारे में बताओ॥
॥ चौपाई ॥
तुम देखी अपनी बतलावौ। करनी और और की गावौ॥
साँची करनी अपनी भाई। तुम कुछ और और की गाई॥
तीर्थङ्कर पहुँचे निरबाना। कर्म काटि वे जाइ समाना॥
तुम तेहि करनी भाखि सुनाई। हाथ कहा कहौ तुम्हरे आई॥
जीवत मिले देखिये आँखी। ता की करनी कह कर भाखी॥
खावै भूख जाइ पुनि ताही। ऐसी बात कहौ समझाई॥
अब जो तुरत तलब सो पावै। तब तुलसी की प्यास बुझावै॥
तुम तौ कही जुगन की बानी। देखौं अबै सुनौं जो कानी॥
देखौं अबै तो मन पतियावै। ऐसी तत्त बात मन भावै॥
ये सब कही सुनी हम जानी। मुए मुक्ति की करौं बखानी॥
मुए पर कोइ आवै न भाई। जीवत में केहु पहुँचि न पाई॥
ता की खबरिं साँच कस आई। सो धर्मा तुम कहौ सुनाई॥
ये तौ अंध अंध कर लेखा। मानौ जो जोड़ नैनन देखा॥
अर्थ-तुम अपनी देखी हुई बतलाओ, करनी किसी ने की है, तुम दूसरे बनकर उसे गा रहे हो। हे
भाई! अपनी सच्ची आध्यात्मिक करनी बताओ, तुम तो दूसरे हो और दूसरे की करनी गाते हो॥
तुमने तीर्थंकरों की करनी मुझे कहकर सुना दी-उस करनी की समझ तुम्हें कितनी आई। इसे
बताओ। जो आँखों के सामने जीवित मिले, उसकी करनी कहकर कहनी चाहिए॥ जिसको भूख है, उसे
खाना चाहिए (और उस खाने का अनुभव उसे बताना चाहिए) तुम झूठे अनुभव को मुझे क्यों समझा
रहे हो।
जो सही ढंग से ईश्वर के अनुभव के नशे में डूब जाता है, वही तुलसी की जिज्ञासा भरी प्यास बुझा
सकता है। तुम तो अनेक युगों के पूर्व के ज्ञान की वाणी कहते हो-जो अभी अभी आँख से देखते हो
और कान से सुनते हो, उस ज्ञान के विषय में क्यों नहीं बताते।
जिसे अभी देख लोगे, उस पर मन विश्वास करने लगेगा और तत्त्व की ऐसी ही बातें मन को
अच्छी लगती हैं॥
जो तुमने सारी बातें कही है, उसे हमने भी सुन रखी है-तुम मुझसे उस मुक्ति की बात करते हो जो
मर चुकी है॥ हे भाई! मरने के बाद कोई आता नहीं और जीवन में जीवित रहते कोई मृत्यु तक नहीं
पहुँच सकता॥
उस पूर्वमृत की खबर तुम्हारे पास कैसे आ गई, हे धर्मा! इसे सच-सच सुनाकर बताओ॥ यह
तुम्हारा प्रश्न अंधे के द्वारा अंध को ले जाने जैसा है, मन तो उस पर विश्वास करता है, जिसे उसने अपने
नेत्रों से देखा है।
॥ सोरठा ॥
तुलसी तुरत बताइ जो निज नैननि लखि परै।
सरै जीव को काज परै पार गति देखिये॥
१५० / घट रामायण
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि हे धर्मा, उसके विषय में बताओ जो अपनी आँखों से दिखाई पड़े,
उससे जीव का कार्य सिद्ध होगा और उस पार जाकर कह उस विशुद्ध मुक्ति को प्राप्त करेगा और उसे
देखेगा॥
॥ चौपाई ॥
सो साँची भानैं हम भाई। ऐसी धर्मा कहौ सुनाई॥
अर्थ-हे धर्मा, ऐसी बातें कहकर सुनाओ, जिसे हे भाई! हम भी अनुभव करें॥
॥ उत्तर धर्मा ॥
कहै धर्मा तुलसी सुनौ, कहौं भे बिस्वास।
बिन संजम पावै नहीं, तप जप बिना उपास॥
अर्थ-धर्मा ने कहा कि, हे तुलसी साहब! सुनें, किसी के बताने से यह विश्वास हुआ कि बिना
संयम एवं जप, तप एवं उपवास के कुछ प्राप्त नहीं होता॥
॥ प्रश्न तुलसी साहिब ॥
॥ सोरठा ॥
सुनु धर्मा बिधि बात। संजम तप मुक्ती नहीं॥
पद पावै निरबान। चढ़ि अकास मुक्ती मिलै॥ १॥
निज निरबान बिधान। कहौं भेद भिन भिन सुनौ॥
पद निर्बान निज पार। संत सार आगे चखै॥ २॥
अर्थ-हे धर्मा! मेरी बात सुनो, संयम एवं तपस्या मुक्ति नहीं है, जो निर्वाण पद को प्राप्त कर लेता
है, उसे शून्याकाश में मुक्ति मिलती है॥ १॥
अपने निर्वाण विधान के भिन्न-भिन्न भेदों को मैं बतलाता हूँ-निर्वाण का पद अपने (चित्त) के उस
पार है-और उसके सारतत्त्व आनन्द का आस्वादन मुक्ति के बाद चखते हैं॥ २॥
॥ रेखता ॥
निकट निरबान की सान जग में लखौ।
फटिक बिच सिला पर स्याम माई॥ १॥
काल की जाल दरहाल जा को कहैं।
भये चौबीस भौ मुक्ति पाई॥ २॥
गुन मिलि गोह चौधा गुनष्ठान हैं।
चौधा जमराय जहँ कसत भाई॥ ३॥
अधर अठबीस लख लोक राचू कहैं।
काल निरबान रत रहत गही॥ ४॥
देव मुनि दैत्य गंधर्व और मानवी।
केवली काल मुख सकल जाई॥ ५॥
दास तुलसी निबान पद निरखि कै।
छाँड़ि ये राह घर अधर माई॥ ६॥
घट रामायण / १५१
अर्थ—अपने ही निकट निर्वाण की गरिमा को देखो—स्फटिक की शिला (चित्त शिला पर) वह
श्याममयी है—उसे काल के क्षण-क्षण का समाचार कहा जाता है, चौबीसरूपों (चौबीस तीर्थंकरों) के
रूप में इन्होंने मुक्ति प्राप्त की है॥ १-२॥
गुणों से मिलकर चौदह अनुष्ठान हैं—जहाँ चौदह यमराज निवास करते हैं॥ ३॥
अन्तरात्मा में अट्ठाईस दिखाई पड़ने वाले लोक हैं—काल-निर्वाण द्वारा इन्हें सभी गृहीत रहते हैं॥ ४॥
देव, मुनि, दैत्य, गंधर्व एवं मानव के बीच क्या ज्ञानी (कवली) मुक्ति का अधिकारी हो गया
है॥५॥
तुलसीदास कहते हैं कि निर्वाण के पद को देखकर, इस मार्ग को छोड़ दो—और अपनी अन्तरात्मा
के घर में निवास करो॥ ६॥
॥ गजल १॥
जैनी जो जैन नैन सूझै नाईं।
आतम को छाँड़ि पूजें पाहन जाई॥ १॥
कर कर पूजा बिधान अष्टक गावैं।
भादों बिधि मंदिर सब स्रावग आवैं॥ २॥
चावल रँग माँड मँडे मनसैं आप का।
नंदेसुर पूजि दीप करें बाप का॥ ३॥
और अढ़ाई दीप माँड़ि करते पूजा।
अंदर आतम्म ब्रह्म नाहीं सूझा॥ ४॥
करते कल्यान पाँच कामधेनु की।
पूजें बेहोस फूटि हिये नैन की॥ ५॥
जिन ने तन साज किया जानौ भाई।
वा की विधि भूलि भाव पाहन लाई॥ ६॥
तुलसी ये फंद कीन्ह काल पसारा।
धरमन की टेक बाँधि बूड़े सारा॥ ७॥
अर्थ—जैनी को ज्ञान के नेत्रों से कुछ भी नहीं सूझता और वे आत्मा को छोड़कर पत्थर की पूजा
करने जाते हैं॥ १॥
पूजाविधान कर करके अष्टक गाते हैं और भादों के महीने में सभी मन्दिर में (पूजा) के निमित्त
आते हैं॥ २॥
चावल को रंगकर माँड़ को रजाकर स्वयं अपनी स्वेच्छा से नंदेसुर की पूजा करके अपने मृत पिता
के लिए दीपदान करते हैं॥ ३॥
उन्हें अपनी अन्तरात्मा में स्थित ब्रह्म नहीं सूझता और उधर ढाई दीपक सजा कर पूजन करते
हैं॥४॥
वे पांच कामधेनु जैसी गायों को खिलाते-पिलाते हैं तथा हृदय के नेत्रों से वंचित (फूटि) अज्ञानी
जैसे पूजा करते हैं॥ ५॥
हे भाई! समझो, जिसने तुम्हारे इस शरीर की रचना जैसी साज सज्जा की है, उसको भूल करके
अपने भावचित्त में पत्थर ला रहे हो॥ ६॥
१५२ / घट रामायण
तुलसी साहब कहते हैं कि काल ने फंदा बनाकर चारों ओर फैला रखा है और इन धर्मों के टेक
के अन्तर्गत बँधे हुए तुम सारे के सारे लोग डूब जावोगे ॥ ७॥
॥ गजल २॥
ढूँढ़त गिरिनार सिखर आबू जाते।
सतगुरु बिन मेहर नहीं काबू पाते॥ १॥
बूझैं सतसंग संग संतन माई।
अंदर पट खोल बोल देत दिखाई॥ २॥
जिनके बड़े भाग सोई निरखि निहारा।
रहते जग बीच बीच जग से न्यारा॥ ३॥
उनकी वोहि चाल हाल घट में देखें।
पूछै कोइ चीन्हें नहिं बात बिसेखै ॥ ४॥
खोजत पहाड़ सिखर मूरति माई।
तुलसी नौकार जपैं सूझै नाई॥ ५॥
अर्थ-आबू पर्वत या गिरनार के शिखर पर जिसे खोजने जाते हो, किन्तु सतगुरु की कृपा बिना पूजा
करने वाले अपने पर नियंत्रण नहीं कर पाते ॥ १॥
हे भाई! संतों के साथ होने वाले सत्संग को समझो जो अन्तरात्मा के पर्दे को खोल कर उस
परमात्मा को दिखा देते हैं॥ २॥
वे लोग, जिनके बड़े भाग्य हैं, वही उसे निरखते और निहारते हैं और संसार में रहते हुए भी संसार
से असंसक्त हैं॥ ३॥
उनकी उस चाल तथा हाल कि वे घट के भीतर ही तत्त्व का दर्शन कर लेते हैं, वे पूछने पर भी
किसी को पहचानते नहीं, यह विशेष बात हैं अर्थात् निरन्तर आत्मरत रहते हैं॥
हे धर्मा! पर्वत शिखरों पर उनकी मूर्ति को खोजते हुए नौकार जाप करते हैं किन्तु यह सूझ नहीं
पड़ता-यह कौन-सी साधना है॥ ५॥
॥ चौपाई ॥
पद निरबान भूमि बतलाई। केवलि ज्ञान तिर्थंकर गाई॥
तप संजम पूजा बिधि बानी। ये गति चारि माहिं भौ खानी॥
अर्थ-मैंने निर्वाण पद की मूलभूमि का वर्णन किया है और केवल तीर्थंकरों के विषय में बताया है।
तप, संयम, पूजाविधि, और कीर्तन ये चारों गतियाँ इस सांसारिक बन्धन की खानि हैं॥
॥ दोहा ॥
जब नौकार निकाम सब, आदि सार नहिं जान।
पद निरबान के पार की, तुलसी करत बखान॥
अर्थ-जब नौ प्रकार की सभी पूजाएँ व्यर्थ हैं-और कोई मूल स्तर सार तत्त्व नही समझता, (तो
निर्वाण पद को क्या समझेंगे) तुलसीदास जी कहते हैं कि इसलिए मैं निर्वाण पद के उस पार की
स्थिति का वर्णन करता हूँ॥
घट रामायण / १५३
॥ शब्द ॥
अद्भुत आज अलेखा री, सखि सइयाँ कौ भेषा॥ टेक॥
उदित मुदित दोइ सहर सुहावन, स्याम सेत नित देखा।
अजर खेत्र नभ फटिक, सिला पर, पद निरबान बिसेखा॥ १॥
सिलि पिलि बिजै खेत्र बिंदाचल, लील सिखर पर ठेका।
समुँदर सात पार जल खण्डा, अंडा अब ले पेखा॥ २॥
निरखत चारि खानि गति चारी, बिधि बिधि जीव बिसेखा।
केवलि ज्ञान होत गुंकारा, देखे केवली अनेका॥ ३॥
ये निरबान भूमि मत मारग, आगे जान न लेखा।
स्रावग जैन धर्म मत माहीं, इनके वोही टेका॥ ४॥
आतम ज्ञान ध्यान बतलावैं, आगे भेद न पावैं।
सास्तर साखि भाखि बिधि देखें, खोजत मुए अनेका॥ ५॥
या के परे भिन्न गति न्यारी, सूनि बाइस बिधि देखा।
ता के परे पार सत साहिब, सो पद संतन लेखा॥ ६॥
सुन्न सुन्न प्रति प्रति पद माहीं, जहाँ निरबान न पेखा।
केवलि ज्ञान आतमा नाहीं, धरम करम नहिं एका॥ ७॥
सूर चंद नहिं धरनि अकासा, तेज पवन जल छेका॥
ता के परे पार निर्ख न्यारा, तुलसी हिये दृग देखा॥ ८॥
अर्थ-हे सखी! आज स्वामी (ब्रह्म) की वेषरचना अद्भुत एवं अलेख्य है। उदित तथा मुदित नाम
के दो सुहावने नगर हैं और वहीं मैंने उनको, श्याम तथा श्वेत इन दो रूपों में देखा है। वह क्षेत्र अजर है,
शून्याकाश में एक स्फटिक शिला है-उनका विशेष निर्वाण पद वही है॥ १॥
वह जल खंड सात समुद्रों के उस पार है और वहीं ब्रह्मांड रूप इस विश्व को देखा है॥ २१॥
यहाँ चारों प्रकार के ज्ञान विभव के स्रोत तथा चारों प्रकार की मुक्ति की गतियाँ और नाना प्रकार
के जीव हैं। यहाँ केवल गुंकार (ध्वनि रूप) ज्ञान सुनाई पड़ता है- इसे केवल वे ही देखते हैं जो
'केवल ज्ञानी हैं॥ ३॥
यही निर्वाणभूमि ही धर्म का मार्ग है, आगे कोई न ज्ञान है और न उसे लेखा-जोखा (विवरण) है।
श्रावग, जैनधर्म मत के अन्तर्गत इनकी यही अन्तिम मान्यता है॥ ४॥
ध्यान ही आत्म ज्ञान बतलाता है, उसके आगे क्या है, वे उसका भेदभाव नहीं प्राप्त कर पाते। शास्त्र
की साक्षी अनेक प्रकार से कह देते हैं किन्तु इसी को खोजते-खोजते वे मर जाते हैं॥ ५॥
इस शास्त्र से परे एक विलक्षण ज्ञान की भिन्न गति है, सुनो! उसे बाईस प्रकार से मैंने देखा है
(देखा जाता है)। उसके उस पार सत्य ब्रह्म जैसा स्वामी है-उस स्थान को केवल संतों ने देखा है॥ ६॥
प्रति पद-पद में शून्य-ही शून्य है-वहाँ निर्वाण नहीं दिखता-वहाँ न ज्ञान है, न आत्मा है, न धर्म है, न
कर्म है-अर्थात् एक भी नहीं है॥ ७॥
वहाँ न सूर्य हैं, न चन्द्रमा हैं, न पृथ्वी है, न आकाश है-और सभी कुछ तीक्ष्ण वायु एवं जल से
घिरा हुआ है। उसके पार उस प्रिय विलक्षण ब्रह्म को देखो, और तुलसीदास ने भी हृदय की आँखों से
उसे देखा है॥ ८॥
१५४ / घट रामायण
॥ दोहा ॥
तुलसी भूमि निरबान की, धर्मा सुनौ बयान।
केवलि ज्ञान गोंकार का, तुलसी करत बखान॥ १॥
फटिक सिला नभ ऊपरै, केवलि करत बखान।
तुलसी चढ़ि असमान पर, निरखा भिनि भिनि छान॥ २॥
निरबान निरखि आगे चली, सुनि अंड बाइस पार।
नहिं निरबान गति वहँ चलै, तुलसी देखा झार॥ ३॥
जीव अचर चर अंड के, जो ब्रह्मांड के माहिँ।
सूरति चढ़ि असमान पर, तुलसी देखा जाइ॥ ४॥
अर्थ-हे धर्मा! मेरी बात सुनो, निर्वाण की भूमि, वह केवल 'गोंकार' ज्ञानी भूमि है, ऐसा,
तुलसीदास कहते हैं॥ १॥
शून्याकाश के ऊपर स्फटिक शिला कैवल्य ज्ञान युक्त सन्तजन उसका वर्णन करते हैं। तुलसी
साहब कहते हैं कि मैंने भी शून्याकाश पर चढ़कर उन भिन्न-भिन्न केन्द्रों को देखा॥ २॥
निर्वाण पद को देखकर आत्मा के आगे चलने पर उसे बाइस ब्रह्मांड दिखाई पड़ते हैं। उन बाइस
अंडों के आगे निर्वाण की गति नहीं चलती-तुलसी ने इस साफ-साफ देखा है॥ ३॥
इस अंड के चराचर जीव जो ब्रह्मांड के मध्य हैं-तुलसी साहब कहते हैं कि शून्याकाश पर चढ़कर
मैंने उन्हें भी देखा है॥ ४॥
॥ चौपाई ॥
तुलसी धर्म बिलोके सारी। तुरक जैन बाम्हन मत झारी॥
जग थापन जैनी बतलावैं। ऋषभ देव कीन्हा बिधि गावैं॥
तीथंकर चौबीसों बानी। तुरक पीर चौबीस बखानी॥
मुहम्मद थापन कीन्ह जहाना। बाम्हन ब्रह्मा बेद बखाना॥
मुहम्मद तुरक बाम्हन बतलावैं। तीसर जैनी अस अस गावैं॥
अस अस तीनों कहत बखाना। झूठ साँच कहौ केहि को माना॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि तुर्क, जैन एवं ब्राह्मण धर्म से सम्बद्ध सारे मतों को मैंने देखा है,
जैसा कि जैन मतावलम्बी बतलाते हैं-'ऋषभदेव' ने इस संसार की स्थापना की है॥
चौबीस तीर्थंकरों की ये कहते हैं और तुर्क, पीर भी चौबीस की ही बातें करते हैं। मुसलमान कहते
हैं कि मुहम्मद साहब ने इस संसार की स्थापना की है और ब्राह्मण ब्रह्मा तथा वेद को बतलाते हैं॥
मुहम्मद साहब को तुर्क एवं ब्राह्मण ब्रह्मा को तथा तीसरे जैनी इस प्रकार की बातें करते हैं। इस
प्रकार से तीनों कहते हैं और बताइए-इनकों किस तर्क से झूठ या सच माना जाए॥
॥ दोहा ॥
गुनष्टान चौधा कहे, जैन मते में जान।
तुरक तबक चौधा कहे, बाम्हन भुवन बखान॥ १॥
घट रामायण / १५५
चौधा भुवन बाम्हन कहैं, तीनौ मत इक सार।
आदि पार कोइ ना कहै, लखा न रचनेहार ॥ २ ॥
अर्थ-जैन मत के अनुसार यह समझो कि गुणगान चौदह कहे जाते हैं। मुसलमान भी चौदह तबक
( योनियाँ ) बताते हैं। इसी प्रकार ब्राह्मणों के भी चौदह भुवन हैं।। १ ।।
ब्राह्मण भी चौदह भुवन कहते हैं-ये तीनों मत एक जैसे हैं, लेकिन इसके उस पार क्या है? इसके
विषय में कोई नहीं बताता। इस रचने वाले ईश्वर को किसी ने भी नहीं देखा है॥
॥ रेखता ॥
चौधा तबक किताब कुरान में।
पीर चौबीस पुनि वोहू गावा ॥ १ ॥
अल्ला रचि खेल सब जहान आलम किया।
आब और ताब पट अबर आवा ॥ २ ॥
सरा का खेल मुहम्मद से करि कहैं।
येही बिधि तुरक तकरीर लावा ॥ ३ ॥
जैन मत माहिं गुनष्टान चौधा कहैं।
बिधी भगवान चौबीस गावा ॥ ४ ॥
ऋषभजी रचन संसार की थापना॥
आपने मते की वोहू लावा ॥ ५ ॥
बेद पुरान संसार बाम्हन कहै॥
विधी भगवान चौबीस गावा ॥ ६ ॥
चतुरदस लोक लीला बरनन करैं।
रचना बैराट जग बिधि बनावा ॥ ७ ॥
झूठ और साँच कहौं कौन को कीजिये।
हिन्दू और तुरक पढ़ भूल पावा ॥ ८ ॥
जैन सोइ जिंद बुन्द आदि को ना लखा।
तीनि में किनहुँ नहिं चीन्ह पावा ॥ ९ ॥
दास तुलसी कहै अगम घर अधर है।
संत बिन भेद नहिं हाथ आवा ॥ १० ॥
अर्थ-पुस्तकों में चौदह तबकों ( योनियों ) का वर्णन है, और पीर उन्हीं चौबीसों का गान करते रहते
हैं॥ १॥
अल्ला मियाँ ने खेल खेल में रचकर सम्पूर्ण सृष्टि को सुशोभित कर दिया और उस पर जल तथा
चेतना अलग से भर दी॥ २ ॥
अपनी इस रचना के खेल को बनाकर मुहम्मद साहब से बताया और जो कुछ बताया है, उसको
मुसलमान तर्क और बहस के रूप में पेश कहते हैं॥ ३ ॥
१५६ / घट रामायण
जैन धर्मी भी उसी को चौदह गुनष्ठान कहते हैं और भगवान की विधि की गणना चौबीस बताई
है॥ १४॥
संसार की स्थापना तथा रचना ऋषभ देव ने की और उन्होंने भी अपने मत के अनुसार उसे स्थापित
किया॥ ५॥
वेद, पुराण, संसार एवं ब्राह्मण सभी कहते हैं कि ब्रह्मा ने चौबीस रूपों का वर्णन किया है॥ ६॥
चौदह लोकों की ये सभी लीला वर्णन करते हैं और कहते हैं कि विधाता ने इस ब्रह्माण्ड को
बनाकर उसकी रचना की है॥ १७॥
सच और झूठ कहो किसको कहा जाए, हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ने पढ़कर असत्य प्राप्त
किया ॥ ८॥
किसी जैन ने आज तक न जिंद को देखा न बुंद को और तुर्क, जैन एवं ब्राह्मण तीनों में से किसी ने
भी उसे नहीं पहचान पाया है॥ ९॥
तुलसी साहब कहते हैं कि उस अगम्य का निवास अन्तरात्मा में है, और संतों की मदद के बिना
यह रहस्य समझ में नहीं आता (हाथ में नहीं आता) ॥ १०॥
॥ चौपाई ॥
बाम्हन तुरुक जैन मत माईं। करता की गति केहु न पाई॥
मत अपने अपने की गावैं। तीनों करता तीनि बतावैं॥
थापा जग रुचि एक बनाई। ये तीनों मिलि तीनि बताई॥
अर्थ-हे सखे! ब्राह्मण, तुर्क एवं जैन ये तीनों मत कर्त्ता परमात्मा की गति किसी ने भी नहीं प्राप्त
की॥ सभी अपने-अपने मत का गान करते हैं-और तीनों तीन सृष्टि कर्त्ता बताते हैं। उस ईश्वर ने एक
ही संसार बनाकर उसकी स्थापना की है- और ये तीनों मिलकर तीन बताते हैं।
॥सोरठा ॥
धर्मा धर्म पसार, जैन बिधी कस कस कही।
भिनि भिनि कहौ बिचार, तब संजम उपवास बिधि ॥
अर्थ-हे धर्मा! जैन विधि से धर्म के प्रसार को किस-किस प्रकार कहा गया है, तुम भिन्न-भिन्न
ढंग से तप, संयम, उपवास की विधियों पर विचार करते हो (यह ठीक नहीं हैं)॥
॥ चौपाई ॥
व्रत संजम जप तप बतलावौ। कहै तुलसी भिनि बिधि दरसावौ ॥
कस कस चलन बात बिधि कहिये। स्त्रावग बिधि पुनि धर्म सुनइये ॥
स्त्रावग कौन बात बिधि पालैं। सोई कहौ कौन बिधि चालैं॥
धर्मा अष्टक बाँचि सुनाई। तुलसी सुनियौ चित्त लगाई ॥
अर्थ-तुम, व्रत, संयम, जप, तप आदि को बतलाते हो और तुलसी साहब कहते हैं, उन्हें भिन्न-
भिन्न ढंग से निरूपित करते हो। किस-किस प्रचलन की विधियों की बातें कहें-फिर उसके बाद
स्त्रावणों की विधि से धर्म को सुनाते हो ॥
स्त्रावक किस विधि से अपनी बातें सिद्ध करते हैं, वही बताओ, कि वे किस प्रकार का आचरण
करते हैं। धर्मा ने (इस बात को सुनकर) जैनाष्टक बाँच कर सुनाया और तुलसी साहब ने उसे चित्त
लगाकर सुना॥
घट रामायण / १५७
॥ उत्तर धर्मा। अष्टक १ ॥
जल नीर निरमल मिष्ट। हिमकर बासनं ॥१॥
धार ते भंडार भौ के। चरन श्रीपति चर्चनं ॥२॥
सोइ पूजि पावै सेव सुखदाता। दुरियत कर्म के खंडनं ॥ ३ ॥
श्रीपारसनाथ जप सूरज जैनराई। मूल नायक बंदनं ॥४॥
तुम चंद्र बदनी। चंदा पूरी परमेसुरा ॥५॥
अर्थ-चन्द्रमा की किरणों से बासित जल निर्मल एवं मीठा है श्रीपति द्वारा पूजित आपके चरण इस
भव सागर के लिए भंडार की धारा हैं। उसकी पूजा तथा सेवा करके सेवक सुख प्राप्त करते हैं और
उनके कर्म जनित पाप नष्ट हो जाते हैं। जैन मुनियों के सूर्य की पारसनाथ जी जप सृष्टि रचना कर्त्ता के
नायक की वन्दना है। हे आत्मा? तुम चन्द्रबदनी हो-और परमेश्वर की पुरी चन्द्रा पुरी है? श्रेष्ठ ऋषभ
देवता कैलास गिरि पर निवास करते हैं और मैं उनके चरण कमलों को हृदय में धारण करता हूँ ॥ १ ॥
॥ अष्टक २॥
कुमकुम जो मंजन सगर केसर। मलयागिरि घिसि चंदनं ॥१॥
अकल दुख्ख निरवार भौ के। चरन श्रीपति चर्चनं ॥ २ ॥
सोइ पूजि पावै सेव सुखदाता। दुरियत कर्म के खंडनं ॥ ३ ॥
श्रीपारसनाथ जप सूरज जैनराई। मूल नायक बंदनं ॥ ४ ॥
अर्थ-केशर और कुमकुम से पूरी तरह से मंजन करके और मलयगिरि के चंदन को घिस करके
इस भवसागर के अकल्पनीय (अकाल) कष्टों को समाप्त करने वाला श्रीपति जी के चरणों का यह
चर्चित रूप है। उस सुख देने वाले श्री पारसनाथ जी को पूजा एवं सेवा करके कर्म के पापों का खण्डन
होता है। श्री पारसनाथ जी जैनियों में परमश्रेष्ठ हैं और उन श्री पारसनाथ का जाप करो-इन जैनधर्म के
मूलनायक का शरीर सूर्य की भाँति (प्रकाश वान) है।
॥ अष्टक ३॥
बेल फूल चमेलि चंपा। काम कामोदिनि केतकी ॥ १ ॥
तास परमल बास ऊधौ। अगर आगर सेवती ॥ २ ॥
सोइ पूजि पावै सेव सुखदाता। दुरियत कर्म के खंडनं ॥ ३ ॥
श्रीपारसनाथ जप सूरज जैनराई। मूल नायक बंदनं ॥ ४ ॥
अर्थ-बेला, चमेली, चंपा, कुमोदनी, केतकी, इनके सुवास से नितान्त निर्मल परागयुक्त-
अगरबत्तियों के ढेर से सुवासित उन्हीं चरणों की सेवा करके सुख मिलता है और दूषित कर्मफल
खंडित होते हैं। श्री पारसनाथ जी का जप करो, जैनधर्म के इन मूलनायक का शरीर सूर्य की भाँति
चमक रहा है।
॥ अष्टक ४॥
खरि खरेला दाख खिरनी। आम स्त्रीफल लाइया ॥ १ ॥
नारियल नौरंग केला। प्रभुजी के चरन चढ़ाइया ॥ २ ॥
मोरी इतनी बिनती दयाल कौं। प्रभुनाथ के गुन गाइया ॥ ३ ॥