गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
] जो कि इस दी गई उपांतिम राशि से संयवित (associated) है । सब विभिन्न दी गई राशियों -> wait, "संयवित" or "संयुत"?
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"संयवित" -> wait, सं य वि त? Or संबंधित?
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स with anusvara: सं
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स with anusvara (सं)
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११५३or११५ १/२? Let's look at the header: -६. ११५३ ]or-६. ११५ १/२ ]? Ah, it's -६. ११५३ ]or-६. ११५ १/२ ]? Let's look at the fraction: ११५with a horizontal line and२below. Yes,११५ १/२` (115 1/2).
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११५३or११५ १/२? It's११५३or११५ १/२? It's११५३or११५ १/२? Let's write११५३or११५ १/२? Let's write११५३or११५ १/२? Let's write११५३or११५ १/२? Let's write११५३or११५ १/२? Let's write११५३or११५ १/२? Let's write११५३or११५ १/२? Let's write११५३or११५ १/२? Let's write `१
११६ ] गणितसारसंग्रहः [ -६. ११५½
अन्तिम अयुग्म स्थिति क्रम वाले अल्पतम शेष में जोड़कर परिणामी योगफल को ऊपर की भाजन श्रृंखला
के अन्तिम भाजक द्वारा विभाजित करने के पश्चात् प्राप्त संख्या को रखना चाहिये । इस प्रकार 'इस बाद
वाचक मान' को निकालना इष्ट होता है । अब इस नियम के अनुसार हम पहिले राशि अथवा समूह-
वाचक संख्या ६३ को छेद अथवा भाजक २३ द्वारा भाजित करते हैं, और तब हम जिस प्रकार दो
संख्याओं का महत्तम समापवर्त्य निकालते हैं उसी प्रकार की भाग विधि को यहाँ जारी रखते हैं ।
२३ ) ६३ ( २ यहाँ प्रथम भजनफल २ को उपेक्षित कर दिया
४६ १ जाता है; अन्य भजनफल बाजू के स्तम्भ में एक पंक्ति में
१७ ) २३ ( १ २ एक के नीचे एक लिखे गये हैं । अब हमें एक ऐसी
१७ १ संख्या चुनना पड़ती है जो जब अन्तिम शेष १ के द्वारा
६ ) १७ ( २ ४ गुणित की जाती है, और फिर ७ में जोड़ी जाती है, तो
१२ वह अन्तिम भाजक १ के द्वारा भाजन योग्य होती है ।
५ ) ६ ( १ इसलिये, हम १ को चुनते हैं, जो श्रृंखला में अन्तिम अंक
५ के नीचे लिखा हुआ है । इस चुनी हुई संख्या के नीचे,
१ ) ५ । ४ फिरसे चुनी हुई संख्या की सहायता से, उपर्युक्त भाग में
४ प्राप्त भजनफल लिखा जाता है । इस प्रकार हमें बाजू में
१ प्रथम स्तम्भ के अंकों में श्रृंखला अथवा वल्लिका प्राप्त
यहाँ हम पाँचवें शेष के साथ ही हो जाती है । तब हम श्रृंखला के नीचे उप अन्तिम अंक
भाग रोक देते हैं, क्योंकि वह भाजन अर्थात् १ को लिखकर उसके ऊपर के अंक ४ द्वारा गुणित
की श्रेणियों में अयुग्म स्थिति क्रम वाला करते हैं, और ८ जोड़ते हैं । यह ८, श्रृंखला की अंतिम
अल्पतम शेष है । संख्या है । परिणामी १२ इस तरह लिख दिया जाता है
१ — ५१ ताकि वह ४ के संवादी स्थान में हो । तत्पश्चात् इस १२ को
२ — ३८ वल्लिका श्रृंखला में उसके ऊपर के अंक १ द्वारा गुणित करते
१ — १३ हैं और १ जोड़ने पर (जो कि उसके उसी प्रकार नीचे है)
४ — १२ हमें १३ एक के संवादी स्थान में प्राप्त होता है । इसी
१ प्रकार, क्रिया को जारी रखकर हमें ३८ और ५१ भी प्राप्त
८
होते हैं जो २ और १ के संवादी स्थान में प्राप्त किये जाते हैं। इस ५१ को २३ द्वारा भाजित किया
जाता है; और शेष ५ एक गुच्छे में फलों की अल्पतम संख्या दृष्टिगत होती है । निम्नलिखित बीजीय
निरूपण द्वारा इस नियम का मूलभूत सिद्धान्त ( rationale ) स्पष्ट हो जावेगा—
( वा क + ब ) / आ = ख ( जो एक पूर्णांक है ) = फ₁ क + प₁, जहाँ प₁ = [ ( वा - आफ₁ ) क + ब ] / आ
∴ क = ( आ प₁ - ब ) / र₁, ( जहाँ र₁ = वा - आफ, जो प्रथम शेष है ) = फ₂ प₁ + प₂, जहाँ प₂
= ( र₂ प₁ - ब ) / र₁, और फ₂ दूसरा भजनफल है तथा र₂ दूसरा शेष है ।
इसलिये, प₁ = ( र₁ प₂ + ब ) / र₂ = फ₃ प₂ + प₃, जहाँ प₃ = ( र₃ प₂ + ब ) / र₂ और फ₃ तीसरा
भजनफल तथा र₃ तीसरा शेष है ।
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-६. ११५३] मिश्रकव्यवहारः [ ११७
के मिश्रित प्रश्न के हल के लिये इष्ट लता समान अंकों की शृङ्खला प्राप्त की जाती है । यह शृङ्खला
पहिले की भाँति नीचे से ऊपर की ओर बर्त्ती जाती है और, पहिले की तरह, परिणामी संख्या को इस
इसी तरह, प₂ = (र₂ प₃ - ब) / र₃ = फ४ प₃ + प४, जहाँ प४ = (र४ प₃ - ब) / र₃ है ; प₃ = (र₃ प४ + ब) / र४
= फ५ प४ + प५, जहाँ प५ = (र५ प४ + ब) / र४ है । इस प्रकार हमें निम्नलिखित सम्बन्ध प्राप्त होते हैं -
क = फ₂ प₁ + प₂ ; प₁ = फ₃ प₂ + प₃ ; प₂ = फ४ प₃ + प४ ; प₃ = फ५ प४ + प५ ;
प४ का मान इस तरह चुनते हैं ताकि (र५ प४ + ब) / र४ ( जो कि ऊपर बतलाए अनुसार प५ का मान
है ), एक पूर्णांक बन जावे । इस प्रकार, शृंखला फ₂, फ₃, फ४, प
११८ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ११५½-
अन्तिम भाजन शृङ्खला के प्रथम भाजक द्वारा विभाजित करते हैं । ( इस क्रिया में प्राप्त ) शेष को
(अधिक बड़े समूह वाचक मान सम्बन्धी) भाजक द्वारा गुणित करते हैं, और परिणामी गुणनफल में इस
अधिकबड़े समूह वाचक मान को जोड़ देते हैं । ( इस प्रकार दी गई समूह संख्या के इष्ट गुणक का
मान प्राप्त किया जाता है, जो दो विचाराधीन विशिष्ट विभाजनों का समाधान करता है ) ॥११५½॥
इस विधि का मूल भूत सिद्धान्त ( rationale ) निम्नलिखित विमर्श से स्पष्ट हो जावेगा—
( १ ) (बा₁क + व₁) / आ₁ पूर्णांक है; ( २ ) (बा₂क + व₂) / आ₂ पूर्णांक है; और ( ३ ) (बा₃क + व₃) / आ₃ पूर्णांक है ।
( १ ) में मानलो क का अल्पतम मान = स₁ है ।
( २ ) में मानलो क का अल्पतम मान = स₂ है ।
( ३ ) में मानलो क का अल्पतम मान = स₃ है ।
( ४ ) जब (१) और (२) दोनों का समाधान करना पड़ता है, तब दआ₁ + स₁ को क्षआ₂
- स₂ के तुल्य होना पड़ता है, ताकि स₁ - स₂ = क्षआ₂ - दआ₁ हो; अर्थात्, [आ₁द + (स₁ - स₂)] / आ₂
= क्ष, हो ।
अज्ञात मानवाली राशियों द और क्ष सहित होने से अनिर्धृत ( indeterminate )
समीकरण ( ४ ) से, जैसा कि पहले ही सिद्ध किया जा चुका है उसके अनुसार, द के अल्पतम धनात्मक
पूर्णांक को प्राप्त कर सकते हैं । द के इस मान को आ₁ द्वारा गुणित करने, और तब स₁ में जोड़ने पर
क का मान प्राप्त होता है जो ( १ ) और ( २ ) का समाधान करता है ।
मानलो यह त₁ है, और इन दोनों समीकारों का समाधान करने वाला क का और अधिक बड़ा
मान मानलो त₂ है ।
( ५ ) अब, त₁ + नआ₁ = त₂ है,
( ६ ) और, त₁ + मआ₂ = त₂ है ।
∴ आ₁ / आ₂ = म / न . इस प्रकार, आ₁ = म . प, और आ₂ = न . प, जहाँ आ₁ और आ₂ का
सबसे बड़ा साधारण गुणनखंड ( मह. समा. ) प है । ∴ म = आ₁ / प , और न = आ₂ / प .
( ५ ) अथवा ( ६ ) में इनका मान रखने पर, त₁ + (आ₁ आ₂) / प = त₂ होता है ।
इससे स्पष्ट है कि क का दूसरा उच्चतर मान जो दो समीकरणों का समाधान करता है वह आ₁
और आ₂ के लघुत्तम समापवर्त्य को निम्नतर मान में जोड़ने पर प्राप्त होता है ।
फिर से, मानलो तीनों सभी समीकारों का समाधान करने वाले क का मान व है ।
तब, व = त₁ + (आ₁ आ₂) / प × र, ( जहाँ र धनात्मक पूर्णांक है ) = ( मानलो ) त₁ + लर और
व = स₂ + ष आ₃ = त₁ + ल र , ∴ र = (ष आ₃ + स₃ - त₁) / ल होगा ।
पिछले समीकार में वल्लिका कुट्टीकार के सिद्धान्त का प्रयोग करने पर ष का मान प्राप्त हो जाता
-६. १२०$\frac{१}{२}$ ] मिश्रकव्यवहारः [ ११९
अत्रोद्देशकः
जम्बूजम्बीररम्भाक्रमुकपनसखर्जूरहिन्तालताली-
पुन्नागाम्राद्यनेकद्रुमकुसुमफलैर्नम्रशाखाधिरूढम् ।
भ्राम्यद्भृङ्गाब्जवापीशुकपिककुलनानाध्वनिव्याप्तदिकं
पान्थाः श्रान्ता वनान्तं श्रमनुदममलं ते प्रविष्टाः प्रहृष्टाः ॥ ११६$\frac{१}{२}$ ॥
राशित्रिषष्टिः कदलीफलानां संपीड्य संक्षिप्य च सप्तभिस्तैः ।
पान्थैस्त्रयोविंशतिभिर्विशुद्धा राशेस्त्वमेकस्य वद प्रमाणम् ॥ ११७$\frac{१}{२}$ ॥
राशीन् पुनर्द्वादश दाडिमानां समस्य संक्षिप्य च पञ्चभिस्तैः ।
पान्थैर्नैरैर्विंशतिभिर्निरैकैर्भक्तांस्तथैकस्य वद प्रमाणम् ॥ ११८$\frac{१}{२}$ ॥
दृष्ट्वाम्राशीन् पथिको यथैकत्रि
१२० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १२१½-
दृष्ट्वाम्राशिमपहाय च सप्त पञ्चाष्टकेऽष्टभिः पुनरपि प्रविहाय तस्मात् ।
त्रीणि त्रयोदशभिरुद्धलिते विशुद्धः पान्यैर्वने गणक मे कथयैकराशिम् ॥ १२१½ ॥
द्वाभ्यां त्रिभिश्चतुर्भिः पञ्चभिरेकः कपित्थफलराशिः ।
भक्तो रूपाग्रस्तत्प्रमाणमाचक्ष्व गणितज्ञ ॥ १२२½ ॥
द्वाभ्यामेकस्त्रिभिर्द्वौ च चतुर्भिर्भाजिते त्रयः । चत्वारि पञ्चभिः शेषः को राशिर्वद मे प्रिय ॥१२३½॥
द्वाभ्यामेकस्त्रिभिशुद्धश्चतुर्भिर्भाजिते त्रयः । चत्वारि पञ्चभिः शेषः को राशिर्वद मे प्रिय ॥१२४½॥
द्वाभ्यां निरग्र एकाग्रस्त्रिभिर्नाग्रो विभाजितः । चतुर्भिः पञ्चभिर्भक्तो रूपाग्रो राशिरेष कः ॥१२५½॥
द्वाभ्यामेकस्त्रिभिः शुद्धश्चतुर्भाजिते त्रयः । निरग्रः पञ्चभिर्भक्तः को राशिः कथयाधुना ॥१२६½॥
दृष्ट्वा जम्बूफलानां पथि पथिकजनै राशयस्तत्र राशी
द्वौ त्र्यग्रौ तौ नवानां त्रय इति पुनरेकादशानां विभक्ताः ।
पञ्चाग्रास्ते यतीनां चतुरधिकतराः पञ्च ते सप्तकानां
कुट्टीकारार्थविन्मे कथय गणक संचिन्त्य राशिप्रमाणम् ॥ १२७½ ॥
वनान्तरे दाडिमराशयस्ते पान्यैस्त्रयः सप्तभिरेकशेषाः ।
सप्त त्रिशेषा नवभिर्विभक्ताः पञ्चाष्टभिः के गणक द्विरग्राः ॥ १२८½ ॥
वन में आमों की ढेरियाँ देखने के बाद और उनमें ७ फल निकालने के पश्चात् उन्हें ८ यात्रियों
में बराबर-बराबर बाँट दिया गया । और जब, फिर से, उन्हीं ढेरियों में से ३ फल निकाल लिये गये
तब उन्हें १३ यात्रियों में बाँट दिया गया । दोनों दशाओं में कुछ भी शेष न रहा । हे गणितज्ञ ! इस
केवल एक ढेरी का संख्यात्मक मान (फलों की संख्या) बतलाओ ॥ १२१½ ॥
कपित्थ फलों की केवल एक ढेरी के फलों को २, ३, ४ अथवा ५ मनुष्यों में विभाजित करने
पर प्रत्येक दशा में शेष १ बचता है । हे गणितवेत्ता ! उस ढेरी में फलों की संख्या बतलाओ ॥१२२½॥
जब २ द्वारा भाजित हो तब शेष १ रहता है, जब ३ द्वारा भाजित हो तब शेष २, जब ४ द्वारा
तब शेष ३, जब ५ द्वारा तब शेष ४ है । हे मित्र ! ऐसी ढेरी में कितने फल हैं ? ॥ १२३½ ॥
जब २ द्वारा भाजित हो तब शेष १ है, जब ३ द्वारा तब शेष कुछ नहीं है, जब ४ द्वारा तब
शेष ३ है, जब ५ द्वारा तब शेष ४ है । ढेरी का संख्यात्मक मान बतलाओ ॥ १२४½ ॥
जब २ द्वारा भाजित हो तब शेष कुछ नहीं है, जब ३ द्वारा तब शेष १, जब ४ द्वारा तब शेष
कुछ नहीं है; और जब ५ द्वारा भाजित हो तब शेष १ रहता है । यह राशि क्या है ? ॥ १२५½ ॥
जब २ द्वारा भाजित हो तब शेष १ है, जब ३ द्वारा तब शेष कुछ नहीं है, जब ४ द्वारा तब
शेष ३, और जब ५ द्वारा भाजित हो तब शेष कुछ नहीं है । यह राशि कौन है ? ॥ १२६½ ॥
रास्ते में यात्रियों ने जम्बू फलों की कुछ बराबर ढेरियाँ देखीं । उनमें से २ ढेरियाँ ९ साधुओं
में बराबर-बराबर बाँटने पर ३ फल शेष रहे । फिर से, ३ ढेरियाँ इसी प्रकार ११ व्यक्तियों में बाँटने
पर ५ फल शेष बचे, पुनः ५ ढेरियों को ७ व्यक्तियों में बराबर बाँटने पर शेष ४ फल बचे । हे विभाजन
की कुट्टीकार विधि को जानने वाले अंकगणितज्ञ ! ठीक तरह सोचकर ढेरी का संख्यात्मक मान
बतलाओ ॥ १२७½ ॥
- वन के अन्तर में अनार की ३ बराबर ढेरियाँ ७ यात्रियों में बराबर बाँट देने पर १ फल शेषफल
है; ७ ऐसी ढेरियाँ उसो प्रकार ९ में बाँटने पर शेष ३ फल, और पुनः ५ ऐसो ढेरियाँ ८ में बाँट देने
पर २ फल बचते हैं । हे अंकगणितज्ञ ! प्रत्येक का संख्यात्मक मान बतलाओ ॥ १२८½ ॥
-६. १३०½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १२१
भक्ता द्वियुक्ता नवभिस्तु पञ्च युक्ताश्चतुर्भिंश्च षडष्टभिस्तैः ।
पान्थैर्जनैः सप्तभिरेकयुक्ताश्चत्वार एते कथय प्रमाणम् ॥ १२९½ ॥
अग्रशेषविभागमूलानयनसूत्रम्—
शेषांशाग्रवधो युक् स्वाग्रेणान्यस्तदंशकेन गुणः । यावद्भागास्तावद्विच्छेदाः स्युस्तदग्रगुणाः॥१३०½॥
समान फलों की संख्या वाली ५ ढेरियाँ थीं, जिनमें २ फल मिलाने के पश्चात् ९ यात्रियों में
बाँटने पर कुछ न रहा । ६ ऐसी ढेरियों में ४ फल मिलाने के पश्चात् उसी प्रकार ८ में बाँटने पर,
और ४ ढेरियों में १ फल मिलाकर उसी प्रकार ७ में बाँटने पर शेष कुछ न रहा । ढेरी का संख्यात्मक
मान बतलाओ ॥ १२९½ ॥
इच्छानुसार वितरित मूल राशि को निकालने के लिये नियम, जब कि कुछ विशिष्ट ज्ञात राशियों
को हटाने पर शेष को प्राप्त किया जाता है :—
हटाई जाने वाली ( दी गई ) ज्ञात राशि और ( दी गई ज्ञात राशि को दे चुकने पर ) जो
शेष विशिष्ट भिन्नीय भाग बच रहता है उसका भिन्नीय समानुपात—इन दोनों का गुणनफल प्राप्त करो ।
इसके बाद की राशि, इस गुणनफल में पिछले शेष में से निकाली जाने वाली विशिष्ट ज्ञात राशि को
जोड़कर प्राप्त की जाती है । और, इस परिणामी योग को उसी प्रकार के ऊपर कथित शेष के शेष रहने
वाले भिन्नीय समानुपात द्वारा गुणित किया जाता है । यह उतने बार करना पड़ता है जितने कि वितरण
करने पड़ते हैं । तत्पश्चात् इस तरह प्राप्त राशियों के हरों को अलग कर देना चाहिये । हर रहित
राशियों और शेष के ऊपर कथित शेष रहने वाले भिन्नीय समानुपात के उत्तरोत्तर गुणनफलों को ज्ञात
राशि और ( अन्य तत्व, जैसे, अज्ञात राशि का गुणांक ) अपवर्त्य ( तथा भाजक के नाम से वल्लिका
कुट्टीकार के प्रश्न में ) उपयोग में लाते हैं ॥ १३०½ ॥
( १३०½ ) यहाँ हटाई जाने वाली ज्ञात राशि अग्र कहलाती है । अग्र के हटाने के पश्चात् जो
बच रहता है वह 'शेष' कहलाता है । जो दिया अथवा लिया जाता है ऐसे शेष के भिन्न को अग्रांश
कहते हैं, और अग्रांश के दिये अथवा लिये जानेपर जो शेष बच रहता है वह शेषांश अथवा शेष
का शेष रहनेवाला भिन्नीय समानुपात कहलाता है, जैसे, जहाँ क का मान निकालना पड़ता है, और 'अ'
विभाजित हुए भिन्नीय समानुपात ⅓ को लेकर प्रथम विभाजन सम्बन्धी अग्र है, वहाँ (क - अ)/३ अग्रांश है और
( क - अ ) - (क - अ)/३ शेषांश है । १३२½ - १३३½ वीं गाथा के प्रश्न को हल करने पर यह नियम
स्पष्ट हो जावेगा—
यहाँ १ पहिला अग्र है, और ⅓ पहिला अग्रांश है; इसलिये ( १ - ⅓ ) या ⅔ शेषांश है । अब,
अग्र और शेषांश का गुणनफल १ × ⅔ या ⅔ है । इसे दो स्थानों में लिखो, यथा—
⎧ २/३ ⎫
⎩ २/३ ⎭ .................................................( १ )
अब राशियों, ⎧ २/३ ⎫ की पुनरावृत्ति करो; किसी एक राशि में दूसरे अग्र १ को जोड़ दो ।
⎩ २/३ ⎭
तब हमें ⎧ ५/३ ⎫ प्राप्त होता है । दोनों को दूसरे शेषांश अर्थात् १ - ⅓ या ⅔ द्वारागुणित करो, ताकि
⎩ २/३ ⎭
⎧ १०/९ ⎫ प्राप्त हो ।................................................( २ )
⎩ ४/९ ⎭
इन अंकों को लेकर पहिले की तरह तीसरे अग्र १ को जोड़ो जिससे ⎧ १९/९ ⎫ प्राप्त होगा ।
⎩ ४/९ ⎭
ग० सा० सं०-१६
१२२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १३१½-
अत्रोद्देशकः
आनीतवत्याम्रफलानि पुंसि प्रागेकमादाय पुनस्तदर्धम् ।
गतेऽग्रपुत्रे च तथा जघन्यस्तत्रावशेषार्धमथो तमन्यः ॥ १३१½ ॥
प्रविश्य जैनं भवनं त्रिपूरुषं प्रागेकमभ्यर्च्य जिनस्य पादे¹ ।
शेषत्रिभागं प्रथमेऽनुमाने तथा द्वितीये च तृतीयके तथा ॥ १३२½ ॥
शेषत्रिभागद्वयतश्च शेषत्र्यंशद्वयं चापि ततस्त्रिभागान् ।
कृत्वा चतुर्विंशतितीर्थनाथान् समर्च्चयित्वा गतवान् विशुद्धः ॥ १३३½ ॥
इति मिश्रकव्यवहारे साधारणकुट्टीकारः समाप्तः ।
१. हस्तलिपि में पादौ शब्द है जो यहाँ शुद्ध प्रतीत नहीं होता है । B में पादे के लिये के ज्ञान्
पाठ है ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी मनुष्य द्वारा घर पर आम्र फलों को लाने पर उसके बड़े पुत्र ने पहिले एक फल लिया
और तब शेष के आधे लिये । बड़े लड़के के जाने पर, छोटे लड़के ने भी शेष में से उसी प्रकार फल
लिये । ( उसने, तत्पश्चात् , जो शेष रहा उसका आधा लिया ); और अन्य पुत्र ने शेष आधे लिये ।
पिता के द्वारा लाये हुए फलों की संख्या निकालो । ॥ १३१½ ॥ कोई मनुष्य फूल लेकर ऐसे जिन-
मंदिर में गया जो मनुष्य की ऊँचाई से तिगुना ऊँचा था । पहिले उसने इन फूलों में से पूजन में जिन
भगवान् के चरणों में एक फूल चढ़ाया, और तब पूजन में शेष फूलों के एक तिहाई जिन भगवान् की
प्रथम ऊँचाई-माप वाली प्रतिमा के चरणों में भेंट किये । शेष दो तिहाई फूलों में से उसने उसी प्रकार
द्वितीय ऊँचाई-माप वाली प्रतिमा के चरणों में भेंट किये, और तब उसी प्रकार तीसरी ऊँचाई-माप
वाली प्रतिमा के चरणों में भेंट किये । अंत में जो दो तिहाई बचे वे भी तीन बराबर भागों में बाँटे
गये; और इन भागों में से एक-एक भाग आठ-आठ तीर्थंकरों को ( इस प्रकार कुल २४ तीर्थंकरों को )
भेंट करने पर उसके पास एक भी फूल न बचा । बतलाओ उसके पास कितने फूल थे ?
॥ १३२½-१३३½ ॥
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में, साधारण कुट्टीकार नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
दूसरे शेषांश १ - १/३ या २/३ द्वारा और अन्तिम अंश या १/३ द्वारा गुणित करो जिससे { ३८/८१, ८/८१ } प्राप्त
होगा ।...........................................................( ३)
( १ ), ( २ ), ( ३ ) द्वारा दर्शाये गये भिन्नों की इन तीन राशियों में प्रथम भिन्नों के हरों को
अलग कर देते हैं, और अंश वल्लिका कुट्टीकार में ऋणात्मक अग्र निरूपित करते हैं जहाँ उन राशियों में
दूसरे भिन्नों में से प्रत्येक अंश और हर क्रमशः भाज्य, गुणक और भाजक का निरूपण करते हैं । इस
प्रकार, (२ क - २)/३ पूर्णांक; (४ क - १०)/९ पूर्णांक, और (८ क - ३८)/८१ पूर्णांक प्राप्त होते हैं । इन तीन दशाओं
को समाधानिक करनेवाला क का मान, फूलों की संख्या होती है ।
-६. १३५½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १२३
विषमकुट्टीकारः
इतः परं विषमकुट्टीकारं व्याख्यास्यामः । विषमकुट्टीकारस्य सूत्रम्—
मतिसंगुणितौ छेदौ योज्योनत्याज्यसंयुतौ राशिहृतौ ।
भिन्ने कुट्टीकारे गुणकारोऽयं समुद्दिष्टः ॥ १३४½ ॥
अत्रोद्देशकः
राशिः षट्केन हतो दशान्वितो नवहृतो निरवशेषः ।
दशभिर्हीनश्च तथा तद्गुणकौ १ कौ ममाशु संकथय ॥ १३५½ ॥
१. B गुणकारौ ।
विषम कुट्टीकार*
इसके पश्चात् हम विषम कुट्टीकार की व्याख्या करेंगे ।
विषम कुट्टीकार सम्बन्धी नियम :—
दिया हुआ भाजक दो स्थानों में लिख लिया जाता है, और प्रत्येक स्थान में मन से चुनी हुई
संख्या द्वारा गुणित किया जाता है । ( इस प्रश्न में ) जोड़ने के लिये दी गई ( ज्ञात ) राशि इन स्थानों
के किसी एक गुणनफल में से घटाई जाती है । घटाई जाने के लिये दी गई राशि अन्य स्थान में
लिखे हुए गुणनफल में जोड़ दी जाती है । इस प्रकार प्राप्त दोनों राशियाँ ( प्रश्नानुसार विभाजित की
जाने वाली अज्ञात राशियों के ) ज्ञात गुणांक ( गुणक ) द्वारा भाजित की जाती हैं । इस तरह
प्राप्त प्रत्येक भजनफल इष्ट राशि होती है, जो भिन्न कुट्टीकार की रीति में दिये गये गुणक द्वारा गुणित
की जाती है । ॥ १३४½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई राशि ६ द्वारा गुणित होकर, तब १० द्वारा बढ़ाई जाकर और तब ९ द्वारा भाजित होकर
कुछ भी शेष नहीं छोड़ती । इसी प्रकार, ( कोई दूसरी राशि ६ द्वारा गुणित होकर ), तब १० द्वारा
ह्रासित होकर ( और तब ९ द्वारा भाजित होकर ) कुछ शेष नहीं छोड़ती । उन दो राशियों को शीघ्र
बतलाओ ( जो दिये गये गुणक से यहाँ इस प्रकार गुणित की जाती हैं । ) ॥ १३५½ ॥
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में, विषम कुट्टीकार नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
- विषम और भिन्न दोनों शब्द कुट्टीकार के संबंध में उपयोग में लाये गये हैं और दोनों के
स्पष्टतः एक से अर्थ हैं । ये इन नियमों के प्रश्नों में आने वाली भाज्य ( dividend ) राशियों के
भिन्नीय रूप को निर्देशित करते हैं ।
१२४ ] गणितसारसंग्रहः [ ६०१३६½-
सकलकुट्टीकारः
सकलकुट्टीकारस्य सूत्रम्—
भाज्यच्छेदाग्रशेषैः प्रथमहृतिफलं त्याज्यमन्योन्यभक्तं
न्यस्यान्ते साग्रमूर्ध्वैरुपरिगुणयुतं तैः समानासमाने ।
स्वर्णघ्नं व्याप्तहारौ गुणधनमृणयोश्चाधिकाग्रस्य हारं
हृत्वा हृत्वा तु साग्रान्तरधनमधिकाग्रान्वितं हारघातम् ॥ १३६½ ॥
सकल कुट्टीकार
सकल कुट्टीकार सम्बन्धी नियम :—
विभाजित की जाने वाली अज्ञात राशि के भाज्य गुणक द्वारा अग्रनयनित (carried on) तथा
भाजक और उत्तरोत्तर परिणामी शेषों द्वारा अग्रनयनित भाजनों में प्रथम के भजनफल को
अलग कर दिया जाता है। इस पारस्परिक भाजन द्वारा, जो कि भाजक और शेष के समान हो जाने
तक किया जाता है, अन्य भजनफल प्राप्त किये जाते हैं, जो ऊर्ध्वाधर श्रृंखला में अन्तिम तुल्य शेष और
भाजक के साथ लिखे जाते हैं। इस श्रृंखला के निम्नतम अंक में भाजक द्वारा विभाजित की गई ज्ञात
राशि से प्राप्त शेष को जोड़ना पड़ता है । ( तब, श्रृंखला में इन संख्याओं द्वारा, ) वह योग प्राप्त
करते हैं, जो उत्तरोत्तर निम्नतम संख्या में उसके ठीक ऊपर की दो संख्याओं का गुणनफल जोड़ने पर
प्राप्त होता है । ( यह विधि तब तक की जाती है जब तक कि श्रृंखला का उच्चतम अंक भी क्रिया में
शामिल नहीं हो जाता । ) उसके बाद यह परिणामी योग और प्रश्न में दिया गया भाजक, दो शेषों के
रूप में, अज्ञात राशि के दो मानों को उत्पन्न करता है। इस राशि के मानों को प्रश्न में दिये गये
भाज्य गुणक द्वारा गुणित किया जाता है। इस प्रकार प्राप्त होने वाले दो मान या तो जोड़ी जाने
वाली दी गई ज्ञात राशि से सम्बन्धित रहते हैं अथवा घटाई जाने वाली दी गई ज्ञात राशि से
सम्बन्धित रहते हैं, जब कि ऊपर कथित भजनफलों की श्रृंखला की अंक पंक्ति की संख्या क्रमशः युग्म
अथवा अयुग्म होती है। ( जहाँ दिये गये समूह एक से अधिक प्रकार से बढ़ाये जाने पर अथवा
घटाये जाने पर एक से अधिक अनुपात में वितरित किये जाना होते हैं वहाँ ) अधिक बड़े समूहमान से
सम्बन्धित भाजक ( जिसे ऊपर समझाये अनुसार दो विशिष्ट विभाजनों में से किसी एक के सम्बन्ध में
प्राप्त किया जाता है ) को ऊपर के अनुसार बार-बार छोटे समूह मान से संबंधित भाजक द्वारा भाजित
किया जाता है, ताकि उत्तरोत्तर भजनफलों की लता समान श्रृंखला इस दशा में भी प्राप्त हो सके । इस
श्रृंखला के निम्नतम भजनफल के नीचे इस अंतिम उत्तरोत्तर भाग में अयुग्म स्थिति क्रमवाले अल्पतम
शेष के मन से चुने हुए गुणक को रखा जाता है। फिर इसके नीचे वह संख्या रखी जाती है, जो दो
समूह-मानों के अंतर को ऊपर कथित मन से चुने हुए गुणक से गुणित अयुग्म स्थिति क्रमवाले अल्पतम
शेष के गुणनफल में जोड़नेपर, और तब इस परिणामी योग को ऊपर की भाजन श्रृंखला के अंतिम
भाजक द्वारा भाजित करने पर प्राप्त होती है। इस प्रकार लता सदृश अंकों की श्रृंखला प्राप्त होती है,
जिसकी आवश्यकता इस पिछले प्रकार के प्रश्न के साधन के लिये होती है। यह श्रृंखला नीचे से ऊपर
तक पहिले की भाँति बर्त्ती जाती है, और परिणामी संख्या पहिले को तरह इस अंतिम भाजन श्रृंखला में
प्रथम भाजक द्वारा भाजित की जाती है। इस क्रिया से प्राप्त शेष को अधिक बड़े समूह-मान से सम्ब-
न्धित भाजक द्वारा गुणित किया जाना चाहिये। परिणामी गुणनफल में यह अधिक बड़ा समूहमान जोड़
देना चाहिये । ( इस प्रकार, दिये गये समूहमान के इष्ट गुणक का मान प्राप्त करते हैं ताकि वह
विचाराधीन दो उल्लिखित विभाजनों का समाधान करे ) ॥ १३६½ ॥
( १३६½ ) यह नियम १३७½ वीं गाथा में दिये गये प्रश्न को हल करने पर स्पष्ट हो जावेगा—
-६. १३७½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १२५
अत्रोद्देशकः
सप्तोत्तरसप्तत्या युतं शतं योज्यमानमष्टत्रिंशत् । सैकशतद्वयभक्तं को गुणकारो भवेदत्र ॥ १३७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
अज्ञात गुणनखंड का भाज्य ( dividend ) गुणक १७७ है । २४०, स्व में जोड़े जानेवाले
अथवा घटाये जाने वाले गुणनफल से सम्बन्धित ज्ञात राशि है; पूरी राशि को २०१ द्वारा भाजित
करने पर शेष कुछ नहीं रहता । यहाँ अज्ञात गुणनखण्ड कौन सा है, जिससे की दिया गया भाज्यगुणक
गुणित किया जाना है ? ॥ १३७½ ॥ ३५ और अन्य राशियाँ, जो संख्या में १६ हैं, और उत्तरोत्तर मान
प्रश्न है कि जब (१७७ क ± २४०)/२०१ पूर्णांक है तो क के मान क्या होंगे ? साधारण गुणन खंडों को निरसित
करने पर हमें (५९ क ± ८०)/६७ पूर्णांक प्राप्त होता है । लगातार किये जाने वाले भाग की इष्ट विधि को
निम्नलिखित रूप में कार्यान्वित करते हैं—
६७)५९(० प्रथम भजनफल को अलग कर, अन्य
० १ भजनफल, श्रृंखला में इस प्रकार लिखे जाते हैं—
५९)६७(१ ७ इसके नीचे १ और १ को अग्रिम
५९ २ लिखा जाता है । ये अन्तिम भाजक और शेष
८)५९(७ १ समान होते हैं । यहाँ भी जैसा कि वल्लिका
५६ १ कुट्टीकार में होता है, यह देखने योग्य है कि
३)८(२ १ अन्तिम भाजन में कोई शेष नहीं रहता क्योंकि
६ १ + १३ = १४ २ में १ का पूरा-पूरा भाग चला जाता है । परन्तु
२)३(१ चूँकि, अन्तिम शेष, श्रृंखला के लिये चाहिये,
२ इसलिये वह अन्तिम भजनफल छोटा से छोटा
१)२(१ बनाकर रख दिया जाता है, और अन्तिम
१ संख्या १ में यहाँ, १३ जोड़ते हैं, जो कि ८० में
१
से ६७ का भाग देने पर प्राप्त होता है । इस प्रकार १४ प्राप्त कर, उसे श्रृंखला के अन्त में नीचे
लिख दिया जाता है । इस प्रकार श्रृंखला पूरी हो जाती है । इस श्रृंखला के अंकों के लगातार किये
गये गुणन और जोड़ द्वारा, ( जैसा कि गाथा ११५½ के नोट में पहिले ही समझाया जा चुका है, ) हमें
३९२ प्राप्त होता है । इसे ६७ द्वारा विभाजित किया जाता है । शेष ५७ क का एक मान होता है,
जब कि ८० को श्रृंखला में अंकों की संख्या अयुग्म होने के कारण ऋणात्मक ले लिया जाता है । परन्तु
जब ८० को धनात्मक लिया जाता है, तब क का मान ( ६७-५७ ) अथवा १०
१ — ३९२ होता है । यदि श्रृंखला में अंकों की संख्या युग्म होती है, तो क का प्रथम
७ — ३४५ निकाला हुआ मान धनात्मक अग्र सम्बन्धी होता है । यदि यह मान भाजक में से
२ — ४७ घटाया जाता है तो क का ऋणात्मक अग्र सम्बन्धी मान प्राप्त होता है ।
१ — १६
१ — १५ इस विधि का सिद्धान्त उसी प्रकार है जैसा कि वल्लिका कुट्टीकार के सम्बन्ध
१ में है । परन्तु, उनमें अन्तर यही है कि यहाँ श्रृंखला में दो अन्तिम अंक दूसरी
१४ विधि द्वारा प्राप्त किये जाते हैं । अध्याय ६ की ११५½ वीं गाथा के नियम के नोट
१२६ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १३८½-
पञ्चत्रिंशत् त्र्युत्तरषोडशपदान्येव हाराश्च ।
द्वात्रिंशद्व्यधिकैका त्र्युत्तरतोऽग्राणि के धनर्णगुणाः ॥ १३८½ ॥
में ३ द्वारा बढ़ती हुई हैं, दत्त भाज्यगुणक हैं । दिये गये भाजक, ३२ ( और अन्य ) हैं, जो उत्तरोत्तर
२ द्वारा बढ़ते जाते हैं । और, १ को उत्तरोत्तर ३ द्वारा बढ़ाते जाने पर ज्ञात धनात्मक और ऋणात्मक
सम्बन्धित राशियाँ उत्पन्न होती हैं । ज्ञात भाज्य-गुणक के अज्ञात गुणनखण्डों के मान क्या हैं जबकि
वे धनात्मक या ऋणात्मक ज्ञात संख्याओं के साथ योगरूप से सम्बन्धित हैं ? ॥ १३८½ ॥
में दिये गये मूलभूत सिद्धान्त में अयुग्म स्थिति क्रम वाले शेष के साथ सम्बन्धित अग्र ब का बीजीय
चिन्ह वही है जो इस प्रश्न में दिया गया है, परन्तु युग्म स्थिति क्रमवाले शेष के साथ सम्बन्धित अग्र
ब का चिन्ह प्रश्न में जैसा दिया गया है उसके विपरीत है; इसलिये जब अयुग्म स्थिति क्रमवाले शेष तक
लगातार भाजन किया जाता है तब प्राप्त क का मान उस अग्र के सम्बन्ध में होता है जिसका चिन्ह
अपरिवर्तित है । और दूसरी ओर, जब लगातार भाजन युग्म स्थिति क्रमवाले शेष तक ले जाया जाता
है तब वहाँ से प्राप्त क का मान उस अग्र के सम्बन्ध में होता है जिसका चिन्ह परिवर्तित है । जब प्राप्त
शेषों की संख्या अयुग्म होती है, तब श्रृंखला में भजनफलों की संख्या युग्म होती है; और जब शेषों की
संख्या युग्म होती है, तब श्रृंखला में भजनफलों की संख्या अयुग्म होती है । कारण यह है कि इस
नियम में अन्तिम शेष से सम्बन्धित अग्र हमेशा धनात्मक लिया जाता है, इसलिये इस धनात्मक अग्र
के सम्बन्ध में क का मान प्राप्त होता है जब कि अंतिम शेष अयुग्म स्थिति क्रममें हो । वह ऋणात्मक
अग्र के सम्बन्ध में तब प्राप्त होता है जब कि अंतिम शेष युग्म स्थिति क्रम में हो । दूसरे शब्दों में,
यदि भजनफलों की संख्या युग्म हो, तब धनात्मक अग्र सम्बन्धी मान प्राप्त होता है; और जब भजनफलों
की संख्या अयुग्म हो, तब ऋणात्मक अग्र सम्बन्धी मान प्राप्त होता है ।
इस प्रकार, धनात्मक और ऋणात्मक अग्रों के सम्बन्ध में क का मान प्राप्त करने पर दूसरा मान,
इस मानको प्रश्न के भाजक में से घटाकर प्राप्त करते हैं । यह निम्नलिखित निरूपण से स्पष्ट हो
जावेगा :— (आ क ± ब) / बा = एक पूर्णांक । यहाँ मानलो क = ष; तब, (आ ष + ब) / बा = एक पूर्णांक । हम
जानते हैं कि (आ बा) / बा भी एक पूर्णांक है । इसलिये (आ बा) / बा – (आ ष + ब) / बा , अथवा [आ (बा – ष) – ब] / बा भी
एक पूर्णांक है । यहाँ यह देखने योग्य है, कि तीनों दी गईं संख्यात्मक राशियों के साधारण गुणनखंडों को
लगातार भाजन के आरम्भ करने के पूर्व ही हटा देते हैं । अंतिम भाजक और अंतिम शेष बराबर होना
चाहिये इसलिये इन में से प्रत्येक १ होता है । 'मति' जिसे वल्लिका कुट्टीकार के सम्बन्ध में नियमानुसार
चुनना पड़ता है, और भजनफलों की श्रृंखला के नीचे लिखना पड़ता है, वह इस नियम में हमेशा १
रहती है । अंतिम भाजक भी १ होता है । इसलिये वल्लिका कुट्टीकार में 'मति' यहाँ अंतिम भाजक का
स्थान ले लेती है । इसके बाद देखा जायगा कि इस नियम द्वारा प्राप्त श्रृंखला का अंतिम अंक ( १ +
अग्र ) उतना ही रहता है जितना कि वल्लिका कुट्टीकार में प्राप्त श्रृंखला का अंतिम अंक । यह अंतिम
अंक, अंतिम भाजक को अग्र तथा मति और अंतिम शेष के गुणनफल के योग द्वारा विभाजित करने
पर प्राप्त करते हैं । यथा, अंतिम अंक = [ अंतिम भाजक ] ÷ { अग्र + ( मति × अंतिम शेष ) }
-६. १४३½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १२७
अधिकाल्पराशयोरपरायोर्मूलमिश्रविभागसूत्रम्—
ज्येष्ठाग्रमहाराशेर्जघन्यफलताडितोनमपनीय ।
फलवर्गशेषभागो ज्येष्ठार्घोऽन्यो गुणस्य विपरीतम् ॥ १३९½ ॥
अत्रोद्देशकः
नवानां मातुलुङ्गानां कपित्थानां सुगन्धिनाम् । सप्तानां मूल्यसंमिश्रं सप्तोत्तरशतं पुनः ॥१४०½॥
सप्तानां मातुलुङ्गानां कपित्थानां सुगन्धिनाम् । नवानां मूल्यसंमिश्रमेकोत्तरशतं पुनः ॥ १४१½ ॥
मूल्ये ते वद मे शीघ्रं मातुलुङ्गकपित्थयोः । अनयोर्गणक त्वं मे कृत्वा सम्यक् पृथक् पृथक् ॥१४२½॥
बहुराशिमिश्रतन्मूल्यमिश्रविभागसूत्रम्—
इष्टघ्नफलैरूनितलाभादिष्टप्राप्तफलमसकृत् । तैरूनितफलपिण्डस्तच्छेदा गुणयुतास्तदर्घाः स्युः ॥१४३½॥
बड़ी और छोटी संख्याओं वाली वस्तुओं की कीमतों के दिये गये मिश्र योगों में से दो भिन्न
वस्तुओं की विनिमयशील बड़ी और छोटी संख्या की कीमतों को अलग-अलग करने के लिये नियम—
दो प्रकार की वस्तुओं में से किसी एक की संवादी बड़ी संख्या द्वारा गुणित उच्चतर मूल्य-योग
में से दो प्रकार की वस्तुओं में से अन्य सम्बन्धी छोटी संख्या द्वारा गुणित निम्नतर मूल्य-संख्या
घटाओ । तब, परिणाम को इन वस्तुओं सम्बन्धी संख्याओं के वर्गों के अन्तर द्वारा भाजित करो । इस
प्रकार प्राप्त फल अधिक संख्या वाली वस्तुओं का मूल्य होता है । दूसरा अर्थात् छोटी संख्या वाली
वस्तु का मूल्य गुणकों ( multipliers ) को परस्पर बदल देने से प्राप्त हो जाता है ॥१३९½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
९ मातुलुङ्ग ( citron ) और ७ सुगन्धित कपित्थ फलों की मिश्रित कीमत १०७ है । पुनः ७
मातुलुङ्ग और ९ सुगन्धित कपित्थ फलों की कीमत १०१ है । हे अंकगणितज्ञ ! मुझे शीघ्र बताओ
कि एक मातुलुङ्ग और एक कपित्थ के दाम अलग-अलग क्या हैं ? ॥ १४०½-१४२½ ॥
दिये गये मिश्रित मूल्यों और दिये गये मिश्रित मानों में से विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के
विभिन्न मिश्रित परिमाणों की संख्याओं और मूल्यों की अलग-अलग करने के लिये नियम—
( विभिन्न वस्तुओं की ) दी गई विभिन्न ( मिश्रित ) राशियों को मन से चुनी हुई संख्या द्वारा
गुणित किया जाता है । इन मिश्रित राशियों के दिये गये मिश्रित मूल्य को इन गुणनफलों के मानों
द्वारा अलग अलग हासित किया जाता है । एक के बाद दूसरी परिणामी राशियों को मन से चुनी हुई
संख्या द्वारा भाजित किया जाता है और शेषों को फिर से मन से चुनी हुई संख्या द्वारा भाजित किया
जाता है । इस विधि को बारबार दुहराना पड़ता है । विभिन्न वस्तुओं की दी गई मिश्रित राशियों को
उत्तरोत्तर ऊपरी विधि में संवादी भजनफलों द्वारा हासित किया जाता है । इस प्रकार, मिश्रयोगों में
विभिन्न वस्तुओं के संख्यात्मक मानों को प्राप्त किया जाता है । मन से चुने हुए गुणी ( multi-
pliers ) को उपर्युक्त लगातार भाग की विधि वाले मन से चुने हुए भाजकों में मिलाने से प्राप्त
राशियाँ तथा उक्त गुणक
१२८ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १४४½-
अत्रोद्देशकः
अथ मातुलुङ्गकदलीकपित्थदाडिमफलानि मिश्राणि ।
प्रथमस्य सैकविंशतिरथ द्विरग्रा द्वितीयस्य ॥ १४४½ ॥
विंशतिरथ सुरभीणि च पुनस्त्रयोविंशतिस्तृतीयस्य ।
तेषां मूल्यसमासस्त्रिसप्ततिः किं फलं कोऽर्घः ॥ १४५½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
यहाँ, ३ ढेरियों में सुगन्धित मातुलुङ्ग, कदली, कपित्थ और दाडिम फलों को इकट्ठा किया
गया है । प्रथम ढेरी में २१, दूसरी में २२, और तीसरी में २३ हैं । इन ढेरियों में से प्रत्येक की
मिश्रित कीमत ७३ है । प्रत्येक ढेरी में विभिन्न फलों की संख्या और भिन्न प्रकार के फलों की कीमत
निकालो । ॥ १४४½ और १४५½ ॥
नियम स्पष्ट हो जावेगा ।
प्रथम ढेरी में फलों की कुल संख्या २१ है ।
दूसरी ” ” ” ” २२ है ।
तीसरी ” ” ” ” २३ है ।
मन से कोई भी संख्या जैसे, २ चुनने पर और उससे इन कुल संख्याओं को गुणित करने पर हमें
४२, ४४, ४६ प्राप्त होते हैं । इन्हें अलग-अलग ढेरियों के मूल्य ७३ में से घटाने पर शेष ३१, २९ और
२७ प्राप्त होते हैं । इन्हें मन से चुनी हुई दूसरी संख्या ८ द्वारा भाजित करने पर भजनफल ३, ३, ३
और शेष ७, ५ और ३ प्राप्त होते हैं । ये शेष, पुनः, मन से चुनी हुई संख्या २ द्वारा भाजित होनेपर
भजनफल ३, २, १ और शेष १, १, १ उत्पन्न करते हैं । इन अंतिम शेषों को यहाँ मन से चुनी हुई
संख्या १ द्वारा भाजित करने पर भजनफल १, १, १ प्राप्त होते हैं और शेष कुछ भी नहीं । पहिली
कुल संख्या के सम्बन्ध में निकाले गये भजनफलों को उसमें से घटाना पड़ता है । इस प्रकार हमें
२१ - (३ + ३ + १) = १४ प्राप्त होता है; यह संख्या और भजनफल ३, ३, १ प्रथम ढेरी में भिन्न प्रकारों
के फलों की संख्या निरूपित करते हैं । इसी प्रकार, हमें दूसरे समूह में १६, ३, २, १ और तीसरे समूह
में १८, ३, १, १ विभिन्न प्रकार के फलों की संख्या प्राप्त होती है ।
प्रथम चुना हुआ गुणक २, और उसके अन्य मन से चुने हुए गुणकों के योग कीमतें होती हैं ।
इस प्रकार, हमें क्रम से इन ४ भिन्न प्रकारों के फलों में प्रत्येक की कीमत २, २ + ८ या १०, २ + २ या
४, और २ + १ या ३, रूप में प्राप्त होती है ।
इस रीति का मूलभूत सिद्धान्त निम्नलिखित बीजीय निरूपण द्वारा स्पष्ट हो जावेगा—
अक + ब ख + स ग + ड घ = प, …………………………………………………(१)
अ + ब + स + ड = न,…………………………………………………(२)
मानलो घ = श; तब (२) को श से गुणित करने पर हमें श ( अ + ब + स + ड ) = श न
प्राप्त होता है ।……………………………………………………………………(३)
(३) को (१) में से घटाने पर हमें अ ( क - श) + ब ( ख - श) + स ( ग - श ) = प - श न
प्राप्त होता है ।……………………………………………………………………(४)
-६. १४९ ] मिश्रकव्यवहारः [ १२९
जघन्योनमिश्रितराश्यानयनसूत्रम्—
पण्यहृताल्पफलोनैरिच्छन्द्यादल्पमूल्यहीनेष्टम् ।
कृत्वा तावत्खण्डं तदूनमूल्यं जघन्यपण्यं स्यात् ॥ १४६½ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वाभ्यां त्रयो मयूरास्त्रिभिश्च पारावताश्च चत्वारः ।
हंसाः पञ्च चतुर्भिः पञ्चभिरथ सारसाः षट् च ॥ १४७½ ॥
यत्रार्घस्तत्र सखे षट्पञ्चाशत्पणैः खगान् क्रीत्वा ।
द्वासप्ततिमानयतामित्युक्त्वा मूलमेवादात् ।
कतिभिः पणैस्तु विहगाः कति विगणय्याशु जानीयाः ॥ १४९ ॥
कुल कीमत के दिये गये मिश्रित मान में से, क्रमशः, मँहगी और सस्ती वस्तुओं के मूल्यों के
संख्यात्मक मानों को निकालने के लिये नियम —
( दी गई वस्तुओं की दर-राशियों को ) उनकी दर-कीमतों द्वारा भाजित करो । ( इन परिणामी
राशियों को अलग-अलग ) उनमें से अल्पतम राशि द्वारा हासित करो । तब ( उपर्युक्त भजनफल
राशियों में से ) अल्पतम राशि द्वारा सब वस्तुओं की मिश्रित कीमत को गुणित करो; और ( इस
गुणनफल को ) विभिन्न वस्तुओं की कुल संख्या में से घटाओ । तब ( इस शेष को मन से ) उतने
भागों में विभक्त करो ( जितने कि घटाने के पश्चात् बचे हुए उपर्युक्त भजनफलों के शेष होते हैं ) ।
और तब, ( इन भागों को उन भजनफल राशियों के शेषों द्वारा ) भाजित करो । इस प्रकार, विभिन्न
सस्ती वस्तुओं की कीमतें प्राप्त होती हैं । इन्हें कुल कीमत से अलग करनेपर खरीदी हुई महँगी
वस्तु की कीमत प्राप्त होती है ॥१४६½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
“२ पण में ३ मोर, ३ पण में ४ कबूतर, ४ पण में ५ हंस, और ५ पण में ६ सारस की दरों
के अनुसार, हे मित्र, ५६ पण के ७२ पक्षी खरीद कर मेरे पास लाओ ।” ऐसा कहकर एक मनुष्य
ने खरीद की कीमत ( अपने मित्र को ) दे दी । शीघ्र गणना करके बतलाओ कि कितने पणों में
उसने प्रत्येक प्रकार के कितने पक्षी खरीदे ॥ १४७½-१४९ ॥ ३ पण में ५ पल शुण्ठि, ४ पण में
(४) को ( क - श ) से विभाजित करने पर हमें भजनफल अ प्राप्त होता है, और शेष
ब ( ख - श ) + स ( ग - श ) प्राप्त होता है, जहाँ क - श उपयुक्त पूर्णांक है । इसी प्रकार, हम यह
क्रिया अंत तक ले जाते हैं ।
इस प्रकार, यह देखने में आता है कि उत्तरोत्तर चुने गये भाजक क - श, ख - श और ग - श,
जब श में मिलाये जाते हैं, तब वे विभिन्न कीमतों के मान को उत्पन्न करते हैं, प्रथम वस्तु की कीमत श
ही होती है, और यह कि उत्तरोत्तर भजनफल अ, ब, स और साथ ही न - ( अ + ब + स ) विभिन्न
प्रकारों की वस्तुओं के मान हैं । इस नियम में, दी गई वस्तुओं के प्रकारों की संख्या से एक कम संख्या
के विभाजन किये जाते हैं । अंतिम भाजन में कोई भी शेष नहीं बचना चाहिए ।
( १४६½ ) अगली गाथा ( १४७½-१४९ ) में दिये गये प्रश्न को साधन करने पर नियम स्पष्ट
हो जावेगा — दर-राशियां ३, ४, ५, ६ को क्रमवार दर-कीमतों २, ३, ४, ५ द्वारा विभाजित करते
हैं । इस प्रकार हमें ३/२, ४/३, ५/४, ६/५ प्राप्त होते हैं । इनमें से अल्पतम ६/५ को अन्य तीन में से अलग-
ग० सा० सं०-१७
१३० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १५०-
त्रिभिः पणैः शुण्ठिपलानि पञ्च चतुर्भिरेकादश पिप्पलानाम् ।
अष्टाभिरेकं मरिचस्य मूल्यं षष्ट्यानयाष्टोत्तरषष्टिमाशु ॥ १५० ॥
इष्टार्थैरिष्टमूल्यैरिष्टवस्तुप्रमाणानयनसूत्रम्—
मूल्यघ्नफलेच्छागुणपणान्तरेष्टघ्नयुतिविपर्यासः । द्विष्ठः स्वधनेष्टगुणः प्रक्षेपक्करणमवशिष्टम् ।। १५१ ।।
११ पल लम्बी मिर्च, और ८ पण में १ पल मिर्च प्राप्त होती है । ६० पण खरीद के दामों में शीघ्र ही
६८ पल वस्तुओं को प्राप्त करो ॥ १५० ॥
इच्छित रकम ( जो कि कुल कीमत है ) में इच्छित दरों पर खरीदी गई कुछ विशिष्ट वस्तुओं के
इच्छित संख्यात्मक-मान को निकालने के लिये नियम—
( खरीदी गईं विभिन्न वस्तुओं के ) दर-मानों में से प्रत्येक को ( अलग-अलग खरीद के
दामों के ) कुल मान द्वारा गुणित किया जाता है। दर-रकम के विभिन्न मान अलग-अलग समान होते
हैं। वे खरीदी गईं वस्तुओं की कुल संख्या से गुणित किये जाते हैं। आगे के गुणनफल क्रमवार पिछले
गुणनफलों में से घटाये जाते हैं । धनात्मक शेष एक पंक्ति में नीचे लिख लिये जाते हैं। ऋणात्मक
शेष एक पंक्ति में उनके ऊपर लिखे जाते हैं। सभी में रहने वाले साधारण गुणनखंडों को अलग
कर इस सबको अल्पतम पदों में प्रह्रासित ( लघुकृत ) कर लिया जाता है । तब इन प्रह्रासित अंतरों में
से प्रत्येक को मन से चुनी हुई अलग राशि द्वारा गुणित किया जाता है। उन गुणनफलों को जो नीचे
की पंक्ति में रहते हैं तथा उन्हें जो ऊपर की पंक्ति में रहते हैं, अलग-अलग जोड़ते हैं, और योगों को
ऊपर नीचे लिखते हैं । संख्याओं की नीचे की पंक्ति के योग को ऊपर लिखते हैं और ऊपर की पंक्ति के
योग को नीचे लिखते हैं । इन योगों को उनके सर्वसाधारण गुणनखंड हटाकर अल्पतम पदों में प्रह्रासित
कर लिया जाता है । परिणामी राशियों में से प्रत्येक को नीचे दुबारा लिख लिया जाता है, ताकि
एक को दूसरे के नीचे इतनी बार किया जा सके, जितने कि संवादी एकान्तर योग में संघटक तत्व होते
हैं। इन संख्याओं को इस प्रकार दो पंक्तियों में जमाकर, उनकी क्रमवार दर-कीमतों और चीजों के
दर-मानों द्वारा गुणित करते हैं । ( अंकों की एक पंक्ति में दर-मूल्य गुणन और अंकों की दूसरी पंक्ति
[L
-६. १५३ ] मिश्रकव्यवहारः [ १३१
अत्रोद्देशकः
त्रिभिः पारावताः पञ्च पञ्चभिः सप्त सारसाः । सप्तभिर्नव हंसाश्च नवभिः शिखिनस्त्रयः ॥१५२॥
क्रीडार्थं नृपपुत्रस्य शतेन शतमानय । इत्युक्तः प्रहितः कश्चित् तेन किं कस्य दीयते ॥ १५३ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कबूतर ५ प्रति ३ पण की दर से बेचे जाते हैं, सारस पक्षी ७ प्रति ५ पण की दर से, हंस ९ प्रति
७ पण की दर से, और मोरें ३ प्रति ९ पण की दर से बेची जाती हैं । किसी मनुष्य को यह कह कर
भेजा गया कि वह राजकुमार के मनोरंजनार्थ ७२ पण में १०० पक्षियों को लावे । बतलाओ कि प्रत्येक
प्रकार के पक्षियों को खरीदने के लिये उसे कितने-कितने दाम देना पड़ेंगे ? ॥१५२-१५३॥
५ ७ ९ ३ | स्पष्ट हो जावेगा—दर-वस्तुओं और दर-कीमतों को दो
३ ५ ७ ९ | पंक्तियों में इस प्रकार लिखो कि एक
१३२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १५४-
व्यस्तार्घपण्यप्रमाणानयनसूत्रम्¹—
पण्यैक्येन पणैक्यमन्तरमतः पण्येष्टपण्यान्तरै-
श्छिन्द्यात्संक्रमणे कृते तदुभयोरर्घौ भवेतां पुनः ।
पण्ये ते खलु पण्ययोगविवरे व्यस्तं तयोरर्घयोः-
प्रश्नानां विदुषां प्रसादनमिदं सूत्रं जिनेन्द्रोदितम् ॥ १५४ ॥
अत्रोद्देशकः
आद्यमूल्यं यदेकस्य चन्दनस्यागरोस्तथा । पलानि विंशतिर्मिश्रं चतुरग्रशतं पणाः ॥ १५५ ॥
कालेन व्यत्ययार्घः स्यात्सषोडशशतं पणाः । तयोरर्घफले ब्रूहि त्वं षडष्टौ पृथक् पृथक् ॥ १५६ ॥
१. उपलब्ध हस्तलिपियों में प्राप्य नहीं ।
जिनके मूल्यों को परस्पर बदल दिया गया है ऐसी दो दत्त वस्तुओं के परिमाण को प्राप्त करने
के लिये नियम—
दो दत्त वस्तुओं की बेचने की कीमतों और खरीदने की कीमतों के योग के संख्यात्मक मान
को दी गई वस्तुओं के योग के संख्यात्मक मान द्वारा भाजित किया जाता है । तब उन उपर्युक्त बेचने
और खरीदने की कीमतों के अंतर को ( दी गई वस्तुओं के दिये गये ) योग में से किसी मन से चुनी
हुई वस्तु राशि को घटाने पर प्राप्त हुए अंतर के संख्यात्मक मान द्वारा भाजित किया जाता है । यदि
इनके साथ ( अर्थात् ऊपर की प्रथम क्रिया में प्राप्त भजनफल और दूसरी क्रिया में प्राप्त कई भजनफलों
में से किसी एक के साथ ) संक्रमण क्रिया की जाय, तो वे दरें प्राप्त होती हैं जिन पर कि ये वस्तुएँ
खरीदी जाती हैं । यदि वस्तुओं के योग और उनके अन्तर के सम्बन्ध में वही संक्रमण क्रिया की जावे
तो वह वस्तुओं के संख्यात्मक मान को उत्पन्न करती है । उपर्युक्त खरीद-दरों के एकान्तरण से बेचने
की दरें उत्पन्न होती हैं । इस प्रकार के प्रश्नों के साधन का प्रतिपादन विद्वानों ने किया है और सूत्र
भगवान् जिनेन्द्र के निमित्त से उदय को प्राप्त हुआ है ॥१५४॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
चंदन काष्ठ के एक टुकड़े की मूल-कीमत और अगरु काष्ठ के एक टुकड़े की कीमत मिलाने से
१०४ पण में २० पल वजन की वे दोनों प्राप्त होती हैं । जब वे अपनी पारस्परिक बदली हुई कीमतों
पर बेची जाती हैं तो ११६ पण प्राप्त होते हैं । नियमानुसार ६ और ८ अलग-अलग मन से चुनी
हुई संख्याएँ लेकर वस्तुओं की खरीद एवं बेचने की दर तथा उनका संख्यात्मक मान
निकालो ॥१५५-१५६॥
( १५४ ) इस नियम में वर्णित विधि का बीजीय निरूपण गाथा १५५-१५६ के प्रश्न के सम्बन्ध
में इस प्रकार दिया जा सकता है:—
मानलो अय + बर = १०४,..........................................................( १ )
अर + बय = ११६,................................................................( २ )
अ + ब = २०.......................................................................( ३ )
( १ ) और ( २ ) का योग करने पर, ( अ + ब ) ( य + र ) = २२०,.....................( ४ )
∴ य + र = ११.....................................................................( ५ )
पुनः ( १ ) को ( २ ) में से घटाने पर, ( अ - ब ) ( र - य ) = १२ प्राप्त होता है । अब २ब को
मनसे ६ के तुल्य मान लेते हैं । इस प्रकार, अ + ब - २ ब अथवा अ - ब = २० - ६ = १४......( ६ )
-६. १६१ ] मिश्रकव्यवहारः [ १३३
सूर्यरथाश्वेष्टयोगयोजनानयनसूत्रम्—
अखिलाप्ता खिलायोजनसंख्यापर्याययोजनानि स्युः ।
तानीष्टयोगसंख्यानिघ्नान्येकैकगमनमानानि ॥ १५७ ॥
अत्रोद्देशकः
रविरथतुरगाः सप्त हि चत्वारोऽश्वा वहन्ति धूर्युक्ताः ।
योजनसप्ततिगतयः के व्यूढाः के चतुर्योगाः ॥ १५८ ॥
सर्वधनेष्टहीनशेषपिण्डात् स्वस्वहस्तगतधनानयनसूत्रम्—
रूपोननरैर्विभजेत् पिण्डीकृतभाण्डसारमुपलब्धम् ।
सर्वधनं स्यात्तस्मादुक्तविहीनं तु हस्तगतम् ॥ १५९ ॥
अत्रोद्देशकः
वणिजस्ते चत्वारः पृथक् पृथक् शौल्किकेन परिपृष्टाः ।
किं भाण्डसारमिति खलु तत्राहैको वणिक्श्रेष्ठः ॥ १६० ॥
आत्मधनं विनिगुह्य द्वाविंशतिरिति ततः परोऽवोचत् ।
त्रिभिरुत्तरा तु विंशतिरथ चतुरधिकैव विंशतिस्तुर्यः ॥ १६१ ॥
सूर्य रथ के अश्वों के इष्ट योग द्वारा योजनों में तय की गई दूरी निकालने के लिए नियम—
कुल योजनों का निरूपण करने वाली संख्या कुल अश्वों की संख्या द्वारा विभाजित होकर प्रत्येक
अश्व द्वारा प्रक्रम में तय की जानेवाली दूरी (योजनों में) होती है। यह योजन संख्या जब प्रयुक्त
अश्वों की संख्या द्वारा गुणित की जाती है तो प्रत्येक अश्व द्वारा तय की जानेवाली दूरी का मान
प्राप्त होता है ॥ १५७ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
यह प्रसिद्ध है कि सूर्य रथ के अश्वों की संख्या ७ है। रथ में केवल ४ अश्व प्रयुक्त कर उन्हें
७० योजन की यात्रा पूरी करना पड़ती है। बतलाओ कि उन्हें ४, ४ के समूह में कितने बार खोलना
पड़ता है और कितने बार जोतना पड़ता है ? ॥१५८॥
समस्त वस्तुओं के कुल मान में से जो भी इष्ट है उसे घटाने के पश्चात् बचे हुए मिश्रित शेष में
से संयुक्त साझेदारी के स्वामियों में से प्रत्येक की हस्तगत वस्तु के मान को निकालने के लिए नियम—
वस्तुओं के संयुक्त ( conjoint ) शेषों के मानों के योग को एक कम मनुष्यों की संख्या
द्वारा भाजित करो; भजनफल समस्त वस्तुओं का कुल मान होगा । इस कुल मान को विशिष्ट मानों द्वारा
हासित करने पर संवादी दशाओं में प्रत्येक स्वामी की हस्तगत वस्तु का मान प्राप्त होता है ॥१५९॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
चार व्यापारियों ने मिलकर अपने धन को व्यापार में लगाया । उन लोगों में से प्रत्येक से
अलग-अलग, महसूल पदाधिकारी ने व्यापार में लगाई गई वस्तु के मान के विषय में पूछा । उनमें से
एक श्रेष्ठ वणिक ने, अपनी लगाई हुई रकम को घटाकर २२ बतलाया । तब, दूसरे ने २३, अन्य ने २४
∵ र - य = १२/१४ .....................................................(७) .
यहाँ (७) और (५) तथा (६) और (३) के सम्बन्ध में संक्रमण क्रिया करते हैं, जिससे
य, र, अ और ब के मान प्राप्त हो जाते हैं ।