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सर्वकोश
गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 421 में से

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पृष्ठ 180

१२६ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १३८½-
पञ्चत्रिंशत् त्र्युत्तरषोडशपदान्येव हाराश्च ।
द्वात्रिंशद्व्यधिकैका त्र्युत्तरतोऽग्राणि के धनर्णगुणाः ॥ १३८½ ॥
में ३ द्वारा बढ़ती हुई हैं, दत्त भाज्यगुणक हैं । दिये गये भाजक, ३२ ( और अन्य ) हैं, जो उत्तरोत्तर
२ द्वारा बढ़ते जाते हैं । और, १ को उत्तरोत्तर ३ द्वारा बढ़ाते जाने पर ज्ञात धनात्मक और ऋणात्मक
सम्बन्धित राशियाँ उत्पन्न होती हैं । ज्ञात भाज्य-गुणक के अज्ञात गुणनखण्डों के मान क्या हैं जबकि
वे धनात्मक या ऋणात्मक ज्ञात संख्याओं के साथ योगरूप से सम्बन्धित हैं ? ॥ १३८½ ॥
में दिये गये मूलभूत सिद्धान्त में अयुग्म स्थिति क्रम वाले शेष के साथ सम्बन्धित अग्र ब का बीजीय
चिन्ह वही है जो इस प्रश्न में दिया गया है, परन्तु युग्म स्थिति क्रमवाले शेष के साथ सम्बन्धित अग्र
ब का चिन्ह प्रश्न में जैसा दिया गया है उसके विपरीत है; इसलिये जब अयुग्म स्थिति क्रमवाले शेष तक
लगातार भाजन किया जाता है तब प्राप्त क का मान उस अग्र के सम्बन्ध में होता है जिसका चिन्ह
अपरिवर्तित है । और दूसरी ओर, जब लगातार भाजन युग्म स्थिति क्रमवाले शेष तक ले जाया जाता
है तब वहाँ से प्राप्त क का मान उस अग्र के सम्बन्ध में होता है जिसका चिन्ह परिवर्तित है । जब प्राप्त
शेषों की संख्या अयुग्म होती है, तब श्रृंखला में भजनफलों की संख्या युग्म होती है; और जब शेषों की
संख्या युग्म होती है, तब श्रृंखला में भजनफलों की संख्या अयुग्म होती है । कारण यह है कि इस
नियम में अन्तिम शेष से सम्बन्धित अग्र हमेशा धनात्मक लिया जाता है, इसलिये इस धनात्मक अग्र
के सम्बन्ध में क का मान प्राप्त होता है जब कि अंतिम शेष अयुग्म स्थिति क्रममें हो । वह ऋणात्मक
अग्र के सम्बन्ध में तब प्राप्त होता है जब कि अंतिम शेष युग्म स्थिति क्रम में हो । दूसरे शब्दों में,
यदि भजनफलों की संख्या युग्म हो, तब धनात्मक अग्र सम्बन्धी मान प्राप्त होता है; और जब भजनफलों
की संख्या अयुग्म हो, तब ऋणात्मक अग्र सम्बन्धी मान प्राप्त होता है ।
इस प्रकार, धनात्मक और ऋणात्मक अग्रों के सम्बन्ध में क का मान प्राप्त करने पर दूसरा मान,
इस मानको प्रश्न के भाजक में से घटाकर प्राप्त करते हैं । यह निम्नलिखित निरूपण से स्पष्ट हो
जावेगा :— (आ क ± ब) / बा = एक पूर्णांक । यहाँ मानलो क = ष; तब, (आ ष + ब) / बा = एक पूर्णांक । हम
जानते हैं कि (आ बा) / बा भी एक पूर्णांक है । इसलिये (आ बा) / बा – (आ ष + ब) / बा , अथवा [आ (बा – ष) – ब] / बा भी
एक पूर्णांक है । यहाँ यह देखने योग्य है, कि तीनों दी गईं संख्यात्मक राशियों के साधारण गुणनखंडों को
लगातार भाजन के आरम्भ करने के पूर्व ही हटा देते हैं । अंतिम भाजक और अंतिम शेष बराबर होना
चाहिये इसलिये इन में से प्रत्येक १ होता है । 'मति' जिसे वल्लिका कुट्टीकार के सम्बन्ध में नियमानुसार
चुनना पड़ता है, और भजनफलों की श्रृंखला के नीचे लिखना पड़ता है, वह इस नियम में हमेशा १
रहती है । अंतिम भाजक भी १ होता है । इसलिये वल्लिका कुट्टीकार में 'मति' यहाँ अंतिम भाजक का
स्थान ले लेती है । इसके बाद देखा जायगा कि इस नियम द्वारा प्राप्त श्रृंखला का अंतिम अंक ( १ +
अग्र ) उतना ही रहता है जितना कि वल्लिका कुट्टीकार में प्राप्त श्रृंखला का अंतिम अंक । यह अंतिम
अंक, अंतिम भाजक को अग्र तथा मति और अंतिम शेष के गुणनफल के योग द्वारा विभाजित करने
पर प्राप्त करते हैं । यथा, अंतिम अंक = [ अंतिम भाजक ] ÷ { अग्र + ( मति × अंतिम शेष ) }