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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

६. मिश्रकव्यवहारः
प्राप्तानन्तचतुष्टयान् भगवतस्तीर्थस्य कर्तॄन् जिनान्
सिद्धान् शुद्धगुणांस्त्रिलोकमहितानाचार्यवर्यानपि ।
सिद्धान्तार्णवपारगान् भवभृतां नेतॄनुपाध्यायकान्
साधून् सर्वगुणाकरान् हितकरान् वन्दामहे श्रेयसे ॥ १ ॥
इतः परं मिश्रगणितं नाम पञ्चमव्यवहारमुदाहरिष्यामः । तद्यथा—
संक्रमणसंज्ञाया विषमसंक्रमणसंज्ञायाश्च सूत्रम्—
युतिवियुतिदलनकरणं संक्रमणं छेदलब्धयो राश्योः ।
संक्रमणं विषममिदं प्राहुर्गणितार्णवान्तगताः ॥ २ ॥
६. मिश्रकव्यवहार
जिन्होंने अनन्त चतुष्टय प्राप्त कर धर्म तीर्थ की प्रवर्तना की है ऐसे अरिहंत प्रभुओं की, जो
अष्टक्षायिक गुण सम्पन्न हैं तथा तीनों लोकों में आदर को प्राप्त हैं ऐसे सिद्ध प्रभुओं को, श्रेष्ठ
आचार्यों की, जो जैन सिद्धान्त सागर के पारगामी हैं तथा संसारी जीवों को मोक्षमार्ग के उपदेशक हैं
ऐसे उपाध्यायों की और जो सर्व सद्गुणों के धारक हैं तथा दूसरों के हितकर्ता हैं ऐसे साधुओं की हम
अपने सर्वोपरि हित के लिये वन्दना करते हैं ॥१॥
इसके पश्चात् हम मिश्रित उदाहरण नामक पाँचवें व्यवहार का प्रतिपादन करेंगे ।
पारिभाषिक शब्द ‘संक्रमण’ और ‘विषम संक्रमण’ के अर्थों को स्पष्ट करने के लिये सूत्र—
गणित समुद्र के पारगामी, किन्हीं दो राशियों के योग अथवा अन्तर के आधा करने को
संक्रमण कहते हैं । और, ऐसी दो राशियाँ जो क्रमशः भाजक तथा भजनफल रहती हैं, उनके संक्रमण
को विषम संक्रमण कहते हैं ॥२॥
( १ ) कर्म और जन्म मरण के दुःखों से पूर्ण संसारीजीवनरूपी नदी को पार करने के लिये
‘तीर्थ’ शब्द का प्रयोग ‘एक ऐसे स्थान के लिये हुआ है जो उथला होने के कारण नदी को पार करने
में सहायक सिद्ध होता है । संसार अर्थात् चतुश्चक्रभ्रमण के दुःखों रूपी सागर को पार कराने के लिये भगवान्
आत्माओं के लिये नैमित्तिक सहायक माने गये हैं । इसलिये इन जिनों को तीर्थंकर कहा जाता है ।
( २ ) बीजीय रूप से, दो राशियों अ और ब का संक्रमण (अ + ब)/२ और (अ ~ ब)/२ के मान निका-
लना है । उनका विषम संक्रमण, (ब + अ/ब)/२ और (ब ~ अ/ब)/२ के मान निकालना है ।

९२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ३-
अत्रोद्देशकः
द्वादशसंख्याराशेर्द्वाभ्यां संक्रमणमत्र किं भवति ।
तस्माद्राशेर्भक्तं विषमं वा किं तु संक्रमणम् ॥ ३ ॥
पञ्चराशिकविधिः
पञ्चराशिकस्वरूपवृद्ध्यानयनसूत्रम्—
इच्छाराशिः स्वस्य हि कालेन गुणः प्रमाणफलगुणितः ।
कालप्रमाणभक्तो भवति तदिच्छाफलं गणिते ॥ ४ ॥
अत्रोद्देशकः
त्रिकपञ्चकषट्कशते पञ्चाशतषष्टिसप्ततिपुराणाः । लाभार्थतः प्रयुक्ताः का वृद्धिर्मासषट्कस्य ॥ ५ ॥
व्यर्धाष्टकशत्युक्तास्त्रिंशत्कार्षापणाः पणाश्चाष्टौ । मासाष्टकेन जाता दलहीनेनैव का वृद्धिः ॥ ६ ॥
षष्ट्या वृद्धिर्दृष्टा पञ्च पुराणाः पणत्रयविमिश्राः । मासद्वयेन लब्धा शतवृद्धिः का तु वर्षस्य ॥ ७ ॥
सार्धशतकप्रयोगे सार्धकमासेन पञ्चदश लाभः । मासदर्शकेन लब्धा शतत्रयस्यात्र का वृद्धिः ॥८॥
साष्टशतकाष्टयोगे त्रिषष्टिकार्षापणा विशा दत्ताः । सप्तानां मासानां पञ्चमभागान्वितानां किम्॥९॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
जब संख्या १२, दो से आयोजित हो तो संक्रमण क्या होगा ? और, २ के सम्बन्ध में उसी
संख्या १२ का भागीय विषम संक्रमण क्या होगा ?
पंचराशिक विधि
पंचराशिक प्रकार के ब्याज को निकालने की विधि के लिये नियम—
इच्छा का प्ररूपण करनेवाली संख्या, अर्थात् जिस पर ब्याज निकालना इष्ट होता है ऐसे धन
को उससे सम्बन्धित समय द्वारा गुणित किया जाता है और तब दिये हुए मूलधन पर ब्याज दर का
निरूपण करने वाली संख्या द्वारा गुणित किया जाता है । गुणनफल को समय तथा मूलधन राशि द्वारा
भाजित किया जाता है । यह भजनफल, गणित में, इष्ट धन का ब्याज होता है ॥४॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
५०, ६० और ७० पुराण क्रमशः ३, ५ और ६ प्रतिशत प्रतिमाह की दर ( rate ) से ब्याज पर
दिये गये, उनका ६ माह में ब्याज क्या होगा ? ॥५॥ ३० कार्षापण और ८ पण, ७ ½ प्रतिशत प्रतिमाह
की दर से ब्याज पर दिये गये, ७ ½ माह में कितना ब्याज होगा ? ॥६॥ ६० पर २ माह में ५ पुराण और
३ पण ब्याज होता है; १०० पण १ वर्ष का ब्याज बतलाओ ॥७॥ १५० को १ ½ माह तक उधार देने
से १५ ब्याज प्राप्त होता है । इसी अर्ध से ३०० पर १० माह का ब्याज क्या होगा ? ॥८॥ एक
व्यापारी ने ६३ कार्षापण, १०८ पर ८ प्रतिमाह की दर से उधार दिये, बतलाओ ७ ⅕ माह में कितना
ब्याज होगा ॥९॥
ध × अ × बा
( ४ ) बीजीय रूप से ब = ―――――――――― जहाँ आ, धा और बा प्रमाण अथवा दर सम्बन्धी क्रमशः
आ × धा
अवधि, मूलधन और ब्याज हैं और अ, ध तथा ब इच्छा की क्रमशः अवधि, मूलधन और ब्याज हैं ।
प्रमाण और इच्छा के विशेष स्पष्टीकरण के लिये अध्याय ५ की गाथा २ की पाद टिप्पणी देखिये ।
( ५ ) ब्याज की दर यदि उल्लिखित न हो तो उसे प्रतिमास समझना चाहिये ।

–६. १४ ] मिश्रकव्यवहारः [ ९३
मूलानयनसूत्रम्—
मूलं स्वकालगुणितं स्वफलेन विभाजितं तदिच्छायाः ।
कालेन भजेल्लब्धं फलेन गुणितं तदिच्छा स्यात् ॥ १० ॥
अत्रोद्देशकः
पञ्चार्धकशतयोगे पञ्च पुराणान्दलोनमासौ द्वौ । वृद्धिं लभते कश्चित् किं मूलं तस्य मे कथय ॥११॥
सप्तत्याः सार्धमासेन फलं पञ्चार्धमेव च । व्यर्धाष्टमासे मूलं किं फलयोः सार्धयोर्द्वयोः ॥ १२ ॥
त्रिकपञ्चकषट्कशते यथा नवाष्टादशाथ पञ्चकृतिः ।
पञ्चांशकेन मिश्रा षट्सु हि मासेषु कानि मूलानि ॥ १३ ॥
कालानयनसूत्रम्—
कालगुणितप्रमाणं स्वफलेच्छाभ्यां हृतं ततः कृत्वा ।
तदिहेच्छाफलगुणितं लब्धं कालं बुधाः प्राहुः ॥ १४ ॥
——————————————————————————————————————
उधार दिये गये मूलधन को निकालने के लिये नियम—
मूलधन राशि को उसो से सम्बन्धित समय द्वारा गुणित करते हैं और सम्बन्धित ब्याज द्वारा
विभाजित करते हैं । तब इस भजनफल को (उधार दिये गये) मूलधन से सम्बन्धित अवधि द्वारा
विभाजित करते हैं; यह अंतिम भजनफल जब उपार्जित ब्याज द्वारा गुणित किया जाता है तब वह
मूलधन प्राप्त होता है जिस पर कि उक्त ब्याज प्राप्त हुआ है ॥१०॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
ब्याज दर २ ½ प्रतिशत प्रतिमाह से १ ½ माह तक रकम उधार देकर एक व्यक्ति ५ पुराण
ब्याज प्राप्त करता है । मुझे बतलाओ कि उस ब्याज के सम्बन्ध में मूलधन क्या है ? ॥११॥
७० पर १ ½ माह में २ ½ ब्याज होता है । यदि ७ ½ माह में २ ½ ब्याज होता हो तो बतलाओ कि
कितना मूलधन ब्याज पर दिया गया है ? ॥१२॥ क्रमशः ३, ५ और ६ प्रतिशत प्रति माह की दर से
उधार देने पर ६ माह में प्राप्त होने वाले ब्याज क्रमशः ९, १८ और २५ ⅕ हैं; कौन-कौन से मूलधन
ब्याज पर दिये गये हैं ? ॥१३॥
अवधि निकालने के लिये नियम—
मूलधन को सम्बन्धित अवधि से गुणित करो; तब इस गुणनफल को उसो से सम्बन्धित ब्याज
दर से भाजित करो और उधार दी हुई रकम से भी भाजित करो । प्राप्त भजनफल को उधार दी हुई
रकम के ब्याज द्वारा गुणित करो । बुद्धिमान मनुष्य कहते हैं कि परिणामी गुणनफल (उपार्जित ब्याज
की) अवधि होता है ॥१४॥
.........................................................................................................................
धा × आ × बा
(१०) प्रतीक रूप से, ─────────── = ध
बा × अ
धा × आ × ब
(१४) प्रतीक रूप से, ────────── = अ
बा × घ

९४ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १५–
अत्रोद्देशकः
सप्तार्धशतकयोगे वृद्धिरस्त्वष्टाप्रविंशतिरशीत्या ।
कालेन केन लब्धा कालं विगणय्य कथय सखे ॥ १५ ॥
विंशतिषट्शतकस्य प्रयोगतः सप्तगुणषष्टिः । वृद्धिरपि चतुरशीतिः कथय सखे कालमाशु त्वम् ॥१६॥
षट्कशतेन हि युक्ताः षण्णवतिर्वृद्धिरत्र संदृष्टा । सप्रोत्तरपञ्चाशत् त्रिपञ्चभागश्च कः कालः ॥१७॥
भाण्डप्रतिभाण्डसूत्रम्—
भाण्डस्वमूल्यभक्तं प्रतिभाण्डं भाण्डमूल्यसंगुणितम् ।
स्वेच्छाभाण्डाभ्यस्तं भाण्डप्रतिभाण्डमूल्यफलमेतत् ॥ १८ ॥
अत्रोद्देशकः
क्रीतान्यष्टौ शुण्ठ्याः पलानि षड्भिः पणैः सपादांशैः ।
पिप्पल्याः पलपञ्चकमथ पादोनैः पणैर्नवभिः ॥ १९ ॥
शुण्ठ्याः पलैश्च केनचिदशीतिभिः कति पलानि पिप्पल्याः ।
क्रीतानि विचिन्त्य त्वं गणितविदाचक्ष्व मे शीघ्रम् ॥ २० ॥
इति मिश्रकव्यवहारे पञ्चराशिविधिः समाप्तः ।
वृद्धिविधानम्
इतः परं मिश्रकव्यवहारे वृद्धिविधानं व्याख्यास्यामः ।
१ M और B दोनों में अशुद्ध पाठ है : कश्चित् त्वशीतिभिः स च पलानि पिप्पल्याः.
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे मित्र ! अवधि की गणना कर बतलाओ कि ३½ प्रतिशत प्रतिमाह के अर्घ से ८० पर २८
ब्याज कितने समय में प्राप्त होगा ? ॥१५॥ २० प्रति ६०० प्रतिमाह के अर्घ से उधार दिया गया धन
४२० है । ब्याज भी ८४ है । हे मित्र ! मुझे शीघ्र बतलाओ कि यह ब्याज कितनी अवधि में उपार्जित
हुआ है ?॥१६॥ ६ प्रतिशत प्रतिमाह के अर्घ से ९६ उधार दिये जाते हैं । उन पर ५७⅗ ब्याज होता
है । यह ब्याज कितनी अवधि में प्राप्त हुआ होगा ? ॥१७॥
भांडप्रतिभांड (वस्तुओं के पारस्परिक विनिमय) के सम्बन्ध में नियम —
बदले में ली गई वस्तु के परिमाण को उसके स्वमूल्य तथा बदले में दी गई वस्तु के परिमाण
द्वारा विभाजित करते हैं । तब, उसे बदले में दी गई वस्तु के मूल्य द्वारा गुणित करते हैं और तब,
बदली जाने वाली (जिसे बदलना इष्ट है) वस्तु के परिमाण द्वारा गुणित करते हैं। यह परिणामी
गुणनफल, बदले में ली गई वस्तु तथा बदले में दी गई वस्तु के मूल्यों की संवादी इष्ट राशि
होती है ॥१८॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
८ पल शुण्ठि (सूखी अदरख) ६¼ पण में खरीदी गई और ५ पल लम्बी मिर्च ८¾ पण में
खरीदी गई । हे गणितज्ञ ! विचारकर मुझे शीघ्र बतलाओ कि ऊपर लिखी हुई दर से खरीदी जाने वाली
लम्बी मिर्च, ८० पल सूखी अदरख (सोंठ) के बदले में कितने पल खरीदी जा सकेगी ? ॥१९–२०॥
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में पंचराशिक विधि नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
वृद्धि विधान [ब्याज]
इसके पश्चात्, मिश्रक व्यवहार में हम ब्याज पर व्याख्या करेंगे ।

-६. २४ ] मिश्रकव्यवहारः [ ९५
मूलवृद्धिमिश्रविभागानयनसूत्रम्—
रूपेण कालवृद्ध्या युतेन मिश्रस्य भागहारविधिम् । कृत्वा लब्धं मूल्यं वृद्धिमूलोनमिश्रधनम् ॥२१॥
अत्रोद्देशकः
पञ्चकशतप्रयोगे द्वादशमासैर्धनं प्रयुङ्क्ते चेत् । साष्टा चत्वारिंशन्मिश्रं तन्मूलवृद्धी के ।। २२ ।।
पुनरपि मूलवृद्धिमिश्रविभागसूत्रम्—
इच्छाकालफलघ्नं स्वकालमूलेन भाजितं सैकम् । संमिश्रस्य विभक्तं लब्धं मूलं विजानीयात् ॥२३॥
अत्रोद्देशकः
सार्धद्विशतकयोगे मासचतुष्केण किमपि धनमेकः ।
दत्त्वा मिश्रं लभते किं मूल्यं स्यात् त्रयस्त्रिंशत् ॥ २४ ॥
कालवृद्धिमिश्रविभागानयनसूत्रम्—
मूलं स्वकालगुणितं स्वफलेच्छाभ्यां हृतं ततः कृत्वा ।
मिश्रित रकम में से धन और ब्याज अलग करने के लिये नियम—
मूलधन और ब्याज सम्बन्धी दिये गये मिश्रधन को जो दी गई अवधि के ब्याज में जोड़कर
प्राप्त किया जाता है, ऐसी ( ब्याज ) राशि द्वारा हासित किया जाय तो इष्ट मूलधन प्राप्त होता है;
और इष्ट ब्याज को मिश्रित धन में से ( निकाले हुए ) इष्ट मूलधन को घटाकर प्राप्त कर लेते हैं ॥२१॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
यदि कोई धन ५ प्रतिशत प्रतिमाह के अर्घ से ब्याज पर दिया जाय तो १२ माह में मिश्रधन
४८ हो जाता है । बतलाओ कि मूलधन और ब्याज क्या हैं ? ॥२२॥
मिश्रधन में से मूलधन और ब्याज अलग करने के लिये दूसरा नियम—
दिये गये समय तथा ब्याज दर के गुणनफल को समयदर तथा मूलधनदर द्वारा भाजित
करते हैं । प्राप्त फल में १ जोड़ने से प्राप्त राशि द्वारा मिश्रधन को भाजित करते हैं जिससे परिणामी
भजनफल इष्ट मूलधन होता है ॥२३॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
२ ½ प्रतिशत प्रतिमाह के अर्घ से रकम को ब्याजपर देने से किसी को चार माह में ३३ मिश्रधन
प्राप्त होता है । बतलाओ मूलधन क्या है ? ॥२४॥
मिश्र योग में से अवधि तथा ब्याज को अलग करने के लिये नियम—
मूलधनदर को अवधि दर द्वारा गुणित करो और ब्याज दर तथा दिये गये मूलधन द्वारा
( २१ ) प्रतीक रूप से ध = म / [ १ + ( १ × अ × बा ) / ( आ × घा ) ] , जहाँ म = ध + ब है; इसलिये ब = म - ध
( २३ ) प्रतीक रूप से, ध = म ÷ { ( अ × बा ) / ( आ × घा ) + १ } , स्पष्ट है कि यह बहुत कुछ गाथा २१ में
दिये गये सूत्र के समान है ।

".
Wait, look at the letter in L28:
It looks like व!
Wait, could it be ब? Look at ब in बा: the circle has a diagonal slash.
Look at this letter: does it have a diagonal slash? It looks very similar to व, but in some prints the slash inside ब is faint or missing. But wait, व for वृद्धि makes sense too! Let's write व (or ब? Wait, let's look really closely at that letter:
It is ४ followed by a letter. In Hindi text: "ब्याज की चौगुनी राशि". If it's ब्याज, symbol is ब. But in Sanskrit: "कालचतुर्वृद्धि" -> वृद्धि = व. So व is totally plausible).
Wait, look at the sign after it:
Is it ± or ×?
Wait, look at it:
It has an upper part and lower part.
Wait, let's look at the character after it: म.
And then }.
And below is २.
And to the right of } is = घ अथवा अ, ( यथा.

Wait, how should we write these formula lines without LaTeX?
Let's check if we can write:

( २५ ) प्रतीक रूप से, ब = म ÷ { (धा × आ)/(बा × घ) + १ } = ब, जहाँ म = ब +

-६. ३४ ] मिश्रकव्यवहारः [ ९७
अत्रोद्देशकः
सप्तत्या वृद्धिरियं चतुःपुराणाः फलं च पञ्चकृतिः ।
मिश्रं नव पञ्चगुणाः पादेन युतास्तु किं मूलम् ॥ ३० ॥
त्रिकषष्ट्या दत्त्वैकः किं मूलं केन कालेन । प्राप्तोऽष्टादशवृद्धिं षट्षष्टिः कालमूलमिश्रं हि ॥ ३१ ॥
अध्यर्धमासिकफलं षष्ट्याः पञ्चार्धमेव संदृष्टम् ।
वृद्धिरस्तु चतुर्विंशतिरथ षष्टिर्मूलयुक्तकालश्च ॥ ३२ ॥
प्रमाणफलेच्छाकालमिश्रविभागानयनसूत्रम्—
मूलं स्वकालवृद्धिद्विकृतिगुणं छिन्नमितरमूलेन । मिश्रकृतिशेषमूलं मिश्रे क्रियते तु संक्रमणम् ।।३३।।
अत्रोद्देशकः
अध्यर्धमासकस्य च शतस्य फलकालयोश्च मिश्रधनम् ।
द्वादश दलसंमिश्रं मूलं त्रिंशत्फलं पञ्च ॥ ३४ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
४ पुराण, ७० पर प्रतिमाह ब्याज है । कुल पर प्राप्त ब्याज २५ है । मूलधन तथा ब्याज की
अवधि का मिश्रयोग ४५ १/४ है । कितना मूलधन उधार दिया गया है ? ।।३०।। ३ प्रति ६० प्रतिमास
के अर्घ से कोई मनुष्य कितना मूलधन कितने समय के लिये ब्याज पर लगाये ताकि उसे ब्याज १८
प्राप्त हो जबकि उस अवधि तथा उस मूलधन का मिश्रयोग ६६ दिया गया है ।।३१।। ६० पर १ १/२ माह
में ब्याज केवल २ १/२ है । यहाँ ब्याज २४ है और मूलधन तथा अवधि का मिश्रयोग ६० है । समय
तथा मूलधन क्या हैं ? ।।३२।।
ब्याजदर तथाइष्ट अवधि को मिश्रितयोग में से अलग-अलग करने के लिये नियम—
मूलधनदर स्व समयदर द्वारा गुणित किया जाता है, तथा दिये गये ब्याज से और ४ से भी
गुणित करने के उपरान्त अन्य दिये गये मूलधन द्वारा विभाजित किया जाता है । इस परिणामी भजन-
फल को दिये गये मिश्रयोग के वर्ग में से घटाकर प्राप्त शेष के वर्गमूल को मिश्रयोग के सम्बन्ध में
संक्रमण क्रिया करने के उपयोग में लाते हैं ।।३३।।
उदाहरणार्थ प्रश्न
अर्ध अधिक प्रतिशत प्रतिमाह की इष्ट दर से ब्याज दर और अवधि का मिश्रयोग १२ १/२ होता
है । मूलधन ३० है और उस पर ब्याज ५ है । बतलाओ ब्याज दर और अवधि क्या-क्या हैं ? ।।३४।।
(३३) प्रतीक रूप से, √[ म² - (धा × आ × ब × ४) / छ ] को 'म' के साथ इष्ट संक्रमण क्रिया करने
के उपयोग में लाते हैं । यहाँ म = बा + अ है ।
ग० सा० सं०-१३

९८ ] गणितसारसंग्रहः [ -६. ३५
मूलकालवृद्धि मिश्रविभागानयनसूत्रम्—
मिश्रादूनितराशिः कालस्तस्यैव रूपलाभेन । सैकेन भजेन्मूलं स्वकालमूलोनितं फलं मिश्रम् ॥३५॥
अत्रोद्देशकः
पञ्चकशतप्रयोगे न ज्ञातः कालमूलफलराशिः । तन्मिश्रं द्वां¹शीतिर्मूलं किं कालवृद्धी के ॥ ३६ ॥
बहुमूलकालवृद्धि मिश्रविभागानयनसूत्रम्—
विभजेत्स्वकालताडितमूलसमासेन फलसमासहतम् ।
कालाभ्यस्तं मूलं पृथक् पृथक् चादिशेद् वृद्धिम् ॥ ३७ ॥
अत्रोद्देशकः
चत्वारिंशत्त्रिंशद्विंशतिपञ्चाशदत्र मूलानि । मासाः पञ्चचतुस्त्रिकषट् फलपिण्डश्चतुस्त्रिंशत् ॥३८॥
१ हस्तलिपि में यह अशुद्ध रूप प्राप्य है; शुद्ध रूप 'द्व्यशीति' छंद की आवश्यकता को समाधानित
नहीं करता है ।
मूलधन, ब्याज और समय को उनके मिश्रयोग में से अलग-अलग प्राप्त करने के लिये नियम—
दिये गये मिश्रयोग में से कोई मन से चुनी हुई संख्या को घटाने पर इष्ट समय प्राप्त हुआ
मान लिया जाता है । उस अवधि के लिये १ पर ब्याज निकालकर उसमें १ जोड़ते हैं । तब, दिये गये
मिश्रितयोग में से मन से चुनी गई अवधि घटाकर शेष राशि को उपर्युक्त प्राप्त राशि द्वारा विभाजित
करते हैं । परिणामी भजनफल इष्ट मूलधन होता है । मिश्रयोग को निज के संवादी समय और मूलधन
द्वारा ह्रासित करने पर इष्ट ब्याज प्राप्त होता है ॥३५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
५ प्रतिशत प्रतिमाह के अर्घ से उधार दी गई रकम के विषय में अवधि, मूलधन और ब्याज का
निरूपण करने वाली राशियाँ ज्ञात नहीं हैं । उनका मिश्रयोग ८२ है । अवधि, मूलधन और ब्याज
निकालो ॥३६॥
विभिन्न धनों पर विभिन्न अवधियों में उपार्जित विभिन्न ब्याजों को उन्हीं के मिश्रयोग में से
अलग-अलग ब्याज प्राप्त करने के लिये नियम—
प्रत्येक मूलधन संवादी समय से गुणित होकर तथा ब्याजों की कुल दत्त रकम द्वारा गुणित
होकर, अलग-अलग उन गुणनफलों के योग द्वारा विभाजित किया जाता है जो प्रत्येक मूलधन को
उसके संवादी समय द्वारा गुणित करने पर प्राप्त होते हैं । प्राप्त फल उस मूलधन सम्बन्धी ब्याज
घोषित किया जाता है ॥३७॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस प्रश्न में दिये गये मूलधन ४०, ३०, २० और ५० हैं; और मास क्रमशः ५, ४, ३ और
६ हैं । ब्याज की राशियों का योग ३४ है । प्रत्येक ब्याज राशि निकालो ॥३८॥
(३५) यहाँ ३ अज्ञात राशियाँ दी गई हैं । समय का मान मन से चुन लिया जाता है और अन्य
दो राशियाँ अध्याय ६ की २१वीं गाथा के नियमानुसार प्राप्त हो जाती हैं ।
(३७) प्रतीक रूप से, ध₁ अ₁ म = ब₁; और
─────────────────────
ध₁अ₁ + ध₂अ₂ + ध₃अ₃ + ...
ध₂ अ₂ म
───────────────────── = ब₂; जहाँ म = ब₁ + ब₂ + ब₃ + ...; ध₁, ध₂, ध₃
ध₁अ₁ + ध₂अ₂ + ध₃अ₃ + ...
आदि विभिन्न मूलधन हैं तथा अ₁, अ₂, अ₃ आदि विभिन्न अवधियाँ हैं ।

जहाँ म = ध₁ + ध₂ + ध₃ + ... इत्यादि
ब₁ ब₂ ब₃ अ₂
── + ── + ── + ...
अ₁ अ₂ अ₃

And then:

(४२) प्रतीक रूप से,
म ब₁
──────────────────── × ── = अ₁, जहाँ म = अ₁ + अ₂ + अ₃ +
ब₁ ब₂ ब₃ ध₁
── + ── + ── + ...
ध₁ ध₂ ध₃

And the last line:
`...इत्यादि; इसी तरह अ₂, अ₃ इत्यादि के मान निकालते हैं ।`

Let's transcribe this cleanly line-by-line using Unicode characters (fractions/horizontal rules or standard text layout) without any LaTeX.
Wait, let's keep each printed line mapped to `[L...]`.
Let's count the visual lines of the equations in the image:

Looking at the equation block:
Left: `(३९) प्रतीक रूप से,`
Then:
Line:
`                          म             ब₁`
Line:
`                   ─────────────── × ── = ध₁ ;`
Line:
`                    ब₁    ब₂   ब₃        अ₁`
`                    ── + ── + ── + ...`
`                    अ₁    अ₂   अ₃`

Wait, in the original book, it's printed as:

१०० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ४३-
अत्रोद्देशकः
चत्वारिंशत्त्रिंशद्विंशतिपञ्चाशदत्र मूलानि ।
दशाष्टत्रिषञ्चदश फलमष्टादश कालमिश्रधनराशिः ॥ ४३ ॥
प्रमाणराशौ फलेन तुल्यमिच्छाराशिमूलं च तदिच्छाराशौ वृद्धिं च संपीड्य तन्मिश्रराशौ
प्रमाणराशेर्वृद्धिविभागानयनसूत्रम्—
कालगुणितप्रमाणं परकालहृतं तदेकगुणमिश्रधनात् ।
इतरार्धकृतियुतान् पद्ममितरार्धोनं प्रमाणफलम् ॥ ४४ ॥
अत्रोद्देशकः
मासचतुष्कशतस्य प्रनष्टवृद्धिः प्रयोगमूलं तत् ।
स्वफलेन युतं द्वादश पञ्चकृतिस्तस्य कालोऽपि ॥ ४५ ॥
मासत्रितयाशीत्याः प्रनष्टवृद्धिः स्वमूलफलराशेः । पञ्चमभागेनोनाश्वाष्टौ वर्षेण मूलवृद्धी के ॥४६॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस प्रश्न में, दिये गये मूलधन ४०, ३०, २० और ५० हैं तथा संवादी ब्याज राशियाँ क्रमशः
१०, ६, ३ और १५ हैं । विभिन्न अवधियों का मिश्रयोग १८ है । बतलाओ कि अवधियाँ क्या-
क्या हैं ? ॥४३॥
ब्याजदर के बराबर दिया गया मूलधन और इस उधार दिये गये मूलधन के ब्याज, इन दोनों
के मिश्रयोग को निरूपित करनेवाली राशि में से मूलधनदर एवं ब्याजदर अलग-अलग निकालने
के लिये नियम —
मूलधनदर को अवधिदर द्वारा गुणित कर उसे जिस समय तक ब्याज लगाया गया है उस
समय द्वारा विभाजित करते हैं । इस परिणामी भजनफल को दिये गये मिश्रयोग द्वारा एक बार गुणित
करते हैं, और तब, उसमें उपर्युक्त भजनफल की आधी राशि के वर्ग को जोड़ते हैं । इस तरह प्राप्त राशि
का वर्गमूल निकालते हैं । प्राप्त फल को उसी भजनफल की अर्द्धराशि द्वारा ह्रासित करते हैं तो मूलधन
के बराबर इष्ट ब्याजदर प्राप्त होती है ॥४४॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
ब्याजदर प्रतिशत प्रति ४ माह अज्ञात है । वही अज्ञात राशि उधार दिया गया मूलधन भी
है । यह खुद के ब्याज से जोड़ी जाने पर १२ हो जाती है । २५ माह अवधि है जिसमें कि वह ब्याज
उपार्जित हुआ है । ब्याजदर को निकालो जो मूलधन के तुल्य है ॥४५॥ ब्याजदर प्रति ८० प्रति ३ माह
अज्ञात है । एक साल के ब्याज तथा उस अज्ञात राशि के तुल्य मूलधन का मिश्रयोग ७६ ४/५ है । बतलाओ
कि मूलधन और ब्याजदर क्या क्या हैं ? ॥४६॥
(४४) प्रतीक रूप से, √[ (घा आ / अ) × म + (घा आ / २अ)² ] - (घा आ / २अ) = बा जो ध के तुल्य है ।

-६. ५२ ] मिश्रकव्यवहारः [ १०१
समानमूलवृद्धिमिश्रविभागसूत्रम्-
अन्योन्यकालविनिहतमिश्रविशेषस्य तस्य भागाख्यम् ।
कालविशेषेण हृते तेषां मूलं विजानीयात् ॥ ४७ ॥
अत्रोद्देशकः
पञ्चाशदष्टपञ्चाशन्मिश्रं षट्षष्टिरेव च । पञ्च सप्तैव नव हि मासाः किं फलमानय ॥ ४८ ॥
त्रिंशच्चैकत्रिंशद् द्वित्र्यंशाः स्युः पुनस्त्रयस्त्रिंशत् । सत्र्यंशा मिश्रधनं पञ्चत्रिंशच्च गणकादात् ॥४९॥
कश्चिन्नरश्चतुर्णां त्रिभिश्चतुर्भिश्च पञ्चभिः षड्भिः । मासैर्लब्धं किं स्यान्मूलं शीघ्रं ममाचक्ष्व ॥५०॥
समानमूलकालमिश्रविभागसूत्रम्-
अन्योन्यवृद्धिसंगुणमिश्रविशेषस्य तस्य भागाख्यम् ।
वृद्धिविशेषेण हृते लब्धं मूलं बुधाः प्राहुः ॥ ५१ ॥
अत्रोद्देशकः
एकत्रिपञ्चमिश्रितविंशतिरिह कालमूलयोर्मिश्रम् ।
षड् दश चतुर्दश स्युर्लाभाः किं मूलमत्र साम्यं स्यात् ॥ ५२ ॥
मूलधन जो सब दशाओं में एकसा रहता है, और ( विभिन्न अवधियों के ) ब्याजों को, उनके
मिश्रयोग में से अलग-अलग करने के लिये नियम--
कोई भी दो दिये गये मिश्रयोगों को क्रमशः एक दूसरे के ब्याज की अवधियों द्वारा गुणित
करने से प्राप्त राशियों के अंतर द्वारा विभाजित करने पर जो भजनफल प्राप्त होता है वह उन दिये गये
मिश्रयोगों सम्बन्धी इष्ट मूलधन है ॥४७॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
मिश्रयोग ५०, ५८ और ६६ है और अवधियाँ जिनमें कि ब्याज उपार्जित हुए हैं, क्रमशः ५,७
और ८ माह हैं । प्रत्येक दशा में ब्याज बतलाओ ॥४८॥ हे गणितज्ञ ! किसी मनुष्य ने ४ व्यक्तियों
को क्रमशः ३, ४, ५ और ६ मास के अन्त में उसो मूलधन और ब्याज के मिश्रयोग ३०, ३१ २/३,
३३ १/३ और ३५ दिये । मुझे शीघ्र बतलाओ कि यहाँ मूलधन क्या है ? ॥ ४९-५० ॥
मूलधन ( जो प्रत्येक दशा में वही रहता हो ) और अवधि ( जितने समय में ब्याज उपार्जित
किया गया हो ) को उन्हीं के मिश्रयोग में से अलग-अलग करने के लिये नियम--
कोई भी दो मिश्रयोगों को क्रमशः एक दूसरे के ब्याज द्वारा गुणित कर, प्राप्त राशियों के अन्तर
को दो चुने हुए ब्याजों के अन्तर द्वारा विभाजित करने पर भजनफल के रूप में इष्ट मूलधन प्राप्त होता
है, ऐसा विद्वान् कहते हैं ॥५१॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
मूलधन और अवधियों के मिश्रयोग २१, २३ और २५ हैं । यहाँ ब्याज ६, १० और १४ हैं ।
बतलाओ कि समान अर्हो वाला मूलधन क्या है ? ॥५२॥ दिये गये मिश्रयोग ३५, ३७ और ३९ हैं;
( ४७ ) प्रतीक रूप से, ( म₁ अ₂ ~ म₂ अ₁ ) / ( अ₁ ~ अ₂ ) = ध
( ५१ ) प्रतीक रूप से, ( म₁ ब₂ ~ म₂ ब₁ ) / ( ब₁ ~ ब₂ ) = ध, जहाँ म₁, म₂, आदि, विभिन्न मिश्रयोग हैं ।

१०२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ५३-
पञ्चत्रिंशन्मिश्रं सप्तत्रिंशच्च नवयुतत्रिंशत् । विंशतिरष्टाविंशतिरथ षट्त्रिंशच्च वृद्धिधनम् ॥ ५३ ॥
उभयप्रयोगमूलानयनसूत्रम्—
रूपस्येच्छाकालादुभयफले ये तयोर्विशेषेण । लब्धं विभजेन्मूलं स्वपूर्वसंकल्पितं भवति¹ ॥ ५४ ॥
अत्रोद्देशकः
उद्द्वृत्त्या षट्कशते प्रयोजितोऽसौ पुनश्च नवकशते ।
मासैस्त्रिभिर्मिश्रं लभते सैकाशीतिं क्रमेण मूलं किम् ॥ ५५ ॥
त्रिवृद्धयैव शते मासे प्रयुक्तश्चाष्टभिःशते । लाभोऽशीतिः कियन्मूलं भवेत्तन्मासयोर्द्वयोः ॥ ५६ ॥
वृद्धिमूलविमोचनकालानयनसूत्रम्—
मूलं स्वकालगुणितं फलगुणितं तत्प्रमाणकालाभ्याम् ।
भक्तं स्कन्धस्य फलं मूलं कालं फलात्प्राग्वत् ॥ ५७ ॥
१ इसी नियम को कुछ अशुद्ध रूप में परिवर्तित पाठ में इस प्रकार उल्लिखित किया गया है—
पुनरप्युभयप्रयोगमूलानयनसूत्रम्—
इच्छाकालादुभयप्रयोगवृद्धिं समानीय । तद्वृद्ध्यन्तरभक्तं लब्धं मूलं विजानीयात् ॥
ब्याज २०, २८ और ३६ हैं । समान अर्घ वाला मूलधन क्या है ? ॥५३॥
दो भिन्न ब्याजदरों पर लगाया हुआ मूलधन प्राप्त करने के लिये नियम—
दो ब्याज राशियों के अंतर को उन दो राशियों के अंतर द्वारा विभाजित करो जो दी हुई
अवधियों में १ पर ब्याज होती हैं । यह भजनफल स्वपूर्व संकल्पित मूलधन होता है ॥५४॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
६ प्रतिशत की दर पर उधार लेकर, और तब ९ प्रतिशत की दर पर उधार देकर कोई व्यक्ति
चलन ( differential ) लाभ के द्वारा ठीक ३ माह के पश्चात् ८१ प्राप्त करता है । मूलधन
क्या है ? ॥५५॥ ३ प्रतिशत प्रतिमास के अर्घ से कोई रकम उधार ली जाकर ८ प्रतिशत प्रतिमाह के
अर्घ से ब्याज परदी जाती है । चलन लाभ, २ माह के अन्त में ८० होता है । बतलाओ वह रकम
क्या है ? ॥५६॥
जब मूलधन और ब्याज दोनों (किश्तों द्वारा) चुकाये जाते हों तब समय निकालने के नियम—
उधार दिया गया मूलधन किश्त के समय द्वारा गुणित किया जाता है और फिर ब्याज दर
द्वारा गुणित किया जाता है । इस गुणनफल को मूलधनदर द्वारा और अवधिदर द्वारा विभाजित
करने पर उस किश्त सम्बन्धी ब्याज प्राप्त होता है । इस ब्याज से, किश्त का मूलधन और ऋण को
चुकाने का समय, दोनों को प्राप्त किया जाता है ॥५७॥
ब₁ ~ ब₂
( ५४ ) प्रतीक रूप से, ----------------------------------------- = ध
१ × अ₁ × बा₁ १ × अ₂ × बा₂


आ₁ × घा₁ आ₂ × घा₂
ध × प × बा
( ५७ ) प्रतीक रूप से, ------------ = किश्त सम्बन्धी ब्याज, जहाँ प प्रत्येक किश्त की अवधि है ।
घा × आ

-६. ६२ ] मिश्रकव्यवहारः [ १०३
अत्रोद्देशकः
मासे हि पञ्चैव च सप्ततीनां मासद्वयेऽष्टादशकं प्रदेयम् ।
स्कन्धं चतुर्भिः सहिता त्वशीतिः मूलं भवेत्को नु विमुक्तिकालः ॥ ५८ ॥
षष्ट्या मासिकवृद्धिः पञ्चैव हि मूलमपि च षट्त्रिंशत् ।
मासत्रितये स्कन्धं त्रिपञ्चकं तस्य कः कालः ॥ ५९ ॥
समानवृद्धिमूलमिश्रविभागसूत्रम्—
मूलैः स्वकालगुणितैर्वृद्धिविभक्तैः समासकैर्विभजेत् ।
मिश्रं स्वकालनिघ्नं वृद्धिमूलानि च प्राग्वत् ॥ ६० ॥
अत्रोद्देशकः
द्विकषट्कचतुः शतके चतुः सहस्रं चतुः शतं मिश्रम् ।
मासद्वयेन वृद्ध्या समानि कान्यत्र मूलानि ॥ ६१ ॥
त्रिकशतपञ्चकसप्रतिपादोनचतुष्कषष्टियोगेषु । नवशतसहस्रसंख्या मासत्रितये समा युक्ता ॥६२॥
────────────────────────────────────────────────────────────────────────────────
उदाहरणार्थ प्रश्न
ब्याजदर ५ प्रति ७० प्रतिमास है; प्रत्येक २ माह में चुकाई जाने वाली किश्त १८ है एवं
उधार दिया गया मूलधन ८४ है । विमुक्ति काल (कर्ज चुकाने का समय ) बतलाओ ॥५८॥ ६० पर
प्रतिमास ब्याज ५ होता है । उधार दिया गया मूलधन ३६ है । ३ माह में चुकाई जाने वाली प्रत्येक
किश्त १५ है । उस कर्ज के चुकने का समय बतलाओ ॥५९॥
जिन पर समान ब्याज उपार्जित हुआ है ऐसे विभिन्न मूलधनों को मिश्रयोग से अलग-अलग
करने के लिये नियम—
मिश्रयोग को अवधि द्वारा गुणित कर, उन राशियों के योग से विभाजित करो जो (राशियाँ)
विभिन्न मूलधनदरों को उनकी संवादी अवधिदरों द्वारा गुणित करने तथा संवादी ब्याजदरों द्वारा
विभाजित करने पर प्राप्त होती हैं । इस प्रकार ब्याज प्राप्त होता है और उससे मूलधन प्राप्त किये
जाते हैं ॥६०॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
२, ६ और ४ प्रतिशत प्रतिमास की दर से दिये गये मूलधनों का मिश्रयोग ४,४०० है । इन
समस्त मूलधनों की २ माह की ब्याज राशियाँ बराबर होती हैं । बतलाओ कि वह ब्याजराशि क्या है
और विभिन्न मूलधन क्या-क्या हैं ? ॥६१॥ कुल रकम १,९००; ३ प्रतिशत, ५ प्रति ७० और ३ ३/८ प्रति
६० प्रतिमाह की दर से विभिन्न मूलधनों में ब्याज पर वितरित कर दी गईं । प्रत्येक दशा में ३ माह
में ब्याज बराबर-बराबर उपार्जित हुआ । उस समान ब्याजराशि को तथा विभिन्न मूलधनों को अलग-
अलग प्राप्त करो ॥६२॥
म × अ
( ६० ) प्रतीक रूप से, ─────────────────────────────────── = ब; इसके द्वारा मूलधनों
धा₁ × आ₁ धा₂ × आ₂
───────── + ───────── + ...इत्यादि
बा₁ बा₂
को अध्याय ६ की १० वीं गाथा के नियम द्वारा प्राप्त किया जा सकता है ।

१०४ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ६३-
विमुक्तकालस्य मूलानयनसूत्रम्—
स्कन्धं स्वकालभक्तं विमुक्तकालेन ताडितं विभजेत् ।
निर्मुक्तकालवृद्ध्या रूपस्य हि सैकया मूलम् ॥ ६३ ॥
अत्रोद्देशकः
पञ्चकशतमयोगे मासौ द्वौ स्कन्धमष्टकं दत्त्वा । मासैः षष्टिभिरिह वै निर्मुक्तः किं भवेन्मूलम् ॥६४॥
द्वौ सत्रिपञ्चभागौ स्कन्धं द्वादशदिनैर्द्ददात्येकः । त्रिकशतयोगे दशभिर्मासैर्मुक्तं हि मूलं किम् ॥६५॥
वृद्धियुक्तहीन समानमूलमिश्रविभागसूत्रम्—
कालस्वफलोनाधिकरूपोद्धृतरूपयोगहृतमिश्रे१।
१ "मिश्रः" पाठ हस्तलिपियों में है; यहाँ व्याकरण की दृष्टि से मिश्रे शब्द अधिक संतोषजनक है ।
ज्ञात अवधि में चुकाई जाने वाली किश्तों सम्बन्धी उधार दिये गये मूलधन को निकालने का नियम—
किश्त की रकम को उसकी अवधि द्वारा विभाजित करते हैं और कर्ज चुकाने के समय ( विमुक्ति
काल ) द्वारा गुणित करते हैं । अब प्राप्त राशि को उस राशि द्वारा विभाजित करते हैं जो १ में १ पर
कर्ज निर्मुक्ति समय के लिये लगाये हुए ब्याज को जोड़ने पर प्राप्त होती है । इस प्रकार मूलधन प्राप्त होता है ॥६३॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
५ प्रतिशत प्रतिमास की दर से जब प्रत्येक किश्त की अवधि २ मास रही, और प्रत्येक बार में
८ किश्त रूप में चुकाया गया तब एक मनुष्य ६० माह में ऋणमुक्त हुआ । बतलाओ उसने कितना
धन उधार लिया था ? ॥६४॥
कोई व्यक्ति १२ दिनों में एक बार २ ३/५ किश्तरूप में देता है । यदि ब्याज दर ३ प्रतिशत प्रति-
मास हो तो १० माह में चुकने वाले ऋण के परिमाण को बतलाओ ? ॥६५॥
ऐसे विभिन्न मूलधनों को अलग-अलग निकालने के लिये नियम जो उनके मिश्रयोग में जब
उन्हीं के ब्याजों द्वारा मिलाये जाने पर अथवा उसमें से हासित किये जाने पर एक दूसरे के तुल्य हो
जाते हैं ( सभी दत्त दशाओं में मूलधनों में ब्याज राशियाँ जोड़ी जाती हैं अथवा उनमें से घटायी जाती हैं )—
क्रमशः दी गई ब्याज दर के अनुसार, प्रत्येक दशा में, एक में उपार्जित व्याज या तो मिलाया
जाता है अथवा एक में से हासित किया जाता है । तब, प्रत्येक दशा में, इन राशियों द्वारा एक को
विभाजित किया जाता है । इसके पश्चात् , विभिन्न उधार दिये गये धनों के मिश्रयोग को इन परिणामी
भजनफलों के योग द्वारा विभाजित किया जाता है । और मिश्र योग सम्बन्धी इस तरह बर्ते गये उन
उपर्युक्त भजनफलों के योग के संवादी समानुपाती भाग द्वारा अलग-अलग प्रत्येक दशा में उसे गुणित
( ६३ ) प्रतीक रूप से,
स ⎧ स = किश्त ( स्कंध ) है
── · अ ⎪ प = किश्त का समय है
प ⎪ और
─────────────── = ध; जहाँ ⎨
१ × अ × बा ⎪ अ = ऋण के चुकने की अवधि है ।
१ + ────────── ⎩
आ × धा

-६. ६९ ] मिश्रकव्यवहारः [ १०५
प्रक्षेपो गुणकारः स्वफलोनाधिकसमानमूलानि ॥ ६६ ॥
अत्रोद्देशकः
त्रिकपञ्चकाष्टकशतैः प्रयोगतोऽष्टासहस्रपञ्चशतम् ।
विंशतिसहितं वृद्धिभिरुद्धृत्य समानि पञ्चभिर्मासैः ॥ ६७ ॥
त्रिकषट्काष्टकषष्ट्या मासद्वितये चतुस्सहस्राणि ।
पञ्चाशद्द्विशतयुतान्यतोऽष्टमासकफलाद्धृते सदृशानि ॥ ६८ ॥
द्विकपञ्चकनवकशते मासचतुष्के त्रयोदशसहस्रम् ।
सप्तशतेन च मिश्रा चत्वारिंशत्सवृद्धिसममूलानि ॥ ६९ ॥
किया जाता है । इससे उधार दी गई रकमें उत्पन्न होती हैं जो उनके ब्याजों द्वारा मिलाई जाने पर
अथवा ह्रासित किये जाने पर समान हो जाती हैं ॥ ६६ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
८,५२० रुपये क्रमशः ३, ५ और ८ प्रतिशत प्रतिमास की दर से (भागों में) ब्याज पर दिये
जाते हैं । ५ माह में उपार्जित ब्याजों द्वारा ह्रासित करने पर वे दत्त रकमें बराबर हो जाती हैं । इस
तरह ब्याज पर लगाये हुए धनों को बतलाओ ॥ ६७ ॥ ४,२५० द्वारा निरूपित कुल धन को (भागों
में) क्रमशः ३, ६ और ८ प्रति ६० की दर से २ माह के लिये ब्याज पर लगाया गया है । ८ माह
में होने वाले ब्याजों को धनों में से घटाने पर जो धन प्राप्त होते हैं वे तुल्य देखे जाते हैं । इस
प्रकार विनियोजित विभिन्न धनों को बतलाओ ॥ ६८ ॥ १३,७४० रुपये, (भागों में) २, ५ और ९
प्रतिशत प्रतिमाह के अर्ध से ब्याज पर लगाये जाते हैं । ४ माह के लिये उधार दिये गये धनों में
ब्याजों को जोड़ने पर वे बराबर हो जाते हैं । उन धनों को बतलाओ ॥ ६९ ॥ ३,६४३ रुपये (भागों
में) क्रमशः १रे, ५रे और ६ प्रति ८० प्रतिमाह की दर से ब्याज पर लगाये जाते हैं । ८ माह में

(६६) प्रतीक रूप से,
म

१ १
------------------------------------ + ------------------------------------ + इत्यादि
⎛ १ × अ × बा₁ ⎞ ⎛ १ × अ × बा₂ ⎞
१ ± ⎜ ---------------- ⎟ १ ± ⎜ ---------------- ⎟
⎝ आ₁ × घा₁ ⎠ ⎝ आ₂ × घा₂ ⎠
१
× ------------------------------------ = ध₁
⎛ १ × अ × बा₁ ⎞
१ ± ⎜ ---------------- ⎟
⎝ आ₁ × घा₁ ⎠
इसी प्रकार,
म

१ १
------------------------------------ + ------------------------------------ + इत्यादि
⎛ १ × अ × बा₁ ⎞ ⎛ १ × अ × बा₂ ⎞
१ ± ⎜ ---------------- ⎟ १ ± ⎜ ---------------- ⎟
⎝ आ₁ × घा₁ ⎠ ⎝ आ₂ × घा₂ ⎠
१
× ------------------------------------ = ध₂ ; इसी तरह
⎛ १ × अ × बा₂ ⎞
१ ± ⎜ ---------------- ⎟
⎝ आ₂ × घा₂ ⎠
ध₃, ध₄ आदि के लिये ।
ग० सा० सं०–१४

१०६ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ७०-
सैकार्धकपञ्चार्धकषडर्धकाशीतियोगयुक्तास्तु ।
मासाष्टके षडधिका चत्वारिंशच्च षट्कृतिशतानि ॥ ७० ॥
संकलितस्कन्धमूलस्य मूलवृद्धिविमुक्तिकालानयनसूत्रम्—
स्कन्धाप्तमूलचितिगुणितस्कन्धेच्छाग्रघातियुतमूलं स्यात् ।
स्कन्धे कालेन फलं स्कन्धोद्धृतकालमूलहतकालः ॥ ७१ ॥
अत्रोद्देशकः
केनापि संप्रयुक्ता षष्टिः पञ्चकशतप्रयोगेण । मासत्रिपञ्चभागात् सप्तोत्तरतश्च सप्तादिः ॥ ७२ ॥
तत्षष्टिसप्तमांशकपदमितिसंकलितधनमेव । दत्त्वा तत्सप्तांशकवृद्धिं प्रादाच्च चितिमूलम् ॥
किं तद्वृद्धिः का स्यात् कालस्तदृणस्य मौक्षिको भवति ॥ ७३ १/२ ॥
उत्पन्न हुए व्याजों को मूलधनों में जोड़ने पर देखा जाता है कि वे बराबर हो जाते हैं । उन विनियोजित
रकमों को निकालो ॥ ७० ॥
समान्तर श्रेढि बद्ध किस्तों द्वारा चुकाई गई ऋण की रकम के सम्बन्ध में धन, ब्याज और
ऋण मुक्ति का समय निकालने के लिये नियम—
इष्ट ऋण धन वह मूलधन है जो मन से चुनी हुई (महत्तम प्राप्य किस्त की) रकम और
श्रेढि के पदों की संख्या के भिन्नीय भाग के गुणनफल को (१ जिसका प्रथम पद है, १ प्रचय है और
उपर्युक्त महत्तम ऋण की रकम को प्रथम किस्त द्वारा विभाजित करने से प्राप्त पूर्णाङ्क मान वाली संख्या
(भजनफल) जिसके पदों की संख्या है, ऐसी) समान्तर श्रेढि द्वारा गुणित प्रथम किस्त से मिलाने पर
प्राप्त होता है । ब्याज वह है जो किस्त की अवधि में उत्पन्न होता है । किस्त की अवधि को प्रथम
किस्त द्वारा विभाजित करने और मन से चुनी हुई ऋण की महत्तम रकम द्वारा गुणित करने पर जो
प्राप्त होता है वह ऋण मुक्त होने का समय है ॥ ७१ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक मनुष्य ने ५ प्रतिशत प्रतिमाह की दर से ब्याज लगाये जाने वाले ऋण की मुक्ति के लिये
६० को महत्तम रकम चुना तथा ७ प्रथम किस्त चुनी जो उत्तरोत्तर ३/५ माह में होनेवाली किस्तों में ७ द्वारा
बढ़ती चली गई । इस प्रकार, उसने ६०/७ पदों वाली समान्तर श्रेढि के योग को ऋण रूप में चुकाया
तथा उन ७ के अपवर्त्यो ( multiples ) पर लगने वाले ब्याज को भी चुकाया । श्रेढि के योग की
संवादी ऋण रकम को निकालो, चुकाये गये ब्याज को निकालो और बतलाओ कि उस ऋण की मुक्ति
का समय क्या है ? ॥ ७२–७३ १/२ ॥ किसी मनुष्य ने ५ प्रतिशत प्रतिमास ब्याज की दर लगाये जाने
(७१) यह नियम (कई शब्द छूट जाने के कारण) अत्यन्त भ्रमोत्पादक है तथा ७२–७३ १/२
वीं गाथा के उदाहरण हल करने पर स्पष्ट हो जावेगा । यहाँ मूल अथवा किस्त की महत्तम प्राप्य रकम
६० है । यह प्रथम किस्त की रकम ७ द्वारा विभाजित होने पर ६०/७ अथवा ८ ४/७ होती है जिसमें से ८
समान्तर श्रेढि के पदों की संख्या है । ऐसी समान्तर श्रेढि का १ प्रथम पद है, १ प्रचय है और ४/७ अग्र
अथवा ऊपर का भिन्नीय भाग है । उपर्युक्त श्रेढि के योग ३६ को प्रथम किस्त ७ द्वारा गुणितकर ४/७
और ६० के गुणनफल में जोड़ देते हैं । यहाँ ६० महत्तम प्राप्य रकम है । इस प्रकार ३६ × ७ + ४/७ × ६०
= ३०० ४/७ प्राप्त होता है जो ऋण का इष्ट मूलधन है । ३०० ४/७ पर ३/५ माह में ५ प्रतिशत प्रतिमाह की दर
से पूर्ण पर चुकाया गया ब्याज होगा । ऋण मुक्ति की अवधि ( ३/५ ÷ ७ ) × ६० = ३६/७ माह होगी ।

-६. ७८½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १७७
केनापि संप्रयुक्ताशीतिः पञ्चकशतप्रयोगेण ।। ७४½ ।।
अष्टाद्यष्टोत्तरतस्तदशीत्यष्टांशगच्छेन । मूलधनं दत्त्वाष्टाद्यष्टोत्तरतो धनस्य मासार्धात् ।। ७५½ ।।
वृद्धिं प्रादान्मूलं वृद्धिश्च विमुक्तिकालश्च । एषां परिमाणं किं विगणय्य सखे समाचक्ष्व ।। ७६½ ।।
एकीकरणसूत्रम्—
वृद्धिसमासं विभजेन्मासफलैक्येन लब्धमिष्टः कालः । कालप्रमाणगुणितस्तदिष्टकालेन संभक्तः ।।
वृद्धिसमासेन हतो मूलसमासेन भाजितो वृद्धिः ।। ७७½ ।।
अत्रोद्देशकः
युक्ता चतुरशतीह द्विकत्रिकपञ्चकचतुष्कशतेन । मासाः पञ्च चतुर्द्वित्रयः प्रयोगैककालः कः ।।७८½।।
इति मिश्रकव्यवहारे वृद्धिविधानं समाप्तम् ।
वाले ऋण की मुक्ति के लिये ८० को महत्तम रकम चुना । इसके साथ, ८ प्रथम किस्त की रकम थी
जो प्रति ½ माह में उत्तरोत्तर ८ द्वारा बढ़ती चली गई । इस प्रकार, उसने समान्तर श्रेढि के योग
को ऋण रूप में चुकाया । इस समान्तर श्रेढि में ८०/८ पदों की संख्या थी। इन ८ के अपवर्त्यो पर
ब्याज भी चुकाया गया । हे मित्र ! श्रेढि के योग की संवादी ऋण की रकम, चुकाया गया ब्याज
और ऋण मुक्ति का समय अच्छी तरह गणना कर निकालो ।। ७३½-७६ ।।
औसत साधारण ब्याज को निकालने के लिये नियम —
( विभिन्न उपार्जित होने वाले ) ब्याजों के योग को ( विभिन्न संवादी ) एक माह के दातव्य
ब्याजों के योग द्वारा विभाजित करने पर परिणामी भजनफल, इष्ट समय होता है । ( काल्पनिक )
समयदर और मूलधनदर के गुणनफउ को इष्ट समय द्वारा विभाजित करते हैं और ( उपार्जित होने
वाले विभिन्न ) ब्याजों के योग द्वारा गुणित करते हैं । प्राप्तफल को विभिन्न दिये गये मूलधनों के
योग द्वारा फिर से विभाजित करते हैं । इससे इष्ट ब्याज दर प्राप्त होती है । ॥ ७७-७७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस प्रश्न में, चार सौ की ४ रकमें अलग-अलग क्रमशः २, ३, ५ और ४ प्रतिशत प्रतिमास की
दर से ५, ४, २ और ३ माहों के लिये ब्याज पर लगाई गईं । औसत साधारण अवधि और ब्याजदर
निकालो ।। ७८½ ।।
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में वृद्धि विधान नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
( ७७ और ७७½ ) विभिन्न उत्पन्न होने वाले ब्याज वे होते हैं जो अलग-अलग रकमों के, विभिन्न
दरों पर उनकी क्रमवार अवधियों के लिये ब्याज होते हैं ।
प्रतीक रूप से, { (ध₁ × अ₁ × बा₁) / (आ × घा) + (ध₂ × अ₂ × बा₂) / (आ × घा) + ............ } ÷
{ (ध₁ × १ × बा₁) / (आ × घा) + (ध₂ × १ × बा₂) / (आ × घा) + ............ }
= अ_औ अथवा औसत अवधि ;
और [(घा × आ) / अ_औ] × { (ध₁ × अ₁ × बा₁) / (आ × घा) + (ध₂ × अ₂ × बा₂) / (आ × घा) + ............ } ÷
( ध₁ + ध₂ + ............ ) = ब_औ अथवा औसत ब्याज ।

१०८ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ७९½-
प्रक्षेपकुट्टीकारः
इतः परं मिश्रकव्यवहारे प्रक्षेपकुट्टीकारगणितं व्याख्यास्यामः ।
प्रक्षेपकरणमिदं सवर्गविच्छेदनाशयुतिहृतमिश्रः ।
प्रक्षेपगुणकारः कुट्टीकारो बुधैः समुद्दिष्टम् ॥ ७९½ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वित्रिचतुष्षड्भागैर्विभाज्यते द्विगुणषष्टिरिह हेम्नाम् ।
भृत्येभ्यो हि चतुर्भ्यो गणकाचक्ष्वाशु मे भागान् ॥ ८०½ ॥
प्रथमस्यांशत्रितयं त्रिगुणोत्तरतश्च पञ्चभिर्भक्तम् ।
दीनाराणां त्रिशतं त्रिषष्टिसहितं क एकांशः ॥ ८१½ ॥
आदाय चाम्बुजानि प्रविश्य सच्छावकोऽथ जिननिलयम् ।
पूजां चकार भक्त्या पूजार्हेभ्यो जिनेन्द्रेभ्यः ॥ ८२½ ॥
वृषभाय चतुर्थांशं षष्ठांशं शिष्टपार्श्वाय । द्वादशमथ जिनपतये त्र्यंशं मुनिसुव्रताय ददौ ॥ ८३½॥
नष्टाष्टकर्मणे जगदिष्टायारिष्टनेमयेऽष्टांशम् । षष्ठघ्नचतुर्भागं भक्त्या जिनशान्तये प्रददौ ॥ ८४½ ॥
कमलान्यशीतिमिश्राण्यायातान्यथ शतानि चत्वारि ।
कुसुमानां भागार्थं कथय प्रक्षेपकाख्यकरणेन ॥ ८५½ ॥
प्रक्षेप कुट्टीकार ( समानुपाती भाग )
इसके पश्चात् हम इस मिश्रक व्यवहार में समानुपाती भाग के गणित का प्रतिपादन करेंगे—
समानुपाती भाग की क्रिया वह है जिसमें दी गई ( समूह वाचक ) राशि पहिले ( विभिन्न
समानुपाती भागों का निरूपण करने वाले ) समान ( साधारण ) हर वाले भिन्नों के अंशों के योग द्वारा
विभाजित की जाती है । ऐसे समान हर वाले भिन्नों के हरों को उच्छेदित कर विचारते नहीं हैं ।
प्राप्त फल को प्रत्येक दशा में क्रमशः इन समानुपाती अंशों द्वारा गुणित करते हैं । इसे बुधजन (विद्वज्जन)
'कुट्टीकार' कहते हैं ॥ ७९½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस प्रश्न में १२० स्वर्ण मुद्राएँ ४ नौकरों में क्रमशः १/२, १/३, १/४ और १/६ के भिन्नीय भागों में
बाँटी जाती हैं । हे अंकगणितज्ञ ! मुझे शीघ्र बतलाओ कि उन्हें क्या मिला ? ॥ ८०½ ॥ ३६३ दीनारों
को पाँच व्यक्तियों में बाँटा गया । उनमें से प्रथम को ३ भाग मिले और शेष भाग को उत्तरोत्तर ३
की साधारण निष्पत्ति में बाँटा गया । प्रत्येक का हिस्सा बतलाओ ॥ ८१½ ॥ एक सच्चे श्रावक ने
किसी संख्या के कमल के फूल लिये और जिन मंदिर में जाकर पूज्यनीय जिनेन्द्रों की भक्तिभाव से
पूजा की । उसने वृषभ भगवान् को १/४, १/६ पूज्य पार्श्व भगवान् को, १/१२ जिन पति को, १/३ मुनि सुव्रत
भगवान् को भेंट किये; १/८ भाग आठों कर्मों का नाश करने वाले जगदिष्ट अरिष्टनेमि भगवान् को और
१/६ का १/४ शांति जिन भगवान् को भेंट किये । यदि वह ४८० कमल के फूल इस पूजा के लिये लाया हो
तो इस प्रक्षेप नामक क्रिया द्वारा फूलों का समानुपाती वितरण प्राप्त करो ॥ ८२½-८५½ ॥ ४८० की
( ७९½ ) ८०½ वीं गाथा के प्रश्न को इस नियमानुसार हल करने में हमें १/२, १/३, १/४, १/६ से
६/१२, ४/१२, ३/१२, २/१२ प्राप्त होते हैं । हरों को हटाने के पश्चात्, हमें ६, ४, ३, २ प्राप्त होते हैं । ये
प्रक्षेप अथवा समानुपाती अंश भी कहलाते हैं । इनका योग १५ है, जिसके द्वारा बाँटी जानेवाली रकम

  • ६. ८९½ ] | मिश्रकव्यवहारः | [ १०९
    --- | --- | ---

चत्वारि शतानि सखे युतान्यशीत्या नरैर्विभक्तानि ।
पञ्चभिराचक्ष्व त्वं द्वित्रिचतुःपञ्चषड्गुणितैः ॥ ८६½ ॥
इष्टगुणफलानयनसूत्रम्—
भक्तं रूपैर्मूल्यं गुणगुणितं तेन योजितं प्रक्षेपम् ।
तद्द्रव्यं मूल्यघ्नं क्षेपविभक्तं हि मूल्यं स्यात् ॥ ८७½ ॥
अस्मिन्नर्थे पुनरपि सूत्रम्—
फलगुणकारैर्हत्वा पणान् फलैरेव भागमादाय ।
क्षेपेषु ये गुणाः स्युस्त्रैराशिकः फलं वदेन्मतिमान् ॥ ८८½ ॥
अस्मिन्नर्थे पुनरपि सूत्रम्—
स्वफलहृताः स्वगुणघ्नाः पणास्तु तैर्भवति पूर्ववच्छेषः ।
इष्टफलं निर्दिष्टं त्रैराशिकसाधितं सम्यक् ॥ ८९½ ॥

रकम ५ व्यक्तियों में २, ३, ४, ५ और ६ के अनुपात में विभाजित की गई । हे मित्र ! प्रत्येक के हिस्से में कितनी रकम पड़ी ? ॥ ८६½ ॥
इष्ट गुणफल को प्राप्त करने के लिये नियम—
मूल्यदर

११० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ९०½-
अत्रोद्देशकः
द्वाभ्यां त्रीणि त्रिभिः पञ्च पञ्चभिः सप्त मानकैः ।
दाडिमाम्रकपित्थानां फलानि गणितार्थवित् ॥ ९०½ ॥
कपित्थात् त्रिगुणं ह्याम्रं दाडिमं षड्गुणं भवेत् ।
क्रीत्वानय सखे शीघ्रं त्वं षट्सप्ततिभिः पणैः ॥ ९१½ ॥
दध्याज्यक्षीरघटैर्जिनबिम्बस्याभिषेचनं कृतवान् ।
जिनपुरुषो द्वासप्ततिपलैस्त्रयः पूरिताः कलशाः ॥ ९२½ ॥
द्वात्रिंशत्प्रथमघटे पुनश्चतुर्विंशतिर्द्वितीयघटे ।
षोडश तृतीयकलशे पृथक् पृथक् कथय मे कृत्वा ॥ ९३½ ॥
तेषां दधिघृतपयसां ततश्चतुर्विंशतिर्घृतस्य पलानि ।
षोडश पयःपलानि द्वात्रिंशद् दधिपलानीह ॥ ९४½ ॥
वृत्तिस्त्रयः पुराणाः पुंसश्चारोहकस्य तत्रापि । सर्वेऽपि पञ्चषष्टिः केचिद्भग्ना धनं तेषाम् ॥ ९५½ ॥
संनिहितानां दत्तं लब्धं पुंसा दशैव चैकस्य ।
के संनिहिता भग्नाः के मम संचिन्त्य कथय त्वम् ॥ ९६½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
अनार, आम और कपित्थ क्रमशः २ पण में ३, ३ पण में ५ और ५ पण में ७ की दर से प्राप्य
हैं। हे गणना के सिद्धांतों को जानने वाले मित्र ! ७६ पणों के फल लेकर शीघ्र आओ ताकि आमों की
संख्या कपित्थों की संख्या की तिगुनी हो और अनारों की संख्या ६ गुनी हो ॥ ९०½-९१½ ॥ किसी
जिनानुगामी ने जिन प्रतिमा का दही, घी और दुग्ध से पूरित कलशों द्वारा अभिषेक कराया ।
इनके ७२ पलों द्वारा ३ पात्र भर गये । प्रथम घट में ३२ पल, दूसरे घट में २४ तथा तीसरे में १६
पल पाये गये । इन दधि, घी, दूध मिश्रित पात्रों में मिश्रित द्रव्यों को अलग-अलग ज्ञात और प्राप्त
करो जबकि कुल मिलाकर २४ पल घी, १६ पल दूध और ३२ पल दही है ॥ ९२½-९४½ ॥
एक अश्वारोही सैनिक का वेतन ३ पुराण था । इस दर पर कुल ६५ व्यक्ति नियुक्त थे । उनमें से कुछ
मारे गये और उनके वेतन की रकम रणक्षेत्र में शेष रहनेवाले सैनिकों को दे दी गई । इस प्रकार,
प्रत्येक मनुष्य को १० पुराण प्राप्त हुए । मुझे बतलाओ कि रणक्षेत्र में कितने सैनिक खेत रहे और
कितने जीवित बचे ? ॥ ९५½-९६½ ॥
करते हैं । इस प्रकार हमें २/३ × ६, २/३ × ३, २/३ × १ से क्रमशः ४, २ और २/३ प्राप्त होते हैं । ये समानुपाती
भाग हैं । ८८½ और ८९½ सूत्रों में इन समानुपाती भागों के संबंध में प्रक्षेप की क्रिया का प्रयोग करना
पड़ता है । परन्तु, ८७½ करण नियम में यह क्रिया पूरी तरह वर्णित है ।