गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
भाषाटीकासमेत । ( १५ )
कुर्व्वन्ति सततं कर्म जन्ममृत्युफलप्रदम् ॥
स्वर्गैश्वर्यरता ध्वस्तचेतना भोगवृद्धयः ॥३४॥
इसी कारण वे जन्म और मृत्युके फल देनेहारे कर्मोंको
सदा करते रहते हैं वे स्वर्गके ऐश्वर्योंमेंही लगे रहते हैं, उन
भोगबुद्धिवालोंकी चेतना नष्ट होजाती है ॥ ३४ ॥
सम्पादयन्ति ते भूप स्वात्मना निजबन्धनम् ॥
संसारचक्रं युञ्जन्ति जडाः कर्मपरा नराः॥३५॥
हे राजन् ! वे आपही अपने निमित्त बंधन बनाते हैं, मूढ
और कर्मपरायण मनुष्य संसारचक्रमें पडते हैं ॥ ३५ ॥
यस्य यद्विहितं कर्म तत्कर्तव्यं मदर्पणम् ॥
ततोऽस्य कर्मबीजानामुच्छिन्नाः स्युर्महांकुराः ३६
जिसको जो कर्म विधान किया है, वह मेरे अर्पण करना
चाहिये, तब इन प्राणियोंके कर्मरूप बीजोंके महा अंकुर
नष्ट हों ॥ ३६ ॥
चित्तशुद्धिश्च महती विज्ञानसाधिका भवेत् ॥
विज्ञानेन हि विज्ञातं परं ब्रह्म मुनीश्वरैः ॥३७॥
चित्तकी शुद्धि होनेसेही विज्ञानकी प्राप्ति होती है, विज्ञानके
द्वाराही ऋषियोंने परब्रह्मको जाना है ॥ ३७ ॥
( १६ ) गणेशगीता-अ १.
तस्मात्कर्माणि कुर्वीत बुद्धियुक्तो नराधिप ॥
न त्वकर्मा भवेत्कोऽपि स्वधर्मत्यागवांस्तथा ३८
हे राजन् ! इसकारण जो कर्मकरे वह बुद्धियुक्त है अर्थात्
मेरे अर्पण करे, कारण कि जिस कर्मका त्याग होनेसे स्वध-
र्मका त्याग होता है वह त्याग उचित नहीं है ॥ ३८ ॥
जहाति यदि कर्माणि ततः सिद्धिं न विंदति ॥
आदौ ज्ञानेनाधिकारः कर्मण्येव स युज्यते३९॥
जो कर्मका त्याग करेगा तौ चित्तशुद्धि नहीं होगी, चित्त-
शुद्धि न होनेसे ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होगी, और सिद्धिकीभी
प्राप्ति नहीं होगी, विना चित्तशुद्धिके ज्ञानमें अधिकार नहीं है,
इसकारण प्रथम आसक्तिरहित होकर कर्म करना उचित है ३९॥
कर्मणा शुद्धहृदयोऽभेदबुद्धिमुपैष्यति ॥
स च योगः समाख्यातोऽमृतत्वाय हि कल्पते४०
कर्मसे शुद्ध हृदय होकर अभेद बुद्धिको प्राप्त होता है,
उसीका नाम योग है, जिससे प्राणी अमर होजाता है ॥ ४० ॥
योगमन्यं प्रवक्ष्यामि शृणु भूप तदुत्तमम् ॥
पशौ पुत्रे तथा मित्रे शत्रौ बन्धौ सुहृज्जने॥४१॥
भाषाटीकासमेत । ( १७ )
हे राजन् ! मैं और भी उत्तम योग कहताहूं,तुम उसे सुनो,
पशु, मित्र, पुत्र, शत्रु, बंधु तथा सज्जन पुरुष ॥ ४१ ॥
बहिर्दृष्ट्या च समया हृत्स्थयालोकयेत्पुमान् ॥
सुखे दुःखे तथाऽमर्षे हर्षे भीतौ समो भवेत्॥४२॥
इन सबमें समान दृष्टि करनी चाहिये, बाहर भीतर एकसी
दृष्टि रखनी, सुख, दुःख, क्रोध, हर्ष, भय इनमें समान रहना
चाहिये ॥ ४२ ॥
रोगाप्तौ चैव भोगाप्तौ वा जये विजयेऽपि च ॥
श्रियोऽयोगे च योगे च लाभालाभेमृतावपि॥४३॥
रोगकी प्राप्ति हो, चाहे भोगकी प्राप्तिहो, जयहो, विजयहो
लक्ष्मीकी प्राप्ति, अप्राप्ति, हानि, लाभ, जन्म, मरण, इन सबमें
मनको समान रखना उचित है ॥ ४३ ॥
समो मां वस्तुजातेषु पश्यन्नन्तर्बहिः स्थितम् ॥
सूर्ये सोमे जले वह्नौ शिवे शक्तौ तथानिलेज४४
सम्पूर्ण वस्तुओंमें समान भावसे बाहर भीतर मुझे स्थित
जानना, सूर्य, चन्द्रमा, जल, अग्नि, शिव, शक्ति, वायु॥४४॥
द्विजे हृदे महानद्यां तीर्थे क्षेत्रेऽघनाशिनि ॥
विष्णौ च सर्वदेवेषु तथा यक्षोरगेषु च ॥४५॥
( १८ ) गणेशगीता-अ० १.
ब्राह्मण, छोटे सरोवर,महानदी,तीर्थ पापहारी क्षेत्र, विष्णु,
सम्पूर्ण देवता, यक्ष, उरग ॥ ४५ ॥
गन्धर्वेषु मनुष्येषु तथा तिर्यग्भवेषु च ॥
सततं मां हि यः पश्येत्सोऽयं योगविदुच्यते ४६
गन्धर्व, मनुष्य, तिरछे चलनेहारे जीव, इन सबमें जो मुझे
सदा समान दृष्टिसे देखता है वही योगका जाननेहारा
कहाता है ॥ ४६ ॥
संप्राहृत्य स्वार्थेभ्य इन्द्रियाणि विवेकतः ॥
सर्वत्र समताबुद्धिः स योगो भूप मे मतः ॥४७॥
हे राजन् ! जो ज्ञानद्वारा इन्द्रियोंको स्वार्थसे हटाकर
सर्वत्र समान बुद्धि रखता है, वही योग मानागया है ॥ ४७॥
आत्मानात्मविवेकेन या बुद्धिर्दैवयोगतः ॥
स्वधर्मासक्तचित्तस्य तद्योगो योग उच्यते॥४८॥
अपने धर्ममें आसक्त चित्त प्राणीकी दैवयोगसे जो
आत्मा और अनात्माके विचारकी बुद्धि उत्पन्न होती है,
उस बुद्धिके योगकाही नाम योग है ॥ ४८ ॥
धर्माधर्मौ जहातीह तया त्यक्त उभावपि ॥
अतो योगाय युञ्जीत योगो वैधेषु कौशलम्४९
भाषाटीकासमेत । ( १९ )
और उसी बुद्धिके न होनेसे यह प्राणी धर्म अधर्मका
त्याग करता है, इसकारण योगमें बुद्धि लगानी उचित है,
निष्काम कर्ममें कुशलता ही योग है ॥ ४९ ॥
धर्माधर्मफले त्यक्त्वा मनीषी विजितेन्द्रियः ॥
जन्मबन्धविनिर्मुक्तः स्थानं संयात्यनामयम् ५०
जितेन्द्रिय बुद्धिमान् धर्म और अधर्मके फलको त्यागन
करके जन्म बन्धनसे मुक्त होकर अनामय ( ब्रह्मलोक ) को
प्राप्त होता है ॥ ५० ॥
यदा ह्यज्ञानकालुष्यं जन्तोर्बुद्धिः क्रमिष्यति ॥
तदासौ याति वैराग्यं वेदवाक्यादिषु क्रमात् ५१
जब इस प्राणीकी बुद्धि मोहरूपी अविद्यासे रहित होगी
तब क्रमसे इस प्राणीका श्रवणयोग्य वेदवाक्यादिकोंमें जो
फल प्रतिपादन करते हैं उनमें क्रमसे वैराग्य होगा ॥ ५१ ॥
त्रयीविप्रतिपन्नस्य स्थाणुत्वं यास्यते यदा ॥
परात्मन्यचला बुद्धिस्तदासौ योगमाप्नुयात् ५२
जब तीनों वेदोंमें प्रतिपादन किये कर्मसे यह बुद्धि परमा-
त्मामें लगकर निश्चल होजाय तब इस प्राणीको योगकी
प्राप्ति होती है ॥ ५२ ॥
( २० ) गणेशगीता-अ० १.
मानसानखिलान्कामान्यदा धीमांस्त्यजेत्प्रिय ।
स्वात्मनि स्वेन संतुष्टःस्थिरबुद्धिस्तदोच्यते ५३
हे प्रिय ! जब यह बुद्धिमान् मनके सम्पूर्ण कामोंको त्यागन
कर दे, अपने आत्मामें आपहीसे संतुष्ट हो तब यह स्थिर-
बुद्धि कहाता है ॥ ५३ ॥
वितृष्णः सर्वसौख्येषु नोद्विग्नो दुःखसंगमे ॥
गतसाध्वसरुड्रागः स्थिरबुद्धिस्तदोच्यते ॥५४॥
किसीप्रकारके भी संसारी सुखोंमें तृष्णा न करनी,दुःखमें
उद्विग्न न होना, भय, क्रोध और राग न होना यही स्थिर-
बुद्धिका लक्षण है ॥ ५४ ॥
यथाऽयं कमठोऽङ्गानि संकोचयति सर्वतः ॥
विषयेभ्यस्तथा खानि संकर्षेद्योगतत्परः ॥५५॥
जिसप्रकारसे कछुआ सब ओरसे अपने अंग सिकोड लेता है
इसीप्रकारसे योगीको उचित है कि विषयोंसे इंद्रियोंको खींचे५५
व्यावर्तन्तेऽस्य विषयास्त्यक्ताहारस्यवार्ष्मणः ॥
विना रागं च रागोऽपि दृष्ट्वा ब्रह्म विनश्यति५६
भोजन त्यागनेवालेके विषय नष्ट होजाते हैं परन्तु उनका
भाषाटीकासमेत । ( २१ )
अनुभव बना रहता है परन्तु वैराग्यसे ब्रह्मकी प्राप्ति होनेसे
वह राग भी नष्ट हो आता है ॥ ५६ ॥
विपश्चिद्यतते भूप स्थितिमास्थाय योगिनः ॥
मन्थयित्वेन्द्रियाण्यस्य हरंति बलतो मनः ५७
हे राजन् ! जिनके इन्द्रिय वशमें नहीं हैं, वे स्थिर प्रज्ञा-
वाले नहीं होते हैं, इन्द्रियगण मोक्षके प्रयत्न करनेवाले
विद्वान् पुरुषका भी मन हर लेती हैं,इसकारण इंद्रियोंको वशमें
करनेका यत्न करना ॥ ५७ ॥
युक्तस्तानि वशे कृत्वा सर्वदा मत्परो भवेत् ॥
संयतानीन्द्रियाणीह यस्यासौ कृतधीर्मतः ५८॥
इन्द्रियोंको वशमें करके सदा योगीको मेरा परायण होना
चाहिये, कारण कि जिसकी इन्द्रियें वशमें होगई हैं उसीको
स्थिरप्रज्ञ कहते हैं ॥ ५८ ॥
चिन्तयानस्य विषयान्संगस्तेषूपजायते ॥
कामःसंजायते तस्मात्ततः क्रोधोऽभिवर्द्धते ५९॥
विषयोंकी चिन्ता करनेवाले पुरुषको उन सबोंमें अनुराग
होजाता है, आसक्तिसे कामना होती है, उससे क्रोधकी
उत्पत्ति होती है ॥ ५९ ॥
( २२ ) गणेशगीता-अ० १.
क्रोधादज्ञानसंभूतिर्विभ्रमस्तु ततः स्मृतेः ॥
भ्रंशात्स्मृतेर्मतेर्ध्वंसस्तद्ध्वंसात्सोऽपि नश्यति६०
क्रोधसे अज्ञान और इससे स्मृतिभ्रंश होता है, स्मृति-
भ्रंशसे बुद्धि नष्ट होती है, और बुद्धि नष्ट होनेसे यह प्राणी
नष्ट होजाता है ॥ ६० ॥
विना द्वेषं च रागं च गोचरान्यस्तु खैश्चरेत् ॥
स्वाधीनहृदयो वश्यैः संतोषं स समृच्छति ६१॥
अनुराग और द्वेषसे रहित अपने वशमें आई इन्द्रियोंसे
विषयोंका भोग करके भी चित्तको वशीभूत किये जन
शान्तिको प्राप्त होते हैं ॥ ६१ ॥
त्रिविधस्यापि दुःखस्य संतोषं विलयो भवेत् ॥
प्रज्ञया संस्थितश्चायं प्रसन्नहृदयो भवेत् ॥६२॥
एक संतोषकी प्राप्ति होनेसे तीनों प्रकारके दुःख नष्ट होजाते
हैं, इसीप्रकार स्थिरप्रज्ञावालेका मन प्रसन्न होजाता है ॥६२॥
विना प्रसादं न मतिर्विना मत्या न भावना ॥
विना तां न समो भूप विना तेन कुतः सुखम् ६३
विना चित्तप्रसन्न हुए बुद्धिकी प्राप्ति नहीं और बुद्धिके
भाषाटीकासमेत । ( २३ )
विना श्रद्धा नहीं, श्रद्धाके विना शान्ति नहीं और शान्तिके
विना सुख नहीं होता ॥ ६३ ॥
इंद्रियाणांन्विचरतो विषयाननुवर्तते ॥
यन्मनस्तन्मतिं हन्यादप्सु नावं मरुद्यथा॥६४॥
पवन जिसप्रकार नावको जलमें डुबो देती है वैसेही मन
विषयोंमें विचरनेवाले अवशीभूत इंद्रियरूपी घोडोंमेंसे जिसके
अनुकूल चलता, वही उसकी प्रज्ञाको हर लेता है ॥ ६४ ॥
या रात्रिः सर्वभूतानां तस्यां निद्राति नैव सः॥
न स्वपंतीह ते यत्र ता रात्रिस्तस्य भूमिप ६५
अज्ञानसे आच्छादित सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये जो आत्म-
ज्ञान रात्रि स्वरूप है, उसमें इन्द्रिय वश करनेहारे संयमी
योगी जागते हैं, और जिस विषयबुद्धिमें संपूर्ण प्राणी जागते
हैं, वह विषय भोग ज्ञानियोंके लिये रात्रि स्वरूप है ॥ ६५ ॥
सरितां पतिमायांति वनानि सर्वतो यथा ॥
आयांति यं तथा कामा न स शांतिं क्वचिल्लभेत् ६६
जिसप्रकारसे सब नदियें और जल समुद्रमें प्रवेश कर
जाते हैं और उसकी तृप्ति नहीं होती, इसीप्रकार सब कामना
पूर्ण होनेवालेको भी शान्ति नहीं होती ॥ ६६ ॥
( २४ ) गणेशगीता-अ० १.
अतस्तानीह संरुध्य सर्वतः खानि मानवः ॥
स्वस्वार्थेभ्यः प्रधावंति बुद्धिरस्य स्थिरा तदा ६७
इसकारण प्राणीको उचित है कि, सब प्रकारसे विषयोंकी
ओर धावमान होती हुई इन्द्रियोंको वशमें करे, तब इसकी
बुद्धि स्थिर हो ॥ ६७ ॥
ममताहंकृती त्यक्त्वा सर्वान्कामांश्च यस्त्यजेत् ॥
नित्यं ज्ञानरतो भूत्वा ज्ञानान्मुक्तिं स यास्यति॥
जो ममत्व अहंकार और सब कामनाओंका त्याग करताहै,
नित्य ज्ञानमें मग्न रहताहै वह ज्ञानसे मुक्तिको प्राप्त होजाता है ६८
एवं ब्रह्मधियं भूप यो विजानाति दैवतः ॥
तुर्यामवस्थां प्राप्यापि जीवन्मुक्तिं प्रयास्यति ६९
ॐतत्सादीति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासुयोगामृता-
र्थशास्त्रे श्रीमन्महागणेशपुराणे उत्तरखण्डे बाल-
चरिते गजाननवरेण्यसंवादे सांख्यसारार्थ-
योगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
भाषाटीकासमेत । (२५)
हे राजन् ! जो दैवगतिसे इस ब्रह्मज्ञानयुक्त बुद्धिको प्राप्त
हो जाता है वह तुर्या अवस्थाको प्राप्त होकर जीवन्मुक्त
हो जाता है ॥ ६९ ॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थ-
शास्त्रे श्रीमन्महागणेशपुराणे उत्तरखण्डे बालचरिते
गजाननवरेण्यसंवादे पण्डितज्वालाप्रसादमिश्र-
कृतभाषाटीकायां सांख्यसारार्थयोगो-
नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
वरेण्य उवाच ।
ज्ञाननिष्ठा कर्मनिष्ठा द्वयं प्रोक्तं त्वया विभो ।
अवधार्य वदैकं मे निःश्रेयसकरं नु किम् ॥ १ ॥
वरेण्यने कहा हे भगवन् ! ज्ञाननिष्ठ और कर्मनिष्ठ आपने
दोनोंका वर्णन किया इसमें मुझे संदेह होता है, इसकारण आप
दोनोंमें एक निश्चयकर जो कल्याणदायक हो सो कहिये ॥१॥
गजानन उवाच ।
अस्मिंश्चराचरे स्थित्यौ पुरोक्ते द्वे मया प्रिय ॥
सांख्यानां बुद्धियोगेन वैधयोगेन कर्मणाम् ॥२॥
श्रीगजानन बोले कि हे राजन् ! इस चराचर जगत्में दो
प्रकारकी स्थिति है, ज्ञान योगसे सांख्य शास्त्र जाननेवालोंकी
और कर्मयोगसे कर्मके अधिकारी चित्त शुद्धिरखनेवाले
योगियोंकी ॥ २ ॥
( २६ ) गणेशगीता-अ० २.
अनारम्भेण वैधानां निष्क्रियः पुरुषो भवेत् ॥
न सिद्धियाति संत्यागात्केवलात्कर्मणो नृप॥३॥
कर्मोंके आरंभ न करनेसे यह पुरुष निष्क्रिय हो जाता है,
हे राजन् ! केवल कर्मोंहीके त्यागनेसे सिद्धि नहीं होती ॥३॥
कदाचिदक्रियः कोऽपि क्षणं नैवावतिष्ठते ॥
अस्वतंत्रः प्रकृतिजैर्गुणैः कर्म च कार्यते ॥४॥
किसी दशामें क्षणमात्रभी कर्मविना किये कोई नहीं रह
सकता है, राग द्वेषादि स्वाभाविक गुण सबको ही अवश करके
कर्म कराते हैं, तत्त्वज्ञान होनेसे प्रथम कर्म त्यागनेसे चित्तकी
क्रिया नहीं हो सकती ॥ ४ ॥
कर्मकारीन्द्रियग्रामं नियम्यास्ते स्मरन्पुमान् ॥
तद्गोचरान्मंदचित्तो धिगाचारः स भाष्यते ॥५॥
जो कर्म करनेवाला, इन्द्रियोंको मनहीं मनमें रोककर
इन्द्रियोंके विषयोंका स्मरण करता है, उस दुरात्माको तुच्छ
आचारवाला कहा जाता है ॥ ५ ॥
तद्ग्रामं संनियम्यादौ मनसा कर्म चारभेत् ॥
इंद्रियैः कर्मयोगं यो वितृष्णः स परो नृप ॥६॥
और जो मनसे इन्द्रियोंको संयम करके, कर्म इन्द्रियोंसे
भाषाटीकासमेत । ( २७ )
कर्मयोगका अनुष्ठान करता है, वही फलकी कामना न
करनेवाला ही श्रेष्ठ है ॥ ६ ॥
अकर्मणः श्रेष्ठतमं कर्मानीहाकृतं तु यत् ॥
वर्ष्मणः स्थितिरप्यस्याकर्मणो नैव सेत्स्यति॥७॥
कर्म न करनेसे फलकी कामना न करके कर्मका करना
श्रेष्ठ है कारण कि सब कर्मोंसे रहित होनेसे शरीरयात्रा भी
नहीं हो सकती ॥ ७ ॥
असमर्प्य निबध्यन्ते कर्म तेन जना मयि ॥
कुर्वीत सततं कर्मानिशोऽसंगो मदर्पणम् ॥८॥
प्राणी कर्मोंका फल मुझमें जो समर्पण नहीं करते, इसी
कारण वे बंधनमें पडते हैं, इस कारणसे निष्काम कर्मका अनु-
ष्ठान करना उचित है, और जो करो सब ईश्वरार्पण करो
और असंग अर्थात् उनमें आसक्ति मत करो ॥ ८ ॥
मदर्थे यानि कर्माणि तानि बध्नन्ति न क्वचित्॥
सवासनमिदं कर्म बध्नाति देहिनं बलात् ॥९॥
जो कर्म मेरे निमित्त किये जाते हैं वे बन्धनके निमित्त
नहीं होते, जो वासनापूर्वक कर्म हैं वे ही बलसे प्राणीको
बांधते हैं ॥ ९ ॥
( २८ ) गणेशगीता-अ० २.
वर्णान्सृष्ट्वावदं चाहं सयज्ञांस्तान्पुरा प्रिय ॥
यज्ञेन ऋध्यतामेष कामदः कल्पवृक्षवत् ॥१०॥
पूर्व कालमें मैने यज्ञरूपी नित्यकर्मकेही साथ साथ मनु-
ष्योंको रचकर कहा-हे मनुष्यो ! तुम वृद्धिको प्राप्त हो, यह
क्रिया तुम्हारी इष्ट सिद्धिकी देनेवाली हो ॥ १० ॥
सुरांश्चान्नेन प्रीणध्वं सुरास्ते प्रीणयन्तु वः ॥
लभत्वं परमं स्थानमन्योन्यप्रीणनात्स्थिरम् ११
तुम देवताओंको अन्नसे तृप्त करो, देवता तुमको वर्षा
आदिसे प्रसन्न करेंगे, इसप्रकार परस्पर वृद्धि करते हुए तुम
और देवता सब श्रेष्ठ स्थानको प्राप्त हो ॥ ११ ॥
इष्टा देवाः प्रदास्यन्ति भोगानिष्टान्सुतर्पिताः ॥
तैर्दत्तांस्तानरस्तेभ्योऽदत्त्वाभुङ्क्ते स तस्करः १२
देवता प्रसन्न होकर तुम्हारे मनोवांछित मनोरथोंको पूर्ण
करेंगे, उन देवतोंके दिये पदार्थोंसे उनका आराधन किये
विना जो भोग भोगता है वह चोर है ॥ १२ ॥
हुतावशिष्टभोक्तारो मुक्ताः स्युः सर्वपातकैः ॥
अदन्त्येनो महापापा आत्महेतोःपचन्ति ये १३
जो देवताका आराधनरूप यज्ञ करके अवशिष्ट अन्न
भाषाटीकासमेत । (२९)
भोजन करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त होते हैं, और जो अपने
निमित्त भोजन करते हैं, वे पापी मानो पापही भोजन
करते हैं ॥ १३ ॥
ऊर्जो भवन्ति भूतानि देवादन्नस्य संभवः ॥
यज्ञाच्च देवसंभूतिस्तदुत्पत्तिश्च वैधतः ॥ १४ ॥
अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, और अन्न वर्षासे उत्पन्न
होता है और वर्षा यज्ञसे उत्पन्न होती है, और कर्मसे यज्ञकी
उत्पत्ति होती है ॥ १४ ॥
ब्रह्मणो वैधमुत्पन्नं मत्तो ब्रह्मसमुद्भवः ॥
अतोयज्ञेचविश्वस्मिन्स्थितं मांविद्धि भूमिप १५
कर्म ब्रह्मसे उत्पन्न होता है, इस कारण हे राजन् ! इस
यज्ञमें और विश्वमें स्थित आप मुझे जानिये ॥ १५ ॥
संसृतीनां महाचक्रं क्रामितव्यं विचक्षणैः ॥
स मुदा प्रीणते भूपेन्द्रियक्रीडोऽधमो जनः १६॥
इस आवागमनरूपी संसारचक्रसे बुद्धिमानोंको पार जाना
उचित है. हे राजन् ! जो प्राणी अधम है, वह इन्द्रियोंकी
क्रीडासे सुख मानते हैं ॥ १६ ॥
(३०) गणेशगीता-अ० २.
अन्तरात्मनि यः प्रीत आत्मारामोऽखिलप्रियः॥
आत्मतृप्तो नरो यः स्यात्तस्यार्थो नैव विद्यते १७
जो अन्तरात्मामें प्रीति करनेवाले हैं, वही आत्माराम
और सबके प्यारे हैं, जो प्राणी आत्मतृप्त हैं उन्हें किसी
बातकी इच्छा नहीं रहती ॥ १७ ॥
कार्याकार्यकृतीनां स नैवाप्नोति शुभाशुभे ॥
किंचिदस्य न साध्यं स्यात्सर्वजंतुषु सर्वदा १८॥
इस प्रकारके प्राणी कार्याकार्य करके भी शुभ अशुभ
फलको नहीं प्राप्त होते, यह कुछ करें अथवा न करें तोभी
उनको कुछ प्रयोजन नहीं, सम्पूर्ण प्राणियोंमें इनका कोई
भी प्रयोजनाधार नहीं, ऐसे पुरुषोंको कुछ साध्य नहीं ॥१८॥
अतोऽसक्ततया भूप कर्त्तव्यं कर्म जंतुभिः ॥
सक्तोऽगतिमवाप्नोति मामवाप्नोति तादृशः॥१९॥
इस कारण हे राजन् ! आसक्ति रहित होकर प्राणियोंको
कर्म करना उचित है, जो आसक्त होताहै उसकी दुर्गति होती
है, और अनासक्त मुझे प्राप्त हो जाताहै ॥ १९ ॥
परमां सिद्धिमापन्नाः पुरा राजर्षयो द्विजाः ॥
संग्रहाय हि लोकानां तादृशं कर्म चारभेत् २०॥
भाषाटीकासमेत । ( ३१ )
हे राजन् ! कर्म करनेसे बहुतसे राजर्षि परमसिद्धिको प्राप्त
हुए हैं. लोक संग्रहके निमित्तही अनासक्त होकर कर्म करने
उचित हैं ॥ २० ॥
श्रेयान्यत्कुरुते कर्म तत्करोत्यखिलो जनः ॥
मनुते यत्प्रमाणं स तदेवानुसरत्यसौ ॥२१॥
जो कर्म महत् पुरुष करते हैं, वही कर्म और सब करते हैं
वह जिसका प्रमाण करते हैं, दूसरे भी उसीको मानते हैं ॥२१॥
विष्टपे मे न साध्योऽस्ति कश्चिदर्थो नराधिप ॥
अनालब्धश्च लब्धव्यःकुर्वे कर्म तथाप्यहम् २२॥
हे राजन् ! मुझे कोई वस्तु स्वर्गादिमें दुर्लभ नहीं है, और
मैं कर्म करके किसी अलभ्य वस्तुको प्राप्त होनेकी भी इच्छा
नहीं करताहूं ॥ २२ ॥
न कुर्वेऽहं यदा कर्म स्वतन्त्रोऽलसभाविताः ॥
करिष्यन्ति मम ध्यानं सर्वे वर्णा महामते॥२३॥
और जो मैं आलसी और स्वतंत्र होकर कर्म न करूं तो
सबही वर्ण कर्म छोडकर केवल मेरा ध्यानहीं करें ॥ २३ ॥
भविष्यन्ति ततो लोका उच्छिन्नाः संप्रदायिनः॥
हंता स्यामस्य लोकस्य विधाता शंकरस्यच २४॥
( ३२ ) गणेशगीता-अ० २.
हे महामतिमान् राजा ! तब मेरे ऐसा करनेसे सब वर्ण
आचार भ्रष्ट हो जायँगे, इससे इस वर्णसंकरका करने-
वाला भी मैं ही हूंगा ॥ २४ ॥
कामिनो हि सदा कामैरज्ञानात्कर्मकारिणः ॥
लोकानां संग्रहायैतद्विद्वान् कुर्यादसक्तधीः॥२५॥
जिस प्रकारसे कामनावाले अज्ञानसे सदा कर्म करते रहते
हैं, इसीप्रकार विद्वान्को उचित है कि लोकसंग्रहके निमित्त
आसक्ति रहित होकर कर्म करता रहे ॥ २५ ॥
विभिन्नत्वमतिं जह्यादज्ञानां कर्मचारिणाम् ॥
योगयुक्तः सर्वकर्माण्यर्पयेन्मयि कर्मकृत् ॥२६॥
अज्ञानसे कर्म करनेवालोंकी भेदबुद्धिको त्याग करै,
योगयुक्त होकर कर्म करताहुआ वे सब कर्म मुझे अर्पण
करदे ॥ २६ ॥
अविद्यागुणसाचिव्यात्कुर्वन्कर्माण्यतन्द्रितः ॥
अहंकाराद्भिन्नबुद्धिरहंकर्तेति योऽब्रवीत् ॥२७॥
हे राजन् ! सबही कर्म प्रकृतिके सत्त्वादि गुणोंने किये हैं,
तथापि अहंकारसे मूढ होकर पुरुष अपनेको कर्ता मानता है २७
भाषाटीकासमेत। ( ३३ )
यस्तु वेत्त्यात्मनस्तत्त्वं विभागाद्गुणकर्मणोः॥
करणं विषये वृत्तमिति मत्वा न सज्जते ॥ २८ ॥
जो कोई सत्वादि गुण तथा उनके कर्मोंके विभागको इस
प्रकार जानते हैं, कि सत्वादि गुण आपअपने कार्योंमें वर्त्त-
मान हैं, तौ वह कर्ममें लिप्त नहीं होते हैं ॥ २८ ॥
कुर्वन्ति सफलं कर्म गुणैस्त्रिभिर्विमोहिताः ॥
अविश्वस्तः स्वात्मद्रुहो विश्वविन्नैव लंघयेत् २९॥
सत, रज, तम इन तीन गुणोंसे मोहित हुए प्राणी फलकी
इच्छासे कर्म करते हैं, उनका विश्वासी और आत्मद्रोहियोंको
सर्वज्ञ पुरुष कर्ममार्गसे चलायमान न करे ॥ २९ ॥
नित्यं नैमित्तिकं तस्मान्मयि कर्मार्पयेद्बुधः ॥
त्यक्त्वाहंममताबुद्धिं परांगतिमवाप्नुयात्॥३०॥
इस कारण पण्डितको उचित है कि मुझहीमें नित्य नैमि-
त्तिक कर्मको अर्पण करदे तो वह अहं और ममता बुद्धिको
त्यागन करके परमगतिको प्राप्त हो जायगा ॥ ३० ॥
अनीर्ष्यान्तो भक्तिमन्तो ये मयोक्तमिदं शुभम्॥
अनुतिष्ठन्ति ये सर्वे मुक्तास्तेऽखिलकर्मभिः ३१
२
( ३४ ) गणेशगीता अ० २.
ईर्षा न करनेवाले भक्तिमान् मनुष्य मेरे कहे हुए इस शुभ
मार्गको जो अनुष्ठान करते हैं, वे सब कर्मोंसे मुक्त हो जाते हैं ३१
ये चैव नानुतिष्ठन्ति त्वशुभा हतचेतसः ॥
ईर्ष्यमाणान्महामूढान्नष्टांस्तान्विद्धि मे रिपूनू ३२
और जो अज्ञानसे चित्त नष्ट होनेके कारण इसका अनुष्ठान
नहीं करते हैं, उन मूर्ख नष्ट अपवित्र और नष्ट बुद्धियोंको
मेरा शत्रु जानो ॥ ३२ ॥
तुल्यं प्रकृत्या कुरुते कर्म यज्ज्ञानवानपि ॥
अनुयाति च तामेवाग्रहस्तत्र मुधा मतः ॥३३॥
जब ज्ञानवान् भी अपने स्वभावके अनुसार चेष्टा करता है
तौ अज्ञानीकी बातही क्या है, इस कारण सब जीव जब
अपनी अपनी प्रकृतिको प्राप्त हैं, तौ निग्रह कैसे करै ॥ ३३ ॥
कामश्चैव तथा क्रोधः खानामर्थेषु जायते ॥
नैतयोर्वश्यतां यायादस्य विध्वंसकौ यतः॥३४॥
कर्मेंद्रिय और ज्ञानेन्द्रियके निमित्त काम और क्रोध यह
दोही स्थित हैं, इनके वशमें न होना चाहिये, कारण कि,
यही प्राणीके शत्रुरूप हैं ॥ ३४ ॥