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गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

भाषाटीकासमेत । (३५)
शस्तोऽगुणो निजो धर्मः साङ्गादन्यस्य धर्मतः ॥
निजे तस्मि मृतिः श्रेयोऽपरत्र भयदः परः ३५॥
अपना धर्म यदि निर्गुण हो तौ भी अच्छा है, और धर्म
गुणयुक्त होनेसे भी भला नहीं, अपने धर्ममें मरना भला है,
परन्तु परलोकमें भय देनेहारा दूसरेका धर्म श्रेष्ठ नहीं ॥ ३५ ॥
वरेण्य उवाच ।
पुमान्यत्कुरुते पापं स हि केन नियुज्यते ॥
अकांक्षन्नपि हेरम्ब प्रेरितः प्रबलादिव ॥ ३६ ॥
वरेण्यने कहा हे गणेशजी ! यह जो प्राणी पाप करता है
सो किसके द्वारा करता है, विषयोंका त्यागकर इच्छा नहीं
करता हुआ भी जैसे कोई बलसे करावे. ऐसे प्रेरण किया
हुआ पापाचरण करता है ॥ ३६ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
कामक्रोधौ महापापौ गुणद्वयसमुद्भवौ ॥
नयंतौ वश्यतां लोकान् विद्ध्येतौ द्वेषिणौ वरौ ३७
श्रीगणेशजी बोले कि रजोगुण और तमोगुणसे उत्पन्न
हुए यह दो काम और क्रोधही महापापी लोगोंको अपने
वशमें करते हैं, इन्ही दोनोंको तुम महा शत्रु जानो ॥ ३७ ।

( ३६ ) गणेशगीता-अ० २.
आवृणोति यथा माया जगद्भाष्पो जलं यथा ॥
वर्षामेघो यथाभानुं तद्वत्कामोऽखिलांश्च रुट् ३८
जिस प्रकारसे माया जगत्को ढकती है जैसे वाफ जलको
आच्छादन करती है, वर्षा कालका मेघ जैसे सूर्यको ढकलेता
है इसी प्रकार कामने सबको ढक लिया है ॥ ३८ ॥
प्रतिपत्तिमतो ज्ञानं छादितं सततं द्विषा ॥
इच्छात्मकेन तरसा दुष्पोषेण च शुष्मिणा ३९॥
वेगवान् पोषण करनेमें कठिन महाबली सदैव द्वेष करने-
हारे इच्छात्मक कामनेही ज्ञानको ढक रक्खा है ॥ ३९ ॥
आश्रित्य बुद्धिमनसी इन्द्रियाणि स तिष्ठति ॥
तैरेवाच्छादितप्रज्ञो ज्ञानिनं मोहयत्यसौ ॥४०॥
यह काम बुद्धि और मन इन दो इन्द्रियोंके आश्रय होकर
रहता है कामनाही इन्द्रियोंसे ज्ञानको आच्छादन करके देह-
धारीको मोहित करती है ॥ ४० ॥
तस्मान्नियम्य तान्यादौ स मनांसि नरो जयेत् ॥
ज्ञानविज्ञानयोः शांतिकरं पापं मनोभवम् ४१॥
इसकारण मनके सहित इन्द्रियोंको वश करके ज्ञान और
विज्ञानके नाशकरनेवाले पापात्माकामको जीतो ॥ ४१ ॥

भाषाटीकासमेत । ( ३७ )
यतस्तानि पराण्याहुस्तेभ्यश्च परं मनः ॥
ततोऽपिहि परा बुद्धिरात्मा बुद्धेः परो मतः॥४२॥
स्थूलसे इंद्रिय परे हैं, इन्द्रियोंसे परे मन है, मनसे परे बुद्धि
है, और बुद्धिसे परे परमात्मा है ॥ ४२ ॥
बुद्ध्वैवमात्मनात्मानं संस्तभ्यात्मानमात्मना ॥
हत्वा शत्रुं कामरूपं परं पदमवाप्नुयात् ॥४३॥
ॐ तत्सादिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगा-
मृतार्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उत्तरखण्डे गजानन-
वरेण्यसंवादे कर्मयोगोनामद्वितीयोऽध्यायः॥ २ ॥
इस प्रकार आत्मासे आत्माको जानकर आत्मासेही
आत्माको अटल बनाकर कामरूपी शत्रुको मार परम पदको
प्राप्त होता है ॥ ४३ ॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थ-
शास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उत्तरखण्डे गजाननवरेण्यसंवादे
पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ शुभमस्तु ।

( ३८ ) गणेशगीता-अ० ३.
श्रीगजानन उवाच ।
पुरा सर्गादिसमये त्रैगुण्यं त्रितनूरुहम् ॥
निर्माय चैनमवदं विष्णवे योगमुत्तमम् ॥ १ ॥
श्रीगणेशजी बोले प्रथम सृष्टि उत्पन्न करनेके समय तीन
गुणोंसे युक्त तीन शरीरमें रहनेहारा उत्तम योगको निर्माण
करके प्रथम विष्णुके निमित्त यह योग वर्णन किया था ॥१॥
अर्यम्णे सोऽब्रवीत्सोऽपि मनवे निजसूनवे ॥
ततः परंपरायातं विदुरेनं महर्षयः ॥ २ ॥
विष्णुने यही योग सूर्यसे कहा सूर्यने अपने पुत्र मनुसे कहा
इसके उपरान्त परंपरासे प्राप्त हुए इस योगको महर्षि जानते
रहे ॥ २ ॥
कालेन बहुना चायं नष्टः स्याच्चरमे युगे ॥
अश्रद्धेयो ह्यविश्वास्यो विगीतव्यश्च भूमिप ॥३॥
हे राजन् ! पिछले युगमें जब कि श्रद्धाहीन अविश्वासी और
निन्दित जन हुए तब यह बहुत काल उपरान्त नष्ट हुआ था ३
एवं पुरातनं योगं श्रुतवानसि मन्मुखात् ॥
गुह्याद्गुह्यतरं वेदरहस्यं परमं शुभम् ॥ ४ ॥

भाषाटीकासमेत । ( ३९ )
यह अब फिर तुमने मेरे मुखसे पुरातन योगको सुना है
यह गुप्तसे भी गुप्त अत्यन्त कल्याणकारक सम्पूर्ण वेदोंका
सार है ॥ ४ ॥
वरेण्य उवाच ।
सांप्रतं चावतीर्णोऽसि गर्भतस्त्वं गजानन ॥
प्रोक्तवान्कथमेतं त्वं विष्णवे योगमुत्तमम् ॥५॥
वरेण्यराजा बोला हे गजानन ! इस समय आप गर्भसे तौ
उत्पन्न हुएहो, फिर तुमने विष्णुसे यह योग किसप्रकारसे वर्णन
किया ॥ ५ ॥
गणेश उवाच ।
अनेकानि च ते जन्मान्यतीतानि ममापि च ॥
संस्मरे तानि सर्वाणि न स्मृतिस्तव वर्तते ॥६॥
गणेशजी बोले हे राजन् ! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत
चुके हैं, मैं उन्हें सबको जानता हूं, पर तुम नहीं जानते ॥६॥
मत्त एव महाबाहो जाता विष्ण्वादयः सुराः ॥
मय्येव च लयं यान्ति प्रलयेषु युगेयुगे ॥ ७ ॥
हे महाभुज ! मुझसेही विष्णुआदि देवता उत्पन्न हुए हैं,
और युगयुगमें प्रलयके समय मुझमेंही लय होजाते हैं ॥ ७ ॥

(४०) गणेशगीता अ० ३.
अहमेव परो ब्रह्मा महारुद्रोऽहमेव च ॥
अहमेव जगत्सर्वं स्थावरं जंगमं च यत् ॥ ८ ॥
मैं ही श्रेष्ठब्रह्मा हूं, मैंही महारुद्र हूं, मैं ही स्थावर जंगमरूप
सम्पूर्ण जगत हूं ॥ ८ ॥
अजोऽव्ययोऽहंभूतात्माऽनादिरीश्वर एव च ॥
आस्थाय त्रिगुणां मायां भवामि बहुयोनिषु ९॥
यद्यपि मैं अजन्मा अविनाशी अनादि ईश्वरहूं परन्तु त्रिगु-
णात्मक मायामें स्थित होकर अनेक अवतार धारण करताहूं ९
अधर्मोपचयो धर्मापचयो हि यदा भवेत् ॥
साधूनसंरक्षितुं दुष्टांस्ताडितुं सम्भवाम्यहम् १०॥
जिस समय अधर्मकी वृद्धि और धर्मकी हानि होती है,
उस समय साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंके मारनेको मैं अवतार
लेता हूं ॥ १० ॥
उच्छिद्याधर्मनिचयं धर्मं संस्थापयामि च ॥
हन्मि दुष्टांश्च दैत्यांश्च नानालीलाकरो मुदा ११
अधर्मके समूहको नष्टकर धर्मका स्थापन करताहूं और अनेक
प्रकारकी लीलाकर आनंदसे दुष्ट दैत्योंका वध करताहूं॥११॥

भाषाटीकासमेत । ( ४१ )
वर्णाश्रमान्मुनीन्साधून्पालये बहुरूपधृक् ॥
एवं यो वेत्ति संभूतिर्मम दिव्या युगेयुगे ॥१२॥
अनेक रूप धारण कर वर्ण आश्रम और साधुओंको
पालन करताहूं, इस प्रकारसे जो युगयुगमें मेरी दिव्य विभू-
तिको जानत है ॥ १२ ॥
तत्तत्कर्म च वीर्यं च मम रूपं समासतः ॥
त्यक्ताहंममताबुद्धिं न पुनर्भूः स जायते ॥१३॥
उन मेरे कर्म वीर्य और रूपका सेवन करता हुआ अहंकार
और ममता बुद्धि त्याग न करै तो मुक्त होजाता है ॥ १३ ॥
निरीहा निर्भयारोषा मत्परा मद्यपाश्रयाः ॥
विज्ञानतपसा शुद्धा अनेके मामुपागताः ॥१४॥
इच्छारहित निर्भय क्रोधहीन मुझमेंही भाव और मेरीही
उपासना करनेहारे विज्ञान और तपस्यासे शुद्ध होकर अनेक
प्राणी मुझको प्राप्त होगये हैं ॥ १४ ॥
येन येन हि भावेन संसेवन्ते नरोत्तमाः ॥
तथातथा फलं तेभ्यःप्रयच्छाम्यव्ययःस्फुटम् १५
श्रेष्ठ जन मुझे जिस जिस भावसे सेवन करते हैं,मैं अविन-
श्वर प्रत्यक्ष उनको वैसा वैसाही फल देताहूं ॥ १५ ॥
६

( ४२ ) गणेशगीता अ० ३ ।
जनाः स्युरितरे राजन्मम मार्गानुयायिनः ॥
तथैव व्यवहारं ते स्वेषु चान्येषु कुर्वते ॥ १६ ॥
हे राजन् ! जिस प्रकारसे दूसरे लोग भी मेरे अनुयायी
होजाँय, इसी प्रकारका व्यवहार वे अपने तथा दूसरे मनुष्योंमें
करते हैं ॥ १६ ॥
कुर्वन्ति देवताप्रीतिं कांक्षन्तः कर्मणां फलम् ॥
प्राप्नुवन्तीह ते लोके शीघ्रं सिद्धिं हि कर्मजाम् १७
और जो कर्मोंके फल प्राप्त होनेकी इच्छासे देवताओंकी
उपासना करते हैं, उन उन कर्मोंके अनुसार उनको शीघ्र
सिद्धि प्राप्त होती है ॥ १७ ॥
चत्वारो हि मया वर्णा रजःसत्त्वतमोंऽशतः ॥
कर्मांशतश्च संसृष्टा मृत्युलोके मयाऽनघ ॥१८॥
हे पापरहित ! मृत्युलोकमें मैंने चारों वर्णोंको सत्त्व रज
तम इन गुणोंसे और कर्मोंके अंशसे उत्पन्न किया है ॥१८ ॥
कर्त्तारमपि तेषां मामकर्त्तारं विदुर्बुधाः ॥
अनादिमीश्वरं नित्यमलिप्तं कर्मजैर्गुणैः ॥१९॥
यद्यपि मैं इनका कर्ता हूं परन्तु पंडित जन मुझे अकर्ता
जानते हैं अनादि, ईश्वर, नित्य और कर्मोंके गुणोंसे अलिप्त
मानते हैं ॥ १९ ॥

भाषाटीकासमेत । ( ४३ )
निरीहं योऽभिजानाति कर्म बध्नाति नैव तम् ॥
चक्रुः कर्माणि बुद्ध्वैवं पूर्वपूर्व मुमुक्षवः ॥२०॥
जो मुझे इच्छारहित जानता है उसको कर्मबंधन नहीं होता
इस कारण पूर्वमें मुमुक्षु जन यह बिचारकर कर्म करते थे २०
वासनासहितादाद्यात्संसारकारणाद्दृढात् ॥
अज्ञानबन्धनाज्जन्तुर्बुद्ध्वायं मुच्यतेऽखिलात् २१
वासनासे युक्त जो कि संसारका दृढ कारण है यही अज्ञा-
नका बंधन है इसे जानकर प्राणी मुक्त होता है ॥ २१ ॥
तदकर्म च कर्मापि कथयाम्यधुना तव ॥
यत्र मौनं गता मोहादृषयो बुद्धिशालिनः ॥२२॥
क्या कर्म और क्या अकर्म है यह मैं तुमसे कहताहूं इसके
जाननेमें ऋषिभी मोहको प्राप्त होजाते हैं ॥ २२ ॥
तत्त्वं मुमुक्षुणा ज्ञेयं कर्माकर्मविकर्मणाम् ॥
त्रिविधानीह कर्माणि सुनिम्नैषां गतिःप्रिय२३॥
कर्म अकर्म और विकर्म इसका तत्त्व मुक्तिकी इच्छा
करनेवालोंको जानना अवश्य है, वेतीनही कर्म हैं हे प्रिय !

( ४४ ) गणेशगीता अ० ३.
इनकी गति जाननी महाकठिन है, तू मेरा भक्त है इससे
कहता हूं ॥ २३ ॥
क्रियायामक्रियाज्ञानमक्रियायां क्रियामतिः ॥
यस्यस्यात्सहिमत्येँस्मिँल्लोकेमुक्तोऽखिलार्थकृत्।
क्रियामें अक्रियाका ज्ञान, और अक्रियामें क्रियाकी मति
जिसकी होती है वही इस लोकमें सब कर्मका करनेवाला हो
तौभी मुक्त होजाता है ☸ ॥ २४ ॥
कर्मांकुरवियोगेन यः कर्माण्यारभेन्नरः ॥
तत्त्वदर्शननिर्दग्धक्रियमाहुर्बुधा बुधम् ॥ २५ ॥
जो कर्मोंके अंकुरके वियोगसे अर्थात् संकल्प और कामना
रहित कर्म करते हैं तत्त्वके जाननेसे उनकी सब क्रिया दग्ध
हैं, ऐसा पंडितजन कहते हैं ॥ २५ ॥

  • अर्थात् देह और इंद्रिय आदिके जितने उचित और निषिद्ध
    कर्म हैं उनमेंसे किसकोभी आत्मा नहीं करता है और सब बाह्य
    कर्म त्यागने परभी यदि देहादिको आत्मा मानाजाय तौभी अन्तर
    शारीरिक क्रियां होती है वहभी आत्माकी क्रिया समझी जाती है
    एवं उनसे आत्माको संसारका दुःख आवरण करलेता है, इस
    प्रकारका जिन्हें विश्वास है वही जनोंमें बुद्धिमान् हैं और सब कर्म
    करते रहनेपरभी योगी हैं॥

२. अध्याय ४-६: ज्ञान-योग, भक्ति-योग व गणेश-विश्वरूप दर्शन

भाषाटीकासमेत । ( ४५ )
फलतृष्णां विहाय स्यात्सदा तृप्तो विसाधनः ॥
उद्युक्तोऽपि क्रियां कर्तुं किंचिन्नैव करोति सः२६
जो फलकी इच्छाको छोड कर सदा तृप्त रहते, और
कोई साधन नहीं करते हैं, यदि वे कर्म करनेको उद्यत भी हैं
तौभी कुछ नहीं करते हैं ॥ २६ ॥
निरीहो निगृहीतात्मा परित्यक्तपरिग्रहः ॥
केवलं वै गृहं कर्माचरन्नायाति पातकम् ॥ २७॥
जो इच्छा रहित आत्मजित सम्पूर्ण परित्याग किये हैं
ऐसे प्राणी यदि घरमें रहकै कर्मभी करें तौभी उन्हें कुछ
पातक नहीं लगता ॥ २७ ॥
अद्वन्द्वोऽमत्सरोभूत्वा सिद्ध्यसिद्ध्योः समश्चयः।
यथाप्राप्येहं संतुष्टः कुर्वन्कर्म न बद्ध्यते ॥२८॥
द्वंद्व और मत्सरहीन होकर सिद्धि असिद्धिमें समान दृष्टि
रखते हैं जो प्राप्तिहो उसीमें संतुष्ट रहते हैं ऐसे प्राणी कर्म
करनेसे भी लिप्त नहीं होते हैं ॥ २८ ॥
अखिलैर्विषयैर्मुक्तो ज्ञानविज्ञानवानपि ॥
यज्ञार्थं तस्य सकलं कृतं कर्म विलीयते ॥२९॥

( ४६ ) गणेशगीता अ० ३.
सम्पूर्ण विषयोंसे मुक्त ज्ञानवानभी यदि यज्ञके निमित्त
कर्म करै तौ वह कर्म उसे बाधक नहीं होते, लीन हो
जाते हैं ॥ २९ ॥
अहमग्निर्हविर्दाता हुतं यन्मयि चार्पितम् ॥
ब्रह्माप्तव्यं च ते नाथ ब्रह्मण्येव यतो रतः ॥३०॥
अग्नि, होमका द्रव्य, हवन करनेहारे, और जो आहुति मुझे
अर्पण की जाती है, वह सब ब्रह्मरूप है, इसे ब्रह्मस्वरूपसे
देखकर जो हवन करता है,और ब्रह्मके ही अर्पण करता है वह
ब्रह्मरूप कर्मकी समाधिसे ब्रह्महीको प्राप्त होता है ॥ ३० ॥
योगिनः केचिदपरे दिष्टं यज्ञं वदंति च ॥
ब्रह्माग्निरेव यज्ञो वै इति केचन मेनिरे ॥ ३१ ॥
कोई योगी देवयजनको यज्ञ कहते हैं, दूसरे ब्रह्मरूप अग्निमें
यज्ञरूप उपायसे यज्ञ करनेको यज्ञ मानते हैं ॥ ३१ ॥
संयमाग्नौ परे भूप इंद्रियाण्युपजुह्वति ॥
खाग्निष्वन्ये तद्विषयांश्छन्दादीनुपजुह्वति॥३२॥
हे राजन् ! कोई योगी संयमरूप अग्निमें श्रोत्रादि इन्द्रि-
योंको हवन करते हैं, कोई इन्द्रियरूपी अग्निमें शब्दादिकोंकी
आहुति देते हैं ॥ ३२ ॥

भाषाटीकासमेत । ( ४७ )
प्राणानामिंद्रियाणां च परे कर्माणि कृत्स्नशः ॥
निजात्मरतिरूपेऽग्नौ ज्ञानदीप्ते प्रजुह्वति ॥३३॥
और कोई ज्ञानमें जलती हुई आत्मसंयमरूपी योगाग्निमें
सम्पूर्ण इंद्रिय कर्म और प्राणोंका हवन करते हैं, अर्थात्
इनकी क्रिया आत्मामें लय करदेते हैं ॥ ३३ ॥
द्रव्येण तपसा वापि स्वाध्यायेनापि केचन ॥
तीव्रव्रतेन यतिनो ज्ञानेनापि यजंति माम्॥३४॥
कोई द्रव्ययज्ञका अनुष्ठानकर, दान, तपस्या, कोई स्वाध्या-
यसे, कोई महात्मा तीव्र व्रतसे, कोई ज्ञानसे मेरा यजन
करते हैं ॥ ३४ ॥
प्राणेऽपानं तथा प्राणमपाने प्रक्षिपंति ये ॥
रुद्ध्वा गतीश्वोभयोस्ते प्राणायामपरायणाः ३५॥
दूसरे कोई पूरकसे, प्राणवायुमें अपानको और रेचकसे
प्राणको अपानमें हवन करते हैं, और कुंभकके अनुष्ठानसे
प्राणापानकी गतिको रोककर प्राणायाम परायण होते हैं॥३५॥
जित्वा प्राणान्प्राणगतीरुपजुह्वति तेषु च ॥
एवं नानायज्ञरता यज्ञध्वंसितपातकाः ॥ ३६ ॥

( ४८ ) गणेशगीता अ० ३.
दूसरे नियताहार होकर इन्द्रियोंकी वृत्तिको रोक पांचों
प्राणोंमें पांचों प्राणोंकी आहुति देते हैं, इस प्रकार अनेक
प्रकारके यज्ञकर यज्ञद्वारा पापोंका नाश करते हैं ॥ ३६ ॥
नित्यं ब्रह्म प्रयांत्येते यज्ञशिष्टामृताशिनः ॥
अयज्ञकारिणो लोको नायमन्यःकुतो भवेत् ३७
इस प्रकारसे जो नित्यही यज्ञसे बचे पदार्थको भोजन
करते हैं वे नित्य ब्रह्मको प्राप्त होते हैं, यज्ञ न करनेवालोंको
दूसरा लोक तौ कहां यह भी नहीं है ॥ ३७ ॥
कायिकादि त्रिधाभूतान्यज्ञान्वेदे प्रतिष्ठितान् ॥
ज्ञात्वा तानखिलान्भूप मोक्ष्यसेऽखिलबंधनात्॥
हे राजन् ! ब्रह्मके मुखमें मन वचन कर्मके बहुत प्रकारके
यज्ञ वर्णन किये हैं, उन्हें क्रियासे उत्पन्न और क्रिया रहित
आत्मासे न होनेवाले जानो, ऐसा जानकर संसारसे मुक्त
होगे ॥ ३८ ॥
सर्वेषां भूप यज्ञानां ज्ञानयज्ञः परो मतः ॥
अखिलं लीयते कर्म ज्ञाने मोक्षस्य साधने ३९॥
हे राजन् ! सब यज्ञोंमें ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, जिस मोक्षसाधन
ज्ञानयज्ञमें सब कर्म क्षीण हो जाते हैं ॥ ३९ ॥

भाषाटीकामेत । ( ४९ )
तज्ज्ञेयं पुरुषव्याघ्र प्रश्नेन नतितः सताम् ॥
शुश्रूषया वदिष्यंति संतस्तत्त्वविशारदाः ॥४०॥
हे पुरुषश्रेष्ठ ! उस ज्ञानयज्ञको सत्पुरुषोंकी सेवा और प्रश्नसे
प्राप्त करो तत्वजाननेवाले शुश्रूषासे उसको कहेंगे ॥ ४० ॥
नानासंगाञ्जनः कुर्वन्नैकं साधुसमागमम् ॥
करोति तेन संसारे बन्धनं समुपैति सः ॥४१॥
जो मनुष्य अनेक प्रकारकी संगति करताहै पर एक साधुकी
संगति नहीं करता,वह संसारमें बंधनको प्राप्त होता है ॥४१॥
सत्संगाद्गुणसंभूतिरापदां लय एव च ॥
स्वहितं प्राप्यते सर्वैरिह लोके परत्र च ॥ ४२ ॥
सत्संगसे गुणकी प्राप्ति, और आपदाका नाश होताहै, इस
लोक और परलोकमें अपना कल्याण प्राप्त होता है ॥४२॥
इतरत्सुलभं राजन्सत्सङ्गोऽतीव दुर्लभः ॥
यज्ज्ञात्वा न पुनर्बन्धमेति ज्ञेयं ततस्ततः ॥४३॥
हे राजन् ! और तो सब सुलभ है, परन्तु सत्संग बडा
दुर्लभ है, जिसके जाननेसे फिर संसारमें नहीं आता, इस
कारण उसका जानना अवश्य है ॥ ४३ ॥

( ५० ) गणेशगीता अ ३.
ततः सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभिपश्यति ॥
अतिपापरतो जन्तुस्ततस्तस्मात्प्रमुच्यते ॥४४॥
सत्संगसे ज्ञान मिलनेसे यह सब प्राणियोंको अपनेमेंही
देखता है, इससे अतिपापी प्राणीभी मुक्त होजाता है ॥४४॥
द्विविधान्यपि कर्माणि ज्ञानाग्निर्दहति क्षणात् ॥
प्रसिद्धोऽग्निर्यथा सर्वं भस्मतां नयति क्षणात्४५
जिस प्रकारसे प्रसिद्ध जलती अग्नि सब लकडियोंको
क्षणमें भस्म कर देती है, इसी प्रकार ज्ञानअग्निमें पाप पुण्य
दोनों प्रकारके कर्म नष्ट हो जाते हैं ॥ ४५ ॥
न ज्ञानसमतामेति पवित्रमितरन्नृप ॥
आत्मन्येवावगच्छन्ति योगात्कालेनयोगिनः४६
हे राजन् ज्ञानकी समान और कोई वस्तु पवित्र नहीं, योग
सिद्ध महात्मा उस ज्ञानको काल उपस्थित होनेपर स्वयंही
प्राप्त करता है ॥ ४६ ॥
भक्तिमानिन्द्रियजयी तत्परो ज्ञानमाप्नुयात् ॥
लब्ध्वा तत्परमं मोक्षं स्वल्पकालेन यात्यसौ ४७
भक्तिमान्, इन्द्रिय जीतनेमें तत्पर पुरुषही ज्ञानको प्राप्त
कर सकता है,और ज्ञान प्राप्त होनेसे थोडे समयमेंही मुक्तिको
प्राप्त हो जाता है ॥ ४७ ॥

भाषाटीकासमेत । ( ५१ )
भक्तिहीनोऽश्रद्दधानः सर्वत्र संशयी तु यः ॥
तस्य शं नापि विज्ञानमिह लोकोऽथ वा परः ४८
और जो भक्तिहीन श्रद्धारहित सर्वत्र संदिग्धचित्त है, उसे
कल्याणकी प्राप्ति नहीं तथा दोनों लोककी प्राप्ति नहीं,क्योंकि
उसे ज्ञानही नहीं ॥ ४८ ॥
आत्मज्ञानरतं ज्ञाननाशिताखिलसंशयम् ॥
योगास्ताखिलकर्माणं बध्नन्ति भूप तानि न॥४९॥
जो आत्मज्ञानमें रत हैं, जिन्होंने ज्ञानसे सब संदेह दूर
किये हैं, हे राजन् उस योगमें स्थित पुरुषोंको कर्म नहीं लगते
कारण कि उन्होंने योगसे वे कर्म नष्ट करादिये हैं ॥ ४९ ॥
ज्ञानखङ्गप्रहारेण संभूतामज्ञतां बलात् ॥
छित्त्वान्तःसंशयं तस्माद्योगयुक्तो भवेन्नरः ५०॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृ-
तार्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ० श्रीगजाननवरेण्य-
संवादे विज्ञानप्रतिपादनो नाम
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

( ५२ ) गणेशगीता-अ० ४.
इस कारण ज्ञानरूप खड्गसे मनके अज्ञानसे उत्पन्न हुई
संशयको बलसे काटकर मनुष्यको योगका आश्रय लेना
उचित है ॥ ५० ॥
ॐतत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थ-
शास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ०श्रीगजाननवरेण्यसम्वादे पण्डित-
ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां विज्ञानप्रति-
पादनोनाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
वरेण्य उवाच ।
संन्यस्तिश्चैव योगश्च कर्मणां वर्ण्यते त्वया ॥
उभयोर्निश्चितं त्वेकं श्रेयो यद्वद मे प्रभो ॥१॥
वरेण्य बोले हे भगवन् ! आप कर्मसंन्यास अर्थात् निष्काम
भावसे कर्म करते करते विशुद्धचित्त होनेपर कर्मत्याग कर-
नेको ज्ञानका कारण कहकर फिर कर्मयोगको ज्ञानका कारण
कहतेहो, इससे मुझे सन्देह होता है इन दोनोंमें जो हित हो
सो कहो ॥ १ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
क्रियायोगो वियोगश्चाप्युभौ मोक्षस्य साधने ॥
तयोर्मध्ये क्रियायोगस्त्यागात्तस्य विशिष्यते २

भाषाटीकासमेत । ( ५३ )
श्रीगणेशजी बोले कि, अधिकारियोंके भेदसे कर्मयोग
और कर्मसंन्यास दोनों मुक्तिके साधन हैं, उन दोनोंमें कर्म-
संन्याससे कर्मयोग श्रेष्ठ है ॥ २ ॥
द्वन्द्वदुःखसहोऽद्वेष्टा यो न कांक्षति किञ्चन ॥
मुच्यते बंधनात्सद्यो नित्यं संन्यासवान्सुखम् ३
जो द्वंद्व और दुःखभी सहकर किसीसे द्वेष नहीं करते;
और किसी बातकी इच्छा नहीं करते, ऐसे प्राणी अनायाससे
तत्काल कर्म बन्धनसे मुक्त होते हैं ॥ ३ ॥
वदंति भिन्नफलकौ कर्मणस्त्यागसंग्रहौ ॥
मूढाल्पज्ञास्तयोरेकं संयुञ्जीत विचक्षणः ॥ ४ ॥
कर्मसंन्यास और कर्मयोगको अज्ञानीही पृथक् २ कहते
हैं परन्तु पंडितगण उन्हें एकही कहते हैं ॥ ४ ॥
यदेव प्राप्यते त्यागात्तदेव योगतः फलम् ॥
संग्रहं कर्मणो योगं यो विंदति स विंदति ॥५॥
जो फल कर्मसंन्याससे मिलता है, वही फल कर्मयोगसे
प्राप्त होता है, कर्मसंन्यास और कर्मयोगको जो यथार्थ जानता
है वही ज्ञाता है ॥ ५ ॥

( ५४ ) गणेशगीता-अ० ४
केवलं कर्मणां न्यासं संन्यासं न विदुर्बुधाः ॥
कुर्वन्ननिच्छया कर्म योगी ब्रह्मैव जायते ॥ ६ ॥
पंडितजन केवल कर्मसंन्यासकोही संन्यास नहीं कहते यदि
योगी अनिच्छासे कर्म करे तो वह ब्रह्मही हो जाता है ॥६॥
निर्मलो यतचित्तात्मा जितगो योगतत्परः ॥
आत्मानं सर्वभूतस्थं पश्यन्कुर्वन्न लिप्यते ॥७॥
शुद्धचित्त, आत्माके वश करनेहारे जितेन्द्री योगमें तत्पर
सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित आत्माको देखनेहारे, कर्म करते
हुए भी लिप्त नहीं होते ॥ ७ ॥
तत्त्वविद्योगयुक्तात्मा करोमीति न मन्यते ॥
एकादशानींद्रियाणि कुर्वति कर्म संख्यया ॥८॥
तत्त्वका जानेनहारा योगयुक्त आत्मा पुरुष मैं करता हूं ऐसा
ही नहीं मान्ता, परन्तु मनसहित एकादश इन्द्रिय कर्म करती
हैं ऐसा मानते हैं ॥ ८ ॥
तत्सर्वमर्पयेद्ब्रह्मण्यपि कर्म करोति यः ॥
न लिप्यते पुण्यपापैर्भानुर्जलगतो यथा ॥ ९ ॥
और जो कर्म करनेहारा सब कर्म ब्रह्ममें अर्पणकर देताहै,