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सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 29

( २८ ) गणेशगीता-अ० २.
वर्णान्सृष्ट्वावदं चाहं सयज्ञांस्तान्पुरा प्रिय ॥
यज्ञेन ऋध्यतामेष कामदः कल्पवृक्षवत् ॥१०॥
पूर्व कालमें मैने यज्ञरूपी नित्यकर्मकेही साथ साथ मनु-
ष्योंको रचकर कहा-हे मनुष्यो ! तुम वृद्धिको प्राप्त हो, यह
क्रिया तुम्हारी इष्ट सिद्धिकी देनेवाली हो ॥ १० ॥
सुरांश्चान्नेन प्रीणध्वं सुरास्ते प्रीणयन्तु वः ॥
लभत्वं परमं स्थानमन्योन्यप्रीणनात्स्थिरम् ११
तुम देवताओंको अन्नसे तृप्त करो, देवता तुमको वर्षा
आदिसे प्रसन्न करेंगे, इसप्रकार परस्पर वृद्धि करते हुए तुम
और देवता सब श्रेष्ठ स्थानको प्राप्त हो ॥ ११ ॥
इष्टा देवाः प्रदास्यन्ति भोगानिष्टान्सुतर्पिताः ॥
तैर्दत्तांस्तानरस्तेभ्योऽदत्त्वाभुङ्क्ते स तस्करः १२
देवता प्रसन्न होकर तुम्हारे मनोवांछित मनोरथोंको पूर्ण
करेंगे, उन देवतोंके दिये पदार्थोंसे उनका आराधन किये
विना जो भोग भोगता है वह चोर है ॥ १२ ॥
हुतावशिष्टभोक्तारो मुक्ताः स्युः सर्वपातकैः ॥
अदन्त्येनो महापापा आत्महेतोःपचन्ति ये १३
जो देवताका आराधनरूप यज्ञ करके अवशिष्ट अन्न