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सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 130 में से

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पृष्ठ 32

भाषाटीकासमेत । ( ३१ )
हे राजन् ! कर्म करनेसे बहुतसे राजर्षि परमसिद्धिको प्राप्त
हुए हैं. लोक संग्रहके निमित्तही अनासक्त होकर कर्म करने
उचित हैं ॥ २० ॥
श्रेयान्यत्कुरुते कर्म तत्करोत्यखिलो जनः ॥
मनुते यत्प्रमाणं स तदेवानुसरत्यसौ ॥२१॥
जो कर्म महत् पुरुष करते हैं, वही कर्म और सब करते हैं
वह जिसका प्रमाण करते हैं, दूसरे भी उसीको मानते हैं ॥२१॥
विष्टपे मे न साध्योऽस्ति कश्चिदर्थो नराधिप ॥
अनालब्धश्च लब्धव्यःकुर्वे कर्म तथाप्यहम् २२॥
हे राजन् ! मुझे कोई वस्तु स्वर्गादिमें दुर्लभ नहीं है, और
मैं कर्म करके किसी अलभ्य वस्तुको प्राप्त होनेकी भी इच्छा
नहीं करताहूं ॥ २२ ॥
न कुर्वेऽहं यदा कर्म स्वतन्त्रोऽलसभाविताः ॥
करिष्यन्ति मम ध्यानं सर्वे वर्णा महामते॥२३॥
और जो मैं आलसी और स्वतंत्र होकर कर्म न करूं तो
सबही वर्ण कर्म छोडकर केवल मेरा ध्यानहीं करें ॥ २३ ॥
भविष्यन्ति ततो लोका उच्छिन्नाः संप्रदायिनः॥
हंता स्यामस्य लोकस्य विधाता शंकरस्यच २४॥