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सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 25

( २४ ) गणेशगीता-अ० १.
अतस्तानीह संरुध्य सर्वतः खानि मानवः ॥
स्वस्वार्थेभ्यः प्रधावंति बुद्धिरस्य स्थिरा तदा ६७
इसकारण प्राणीको उचित है कि, सब प्रकारसे विषयोंकी
ओर धावमान होती हुई इन्द्रियोंको वशमें करे, तब इसकी
बुद्धि स्थिर हो ॥ ६७ ॥
ममताहंकृती त्यक्त्वा सर्वान्कामांश्च यस्त्यजेत् ॥
नित्यं ज्ञानरतो भूत्वा ज्ञानान्मुक्तिं स यास्यति॥
जो ममत्व अहंकार और सब कामनाओंका त्याग करताहै,
नित्य ज्ञानमें मग्न रहताहै वह ज्ञानसे मुक्तिको प्राप्त होजाता है ६८
एवं ब्रह्मधियं भूप यो विजानाति दैवतः ॥
तुर्यामवस्थां प्राप्यापि जीवन्मुक्तिं प्रयास्यति ६९
ॐतत्सादीति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासुयोगामृता-
र्थशास्त्रे श्रीमन्महागणेशपुराणे उत्तरखण्डे बाल-
चरिते गजाननवरेण्यसंवादे सांख्यसारार्थ-
योगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥