ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
फिर जो दृश्य दृष्टि-पथमें आता । उसमें जो छोटा बड़ा दीखता ।
उसे मिटाने ध्यान खड्ग धरता । विवेक मुष्टिमें ॥ ४८ ॥
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शांतो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥
ब्रह्म प्राप्ति पथके ये शत्रु—
ऐसे संसार-रणांगण पर । सूर्यसा जाता चीरता अंधार ।
मोक्षश्रीका बनने भर्त्तार । निर्भय होके ॥ ४९ ॥
वहां जो रोकने आता । उस वैरीको मारता ।
उसमें पहला होता । देहाहंकार ॥ १०५० ॥
मार कर वह नहीं छोड़ता । जन्म देकर जीने नहीं देता ।
पेंचमें डाल कुंठित करता । अस्थि पंजरके ॥ ५१ ॥
देह दुर्ग उसका सहारा । तोड कर लिया धनुर्धरा ।
तथा बल है यह दूसरा । मारा शत्रू ॥ ५२ ॥
विषयोंका नाम ही सुनकर । बढ़ जाता चौगुनेसे ऊपर ।
मृतावस्थामें यह धनुर्धर । पहुंचाता विश्वको ॥ ५३ ॥
वह है विषय-विषका गर्त । सब दोषोंका चक्रवर्ती पार्थ ।
किंतु कैसे ध्यान-खड्गका घात । सहेगा वह ॥ ५४ ॥
प्रिय विषय जब होते प्राप्त । उस सुखको कर अभिव्यक्त ।
वही आवरण डालके पार्थ । करता है गर्जना ॥ ५५ ॥
सन्मार्गको ही जो भुलाता । अधर्म वनमें फंसाता ।
बाघके मुखमें है देता । नरकादिक ॥ ५६ ॥
विश्वाससे मारता जो रिपु । निर्मम कर देता है दर्प ।
जिसके नामसे आता कंप । तपस्वियोंको ॥ ५७ ॥
बल दर्प अहंकार काम क्रोध परिग्रह ।
छोड़ कर स-ममत्व पाता है ब्रह्म शांतिसे ॥ ५३ ॥
ज्ञानेश्वरी ८०४
क्रोध जैसा है महादोष । जिसका होता परिपाक ।
भरनेसे होता अधिक । रीता ही जो ॥ ५८ ॥
वह काम जिस स्थान पर । नष्ट होता उस स्थान पर ।
क्रोध भी सहज धनुर्धर । होता है नष्ट ॥ ५९ ॥
जड़ ही तोड़नेसे जैसे । शाखायें नष्ट होती वैसे ।
वैसे ही कामके नाशसे । नासता है क्रोध ॥ १०६० ॥
इसीलिये वैरी है जो काम । उसीका मिटाया जब नाम ।
मिटता जैसे गमनागम । क्रोधका भी ॥ ६१ ॥
जैसे अपना अड़गोड़ा समर्थ । अपराधीके सिरपे होता पार्थ ।
वैसे भोग देकर होता समर्थ । परिग्रह ॥ ६२ ॥
वैसे ही खुगीर सिरपे देता । अंगांगमें अवगुण भरता ।
जीवके हाथमें लकड़ी देता । ममत्वकी जो ॥ ६३ ॥
शिष्य-शाखादि विलाससे । मठ मुद्रादि बहानेसे ।
डाले हैं जो इसने फांसे । असंगों पर भी ॥ ६४ ॥
घरमें कुटुंब रूपसे रहता । वनमें वन्य बन अवतरता ।
नग्न शरीरको भी चिपकता । पांडुकुमार ॥ ६५ ॥
अपरिग्रह जो ऐसा दुर्जय । उसपे भी पाकर विजय ।
भव विजयका धनंजय । आता उत्साह ॥ ६६ ॥
अमानित्वादि जो संपूर्ण । ज्ञानके होते सभी गुण ।
वैफल्य देशके प्रधान । होते हैं जैसे ॥ ६७ ॥
सम्यग्ज्ञानका राज्य अर्पण । करके वे सभी गुणगण ।
उसके परिवार भूषण । होके रहते हैं ॥ ६८ ॥
तब प्रवृत्तिके राज-पथमें । अवस्था-भेद प्रमदियां आपमें ।
दीठ उतारती प्रति-पगमें । अपने सुखकी ॥ ६९ ॥
बोधके दंडसे विवेक जब । दृश्योंकी भीड हटाता सब ।
योगकी भूमिका आके तब । आरती उतारती ॥ १०७० ॥
८०५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
तब ऋद्धि सिद्धिके समुदाय । आते रहते समय समय ।
उस पुष्प-वृष्टिसे धनंजय । नहाता रहता वह ॥ ७१ ॥
इस भांति ब्रह्मैक्यके समान । स्वराज्य आता है समीप जान ।
आनंदसे तीनों लोक अर्जुन । भर देता है ॥ ७२ ॥
शत्रु-मित्रभाव तब अर्जुन । नहीं रहता साम्यके कारण ।
न होता द्वंद्व अणु समान । उस समय ॥ ७३ ॥
यही नहीं किसी कारणसे । कभी कहें यह मेरा ऐसे ।
इतना द्वैत भी प्रतीतिसे । न जानता वह ॥ ७४ ॥
एक मात्र तब अपनी सत्ता । विश्व-व्यापी करके पांडुसुता ।
पास फटकने न देता ममता । इतना भी वह ॥ ७५ ॥
जीतकर ऐसा रिपुवर्ग । आप बन गया सारा जग ।
तब होगया तुरंत योग । वहां सुदृढ ॥ ७६ ॥
अपने पथके शत्रुओंको जीतनेके बाद—
फिर वैराग्यका आवरण । तनपे दृढ था जो अर्जुन ।
करता शिथिल कुछ क्षण । उस समय ॥ ७७ ॥
चलाने ध्यानकी जो तलवार । सम्मुख नहीं द्वैत धनुर्धर ।
तब होता है ध्यानका भी कर । कुछ शिथिल ॥ ७८ ॥
अथवा रसौषधि जैसे । अपना काम हो जानेसे ।
आप ही न रहती वैसे । उसी प्रकार ॥ ७९ ॥
जैसे है जहां पहुंचना होता । वह स्थान देख पैर रुकता ।
वैसे ब्रह्म-दर्शनसे होता । अभ्यास शिथिल ॥ १०८० ॥
जैसे सिंधुसे संपर्क आता । गंगाका वेग भी उतरता ।
या पतिसे मिलके स्थिरता । आती कामिनीमें ॥ ८१ ॥
अथवा आता है जब फल । बढ़ न सकता जब केल ।
या गांव आते जैसे केवल । रुकता मार्ग ॥ ८२ ॥
ज्ञानेश्वरी ८०६
वैसे ही आत्म-साक्षात्कार । होता है यह देख कर ।
साधनाका जो हथियार । रखता नीचे ॥ ८३ ॥
इसीलिये ब्रह्मसे उसका । समय आने पर ऐक्यका ।
शिथिल होता है साधनोंका । वेग पार्थ ॥ ८४ ॥
वैराग्यका फिर है तिरोधान । नानाभ्यासका वार्धक्य अर्जुन ।
योग फलका परिपाक जान । दशा है जो ॥ ८५ ॥
तब वह शांति मान पांडुसुता । उसके अंगांगमें आती पूर्णता ।
ब्रह्मत्व पाके योग्य है वह होता । पुण्य-पुरुष ॥ ८६ ॥
पूर्णिमासे जैसे चतुर्दशी । अल्पत्वमें रहता है शशी ।
या सोलहवे कससे जैसे । पंद्रह होता अल्प ॥ ८७ ॥
सागरमें जाता पानी वेगसे । वह होता गंगौघका जैसे ।
तथा जो निश्चलतासे । रहता सिंधुका ॥ ८८ ॥
ब्रह्म या ब्रह्मत्वके निकट । व्यक्ति होता उसमें सुभट ।
ऐसा अंतर जो वह काट । पाता ब्रह्मत्व ॥ ८९ ॥
परंतु ऐसे हुए बिन । प्रतीत होता ब्रह्मपन ।
वही ब्रह्म होनेकी जान । योग्यता है वहां ॥ १०९० ॥
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ ५४ ॥
वह ब्रह्म-भाव योग्यता । पुरुष फिर पांडुसुता ।
आत्म-बोधकी प्रसन्नता । पद पाता है ॥ ९१ ॥
जिस तापसे होता है पाक । वह जाता पकनेपे पाक ।
फिर जैसे आह्लाद कारक । होता है वह ॥ ९२ ॥
अनेक प्रवाह जैसे लगभग । शरत्कालमें तजते है गंग ।
अथवा गीत होनेपे उपांग । रुकते जैसे ॥ ९३ ॥
हुवा ब्रह्म प्रसन्नात्मा कामना शोकके बिन ।
पाता मेरी परा भक्ति देखती साम्य जो कहीं ॥ ५४ ॥
८०७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
आत्म-बोधमें ऐसा उद्यम । करते हुए होता है श्रम ।
उसका भी हो जाता है शम । जिस स्थानपे ॥ ९४ ॥
आत्म-बोध प्रसन्नता । कहलाती वह पार्थ ! ।
उसका है भोग लेता । योग-साधक ॥ ९५ ॥
ब्रह्म-प्राप्तिके समयका विवेचन—
उस स्थितिमें शोक करना । किसी वस्तुकी इच्छा करना ।
डूबती यह सब भावना । साम्य-पूरमें ॥ ९६ ॥
उदय होते ही गभस्ति । नक्षत्र-मंडलकी व्यक्ति ।
लोपती है उसकी दीप्ति । जिस प्रकार ॥ ९७ ॥
उदय होते ही आत्म-प्रभा । जो सारी भूत भेद व्यवस्था ।
तोड़ते हुए वह देखता । अपनारूप ॥ ९८ ॥
पाटी पे लिखे अक्षर । जैसे पोंछते हैं कर ।
वैसे खोते भेदांतर । उसकी दृष्टिमें ॥ ९९ ॥
वैसे ही जो अन्यथा ज्ञान । दिखाता जागृति स्वप्न ।
वे दोनों क्रियायें हैं लीन । अज्ञानमें ॥ ११०० ॥
फिर वह भी अज्ञान । बोध बढते ही लीन ।
उस बोधमें संपूर्ण । डूबता है ॥ १ ॥
जैसे भोजनके समय । क्षुधा क्षीणती धनंजय ।
वैसे ही तृप्तिके समय । होती है अस्त ॥ २ ॥
जैसे वेग बढ़ता जाता । वैसे मार्ग घटता जाता ।
फिर जब गंतव्य आता । डूबता मार्ग ॥ ३ ॥
या जागृतिका होता उदीपन । निद्रा क्षीण होते जाती अर्जुन
वैसे ही पूर्ण जागृतिमें मान । निद्राका अंत ॥ ४ ॥
या अपना पूर्णत्व मिलता । चंद्रका बढ़ना ही मिटता ।
शुक्ल-पक्षका भी अंत आता । तब निःशेष ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ८०८
जैसे सभी पदार्थ-ज्ञान । निगल जाता मेरा ज्ञान ।
तब वह संपूर्ण ज्ञान । अज्ञान निगलता ॥ ६ ॥
जैसे कल्पांतके समय । नदी सिंधुके समुदाय ।
एक होकर धनंजय । जल होता आम्रक्ष ॥ ७ ॥
या मिटकर नाना घटाकाश । एक हो जाता है महदाकाश ।
या काष्ठोंसे जलके काष्ठ शेष । रहता है अग्नि ॥ ८ ॥
अथवा भूषणके आकार । आंचमें सभी पिघलकर ।
सारा नाम रूप मिटाकर । होता है सुवर्ण ॥ ९ ॥
अथवा होते ही जागृत । हो जाता है स्वप्नका अस्त ।
फिर जैसे आपही पार्थ । रह जाता है ॥ १११० ॥
वैसे ही मुझ एकको छोडकर । न उसे अपने सह कुछ और ।
कहाती जो चौथी भक्ति धनुर्धर । पाता है वह ॥ ११ ॥
जहां आर्त जिज्ञासू अर्थार्थी । जिस मार्गसे करते भक्ति ।
इसे देख मैं कहता चौथी । भक्ति इसको ॥ १२ ॥
वैसे नहीं पहली या चौथी । दूसरी तीसरी इस भांति ।
किंतु जो मेरी सहज स्थिति । भक्ति नाम उसका ॥ १३ ॥
मेरे अज्ञानका प्रकाशन । दिखाके मेरा अन्यथा ज्ञान ।
सबको सर्वत्र ही भजन- । सुझाती है ॥ १४ ॥
जहां जो जैसे देखता वैसे । उसे वहां रहता है वैसे ।
दीखता मेरे चित्प्रकाशसे । यह अखंड ॥ १५ ॥
स्वप्नका दीखना या न दीखना । अपने अस्तित्वपे होना जाना ।
जिससे विश्वका होना या न होना । प्रकाशना वैसे ॥ १६ ॥
ऐसा यह मेरा सहज । प्रकाश जो है कपिध्वज ।
वह भक्ति नामसे आज । कहा जाता है ॥ १७ ॥
इसीलिये आर्तोंमें जैसे । बनके उत्कट इच्छासे ।
अपेक्षणीय जो है उसे । भाता मैं ही ॥ १८ ॥
८०९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
जिज्ञासूके सन्मुख वीरेशा । इसी भांति होकर जिज्ञासा ।
मैं ही मानो जिज्ञास्यु है ऐसा । दिखाया गया है ॥ १९ ॥
ऐसे ही बनकर अर्थना । मैं ही मेरे अर्थार्थ अर्जुना ।
करके तब अर्थाभिधाना । लाता मुझको ही ॥ ११२० ॥
ऐसे ही अज्ञानका कर स्वीकार । करते भक्तिमें मेरा व्यवहार ।
दिखाती भक्ति दृश्य-रूप लेकर । मुझ द्रष्टाको ही ॥ २१ ॥
मुखको दीखता वहां मुख । इस बोलनेमें नहीं चूक ।
झूठा द्वैत दिखाता है देख । दर्पण यहां ॥ २२ ॥
चंद्रको ही देखते हैं नेत्र । तिमिर करता यही मात्र ।
दिखाता रहता है सर्वत्र । एकका होकर ॥ २३ ॥
सर्वत्र ऐसे मुझको मैं अर्जुन । भक्तिसे होता रहता आकलन ।
किंतु है दृश्यत्व अज्ञान कारण । व्यर्थका यहां ॥ २४ ॥
मिटा अब वह सब अज्ञान । मेरा द्रष्टृत्व मुझे मिला मान ।
निज-बिंबमें हुवा है विलीन । प्रतिबिंब जैसे ॥ २५ ॥
सोनेमें जब मिला रहता मल । तब भी सोना रहता है अचल ।
किंतु जल करके वह केवल । रहता सोना ही ॥ २६ ॥
अजी ! पूर्णमासिके पहले कहीं । चंद्रमा सावयव होता या नहीं ।
पूर्णचंद्र देखने मिलता यहीं । पूर्णमासीको ॥ २७ ॥
वैसे मैं अन्यथा ज्ञानसे । दीखता हूं भिन्न रूपसे ।
वह द्रष्टत्वमें खोनेसे । मुझे मैं भेटता ॥ २८ ॥
तभी दृश्यपथातीत । मेरा यह पांडुसुत ।
भक्तियोग है चतुर्थ । कहा मैंने ॥ २९ ॥
ज्ञान-भक्तिसे जो सहजरूप । भक्त मुझमें लीन हुवा आप ।
वह केवल मैं हूं परंतप । जानता तू यह ॥ ११३० ॥
जो मैं हुवा नहीं उसके लिये मैं है ही नहीं—
मैंने ही हाथ उठाकर । ज्ञानी भक्त जो धनुर्धर ।
मेरा आत्मा इस प्रकार । कहा सातवेमें ॥ ३१ ॥
ज्ञानेश्वरी ८१०
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनंतरम् ॥ ५५ ॥
भक्ति जो कल्पादिमें मुझसे । उपदेश रूप जो ब्रह्मसे ।
कही गयी है उत्तम ऐसे । भागवतद्वारा ॥ ३२ ॥
ज्ञानी इसको स्व-संवित्ति । शैव कहते इसे शक्ति ।
तथा हम परम-भक्ति । कहते अपनी ॥ ३३ ॥
मुझसे मिलते हुए यह भक्ति । उस श्रमयोगियोंको है फलती ।
फिर समस्त विश्वको ही देखती । मेरे ही रूपमें ॥ ३४ ॥
वहां वैराग्य विवेकके साथ । मिटता है बंध मोक्ष समस्त ।
डूबती वृत्ति ध्यान सह पार्थ । उस समय ॥ ३५ ॥
चारों तत्त्वोंको निगलकर । रहता आकार मात्र धनुर्धर ।
नहीं रहता उसका ओर छोर । कल्पांतमें जैसे ॥ ३६ ॥
उस भांति होकर कूटस्थ । शुद्ध मैं साध्य साधनातीत ।
वह बनकर मुझे पार्थ । भोगता है ॥ ३७ ॥
बनकर सिंधुका अंग । सिंधुपे झलकती गंग ।
ऐसे रूपका उसका भोग । सुन तू यह ॥ ३८ ॥
या दर्पणको ही दर्पण । दिखाया मान तू अर्जुन ।
बढ़ता तब दृष्टापन । वैसे इस भोगमें ॥ ३९ ॥
जागृतका जब स्वप्न नाशता । अपना ही तब ऐक्य दीखता ।
जैसे जागृतिका ऐक्य भोगता । बिनाद्वैतके ॥ ११४० ॥
जाने दो जब दर्पण खोता । तब मुख-बोध भी ले जाता ।
मुख-सौंदर्य आप भोगता । अकेला जैसे ॥ ४१ ॥
वही होनेसे भोग उसका । न होता यह भाव जिसका ।
शब्दसे कैसे करें शब्दका । कह तू उच्चार ॥ ४२ ॥
भक्तिसे तत्त्वता जान कौन मैं कितना रहा ।
इस भांति मुझे जान मुझमें मिलते फिर ॥ ५५ ॥
८११ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग.
किसके गांवमें दीपकसे । सूर्यको उजाला जाता कैसे ।
व्योमके लिये मांडव कैसे । उभारते न जाने ॥ ४३ ॥
अपनेमें नहीं जब राजपन । भोगेगा कैसा जी राजा राजपन ।
या अंधार करेगा आलिंगन । सूर्यसे कैसे ॥ ४४ ॥
अथवा जो नहीं है आकाश । वह जानेगा कैसे आकाश ।
गूंणचीका गहना विशेष । सोहेगा क्या रत्नोमें ॥ ४५ ॥
इसीलिये जो मैं हुवा नहीं । उसके लिये मैं है ही नहीं ।
फिर भजेगा कैसे जो कोई । कह तू मुझसे ॥ ४६ ॥
अद्वैतमें क्रिया कर्म नहीं होता किंतु भक्ति होती है—
इसी लिये है वह क्रमयोगी । मैं बनकर मेरा भोगी ।
तारुण्य भोगती है तरुणांगी । उसी प्रकार ॥ ४७ ॥
तोय करता सर्वांगसे यदि चुंबन । प्रभा सर्वत्र विलसती है बिंब मान ।
नाना आकाश नभमें होकर विलीन । भोगते हैं जैसे ॥ ४८ ॥
वैसे है जो मेरा ही रूप होकर । अक्रिय भजता मुझे निरंतर ।
भोगता रहता जैसे अलंकार । स्वर्णको ही ॥ ४९ ॥
चंदनकी सुगंध जैसे । चंदन भोगती आपसे ।
या स्वाभाविक चंद्र जैसे । चंद्रिकाको ॥ ११५० ॥
ऐसे वह क्रिया नहीं सहता । अद्वैतमें भक्ति होती है पार्था ।
यह अनुभवसे जाना जाता । तोलनेसे नहीं ॥ ५१ ॥
तब पूर्व संस्कारके कारण । जो कुछ होता है यह भाषण ।
वह विनय सुन मैं अर्जुन । बोलता हूं ॥ ५२ ॥
शब्दको शब्द ही जब मिलता । बोलका व्यवहार नहीं होता ।
तब है मौन ही स्तवन होता । सुंदर मेरा ॥ ५३ ॥
इसीलिये जब वह बोलता । बोलने वालेसे मैं हूं मिलता ।
तब मौनसे ही वह तत्वता । स्तवता मुझको ॥ ५४ ॥
ज्ञानेश्वरी ८१२
वैसे ही बुद्धि हो अथवा दृष्टि । जिसे देखना चाहती किरीटी ।
उस दृष्टिको ही हराके दृष्टि । दिखाती अपनेको ॥ ५५ ॥
दर्पणके पहले अपना मुख । देखनेवाला ही देखता देख ।
उसीको दर्पणमें वही देख - । सकता है जैसे ॥ ५६ ॥
वैसे दृश्य मिटकर द्रष्टा । जैसे मिलता द्रष्टासे द्रष्टा ।
वैसे अकेलेमें नहीं मिटा । द्रष्टापन कभी ॥ ५७ ॥
जैसे स्वप्नकी प्रियाको मान । जगके करना आलिंगन ।
रहता है आपही अर्जुन । प्रियाप्रिय मिलके ॥ ५८ ॥
या दो लकड़ियोंका घर्षण । उससे उठता अग्निकण ।
दोकी भाषा मिटाके अर्जुन । रहता वह एक ॥ ५९ ॥
क्रमयोगी सदैव मुझे भोगता रहता है—
करमें ले अनेक प्रतिबिंब । लेके चलता जब सूर्यबिंब ।
प्रतिबिंबके साथही बिंब । न होता बिंबत्व ॥ ११६० ॥
वैसा मैं होकर देखता । वह दृश्यको ही ले जाता ।
वहां दृश्य भी नहीं होता । द्रष्टापन भी ॥ ६१ ॥
रवि अंधार प्रकाशता । न होती जैसे प्रकाश्यता ।
वैसे दृश्यमें द्रष्टा । मैं होनेसे ॥ ६२ ॥
फिर देखना या न देखना । ऐसी दशाको अनुभवना ।
यह है जो वास्तविक होना । दर्शन मेरा ॥ ६३ ॥
जो कुछ वह देखता । द्रष्टा दृश्यातीत हो पार्था ।
इस दृष्टिसे है भोगता । क्रमयोगी सदा ॥ ६४ ॥
तथा आकाश आकाशसे जैसे । भरकर नहीं हिलता वैसे ।
मैं आत्मासे अपनेमें भी वैसे । होता है उसको ॥ ६५ ॥
कल्पांतमें उदकसे उदक । रोकनेसे सबही जैसे देख ।
रुक जाता वैसे आत्मासे एक । भर जाता वह ॥ ६६ ॥
पैर अपने पर कैसे चढेगा । अग्नि अपनेको कैसे जलायेगा ।
पानी आपही कैसे स्नान करेगा । अपनेसेही ॥ ६७ ॥
८१३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग'
सभी मैं होनेसे अर्जुना । रुक जाता है आना जाना ।
यही है यात्रादि करना । मुझ अद्वयको ॥ ६८ ॥
जैसे जल पर तरंग । यदि दौड़ता है सवेग ।
फिर भी नहीं भूमिभाग । आक्रमता वैसे ॥ ६९ ॥
उसका तजना या धरना । चलना अथवा रुकना ।
वह उदक ही एक पूर्ण । इसी प्रकार ॥ ११७० ॥
तमी वह कहीं भी जाता । उदक परसे ही पार्था ।
आरंभकी एकात्मकता । न टूटती कभी ॥ ७१ ॥
ऐसे वह मैं से भरा रहता । संपूर्ण ही वह मद्रूप होता ।
ऐसे वह सदा यात्रा करता । मेरी ही अर्जुन ॥ ७२ ॥
तथा कभी शरीर स्वभावसे । कहीं कुछ भी कर बैठनेसे ।
तब इस कारण मैं ही उसे । प्राप्त होता हूं ॥ ७३ ॥
वहां है कर्म और कर्ता । यह सब मिटके पार्था ।
मैं आत्मा ही मुझ देखता । अपने आप ॥ ७४ ॥
तब वह न रहनेकासा रहता है न करनेकासा करता है—
दर्पणसे जैसे दर्पण । देखा तो न होता दर्शन ।
सोनेसे ढकता स्वर्ण । न ढकने जैसे ॥ ७५ ॥
दीपको जब दीप प्रकाशता । वह न प्रकाशना ही बनता ।
वैसे ही जब मैं कर्म करता । न करने जैसे ॥ ७६ ॥
कर्म भी वह करता रहता । किंतु कर्तव्य-भाव न रहता ।
वह करना न-करना होता । ऐसे समय ॥ ७७ ॥
कर्म तब जब मद्रूप बनता । तब वह कुछ करना न होता ।
उसका नाम ही पूजन हो जाता । यह है रहस्य ॥ ७८ ॥
ऐसे करके भी सब । न करना होता तब ।
होती महापूजा जब । इस पूजासे ॥ ७९ ॥
ज्ञानेश्वरी ८१४
तब जो बोलता वह स्तवन । जो कुछ देखता वह दर्शन ।
मेरे अद्वयका होगा गमन । वह जो चलता ॥ ११८० ॥
वह जो करता वही पूजन । सोचता वह है मेरा स्मरण ।
ऐसे वह रहता है अर्जुन । रहना मुझमें ॥ ८१ ॥
जैसे सुवर्णका भूषण । सुवर्णमें होता अभिन्न ।
वैसे भक्ति-योगी अर्जुन । रहता मुझमें ॥ ८२ ॥
उदकमें जैसे कलोल । कर्पूरमें है परिमल ।
वैसे ही रत्नमें उजाल । अनन्य जैसे ॥ ८३ ॥
अथवा तंतुसे है पट । या माटीसे रहता घट ।
वैसे समरस सुभट । होता मुझसे ॥ ८४ ॥
यह है जानना सिद्ध भक्ति । अथवा संपूर्ण दृश्य जाति ।
आप जैसे देखना सुमति । आत्मत्वसे जो ॥ ८५ ॥
तीनों अवस्थाओके द्वारा । उपाधि उपहिताकार ।
भाव अभाव रूप स्फुर । दृश्य जो यह ॥ ८६ ॥
दृष्टा मैं यह संपूर्ण । ऐसे बोधमें अर्जुन ।
करना वह नर्तन । ढेंडा जैसे ॥ ८७ ॥
रज्जूको जब देखकर । आभास होता व्यालाकार ।
वह रज्जू ऐसा निर्धार । होता जैसे ॥ ८८ ॥
वैसे सुवर्णसे परे कहीं । रत्ती भी भूषण होता नहीं ।
यह सब गलाकार नहीं । करना निश्चित ॥ ८९ ॥
उदकके उस पार । नहीं होता है लहर ।
वहां स्वतंत्र आकार । न मानते जैसे ॥ ११९० ॥
या स्वप्नके सभी पदार्थ । जगकर देखा तो पार्थ ।
अपनेसे सभी पदार्थ । दीखते वे भिन्न ॥ ९१ ॥
यह सब जिसका स्फुरण है उस 'मैं' का स्वरूप—
तथा जो भावाभाव रहता । और जो कुछ ज्ञेय स्फुरता ।
उसे मैं अनुभवता ज्ञाता । ऐसे भोगता वह ॥ ९२ ॥
८१५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
जानता अज मैं अजर । अक्षय तथा मैं अक्षर ।
अपूर्व और मैं अपार । आनंद मैं हूं ॥ ९३ ॥
अचल मैं अच्युत । अनंत मैं अद्वैत ।
आद्य मैं हूं अव्यक्त । व्यक्त भी मैं ॥ ९४ ॥
ईश्य मैं हूं ईश्वर । अनादि मैं अमर ।
अभय मैं आधार । अज्ञेय भी मैं ॥ ९५ ॥
स्वामी मैं सदोदित । सहज मैं सतत ।
सर्व मैं सर्वगत । सर्वातीत भी मैं ॥ ९६ ॥
नवीन मैं पुराण । शून्य और संपूर्ण ।
स्थूल तथा मैं अणु । जो कुछ सबमें ॥ ९७ ॥
अक्रिय मैं हूं एक । असंग मैं अशोक ।
व्याप्त और व्यापक । पुरुषोत्तम मैं ॥ ९८ ॥
अशब्द मैं अश्रोत्र । अरूप मैं अगोत्र ।
सम और स्वतंत्र । ब्रह्म हूं मैं ॥ ९९ ॥
ऐसे आत्मत्वसे मुझे एक । अद्वय भक्तिसे मान ठीक ।
इस बोधको जानना देख । वह भी मैं हूं ॥ १२०० ॥
अजी ! जागृत होने पर जैसे । अपना एकत्व रहता वैसे ।
वही स्फुरता है उसको जैसे । कुछ समय ॥ १ ॥
अथवा प्रकाश कर अर्क । वही रहता है प्रकाशक ।
उसके अभेद्यका द्योतक । वही होता जैसे ॥ २ ॥
वैसे ही वेद्यका होता विलय । वेदक ही रहता धनंजय ।
वही होता है उसको वेद्य । यह भी जानता वह ॥ ३ ॥
ज्ञानका विवेचन—
अपना यह अद्वयपन । जानना है जो ज्ञान अर्जुन ।
वह ईश्वर मैं यह भान । होता है उसको ॥ ४ ॥
फिर द्वैत अद्वैतातीत । आत्मा हूं मैं एक विश्रांत ।
यह मान करके पार्थ । अनुभवना यह ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ८१६
जगनेपे जैसे अकेलापन । अपने आप जाता है अर्जुन ।
तब क्या होता है इसका ज्ञान । नहीं होता वैसे ॥ ६ ॥
देखते जब स्वर्ण भूषण । तब जान कर यह स्वर्ण ।
न गलाते ही वह भूषण । गलता है जैसे ॥ ७ ॥
लवण पिघल कर होता है नीर । तब रहता उसमें कुछ क्षार ।
वैसे ही फिर मिट जाता है क्षार । रहता उदक मात्र ॥ ८ ॥
समरस भक्तिकी अद्वयावस्थाका विवेचन—
वैसे ही मैं और वह ऐसे जो होता । स्वानंदानुभव समरसमें पार्था ।
सान कर जब एक रूप हो जाता । मुझमें सब ॥ ९ ॥
तब वह यह ऐसा बोल मिटता । कह तू तब मैं किसके लिये होता ।
ऐसे मैं वह यह सब ही मिटता । स्वरूपमें ही ॥ १२१० ॥
कर्पूर जब जल चुकता । अग्नि भी तब समाप्त होता ।
तब उभयातीत रहता । आकाश मात्र ॥ ११ ॥
या एकमेंसे जब एक जाता । केवल शून्य मात्र है रहता ।
तब है नहीं सब ही मिट जाता । शेष रहता मैं ही ॥ १२ ॥
वहां ब्रह्म आत्मा ईश । मिटती है ऐसी भाष ।
अबोलका अवकाश । वहं भी नहीं होता ॥ १३ ॥
न बोलना भी है बोलकर । वह भी बोलके मुह भर ।
जानना न जानना भूलकर । जाना जानना जो ॥ १४ ॥
बोधसे जहां बोध जानना । आनंदसे आनंद भोगना ।
सुखसे सुख अनुभवना । होता है केवल ॥ १५ ॥
वहां जुडता लाभ लाभमें । मिलती है प्रभा प्रभामें ।
डूब कर खड़ा विस्मयमें । स्वयं विस्मय ॥ १६ ॥
साम्य हुवा है वहां समसे । विश्राम हुवा है विश्रांतिसे ।
अनुभव पगलाया है जैसे । अनुभूतिमें ही ॥ १७ ॥
(91) ८१७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
अथवा मानो ऐसे निखिल । मैं पनका मिलता है फल ।
सेवन करती लता वेल । क्रमयोगका वह ॥ १८ ॥
क्रमयोगी चक्रवर्तिके मुकुट पर । रहता है चिद्घन मैं ऐसा अलंकार ।
अपनी जीव-दशा मुझे अर्पण कर । पाया उपलक्षमें ॥ १९ ॥
क्रमयोग प्रासादका । कलश जो है मोक्षका ।
उसके अवकाशका । हुवा जो विस्तार ॥ १२२० ॥
इस संसारके अरण्यमें । क्रमयोगकी इस राहमें ।
जुड जाता मदैक्य ग्राममें । चलने पर जो ॥ २१ ॥
अथवा क्रमयोग ओघ । मिलके भक्त-चित्त गंगौघ ।
पाया स्वानंदोदधि सवेग । मद्रूपका ॥ २२ ॥
यहां तक जो सुवर्म । क्रमयोगकी महिमा ।
तुझसे कहते हम । बार बार ॥ २३ ॥
देश काल और पदार्थ । साधके मुझे पाना पार्थ ।
ऐसा नहीं मैं हूं समस्त । सबका हूं सर्वस्व ॥ २४ ॥
इसलिये हे मदर्थ । न करना कुछ पार्थ ।
मिलता हूं मैं सतत । इस उपायसे ॥ २५ ॥
गीताकी महत्ताका कथन-
एक शिष्य एक गुरु । रूढ यह व्यवहार ।
यह मत्प्राप्ति प्रकार । जाननेमें ॥ २६ ॥
वसुधाके उदरमें अर्जुन । रखा रहता है सिद्ध निधान ।
या अग्निका काठ दूधका स्तन । स्थान है जैसे ॥ २७ ॥
स्वभाव सिद्ध ही यह होता । किंतु उपायसे ही मिलता ।
सिद्ध जो होता वही मिलता । वैसा ही मैं ॥ २८ ॥
फल कहने पर क्या उपाय । कहता है यहां श्रीकृष्णराय ।
इसको कहनेका अभिप्राय । यहां है ऐसे ॥ २९ ॥
ज्ञानेश्वरी ८१८
गीतार्थकी है श्रेष्ठता । मोक्षोपायही है पूर्णता ।
न अन्य शास्त्रसा होता । प्रमाणसिद्ध ॥ १२३० ॥
वायु जैसे बादल हटाता । सूर्यको वह नहीं बनाता ।
या हाथ जलकुंबी हटाता । न बनाता नीर ॥ ३१ ॥
आत्म-दर्शनके आड सकल । रहता है जो अविद्याका मल ।
नाशते हैं शास्त्र वह निर्मल । तब मैं प्रकाशता ॥ ३२ ॥
इसीलिये जो सभी शास्त्र । अविद्या नाशके हैं पात्र ।
किंतु नहीं है वे स्वतंत्र । आत्म-बोधमें ॥ ३३ ॥
जहां तक अध्यात्म शास्त्रकी बात । उसकी सच्चाईका प्रश्न निश्चित ।
आता है तब अंतिम यह गीता । शास्त्र है श्रेष्ठ ॥ ३४ ॥
प्राची जैसे सूर्यसे विभूषित । करती दिशा सतेज सतत ।
वैसे शास्त्रेश्वर गीता सनाथ । करती शास्त्रोंको ॥ ३५ ॥
बोले हैं ऐसे ये शास्त्रेश्वर । पीछे ही उपाय सविस्तर ।
जिससे हाथसे ले उठाकर । आत्मतत्व ॥ ३६ ॥
किंतु प्रथम वचनको अर्जुन । न स्वीकारें यदि तत्व अर्जुन ।
इस विचारसे हो सकरुण । कहता है श्रीहरि ॥ ३७ ॥
वही प्रमेय इस अवसर । शिष्यको करनेके लिये स्थिर ।
कह रहा है फिर एक बार । यहां श्रीकृष्ण ॥ ३८ ॥
प्रसंग भी है गीता-ग्रंथ । मुक्तायका आया साथ ।
तभी है दिखाता साद्यंत । एकार्थत्व ॥ ३९ ॥
गीताग्रंथ मध्य-भागमें । नाना अधिकार प्रसंगमें ।
अनेक सिद्धांतके रूपमें । किया निरूपण ॥ १२४० ॥
वहां जो है सब सिद्धांत । इस शास्त्रमें हैं प्रस्तुत ।
परंपरासे हो अज्ञात । मानेगा कोई ॥ ४१ ॥
उस महासिद्धांतके अंतर्गत । आ गये हैं अन्य अनेक सिद्धांत ।
उन सबके साथ ग्रंथ समाप्त । करता है श्रीहरि ॥ ४२ ॥
८१९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
अविद्या-नाशका है स्थल । जिससे है मोक्ष प्राप्तिका फल ।
इन दोनों विषयोंका केवल । साधन है ज्ञान ॥ ४३ ॥
इतने ही हैं जो नाना प्रकार । कहे हैं ग्रंथ विस्तार कर ।
उसीको अल्पमें चक्रधर । कहता है अब ॥ ४४ ॥
तभी साध्य प्राप्त होने पर । साधनाका विवेचन कर ।
कहता कर ग्रंथ विस्तार । इसी भावसे ॥ ४५ ॥
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥
गीता साधनाका सारांशमें पुनःकथन-
कहता फिर हे सुभट । क्रमयोगी वह स-निष्ठ ।
मैं होके करता प्रविष्ट । मेरे ही रूपमें ॥ ४६ ॥
स्वकर्मोंके सुमनोंसे । मेरी पूजा करनेसे ।
पाता प्रसाद रूपसे । ज्ञान-निष्ठाको ॥ ४७ ॥
ज्ञान जब वह हाथ आता । भक्तिमें है उल्लास भरता ।
इससे फिर है सुख पाता । समरस होके ॥ ४८ ॥
करता जो विश्व-प्रकाशन । आत्मा जो वह मैं हूं अर्जुन ।
वह आत्मा सर्वव्यापी मान । अनुकरण करता ॥ ४९ ॥
तजके अपनी कठोरता । नून जैसे पानीमें घुलता ।
या चलके वायु है समाता । आकाशमें जैसे ॥ १२५० ॥
वैसे ही काया वाचा मनसे । मेरा आश्रय करता उसे ।
निषिद्ध कर्म भी भूलसे । करता तब ॥ ५१ ॥
आनेसे जैसे गंगाका संबंध । गंदा नाला होता है महानद ।
वैसे ही होने पर मेरा बोध । न रहता शुभाशुभ ॥ ५२ ॥
मेरे आश्रयमें नित्य करके सब कर्मको ।
पाता मेरी कृपासे ही मेरा ही पद शाश्वत ॥ ६६ ॥
ज्ञानेश्वरी ८२०
तथा कूरा अथवा चंदन । नहीं करता अग्नि भक्षण ।
तब तक रहते हैं भिन्न । इस प्रकार ॥ ५३ ॥
पांच अथवा षोड़श । तब तक होता कस ।
जब तक है पारस । नहीं छूता ॥ ५४ ॥
ऐसे हैं यह शुभाशुभ । रहता है भरतर्षभ ।
जब तक न होता लाभ । मेरे प्रकाशका ॥ ५५ ॥
अजी ! रात्र और दिव । तब तक द्वैत भाव ।
जब तक है अभाव । सूर्यका जहां ॥ ५६ ॥
इसीलिये होते ही मेरी भेट । उसके सभी कर्म हैं सुभट ।
मिट कर मिल जाता है पाट । मेरे सायुज्यका ॥ ५७ ॥
देश काल तथा स्वभाव । जिसका नाश न संभव ।
ऐसा पद वह पांडव । पाता अविनाशी ॥ ५८ ॥
अथवा मानो पांडुसुता । आत्माकी मेरी प्रसन्नता ।
अलंकार उसे मिलता । इससे बड़ा क्या लाभ ॥ ५९ ॥
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७ ॥
समर्पणका रहस्य—
इसीलिये हे अर्जुन । सभी कर्म समर्पण ।
कर तू अपने जान । मेरे स्वरूपमें ॥ १२६० ॥
वह समर्पण धनुर्धर । कृत्रिम रूपसे तू न कर ।
आत्म-विवेकसे धरकर । कर तू चित्तवृत्तिको ॥ ६१ ॥
फिर वह विवेक बल । सभी कर्ममें जो निराला ।
मेरे रूपमें ही निर्मल । देखेगा तू ॥ ६२ ॥
मुझ मत्पर वृत्तीसे सौंपके कर्म जो सब ।
समत्वमें स्थिरतासे मुझमें चित्त तू रख ॥ ५७ ॥
८२१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
तथा कर्मका जन्म-स्थान । मेरी प्रकृति जो अर्जुन ।
करेगा उसका दर्शन । अपनेसे दूर ॥ ६३ ॥
अपनेसे प्रकृति भिन्न । नहीं रहती है अर्जुन ।
करेगा उसका दर्शन । अपनेसे दूर ॥ ६४ ॥
इससे प्रकृतिका नाश । होकरके कर्म-संन्यास ।
उत्पन्न होगा अनायास । सकारण ॥ ६५ ॥
मिटकर सब कर्म-जात । आत्मा मात्र मैं रहता पार्थ ।
उसमें बुद्धिको तू व्रतस्थ । करके रख ॥ ६६ ॥
बुद्धि है जो अनन्ययोगसे । मुझमें पैठ जायेगी ऐसे ।
तब अन्य विषय त्यागसे । मुझेही भजेगा चित्त ॥ ६७ ॥
तज कर विषय जात । चित्त हुवा मुझमें रत ।
चिंतन करेगा सतत । मेरा ही वह ॥ ६८ ॥
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनंक्ष्यसि ॥ ५८ ॥
इस सेवासे जब अभिन्न । भरेगा चित्त मुझसे जान ।
मेरा प्रसाद हुवा संपूर्ण । जान तू यह ॥ ६९ ॥
वह सकल दुःख धाम । भोगे जाते जो मृत्यु जन्म ।
दुर्गम वे सब सुगम । होंगे तुझे ॥ १२७० ॥
सूर्य-सहायका जो आश्रय । आंखोंको मिलता धनंजय ।
रहा क्या वहां तमका भय । कह तू मुझे ॥ ७१ ॥
वैसे ही है प्रसाद मेरा अर्जुन । करता जीवदशा उपमर्दन ।
उसे कैसे संसारका हौवा जान । डरायेगा कभी ॥ ७२ ॥
इसीलिये हे पार्थ । संसारका जो गर्त ।
तरेगा तू निश्चित । मेरी कृपासे ॥ ७३ ॥
सभी दुःख तभी मेरी कृपासे तर जायगा ।
नाश निश्चित पायगा न मान यह मानसे ॥ ५८ ॥
ज्ञानेश्वरी ८२२
अथवा तू साभिमान । मेरा सब ये कथन ।
रखेगा सीमापे जान । कान मनकी ॥ ७४ ॥
यदि तू है नित्य मुक्त अव्यय । व्यर्थ होकर वह धनंजय ।
देहाहंकारका आघात भय । होगा तुझको ॥ ७५ ॥
जिस देह संबंधमें पार्थ । प्रति पगमें है आत्मघात ।
भोगनेमें होगा सदा श्रांत । शांति न मिलेगी ॥ ७६ ॥
इस बोलका तू धनुर्धर । नहीं करेगा यदि विचार ।
मृत्यु न होके भी भयंकर । पायेगा मृत्यु ॥ ७७ ॥
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥
पथ्य-द्वेषी पोसता है ज्वर । या दीप-द्वेषीको अंधःकार ।
विवेक-द्वेषसे अहंकार । पोसता वैसे ॥ ७८ ॥
स्वदेहका नाम अर्जुन । पर देहका नाम स्वजन ।
संग्रामका नाम मलिन । पापाचार ॥ ७९ ॥
ऐसी अपनी मति अर्जुन । तीनोंको नाम देकर तीन ।
मै न लडूंगा ऐसा वचन । कहती है जो ॥ १२८० ॥
मनमें ऐसा निश्चय एक । करेगा यदि तू आत्यंतिक ।
कार्य करेगा सो नैसर्गिक । स्वभाव तेरा ॥ ८१ ॥
तथा मैं अर्जुन ये आत्मिक । इनको मारना है पातक ।
यह है जान भ्रम-मूलक । है तत्वहीन ॥ ८२ ॥
पहले होता है तू लडाका । तथा फिर शस्त्र उठानेका ।
फिर कहता न लड़नेका । विचार अपना ॥ ८३ ॥
इसीलिये नहीं जूझना । व्यर्थ है तेरा जो कहना ।
लौकिक दृष्टिसे भी जान । तो भी व्यर्थे ॥ ८४ ॥
कहेगा न लडूंगा मैं वश हो अहंकारके ।
यह निश्चय है पार्थ करायेगा स्वभाव जो ॥ ५९ ॥
८२३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग