ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजानता अज मैं अजर । अक्षय तथा मैं अक्षर ।
अपूर्व और मैं अपार । आनंद मैं हूं ॥ ९३ ॥
अचल मैं अच्युत । अनंत मैं अद्वैत ।
आद्य मैं हूं अव्यक्त । व्यक्त भी मैं ॥ ९४ ॥
ईश्य मैं हूं ईश्वर । अनादि मैं अमर ।
अभय मैं आधार । अज्ञेय भी मैं ॥ ९५ ॥
स्वामी मैं सदोदित । सहज मैं सतत ।
सर्व मैं सर्वगत । सर्वातीत भी मैं ॥ ९६ ॥
नवीन मैं पुराण । शून्य और संपूर्ण ।
स्थूल तथा मैं अणु । जो कुछ सबमें ॥ ९७ ॥
अक्रिय मैं हूं एक । असंग मैं अशोक ।
व्याप्त और व्यापक । पुरुषोत्तम मैं ॥ ९८ ॥
अशब्द मैं अश्रोत्र । अरूप मैं अगोत्र ।
सम और स्वतंत्र । ब्रह्म हूं मैं ॥ ९९ ॥
ऐसे आत्मत्वसे मुझे एक । अद्वय भक्तिसे मान ठीक ।
इस बोधको जानना देख । वह भी मैं हूं ॥ १२०० ॥
अजी ! जागृत होने पर जैसे । अपना एकत्व रहता वैसे ।
वही स्फुरता है उसको जैसे । कुछ समय ॥ १ ॥
अथवा प्रकाश कर अर्क । वही रहता है प्रकाशक ।
उसके अभेद्यका द्योतक । वही होता जैसे ॥ २ ॥
वैसे ही वेद्यका होता विलय । वेदक ही रहता धनंजय ।
वही होता है उसको वेद्य । यह भी जानता वह ॥ ३ ॥
ज्ञानका विवेचन—
अपना यह अद्वयपन । जानना है जो ज्ञान अर्जुन ।
वह ईश्वर मैं यह भान । होता है उसको ॥ ४ ॥
फिर द्वैत अद्वैतातीत । आत्मा हूं मैं एक विश्रांत ।
यह मान करके पार्थ । अनुभवना यह ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ८१६