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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 883

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनंतरम् ॥ ५५ ॥
भक्ति जो कल्पादिमें मुझसे । उपदेश रूप जो ब्रह्मसे ।
कही गयी है उत्तम ऐसे । भागवतद्वारा ॥ ३२ ॥
ज्ञानी इसको स्व-संवित्ति । शैव कहते इसे शक्ति ।
तथा हम परम-भक्ति । कहते अपनी ॥ ३३ ॥
मुझसे मिलते हुए यह भक्ति । उस श्रमयोगियोंको है फलती ।
फिर समस्त विश्वको ही देखती । मेरे ही रूपमें ॥ ३४ ॥
वहां वैराग्य विवेकके साथ । मिटता है बंध मोक्ष समस्त ।
डूबती वृत्ति ध्यान सह पार्थ । उस समय ॥ ३५ ॥
चारों तत्त्वोंको निगलकर । रहता आकार मात्र धनुर्धर ।
नहीं रहता उसका ओर छोर । कल्पांतमें जैसे ॥ ३६ ॥
उस भांति होकर कूटस्थ । शुद्ध मैं साध्य साधनातीत ।
वह बनकर मुझे पार्थ । भोगता है ॥ ३७ ॥
बनकर सिंधुका अंग । सिंधुपे झलकती गंग ।
ऐसे रूपका उसका भोग । सुन तू यह ॥ ३८ ॥
या दर्पणको ही दर्पण । दिखाया मान तू अर्जुन ।
बढ़ता तब दृष्टापन । वैसे इस भोगमें ॥ ३९ ॥
जागृतका जब स्वप्न नाशता । अपना ही तब ऐक्य दीखता ।
जैसे जागृतिका ऐक्य भोगता । बिनाद्वैतके ॥ ११४० ॥
जाने दो जब दर्पण खोता । तब मुख-बोध भी ले जाता ।
मुख-सौंदर्य आप भोगता । अकेला जैसे ॥ ४१ ॥
वही होनेसे भोग उसका । न होता यह भाव जिसका ।
शब्दसे कैसे करें शब्दका । कह तू उच्चार ॥ ४२ ॥

भक्तिसे तत्त्वता जान कौन मैं कितना रहा ।
इस भांति मुझे जान मुझमें मिलते फिर ॥ ५५ ॥
८११ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग.