ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब ऋद्धि सिद्धिके समुदाय । आते रहते समय समय ।
उस पुष्प-वृष्टिसे धनंजय । नहाता रहता वह ॥ ७१ ॥
इस भांति ब्रह्मैक्यके समान । स्वराज्य आता है समीप जान ।
आनंदसे तीनों लोक अर्जुन । भर देता है ॥ ७२ ॥
शत्रु-मित्रभाव तब अर्जुन । नहीं रहता साम्यके कारण ।
न होता द्वंद्व अणु समान । उस समय ॥ ७३ ॥
यही नहीं किसी कारणसे । कभी कहें यह मेरा ऐसे ।
इतना द्वैत भी प्रतीतिसे । न जानता वह ॥ ७४ ॥
एक मात्र तब अपनी सत्ता । विश्व-व्यापी करके पांडुसुता ।
पास फटकने न देता ममता । इतना भी वह ॥ ७५ ॥
जीतकर ऐसा रिपुवर्ग । आप बन गया सारा जग ।
तब होगया तुरंत योग । वहां सुदृढ ॥ ७६ ॥
अपने पथके शत्रुओंको जीतनेके बाद—
फिर वैराग्यका आवरण । तनपे दृढ था जो अर्जुन ।
करता शिथिल कुछ क्षण । उस समय ॥ ७७ ॥
चलाने ध्यानकी जो तलवार । सम्मुख नहीं द्वैत धनुर्धर ।
तब होता है ध्यानका भी कर । कुछ शिथिल ॥ ७८ ॥
अथवा रसौषधि जैसे । अपना काम हो जानेसे ।
आप ही न रहती वैसे । उसी प्रकार ॥ ७९ ॥
जैसे है जहां पहुंचना होता । वह स्थान देख पैर रुकता ।
वैसे ब्रह्म-दर्शनसे होता । अभ्यास शिथिल ॥ १०८० ॥
जैसे सिंधुसे संपर्क आता । गंगाका वेग भी उतरता ।
या पतिसे मिलके स्थिरता । आती कामिनीमें ॥ ८१ ॥
अथवा आता है जब फल । बढ़ न सकता जब केल ।
या गांव आते जैसे केवल । रुकता मार्ग ॥ ८२ ॥
ज्ञानेश्वरी ८०६