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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 881

जैसे सभी पदार्थ-ज्ञान । निगल जाता मेरा ज्ञान ।
तब वह संपूर्ण ज्ञान । अज्ञान निगलता ॥ ६ ॥
जैसे कल्पांतके समय । नदी सिंधुके समुदाय ।
एक होकर धनंजय । जल होता आम्रक्ष ॥ ७ ॥
या मिटकर नाना घटाकाश । एक हो जाता है महदाकाश ।
या काष्ठोंसे जलके काष्ठ शेष । रहता है अग्नि ॥ ८ ॥
अथवा भूषणके आकार । आंचमें सभी पिघलकर ।
सारा नाम रूप मिटाकर । होता है सुवर्ण ॥ ९ ॥
अथवा होते ही जागृत । हो जाता है स्वप्नका अस्त ।
फिर जैसे आपही पार्थ । रह जाता है ॥ १११० ॥
वैसे ही मुझ एकको छोडकर । न उसे अपने सह कुछ और ।
कहाती जो चौथी भक्ति धनुर्धर । पाता है वह ॥ ११ ॥
जहां आर्त जिज्ञासू अर्थार्थी । जिस मार्गसे करते भक्ति ।
इसे देख मैं कहता चौथी । भक्ति इसको ॥ १२ ॥
वैसे नहीं पहली या चौथी । दूसरी तीसरी इस भांति ।
किंतु जो मेरी सहज स्थिति । भक्ति नाम उसका ॥ १३ ॥
मेरे अज्ञानका प्रकाशन । दिखाके मेरा अन्यथा ज्ञान ।
सबको सर्वत्र ही भजन- । सुझाती है ॥ १४ ॥
जहां जो जैसे देखता वैसे । उसे वहां रहता है वैसे ।
दीखता मेरे चित्प्रकाशसे । यह अखंड ॥ १५ ॥
स्वप्नका दीखना या न दीखना । अपने अस्तित्वपे होना जाना ।
जिससे विश्वका होना या न होना । प्रकाशना वैसे ॥ १६ ॥
ऐसा यह मेरा सहज । प्रकाश जो है कपिध्वज ।
वह भक्ति नामसे आज । कहा जाता है ॥ १७ ॥
इसीलिये आर्तोंमें जैसे । बनके उत्कट इच्छासे ।
अपेक्षणीय जो है उसे । भाता मैं ही ॥ १८ ॥
८०९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग