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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 887

तब जो बोलता वह स्तवन । जो कुछ देखता वह दर्शन ।
मेरे अद्वयका होगा गमन । वह जो चलता ॥ ११८० ॥
वह जो करता वही पूजन । सोचता वह है मेरा स्मरण ।
ऐसे वह रहता है अर्जुन । रहना मुझमें ॥ ८१ ॥
जैसे सुवर्णका भूषण । सुवर्णमें होता अभिन्न ।
वैसे भक्ति-योगी अर्जुन । रहता मुझमें ॥ ८२ ॥
उदकमें जैसे कलोल । कर्पूरमें है परिमल ।
वैसे ही रत्नमें उजाल । अनन्य जैसे ॥ ८३ ॥
अथवा तंतुसे है पट । या माटीसे रहता घट ।
वैसे समरस सुभट । होता मुझसे ॥ ८४ ॥
यह है जानना सिद्ध भक्ति । अथवा संपूर्ण दृश्य जाति ।
आप जैसे देखना सुमति । आत्मत्वसे जो ॥ ८५ ॥
तीनों अवस्थाओके द्वारा । उपाधि उपहिताकार ।
भाव अभाव रूप स्फुर । दृश्य जो यह ॥ ८६ ॥
दृष्टा मैं यह संपूर्ण । ऐसे बोधमें अर्जुन ।
करना वह नर्तन । ढेंडा जैसे ॥ ८७ ॥
रज्जूको जब देखकर । आभास होता व्यालाकार ।
वह रज्जू ऐसा निर्धार । होता जैसे ॥ ८८ ॥
वैसे सुवर्णसे परे कहीं । रत्ती भी भूषण होता नहीं ।
यह सब गलाकार नहीं । करना निश्चित ॥ ८९ ॥
उदकके उस पार । नहीं होता है लहर ।
वहां स्वतंत्र आकार । न मानते जैसे ॥ ११९० ॥
या स्वप्नके सभी पदार्थ । जगकर देखा तो पार्थ ।
अपनेसे सभी पदार्थ । दीखते वे भिन्न ॥ ९१ ॥
यह सब जिसका स्फुरण है उस 'मैं' का स्वरूप—
तथा जो भावाभाव रहता । और जो कुछ ज्ञेय स्फुरता ।
उसे मैं अनुभवता ज्ञाता । ऐसे भोगता वह ॥ ९२ ॥
८१५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग